शफ़ाअत
| धर्मशास्र | |
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| अन्य उत्कृष्ट मान्यताएँ | |
| अहले बैत (अ) • तक़य्या • विलायते फ़क़ीह • तवस्सुल • शफ़ाअत • क़ुरआन का अविरुपण • ज़ियारत • रज्अत |
शफ़ाअत, मुसलमानों के उन साझा विश्वासों में से है, जिसका अर्थ अल्लाह के समक्ष दूसरों की क्षमा के लिए मध्यस्थता करना है। हालांकि, मुस्लिम विद्वानों के बीच शफ़ाअत के अर्थ और उसके दायरे को लेकर मतभेद पाया जाता है। इमामिया, मुरजेआ और अशाएरा का मानना है कि शफ़ाअत बड़े पाप करने वालों के लिए हो सकती है। इमामिया के अनुसार, शफ़ाअत केवल उन्हीं लोगों को प्राप्त होगी जिनके धर्म से अल्लाह प्रसन्न होगा। इसके विपरीत, मुअतज़ेला और ज़ैदिया का मत है कि शफ़ाअत का अर्थ पुण्य में वृद्धि और लाभ पहुँचाना है तथा यह केवल पश्चाताप करने वालों और आज्ञाकारी लोगों के लिए है।
मुस्लिम विद्वानों का इस बात पर सर्वसम्मत मत है कि पैग़म्बर (स) शफ़ाअत करने वालों में से हैं। इमामिया मत के अनुसार, मासूम इमाम (अ) भी शफ़ाअत करने वालों में शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, शिया और सुन्नी हदीसों के आधार पर अम्बिया, धर्मविद् (उलमा), शोहदा, मोमिन तथा क़ुरआन के हाफ़िज़ भी शफ़ाअत करने वालों में गिने गए हैं। कुछ वहाबी विद्वानों ने पैग़म्बर (स) की शफ़ाअत को केवल उनके सांसारिक जीवन तक सीमित माना है, जबकि इस मत का अधिकांश मुस्लिम विद्वानों ने विरोध किया है।
मुस्लिम विद्वानों का इस बात पर सर्वसम्मत मत है कि शफ़ाअत करने वालों की शफ़ाअत काफ़िरों और मुश्रिकों के लिए नहीं होगी। इसके अतिरिक्त, शिया इमामों से वर्णित कुछ रिवायतों के अनुसार, जो व्यक्ति नमाज़ को तुच्छ समझता है, धर्म में ग़ुलू (अतिशयोक्ति) करने वाले तथा अत्याचारी शासक शफ़ाअत से वंचित रहेंगे।
क़ुरआन में शफ़ाअत शब्द लगभग 30 बार आया है। कुछ आयतों में शफ़ाअत को केवल अल्लाह का अधिकार बताया गया है, जबकि अन्य आयतों के अनुसार अल्लाह ने यह अधिकार अपने पैग़म्बर और कुछ अन्य पात्र व्यक्तियों को भी प्रदान किया है।
मुसलमानों के साझा विश्वासों में से एक
शफ़ाअत के मूल सिद्धांत के सत्य होने पर सभी मुसलमानों का सर्वसम्मत मत है।[१] अल्लामा मजलिसी ने अपनी पुस्तक हक़्क़ुल-यक़ीन में शफ़ाअत पर विश्वास को धर्म की अनिवार्य मान्यताओं में सम्मिलित किया है।[२] इब्ने तैमिय्या ने भी शफ़ाअत के सिद्धांत को समस्त मुसलमानों द्वारा स्वीकार किया गया विश्वास माना है और कहा है कि इससे संबंधित हदीसें मुतावातिर हैं तथा सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम जैसी प्रामाणिक हदीस-ग्रंथों में वर्णित हैं।[३] शेख़ सदूक़ द्वारा इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से वर्णित एक रिवायत के अनुसार, जो व्यक्ति शफ़ाअत का इंकार करता है, वह शियों में से नहीं है।[४]
