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सलवात

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यह लेख सलवात के परिभाषा के बारे में है। सूरह-अहज़ाब की आयत 56 के बारे मं जानने के लिए, सलवात की आयत देखें।
सलावत की सुलेख कृति, नस्तालीक़ लिपि में, सुलेखकार: गुलाम हुसैन अमीरखानी (1996–97 ई).

सलवात, क़ुरआन के उन आदेशों में से एक है जो इससे जुड़ी आयत (सलवात की आयत) में मानने वालों को दिए गए हैं। इस कार्य को पैग़म्बर (स) के प्रति कृतज्ञता की निशानी और उनसे प्रेम को मज़बूत करने वाला साधन माना जाता है।, और हदीस के स्रोतों में इस काम के कई असर बताए गए हैं, जिनमें गुनाहों से पाक होना, आसमान के दरवाज़े खुलना, और पैग़म्बर की शफ़ाअत मिलने की संभावना शामिल है।

सलवात के सबसे मशहूर शब्द है "अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मद व आले-मुहम्मद" और कुछ शिया रिवायतों में इसके बाद "अज्जिल फ़रजहुम" कहने की सिफ़ारिश की गई है। शिया न्यायशास्त्रियों के फ़तवे के अनुसार, नमाज़ के तशह्हुद में सलवात का पढ़ना ज़रूरी (वाजिब) है, और इसे जानबूझकर छोड़ने से नमाज़ अमान्य हो जाती है; सलवात शुक्रवार की नमाज़ के ख़ुत्बे और जनाज़े की नमाज़ में भी ज़रूरी है।

किसी भी समय सलवात का पढ़ना अच्छा है, लेकिन कुछ समय और हालात, जैसे पैग़म्बर (स) का नाम सुनना, नमाज़ के रूकूअ और सजदों में, और कुछ खास समय, में सलवात पढ़ने की ज़्यादा सिफ़ारिश की गई हैं।

अपनी इबादत के अलावा, शियों में सलवात, समारोहों, धार्मिक सभाओं और रोज़ाना के कामों में भी आम है, और कुछ शिया अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सलवात का चिल्ला भी करते हैं।

सलवात के दर्शन में, पैग़म्बर (स) और अहले-बैत (स) के लिए रहमत की दुआ मांगना, उनकी याद और नाम का सम्मान करना और उनकी सुन्नत का पालन करना शामिल है। शिया संस्कृति में, सलवात में परिवार (अहले बैत (अ)) को जोड़ना आम बात है और बहुत से स्रोतों में इसे एक ज़रूरी नियम माना गया है, जबकि वहाबियों के नेता इब्ने तैमिया ने शियों जैसा दिखने से बचने के लिए इसे छोड़ना पसंद किया है।

महत्व और स्थिति

दुआ और मुनाजात

सलवात क़ुरआन में एक हुक्म है।[] सलवात की आयत में, अल्लाह और फ़रिश्ते भी पैग़म्बर (स) पर दुआ भेजते हैं और उनके मानने वालों को ऐसा करने का हुक्म देते हैं।[] सलवात भेजना एक धार्मिक रस्म माना जाता है[] और यह शियों में आम है।[]

यह ज़िक्र (पाठ) ज़्यादातर मुस्लिम समारोहों और जमावड़ों में पढ़ा जाता है, जिसमें जश्न और शोक समारोह भी शामिल हैं।[] शिया संस्कृति में, पैग़म्बर (स) का नाम सुनते ही सलवात पढ़ी जाती है, और इसे छोड़ना बुरा माना जाता है।[] कुछ शिया सलावत को अपना हमेशा पढ़ने वाला ज़िक्र (पाठ) भी बना लेते हैं या इसे एक तय संख्या में पढ़ने की शपथ लेते हैं।[]

धार्मिक अनिवार्य कर्तव्यों और क़ुरआन की तिलावत के बाद सलवात को सबसे उत्तम इबादतों में गिना गया है।[] इसका उल्लेख कई पवित्र लोगों (मासूमीन (अ)) की दुआओं में किया गया है, खासकर सहीफ़ा अल-सज्जादिया में।[] और रिवायत में भी, बहुत ही कंजूस इंसान का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वह ऐसा व्यक्ति है जो पैग़म्बर (स) का नाम सुनकर भी सलवात नहीं पढ़ता।[१०]

शिया न्यायविद इस बात पर एकमत हैं कि नमाज़ के तशह्हुद में सलवात पढ़ना अनिवार्य है, और अगर कोई जानबूझकर इसे छोड़ देता है, तो उसकी नमाज़ अमान्य है।[११] कुछ सुन्नी न्यायविद ने भी इस दृष्टिकोण को माना है।[१२] तशह्हुद के अलावा, शुक्रवार की नमाज़ के खुत्बे[१३] और जनाज़े की नमाज़ में पैग़म्बर (स) और उनके परिवार पर दुआ भेजना ज़रूरी माना गया है।[१४] इसी तरह से, शिया टीकाकारों में से एक, नासिर मकारिम शीराज़ी के अनुसार, सलवात की आयत के आधार पर, पैग़म्बर (स) पर उनके पूरे जीवन में एक बार दुआ भेजना वाजिब है।[१५]

मुस्लिम संस्कृति में सलवात

मुस्लिम संस्कृति में, सलवात का इस्तेमाल कई तरह के हालात में किया जाता है जैसे लोरी गाना, कहावतें सुनाना, खेती की फसल बोते और काटते समय[१६] कुछ इस्लामी देशो जैसे ईरान में, सलवात का एक राजनितिक और समाजिक काम भी रहा है; इस तरह से कि, इमाम ख़ुमैनी का नाम सुनकर सलवात भेजना, लोगों ने उनके देश निकाला के दौरान उनके अधिकार और लीडरशिप की स्थिति को मज़बूत करने में मदद की।[१७]

सलवात का चिल्ला एक प्रथा है जिसमें कुछ व्यक्ति, मासूमीन के नीयत से और अपनी ज़रूरतों (मन्नतों) को पूरा करने के लिए,[१८] लगातार एक निश्चित संख्या में सलवात भेजते हैं (उदाहरण के लिए, 100, 1000, या 14,000)।[१९] यह प्रथा आमतौर पर एक मन्नत (नज़्र) के कारण की जाती है।[२०] सलवात का चिल्ला समूहों में भी आयोजित किया जाता है, और प्रत्येक व्यक्ति एक निश्चित संख्या में सलवात एक साथ पूरा करते हैं।[२१]प्रत्येक सामूहिक नमाज़ के बाद, कोई व्यक्ति सलवात की आयत को ज़ोर से पढ़ता है और नमाज़ पढ़ने वाले तीन बार सलवात भेजते हैं, सलवात भेजने की यह शैली हिन्दुस्तान सहित दूसरों देशों में पाई जाती है मगर वहाँ सामूहिक नमाज़ के बाद सलवात की आयत के बाद केवल बार सलवात पढ़ी जाती है। मिस्बाह अल-मुतहज्जिद पुस्तक में, नमाज़ के बाद सलवात की आयत को ताक़ीबाते नमाज़ के तौर पर पढ़ने की सलाह दी गई है।[२२]

कवियों ने सलवात-नामे नामक रचनाओं की रचना दोहे, ग़ज़ल और क़सीदा जैसे रूपों में भी की है।[२३] इन कविताओं का उद्देश्य आशीर्वाद प्राप्त करना है; जिसका अर्थ है कि श्रोता को प्रत्येक छंद के अंत को सुनने पर आशीर्वाद (सलवात) भेजने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।[२४] सलवात का पाठ करना भी एक धार्मिक कला है जो कुछ क्षेत्रों में लोकप्रिय है।[२५] इस अनुष्ठान में, सलवात का स्मरण मधुर और सामंजस्यपूर्ण तरीके से किया जाता है और आमतौर पर जन्मदिन की पार्टियों और धार्मिक समारोहों में किया जाता है।[२६]

सलवात का दर्शन

आय ए सलावत, जली सुलुस लिपि में। सुलेखकार: Seyit Ahmet Depeler, जो तुर्की के प्रसिद्ध ख़ुशनवीस हैं।

सलवात को पैग़म्बर (स) की 23 वर्षों के प्रयासों के लिए तारीफ़ का एक रूप और उनके लिए प्यार को मज़बूत करने वाला एक कारण माना जाता है।[२७] शोधकर्ताओ का मानना ​​है कि सलवात भेजकर, मानने वाले पैग़म्बर और उनके परिवार को अपने और भगवान के बीच माध्यम बनाते हैं ताकि उन्हें भगवान की रहमत मिल सके।[२८] एक सम्पूर्ण इंसान की मिसाल पर चलना,[२९] पैग़म्बर और उनके परिवार का सम्मान करना, भगवान के चुने हुए लोगों के नामों और यादों का सम्मान करना, नबूवत और विलायत के रास्ते पर चलने पर ध्यान देना, और नबूवत और इमामत की अटूटता को दिखाना सलवात के दूसरे दर्शनों में से हैं।[३०]