यद्यपि शफ़ाअत के अर्थ और उसके प्रभावों के संबंध में विभिन्न इस्लामी फ़िरक़ों और विद्वानों के बीच मतभेद पाया जाता है।[५] इमामिया, अशाएरा और मुरजेआ के अनुसार, शफ़ाअत का अर्थ पापियों से दंड और यातना को दूर करना है;[६] जबकि मोअतज़ेला के मत में इसका अर्थ आज्ञाकारी और पश्चाताप करने वालों के लिए पुण्य में वृद्धि तथा उनके त की प्राप्ति है।[७]
कहा जाता है कि "शफ़ाअत" शब्द और उसके विभिन्न रूप क़ुरआन में लगभग 30 बार प्रयुक्त हुए हैं।[८] इसी प्रकार, शिया[९] और सुन्नी[१०] हदीस-सात्य में पैग़म्बर (स) तथा शिया इमामों (अ) से शफ़ाअत के विषय में अनेक रिवायतें वर्णित हैं। इस विषय पर मुस्लिम धर्मशास्त्रियों (मुतकल्लेमीन) और क़ुरआन-व्याख्याताओं (मुफ़स्सिरों) ने भी विचार किया है।[११] यहूदी और ईसाई धर्म में भी शफ़ाअत को स्वीकार किया गया है।[१२]
अवधारणा (शफ़ाअत का अर्थ)
शफ़ाअत का अर्थ है ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के लिए, जो दंड और यातना के अधिकारी हों, अल्लाह से उनके दंड को हटाने की प्रार्थना करना।[१३] दूसरे शब्दों में, यह पापों की क्षमा और माफ़ी के लिए की जाने वाली मध्यस्थता या सिफ़ारिश है।[१४]

शफ़ाअत के धार्मिक और सामान्य अर्थ में अंतर
शिया टीकाकार नासिर मकारिम शिराज़ी के अनुसार, शफ़ाअत के धार्मिक और सामान्य (लौकिक) अर्थ में स्पष्ट अंतर है। सामान्य अर्थ में, शफ़ाअत करने वाला अपने प्रभाव, प्रतिष्ठा और अधिकार का उपयोग करके किसी शक्तिशाली व्यक्ति के निर्णय को बदल देता है, जबकि जिस व्यक्ति के लिए सिफ़ारिश की जाती है, उसके आचरण या व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन नहीं होता। लेकिन क़ुरआन और हदीसों में वर्णित शफ़ाअत का आधार स्वयं शफ़ाअत प्राप्त करने वाले व्यक्ति के भीतर होने वाला परिवर्तन और सुधार है। अर्थात् उसके भीतर ऐसे गुण और परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जिनके कारण वह दंड के योग्य अवस्था से निकलकर, शफ़ाअत करने वाले से संबंध स्थापित करने के माध्यम से ऐसी स्थिति प्राप्त कर लेता है, जिससे वह क्षमा और माफ़ी का पात्र बन जाता है।[१५]
शफ़ाअत का अर्थ मार्गदर्शन और नेतृत्व
कुछ विद्वानों ने शफ़ाअत का अर्थ मार्गदर्शन और नेतृत्व माना है। उनके अनुसार, इस संसार में शफ़ाअत करने वालों की शफ़ाअत का स्वरूप लोगों का मार्गदर्शन करना है। इसलिए जो व्यक्ति इस संसार में मार्गदर्शन से वंचित रहा, वह परलोक में भी शफ़ाअत से वंचित रहेगा।[१६] मुर्तज़ा मुतह्हरी और जाफ़र सुब्हानी जैसे विद्वानों के अनुसार, पैग़म्बर (स) तथा अन्य नबियों की अपनी उम्मत के लिए शफ़ाअत, क़ुरआन की शफ़ाअत, यहाँ तक कि उन लोगों के लिए उलमा की शफ़ाअत भी, जिन्हें उन्होंने शिक्षा और मार्गदर्शन दिया है, इसी प्रकार की शफ़ाअत है।[१७]