पैग़म्बर और उनके परिवार को सलवात भेजना फ़ायदेमंद है या नहीं, इस बारे में दो दृष्टिकोण हैं।[३१] शिया न्यायविद शहीद सानी,[३२] ''तफ़सीर अल-मीज़ान'' के लेखक अल्लामा तबातबाई[३३] और उनके छात्र हसन हसनज़ादे आमोली[३४] जैसे लोग मानते हैं कि पैग़म्बर (स) का दर्जा इतना ऊंचा है कि उन्हें विश्वासियों (मोमिनों) की प्रार्थनाओं की आवश्यकता नहीं है, और इसलिए सलवात का प्रभाव वक्ता को स्वयं वापस मिल जाता है।[३५] इसके विपरीत, मुहम्मद बाक़िर मजलिसी और मुर्तज़ा मुतह्हरी का मानना ​​है कि हालांकि पैग़म्बर (स) और उनके परिवार का दर्जा बहुत ऊंचा है, मगर वे पूर्णता के मार्ग पर हैं और आशीर्वाद भेजने से ईश्वर के नज़दीक उनका दर्जा बढ़ जाता है।[३६]

यदि सलवात ईश्वर की ओर से हो, तो इस आशीर्वाद का अर्थ दया है; यदि स्वर्गदूतों की तरफ़ से है, तो इसका अर्थ क्षमा मांगना है; और यदि मनुष्यों की ओर से है, तो इसका अर्थ प्रार्थना है।[३७]

गुण और प्रभाव

हदीस के स्रोतों में, सलवात के लिए कई आध्यात्मिक और भौतिक इनाम और प्रभाव बताए गए हैं। इनमें से कुछ काम इस प्रकार हैं:

  1. पापों के लिए प्रायश्चित[३८]
  2. पापों से मुक्ति[३९]
  3. कर्मों के पैमाने पर सबसे भारी काम[४०]
  4. स्वर्ग के दरवाजे़ खोलना और पापों को नष्ट करना[४१]
  5. ईश्वर से दोस्ती[४२]
  6. पैग़म्बर (स) की शफ़ाअत हासिल करना[४३]
  7. पाखंड को ख़त्म करना (ऊंची आवाज़ में सलवात पढ़ कर)[४४]
  8. भूली हुई बात का याद आ जाना[४५]
  9. फ़रिश्तों का माफ़ी मांगना (सलवात लिखने वाले के लिए)[४६]
  10. दुआ क़बूल होना[४७]
  11. जहन्नम की आग से राहत[४८]
  12. सौ मन्नतों का पूरी होना[४९]
  13. सलवात पढ़ने वाले पर ईश्वर और फ़रिश्तों की दुआएँ[५०]
  14. शुक्रवार के दिन का सबसे अच्छा काम[५१]
  15. इमाम ज़माना (अ) का दर्शन (सुबह और दोपहर की नमाज़ के बाद सलवात पढ़ना)[५२]
  16. कल्याण के द्वार का खुलना[५३]
  17. काबा में सबसे अच्छी दुआ[५४]
  18. कर्मों की शुद्धि[५५]
  19. क़ब्र, सेरात और जन्नत का उजाला[५६]
  20. क़यामत के दिन पैग़म्बर (स) का सबसे क़रीबी व्यक्ति[५७]
  21. तस्बीह, तहलील और तकबीर के बराबर[५८]

क्या हमें मुहम्मद (स) के परिवार पर भी दुआ भेजनी चाहिए?