शफ़ाअत का तवस्सुल और मग़फ़िरत से संबंध
जाफ़र सुब्हानी के अनुसार, तवस्सुल के कई प्रकार हैं, जिनमें से एक यह है कि उन व्यक्तियों से शफ़ाअत की प्रार्थना की जाए जिन्हें अल्लाह ने शफ़ाअत की अनुमति प्रदान की है। इसलिए तवस्सुल उस आवश्यकता-मंद व्यक्ति का कार्य है, जो अल्लाह के निकट उच्च स्थान रखने वाले व्यक्ति से अपने लिए शफ़ाअत की प्रार्थना करता है, जबकि शफ़ाअत उस व्यक्ति का कार्य है, जो उस आवश्यकता-मंद के लिए अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करता है।[१८] प्रसिद्ध दुआ ए तवस्सुल में "शफ़ाअत" और "तवस्सुल" दोनों शब्द साथ-साथ आए हैं। इसमें चौदह मासूमीन (अ) का तवस्सुल करने के साथ-साथ प्रत्येक से शफ़ाअत की भी प्रार्थना की गई है।[१९]
मुर्तज़ा मुतह्हरी के अनुसार, शफ़ाअत वास्तव में वही अल्लाह की मग़फ़िरत (क्षमा) है। जब इसे समस्त भलाई और दया के स्रोत अर्थात् अल्लाह की ओर संबद्ध किया जाता है, तो इसे "मग़फ़िरत" कहा जाता है, और जब इसे अल्लाह की रहमत के माध्यमों की ओर संबद्ध किया जाता है, तो इसे "शफ़ाअत" कहा जाता है।[२०]
शफ़ाअत करने वाले
मुस्लिम विद्वानों का इस बात पर सर्वसम्मत मत है कि पैग़म्बर (स) शफ़ाअत करने वालों में से हैं।[२१] उनके अनुसार, आयत وَمِنَ اللَّيْلِ فَتَهَجَّدْ بِهِ نَافِلَةً لَكَ عَسَىٰ أَنْ يَبْعَثَكَ رَبُّكَ مَقَامًا مَحْمُودًا"[२२] में उल्लिखित "मक़ामे महमूद" से अभिप्राय वही "शफ़ाअत का पद" है, जिसका वादा अल्लाह ने पैग़म्बर (स) से किया है।[२३] शेख़ मुफ़ीद ने अवाइलुल मक़ालात में लिखा है कि इमामिया का इस बात पर सर्वसम्मत मत है कि पैग़म्बर (स) के अतिरिक्त इमाम अली (अ) और अन्य मासूम इमाम (अ) भी अपने अनुयायियों की शफ़ाअत करेंगे।[२४] वे इस विषय में उन रिवायतों का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, जिनमें इमाम अली (अ) तथा अन्य शिया इमामों को शफ़ाअत करने वाला बताया गया है।[२५]
आयत لَا يَمْلِكُونَ الشَّفَاعَةَ إِلَّا مَنِ اتَّخَذَ عِندَ الرَّحْمَٰنِ عَهْدًا[२६] के अनुसार, केवल वही लोग शफ़ाअत कर सकते हैं जिन्होंने अल्लाह के साथ अहद (वचन) किया हो।[२७] "अह्द" के अर्थ के संबंध में मुफ़स्सिरों ने विभिन्न मत प्रस्तुत किए हैं।[२८] तबरसी और सय्यद मुहम्मद हुसैन तबातबाई जैसे मुफ़स्सिरों के अनुसार, इसका अर्थ अल्लाह पर ईमान और उसके नबियों की पुष्टि करना है।[२९] कुछ ने इसका अर्थ नेक अमल[३०] तथा कुछ ने तौहीद और इस्लाम बताया है।[३१] शिया मुफ़स्सिरों के एक समूह ने कुछ रिवायतों[३२] के आधार पर "अह्द" का अर्थ इमाम अली (अ) की विलायत और उनके बाद आने वाले मासूम इमामों (अ) की विलायत बताया है।[३३]
कुछ विद्वानों ने सूरह नज्म की आयत 26 के आधार पर फ़रिश्तों को भी शफ़ाअत करने वालों में सम्मिलित किया है।[३४] नहजुल बलाग़ा में इमाम अली (अ) से वर्णित एक रिवायत के अनुसार, क़ुरआन भी शफ़ाअत करने वालों में से है।[३५] शिया और सुन्नी हदीस-स्रोतों में वर्णित कुछ रिवायतों के अनुसार, नबी, धर्मविद् (उलमा), शोहदा,[३६] मोमिन[३७] तथा क़ुरआन के हाफ़िज़[३८] भी शफ़ाअत करने वालों में गिने गए हैं। इसी प्रकार, शिया हदीस-स्रोतों में वर्णित कुछ रिवायतों के अनुसार, पड़ोसी अपने पड़ोसी की तथा रिश्तेदार अपने रिश्तेदार की शफ़ाअत कर सकेगा।[३९] कुछ रिवायतों में तौबा (पश्चाताप) को भी शफ़ाअत करने वालों में से एक बताया गया है।[४०]
शफ़ाअत प्राप्त करने वाले
व अम्मा शफ़ाअती फ़फ़ी असहाबे अल कबाएरे मा ख़ला अहल अल शिर्के वज़ ज़ुल्मे
अनुवाद: मेरी शफ़ाअत बड़े (कबीरा) पाप करने वालों के लिए है, और वह मुश्रिकों तथा अत्याचारियों को प्राप्त नहीं होगी।
शफ़ाअत प्राप्त करने वालों के विषय में मुस्लिम विद्वानों के बीच मतभेद पाया जाता है।[४१] इमामिया, सूरह अम्बिया की आयत 28[४२] तथा मासूम इमामों (अ) से वर्णित रिवायतों[४३] के आधार पर मानते हैं कि शफ़ाअत केवल उसी व्यक्ति को प्राप्त होगी, जिसके धर्म से अल्लाह प्रसन्न हो, चाहे उसने बड़ा पाप (गुनाहे कबीरा) किया हो या छोटा पाप (गुनाहे सग़ीरा)।[४४] वे मासूम इमामों (अ)[४५] से वर्णित कुछ रिवायतों के आधार पर यह भी मानते हैं कि तौबा करने वाले व्यक्ति को शफ़ाअत की आवश्यकता नहीं रहती।[४६] अशाएरा और मुरजेआ भी इमामिया की भाँति यह मानते हैं कि पैग़म्बर (स) की उम्मत के बड़े पाप करने वाले लोग भी शफ़ाअत के पात्र हो सकते हैं।[४७] इसके विपरीत, मोअतज़ेला, ख़वारिज और ज़ैदिया का मत है कि शफ़ाअत केवल उन मोमिनों के लिए है जिन्होंने अपने पापों से तौबा कर ली हो।[४८] वे सूरह बक़रा की आयत 48 और सूरह ग़ाफ़िर की आयत 18 का प्रमाण देते हुए मानते हैं कि जिसने अपने बड़े पाप से तौबा नहीं की, वह पैग़म्बर (स) की शफ़ाअत का पात्र नहीं होगा।[४९]
इमामिया तथा अन्य मुस्लिम फ़िरक़ों का सूरह ग़ाफ़िर की आयत 18[५०] तथा पैग़म्बर (स)[५१] और शिया इमामों (अ)[५२] से वर्णित रिवायतों के आधार पर इस बात पर सर्वसम्मत मत है कि मुश्रिक और काफ़िर शफ़ाअत के पात्र नहीं होंगे।[५३]
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) ने पैग़म्बर (स) से एक रिवायत वर्णित की है, जिसके अनुसार जो व्यक्ति नमाज़ को हल्का समझता है, वह उनकी शफ़ाअत से वंचित रहेगा।[५४] इसी प्रकार, शिया रिवायतों के अनुसार नासेबी, अत्याचारी शासक तथा धर्म में ग़ुलू (अतिशयोक्ति) करने वाले भी शफ़ाअत के पात्र नहीं होंगे।[५५]
शफ़ाअत अल्लाह की अनुमति से होती है