शिया परंपरा में, पैग़म्बर पर सलवात हमेशा उनके परिवार के साथ भेजी जाती है,[५९] और साहिब जवाहिर के अनुसार, सलवात में "परिवार" जोड़ना एक ज़रूरी धार्मिक नियम माना जाता है;[६०] मराजेए तक़लीद में से एक, सय्यद अबुल क़ासिम ख़ूई ने कुछ हदीसों का हवाला देते हुए संभावना व्यक्त की है,[६१] कि परिवार का ज़िक्र किए बिना पैग़म्बर पर सलवात भेजना हराम हो।[६२]

इसके अलावा, शिया और सुन्नी स्रोतों में उल्लेख की गई रिवायतों के आधार पर, अधूरी सलवात (सिर्फ़ पैग़म्बर को भेजना) भेजने से मना किया गया है, और पूरी सलवात भेजना मुहम्मद और उनके परिवार पर सलवात भेजना माना गया है।[६३] क़ाज़ी नूरुल्लाह शूश्तरी ने इन रिवायतों को किताब एहक़ाक़ अल-हक़ में इकट्ठा किया है।[६४]

शिया मत के अनुसार, परिवार का मतलब अबा के पाँच सदस्यों (पंजतन) (पैग़म्बर (स), अली (अ), फ़ातेमा (स), हसन (अ) और हुसैन (अ)) से है, जिनके बारे में शुद्धि की आयत उतारी गई थी। शिया विद्वान मुक़द्दस अर्दबेली के अनुसार, इस आयत में सभी मासूम इमाम और हज़रत फ़ातिमा शामिल हैं, और इसलिए वे सभी परिवार का हिस्सा माने जाते हैं।[६५] सुन्नी भी परिवार को वे लोग मानते हैं जिनके बारे में शुद्धि की आयत उतारी गई थी, हालाँकि इसके उदाहरणों के बारे में उनकी अलग-अलग राय है।[६६]

सुन्नी विद्वान इब्ने हजर अल-हैसमी के अनुसार, पैग़म्बर पर दुआ भेजने का सही तरीका यह कहना है, (अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मद व अला आले मुहम्मद) "हे अल्लाह, मुहम्मद और उनके परिवार पर दुआ भेजो," और इस आधार पर, शाफ़ेई समूदाय में, मुहम्मद के परिवार पर दुआ भेजना अनिवार्य है।[६७] हालांकि, सलफी विद्वान इब्ने तैमिया के अनुसार, हालांकि पैग़म्बर के आदेश के अनुसार, मुहम्मद के परिवार पर भी सलवात भेजी जानी चाहिए, लेकिन यह सलवात शियों की निशानी बन गया है और इसलिये इसे छोड़ देना बेहतर है।[६८] सनआनी ने भी यह इशारा किया है कि "परिवार" पर सलवात को बंद कर देना उमय्यद युग के दौरान लोगों के डर और तक़य्या के कारण हुआ।[६९]

अहले अल-सुन्नत के सेहाह सित्ता में वर्णित हदीसों के अनुसार, पैग़म्बर (स) ने "आल मुहम्मद" वाक्यांश के साथ सलवात भेजने को अनिवार्य कहा है।[७०] सुन्नी विद्वानों में से एक तक़ीउद्दीन सुबकी ने शिफा अल-सक़ाम पुस्तक में पैग़म्बर की रिवायतों में "आल मुहम्मद" के शब्दों (52 शब्दों) को एकत्रित किया हैं; उनमें से ज्यादातर में "आले मुहम्मद" शामिल है, लेकिन उनमें से किसी ने भी सहाबा पर उस तरह से दुआ भेजने का उल्लेख नहीं किया है जिस तरह से सुन्नी आमतौर पर उन पर सलवात भेजते हैं।[७१]

ऐसा कहा जाता है कि सुन्नियों में ग़ैर-पैग़म्बरों पर सलवात भेजने के बारे में अलग-अलग राय है; कुछ इसे ग़लत मानते हैं, कुछ इसे नापसंद (मकरूह) मानते हैं, और कुछ केवल तभी इसकी अनुमति देते हैं जब सलवात पहले पैग़म्बर पर और फिर किसी और पर भेजी जाए।[७२]

सलावत कब भेजनी चाहिए?

आय ए सलवात का सुलेख

प्रसिद्ध शिया न्यायविदों के अनुसार,[७३] पैग़म्बर (स) का नाम, उपनाम या उपाधि सुनते ही, यहां तक ​​कि नमाज़ के दौरान भी, सलवात भेजना मुस्तहब है।[७४] कुछ न्यायविदों ने इस काम को वाजिब भी माना है।[७५] शिया मराजेए तक़लीद में से एक, हुसैन वहीद ख़ुरासानी ने इमाम अली (अ) का नाम सुनने के बाद भी सलावत भेजने को एक अच्छा काम माना है।[७६]

रिवायातों के अनुसार,[७७] सलवात के लिए सबसे अच्छा समय जुमेरात की रात और शुक्रवार का दिन है।[७८] दूसरे अवसर जब सलावत पढ़ने की सिफ़ारिश की गई दी है, उनमें शामिल यह हैं:

सलावत की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ

सबसे प्रसिद्ध सलवात के शब्द यह اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَ آلِ مُحَمَّد "अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मद वा आले-मुहम्मद" है, लेकिन कुछ रिवायतों में सलवात के ज़िक्र के दूसरे रूपों का भी उल्लेख है।[८१] कुछ विद्वानों के अनुसार, सहीफ़ा-सज्जादिया में सलवात का उल्लेख 210 विभिन्न वाक्यांशों में व्यक्त किया गया है।[८२]

एक हदीस के अनुसार, पैग़म्बर (स) ने सलवात का सही ज़िक्र اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَ آلِ مُحَمَّد "अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मद वा आले-मुहम्मद" माना है और इसे "अल्लाहुम्मा सल्ले मुहम्मद वा अला आले-मुहम्मद" वाक्यांश में कहने से मना किया है।[८३] रियाज़ अल-सालेकीन के लेखक सय्यद अली खान कबीर ने इस हदीस को विश्वसनीय नहीं माना है,[८४] लेकिन मुहम्मद तक़ी मजलिसी का मानना ​​है कि सीरत इस हदीस के सही होने की तरफ़ इशारा करती है।[८५]

सलवात अज्जिल फ़रजहुम के साथ

कुछ शिया सलवात पढ़ने के बाद "अज्जिल फ़रजहुम" वाक्यांश जोड़ते हैं, जिसका मतलब है "उनकी राहत को नज़दीक लाना"।[८६] यह इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर में जल्दी होने की गुज़ारिश है। इमाम सादिक़ (अ.स.) से उल्लेख की गई रिवायतों के अनुसार, इस काम के लिए, कुछ शर्तों के तहत और कुछ संख्या में, इनाम का वादा किया गया है, जिसमें इमाम महदी (अ.स.) से मिलने की कामयाबी,[८७] उनके खास साथियों में शामिल होना,[८८] और क़यामत के दिन उनकी ओर से सिफ़ारिश से फ़ायदा मिलना शामिल है।[८९]