मुस्लिम विद्वानों का इस बात पर सर्वसम्मत मत है कि शफ़ाअत करने वालों की शफ़ाअत तथा शफ़ाअत प्राप्त करने वालों के लिए उसका स्वीकार किया जाना दोनों ही अल्लाह की अनुमति पर निर्भर हैं। इस विषय में वे सूरह बक़रा की आयत 255,[५६] सूरह यूनुस की आयत 3,[५७] सूरह ताहा की आयत 109,[५८] तथा सूरह नज्म की आयत 26[५९] का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, जिनमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि शफ़ाअत केवल अल्लाह की अनुमति से ही संभव है।
कुछ लोगों ने قُلْ لِلَّهِ الشَّفَاعَةُ جَمِيعًا[६०] अर्थात् "कह दो, समस्त शफ़ाअत अल्लाह ही के लिए है"[६१] तथा مَا لَكُمْ مِنْ دُونِهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا شَفِيعٍ[६२] अर्थात् "उसके अतिरिक्त तुम्हारा न कोई संरक्षक है और न कोई शफ़ाअत करने वाला" जैसी आयतों के आधार पर शफ़ाअत को केवल अल्लाह के लिए विशेष माना है।[६३] इसके उत्तर में कहा गया है कि यद्यपि शफ़ाअत मूल रूप से अल्लाह ही की है, किन्तु मुफ़स्सिरों का सर्वसम्मत मत है कि सूरह इस्रा की आयत 79 तथा उससे संबंधित रिवायतों[६४] के अनुसार, अल्लाह ने "मक़ामे महमूद" के रूप में इस पद को पैग़म्बर (स) को प्रदान किया है।[६५] कुछ विद्वानों ने उन आयतों का भी प्रमाण दिया है, जिनमें शफ़ाअत के होने और स्वीकार किए जाने को अल्लाह की अनुमति से संबंधित बताया गया है। उनके अनुसार, शफ़ाअत अल्लाह की ही है, किन्तु अल्लाह ने अपनी अनुमति से अपने कुछ निकटवर्ती बंदों को यह अधिकार प्रदान किया है।[६६]
मृत व्यक्ति से शफ़ाअत की प्रार्थना के प्रति वहाबियों का विरोध
इब्ने तैमिय्या हर्रानी तथा उनके अनुयायी कुछ वहाबी विद्वान, पैग़म्बर मुहम्मद (स) और अन्य शफ़ाअत करने वालों से उनके निधन के बाद या उनकी अनुपस्थिति में शफ़ाअत की प्रार्थना करना, बल्कि अल्लाह के अतिरिक्त किसी और से शफ़ाअत माँगना भी बिदअत और शिर्क मानते हैं।[६७] इब्ने तैमिय्या का कहना है कि पैग़म्बर (स) के निधन के बाद किसी भी सहाबी ने उनसे शफ़ाअत की प्रार्थना नहीं की और न ही चारों फ़िक़्ही मज़हबों के किसी इमाम ने इसके मुस्तहब या वाजिब होने का फ़तवा दिया है। इसलिए उनके अनुसार शफ़ाअत की प्रार्थना करना ऐसा कार्य है, जिसके पक्ष में कोई प्रमाण नहीं है और यह सहाबा तथा फ़ुक़हा की परंपरा के विरुद्ध है।[६८] सऊदी अरब के वहाबी मुफ़्ती अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ ने एक इस्तिफ़्ता के उत्तर में कहा है कि शफ़ाअत केवल अल्लाह का अधिकार है और पैग़म्बर (स) तथा अन्य शफ़ाअत करने वाले अपने निधन के बाद इस अधिकार में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकते। इसलिए किसी ऐसे व्यक्ति से, जिसका निधन हो चुका हो और जो किसी कार्य को करने में सक्षम न हो, शफ़ाअत की प्रार्थना करना शिर्क है।[६९]
इन्ना शफ़ाअतना ला तनालो मुस्तख़िफ़्फ़न बिस सलाते