फ़ुटनोट

  1. ज़मानी, «کیفیت صلوات از نگاه فریقین», पृष्ठ 31।
  2. इब्राहीमी, आसार व बरकाते सलवात, पृष्ठ 27-28।
  3. अलवी, आसार अल-सलवात फी रिहाब अल-रिवायत, पृष्ठ 17।
  4. मूसवी, «صلوات، احکام و آثار آن», पृष्ठ 3।
  5. फ़य्याज़, «فقه فریقین و جایگاه اهل‌بیت(ع) در صلوات», पृष्ठ 165।
  6. रेज़ाई, «کیفیت و چگونگی صلوات بر پیامبر اعظم (ص) نزد فریقین», पृष्ठ 74।
  7. रेज़ाई, «کیفیت و چگونگی صلوات بر پیامبر اعظم (ص) نزد فریقین», पृष्ठ 74।
  8. मूसवी, «صلوات، احکام و آثار آن», पृष्ठ 21।
  9. मूसवी, «صلوات، احکام و آثار آن», पृष्ठ 21।
  10. मिस्बाह यज़दी, सहबे अल-हुज़ूर, पृष्ठ 459।
  11. रेज़ाई, «کیفیت و چگونگی صلوات بر پیامبر اعظم (ص) نزد فریقین», पृष्ठ 63।
  12. मावरदी, अल-हावी अल-कबीर, भाग 2, पृष्ठ 137।
  13. नजफ़ी, जवाहिर अल-कलाम, दार इहया अल-तुरास अल-अरबी, भाग 11, पृष्ठ 213–214।
  14. हुसैनी आमेली, मिफ्ताह अल-करामा, दार इहया अल-तुरास अल-अरबी, भाग 1, पृष्ठ 478।
  15. मकारिम शिराज़ी, पयामे इमाम अमीर अल-मोमिनिन, भाग 3, पृष्ठ 200।
  16. शायस्ता रुख, «کاربردشناسی صلوات در ترانه‌های کاشت و برداشت کشاورزی», पृष्ठ 165–167।
  17. रूहबख्श, «صلوات سیاسی», पृष्ठ 40।
  18. क़ज़ावी, ख़त्मे सलवात, पृष्ठ 371।
  19. नसाजी, «رایحه روح‌افزای صلوات», पृष्ठ 59।
  20. क़ज़ावी, ख़त्मे सलवात, पृष्ठ 371।
  21. क़ज़ावी, ख़त्मे सलवात, पृष्ठ 371।
  22. शेख़ तूसी, मिस्बाह अल-मुतहज्जिद, भाग 1, पृष्ठ 50-51।
  23. जावेद, «صلوات‌خوانی هنر عبادی مذهبی ازیادرفته», पृष्ठ 58।
  24. जावेद, «صلوات‌خوانی هنر عبادی مذهبی ازیادرفته», पृष्ठ 58।
  25. जावेद, «صلوات‌خوانی هنر عبادی مذهبی ازیادرفته», पृष्ठ 54।
  26. जावेद, «صلوات‌خوانی هنر عبادی مذهبی ازیادرفته», पृष्ठ 54।
  27. ज़मानी, «کیفیت صلوات از نگاه فریقین», पृष्ठ 30।
  28. इब्राहीमी, आसार वा बरकाते सलवात, पृष्ठ 51।
  29. दारूदगर, «اسرار و آثار صلوات بر پیامبر (ص) و آل پیامبر (ص)», पृष्ठ 15।
  30. मूसवी, «صلوات، احکام و آثار آن», पृष्ठ 24।
  31. कमाली, «نقد دیدگاه عدم انتفاع پیامبر(ص) از دعا و صلوات امت، با تأکید بر امکان رفعت درجه آن حضرت در قوس صعود», पृष्ठ 175।
  32. शहीद सानी, अल-रौज़ा अल-बहिया, खंड 1, पृष्ठ 13।
  33. देखें, तबातबाई, बर्रसीहाय इस्लामी, भाग1, पृष्ठ 150।
  34. आमोली, हज़ार एक नुक्ते, पृष्ठ 186।
  35. शहीद सानी, अल-रौज़ा अल-बहिया, भाग 1, पृष्ठ 13।
  36. मजलिसी, मरात अल-ऊक़ूल, भाग 12, पृष्ठ 112–113; मुतहहरी, मजमूआ आसार, भाग 23, पृष्ठ 316।
  37. तबातबाई, अल-मीज़ान, भाग 16, पृष्ठ 329।
  38. शेख़ सदूक़, ऊयून अख़बार अल-रिज़ा (अ.स.), भाग 1, पृष्ठ 294, हदीस 52।
  39. शायरी, जामेअ अल-अख़बार, पृष्ठ 59।
  40. हिमयरी, कुर्ब अल-इस्नाद, पृष्ठ 14, हदीस 45।
  41. शेख़ सदूक़, अल-अमाली, पृष्ठ 580, हदीस 18।
  42. शेख़ सदूक़, इलल अल-शरायेअ, भाग 1, पृष्ठ 34, हदीस 3।
  43. शईरी, जामेअ अल-अख़बार, पृष्ठ 59।
  44. कुलैनी, अल-काफ़ी, भाग 2, पृष्ठ 493, हदीस 13।
  45. शेख़ सदूक़, ऊयून अख़बार अल-रिज़ा (अ.स.), भाग 1, पृष्ठ 66, हदीस 35।
  46. शहीद सानी, मुन्यत अल-मुरीद, पृष्ठ 347।
  47. शेख़ तूसी, अल-अमाली, पृष्ठ 172, हदीस 42।
  48. शेख़ सदूक़, सवाब अल-अमाल, पृष्ठ 155।
  49. शेख़ सदूक़, सवाब अल-अमाल, पृष्ठ 155।
  50. कुलैनी, अल-काफ़ी, भाग 2, पृष्ठ 492, हदीस 7।
  51. शेख़ सदूक़, अल-ख़ेसाल, भाग 2, पृष्ठ 394, हदीस 101।
  52. शेख़ तूसी, मिस्बाह अल-मुतहज्जिद, भाग 1, पृष्ठ 368।
  53. शईरी, जामेअ अल-अख़बार, पृष्ठ 59।
  54. कुलैनी, अल-काफ़ी, भाग 2, पृष्ठ 494, हदीस 17।
  55. इब्न अश’अस, जा’फ़रियात, मकतबा नैनवह, पृष्ठ 215-216।
  56. रावंदी, अल-दअवात, पृष्ठ 216, हदीस 581।
  57. तबरसी, मकारिम अल-अख़लाक़, पृष्ठ 312।
  58. शेख़ सदूक़, अल-अमाली, पृष्ठ 73, हदीस 4।
  59. फ़य्याज़, «فقه فریقین و جایگاه اهل‌بیت(ع) در صلوات», पृष्ठ 165।
  60. नजफी, जवाहिर अल-कलाम, दार इह्या अल-तुरास अल-अरबी, भाग 10, पृष्ठ 262।
  61. कुलैनी, अल-काफी, भाग 2, पृष्ठ 495, हदीस 21; शेख़ सदूक़, अल-अमाली, पृष्ठ 200, हदीस 9।
  62. ख़ूई, मौसूआ अल-इमाम अल-ख़ूई, भाग 15, पृष्ठ 256।
  63. कुलैनी, अल-काफ़ी, भाग 2, पृष्ठ 495; शरफ़ अल-मुस्तफ़ा, भाग 5, पृष्ठ 107; हैतमी, अल-सवाइक़ अल-मुहर्रेक़ा, भाग 2, पृष्ठ 430।
  64. शुश्तरी, अहक़ाक अल-हक़, भाग 9, पृष्ठ 524-611।
  65. मुक़द्दस अर्देबिली, मजमा अल-फ़ायदा वा अल-बुरहान, भाग 2, पृष्ठ 277।
  66. रेज़ाई, «کیفیت و چگونگی صلوات بر پیامبر اعظم (ص) نزد فریقین», पृष्ठ 74।
  67. हैतमी, अल-सवाइक़ अल-मुहरेक़ा, भाग 2, पृष्ठ 667।
  68. इब्ने तैमिया, मिनहाज अल-सुन्नह अल-नबाविया, भाग 4, पृष्ठ 154।
  69. सनआनी, सुबुल अल-सलाम, भाग 1, पृष्ठ 554।
  70. बुखारी, सहीह अल-बुखारी, भाग 5, पृष्ठ 351; और भाग 7, पृष्ठ 385; और भाग 10, पृष्ठ 103; इब्ने हज्जाज नैशापूरी, सहीह मुस्लिम, दार एह्या अल-तोरास अल-अरबी, भाग 1, पृष्ठ 305।
  71. सुबकी, शिफा अल-सेक़ाम, पृष्ठ 407-412।
  72. मूसवी, «صلوات، احکام و آثار آن», पृष्ठ 11।
  73. नराक़ी, मुसतनद शिया, भाग 5, पृष्ठ 336।
  74. तबाताबाई यज़्दी, अल-उरवा अल-वुसक़ा (अल-महश्शा), भाग 2, पृष्ठ 619।
  75. फ़ाज़िल मिक़दाद, कंज़ अल-इरफ़ान, भाग 1, पृष्ठ 133; शेख़ बहाई, मिफ्ताह अल-फ़लाह, पृष्ठ 38।
  76. वहीद ख़ोरासानी, «صلوات فرستادن هنگام شنیدن نام امیرالمؤمنین(ع) در اذان و اقامه»,” हज़रत आयतुल्लाह वहीद ख़ोरासानी के कार्यालय की आधिकारिक वेबसाइट।
  77. कुलैनी, काफी, भाग 3, पृष्ठ 429।
  78. नसाजी ज़वारेह, «صلوات رمز محبت و وفاداری به پیامبر(ص) و خاندانش(ع)», पृष्ठ 64।
  79. कुलैनी, काफी, भाग 3, पृष्ठ 324।
  80. नसाजी ज़वारेह, «صلوات رمز محبت و وفاداری به پیامبر(ص) و خاندانش(ع)», पृष्ठ 65-66।
  81. फ़य्याज़,«فقه فریقین و جایگاه اهل‌بیت(ع) در صلوات», पृष्ठ 168-169।
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  84. मदनी शिराज़ी, रियाज़ अल-सालेकिन, भाग 1, पृष्ठ 427।
  85. मजलिसी, लवा’मेअ साहिब-ए-क़रानी, ​​भाग 6, पृष्ठ 647।
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स्रोत

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