अनुवाद: हमारी शफ़ाअत उस व्यक्ति को प्राप्त नहीं होगी जो नमाज़ को हल्का समझता है।
सय्यद अली मिलानी, जो एक शिया कलाम-विद्वान हैं, ने अहले सुन्नत के स्रोतों में वर्णित एक रिवायत का हवाला देते हुए कहा है कि सहाबा कुछ अवसरों पर पैग़म्बर (स) के निधन के बाद भी उनसे शफ़ाअत की प्रार्थना किया करते थे।[७०] इस रिवायत के अनुसार, उमर इब्न ख़त्ताब के ख़िलाफ़त काल में जब अकाल पड़ा, तो पैग़म्बर (स) के सहाबी बिलाल बिन हारिस उनकी क़ब्र पर गए और उनसे तवस्सुल करते हुए अल्लाह से वर्षा की दुआ करने का अनुरोध किया, ताकि उम्मत अकाल से मुक्ति पा सके।[७१]
जाफ़र सुब्हानी ने अपनी पुस्तक आइने वहाबियत में लिखा है कि जिन शफ़ाअत करने वालों का निधन हो चुका है, उनसे शफ़ाअत की प्रार्थना करना कब्रों में दफ़्न शरीरों से प्रार्थना करना नहीं है, बल्कि उन पवित्र और जीवित आत्माओं से प्रार्थना करना है, जो बरज़ख़ में अपने बरज़खी शरीरों के साथ जीवित हैं, और जिनके जीवित होने की पुष्टि स्वयं क़ुरआन करता है।[७२]
शफ़ाअत का इनकार और उसका उत्तर
कुछ लोगों ने शफ़ाअत की वैधता का इनकार किया है और इसके लिए कुछ तर्क प्रस्तुत किए हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
- शफ़ाअत की शिक्षा न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है और यह अत्याचार तथा अज्ञानता की व्यवस्था के अनुकूल है। इस आधार पर शफ़ाअत पर विश्वास करना अल्लाह का अपमान है।[७३] हालांकि, आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी के अनुसार, पापी को दंड देना स्वयं न्याय है, जबकि शफ़ाअत को स्वीकार करना अल्लाह का एक प्रकार का अनुग्रह और कृपा है। यह कृपा एक ओर शफ़ाअत प्राप्त करने वाले व्यक्ति में मौजूद योग्यताओं के कारण होती है और दूसरी ओर शफ़ाअत करने वाले के सम्मान, प्रतिष्ठा और नेक कार्यों के कारण।[७४]
- लोगों को शफ़ाअत का वादा, पाप करने, अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने और निर्भय होकर अवज्ञा करने के लिए प्रेरित करता है।[७५] कहा गया है कि यही आपत्ति उन आयतों पर भी लागू होनी चाए जिनमें अल्लाह द्वारा पापों की क्षमा का वर्णन किया गया है, जबकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि क्षमा से संबंधित आयतें लोगों को अल्लाह की सीमाओं के उल्लंघन में निर्भीक नहीं बनातीं।[७६] इसके अतिरिक्त, शफ़ाअत से संबंधित आयतें अल्लाह की इच्छा और अनुमति पर निर्भर हैं। कोई भी व्यक्ति निश्चित रूप से यह नहीं जान सकता कि शफ़ाअत करने वालों की शफ़ाअत उसे प्राप्त होगी या नहीं। इसलिए इससे पाप करने में निर्भयता उत्पन्न नहीं होती, बल्कि शफ़ाअत के वादे का प्रभाव यह है कि यह लोगों को आशा प्रदान करता है और उन्हें अल्लाह की रहमत से निराश होने से बचाता है।[७७]
- शफ़ाअत अल्लाह के ज्ञान और इच्छा में परिवर्तन को आवश्यक बनाती है; इसका अर्थ यह बताया गया है कि शफ़ाअत करने वाला अल्लाह को उस कार्य के विपरीत करने के लिए प्रेरित करता है, जिसे उसने पहले चाहा और जिसका निर्णय किया था। जबकि अल्लाह के ज्ञान और इच्छा में परिवर्तन, उसकी सत्ता में परिवर्तन को आवश्यक बनाता है, और यह असंभव है। अतः शफ़ाअत भी असंभव होनी चाए।[७८] इसके उत्तर में कहा गया है कि अल्लाह द्वारा शफ़ाअत को स्वीकार करना उसकी इच्छा में परिवर्तन या उसके ज्ञान में बदलाव का अर्थ नहीं रखता। बल्कि अल्लाह को पहले से ज्ञान होता है कि कोई व्यक्ति भविष्य में विभिन्न अवस्थाओं से गुज़रेगा, और परिवर्तन का यह ज्ञान स्वयं ज्ञान में परिवर्तन नहीं है। इसलिए अल्लाह की इच्छा भी उन्हीं अवस्थाओं से संबंधित होती है। अर्थात्, कोई व्यक्ति एक समय विशेष परिस्थितियों और कारणों के आधार पर एक अवस्था में होता है और उस समय अल्लाह उसके बारे में एक इच्छा रखता है। फिर किसी अन्य समय में अन्य कारणों और परिस्थितियों के कारण उसकी दूसरी अवस्था हो जाती है और अल्लाह उसके बारे में दूसरी इच्छा रखता है। ये सभी बातें अल्लाह के ज्ञान और इच्छा में किसी परिवर्तन को आवश्यक नहीं बनातीं।[७९]
क़ियामत में शफ़ाअत का इनकार
कुछ लोगों ने आयत يَوْمٌ لَا بَيْعٌ فِيهِ وَلَا خُلَّةٌ وَلَا شَفَاعَةٌ...[८०] अर्थात् "वह दिन जिसमें न कोई खरीद-बिक्री होगी, न दोस्ती लाभ देगी और न शफ़ाअत तुम्हें प्राप्त होगी..."[८१] तथा क़ुरआन की कुछ अन्य आयतों[८२] के आधार पर शफ़ाअत को केवल सांसारिक जीवन तक सीमित माना है और क़ियामत में शफ़ाअत का इनकार किया है।[८३] हालाँकि आयतुल्लाह सुब्हानी के अनुसार, यह आयत क़ियामत में हर प्रकार की शफ़ाअत का इनकार नहीं करती, बल्कि "ला खुल्लह" (न कोई मित्रता लाभ देगी) वाक्य को देखते हुए केवल अमान्य और गलत शफ़ाअत को अस्वीकार करती है।[८४] अमान्य शफ़ाअत वह है जिसमें शफ़ाअत माँगने वाला व्यक्ति अपने धार्मिक कर्तव्यों और कर्मों का पालन किए बिना, केवल शफ़ाअत करने वाले से अपनी मित्रता या संबंध के आधार पर, जैसा कि दुनिया में प्रचलित है, उससे शफ़ाअत की अपेक्षा करता है।[८५] कुछ मुफ़स्सिरों का भी मत है कि यह आयत क़ियामत में पूर्ण रूप से शफ़ाअत का इनकार नहीं करती, बल्कि ग़ैर-मोमिनों के लिए शफ़ाअत को अस्वीकार करती है।[८६] शिया और सुन्नी दोनों के कुछ हदीस-स्रोतों में ऐसी रिवायतें भी वर्णित हैं जिनमें क़ियामत के दिन शफ़ाअत करने वालों की शफ़ाअत का उल्लेख मिलता है।[८७]
फ़ुटनोट
- ↑ अल्लामा हिल्ली, कश्फ़ुल मुराद, पृष्ठ 416; जुर्जानी, शरह अल मवाक़िफ़, खंड 8, पृष्ठ 312।
- ↑ अल्लामा मजलिसी, हक़्क़ुल-यक़ीन, खंड 2, पृष्ठ 445।
- ↑ इब्ने तैमिय्या, मजमूअ अल-फ़तावा, खंड 1, पृष्ठ 313–314।
- ↑ शेख़ सदूक़, अल-अमाली, पृष्ठ 370।
- ↑ अल्लामा मजलिसी, बिहारुल-अनवार, खंड 8, पृष्ठ 29।
- ↑ सय्यद मुर्तज़ा, शरहे जुमल अल-इल्म वल-अमल, पृष्ठ 157; अल्लामा मजलिसी, बिहारुल-अनवार, खंड 8, पृष्ठ 29; फ़ख़्रे राज़ी, अल तफ़्सीर अल कबीर, खंड 3, पृष्ठ 496।
- ↑ क़ाज़ी अब्दुल जब्बार, शरह अल-उसूल अल-ख़म्सा, पृष्ठ 463।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर-ए-नमूना, खंड 1, पृष्ठ 273।
- ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 8, पृष्ठ 101; शेख़ सदूक़, मन ला यहज़ुरुहुल फ़क़ीह, खंड 3, पृष्ठ 574।
- ↑ बुख़ारी, सहीह अल-बुख़ारी, खंड 9, पृष्ठ 139; नसाई, सुनन अल-नसाई, खंड 2, पृष्ठ 229।
- ↑ फ़न्नी अस्ल, «شفاعت از دیدگاه صدالمتألهین», पृष्ठ 110।
- ↑ फ़ख़्रे राज़ी, अश-शफ़ाअतुल-उज़्मा फ़ी यौमिल-क़ियामा, पृष्ठ 7–10।
- ↑ सय्यद मुर्तज़ा, रसाइल अश-शरीफ़ अर-रज़ी, खंड 1, पृष्ठ 150; शेख़ तूसी, अल-तिब्यान, खंड 1, पृष्ठ 213।
- ↑ मुर्तज़ा मुतह्हरी, मजमूआ-ए-आसार, खंड 1, पृष्ठ 254।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर-ए-नमूना, खंड 1, पृष्ठ 271–272।
- ↑ इमाम ख़ुमैनी, शरह-ए-चेहल हदीस, पृष्ठ 150; मुर्तज़ा मुतह्हरी, अद्ल-ए-इलाही, पृष्ठ 226–230; जाफ़र सुब्हानी, अश-शफ़ाआ फ़िल-किताब वस्सुन्नह, पृष्ठ 29–30।
- ↑ मुतह्हरी, अदल-ए-इलाही, पृष्ठ 226-230; जाफ़र सुब्हानी, अश-शफ़ाआ फ़िल-किताब वस्सुन्नह, पृष्ठ 29–30।
- ↑ जाफ़र सुब्हानी, इस्तिफ़्ताआत, खंड 2, पृष्ठ 15।
- ↑ अल्लामा मजलिसी, बिहारुल-अनवार, खंड 102, पृष्ठ 247–249।
- ↑ मुर्तज़ा मुतह्हरी, अदल-ए-इलाही, पृष्ठ 235।
- ↑ शेख़ मुफ़ीद, अवाइल अल-मक़ालात, पृष्ठ 79; सय्यद मुर्तज़ा, शरहे जुमल अल-इल्म वल-अमल, पृष्ठ 156; जुर्जानी, शरह अल-मवाक़िफ़, खंड 8, पृष्ठ 312।
- ↑ सूरह अल-इस्रा, आयत 79।
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- ↑ शेख़ मुफ़ीद, अवाइल अल-मक़ालात, पृष्ठ 79–80।
- ↑ शेख़ मुफ़ीद, अवाइल अल-मक़ालात, पृष्ठ 79–80; अल्लामा मजलिसी, बिहारुल-अनवार, खंड 8, पृष्ठ 41–42।
- ↑ सूरह मरियम, आयत 87।
- ↑ शेख़ तूसी, अल-तिब्यान, खंड 7, पृष्ठ 150।
- ↑ शेख़ तूसी, अल-तिब्यान, खंड 7, पृष्ठ 150; तबरसी, मजमा उल-बयान, खंड 6, पृष्ठ 452; तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 14, पृष्ठ 111।
- ↑ तबरसी, मजमा उल-बयान, खंड 6, पृष्ठ 452; तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 14, पृष्ठ 111।
- ↑ शेख़ तूसी, अल-तिब्यान, खंड 7, पृष्ठ 150।
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स्रोत
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- नसाई, अहमद बिन शुऐब, सुनन अन-नसाई, शोध: अब्दुल फ़त्ताह अबू ग़ुद्दा, हलब, इस्लामी प्रकाशन कार्यालय, 1406 हिजरी।