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ख़लीफ़ाओ के साथ इमाम अली (अ) की बैअत

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खलीफ़ाओं के साथ इमाम अली (अ) की बैअत, का मतलब है अबू बक्र, उमर और उस्मान के प्रति इमाम अली (अ) की वफ़ादारी या गैर-वफ़ादारी के बारे में विचार, और इसे शुरुआती इस्लाम के इतिहास में विवादित मुद्दों में से एक माना जाता है।

सुन्नी इस बैअत को इख़्तेयारी (ऐच्छिक) और तीनों खलीफ़ाओं के शासन के जायज़ होने की निशानी मानते हैं, जबकि शिया दृष्टिकोण से, इमामत एक ईश्वरीय पद है जो बैअत से अलग है। शिया विद्वानों ने बैअत के सिद्धांत को नहीं माना है या इसे अनिच्छा व ज़बरदस्ती, तक़य्या और इस्लामी समुदाय की एकता बनाए रखने की ज़रूरत का नतीजा नहीं माना है, और कुछ ऐतिहासिक रिपोर्ट, जिसमें हज़रत फ़ातिमा (स) के घर पर हमले की घटना भी शामिल है, बैअत को थोपने के सबूत के तौर पर पेश की गई हैं।

शिया विद्वानों का यह भी मानना ​​है कि इमाम अली (अ) ने सक़ीफ़ा घटना में पैग़म्बर (स) के उत्तराधिकारी होने के अपने अधिकार पर तर्क देने के बावजूद, इस्लामी समुदाय में फूट को रोकने और पर्याप्त समर्थकों की अनुपस्थिति के कारण अपने अधिकार को प्राप्त करने से परहेज़ किया।

स्थिति

इमाम अली (अ.स.) की तीनो खलीफ़ाओं के प्रति वफ़ादारी की स्थिति शुरुआती इस्लाम के विवादित मुद्दों में से एक है[१] और शिया और सुन्नियों के बीच एक विवादित मुद्दा है।[२] यह विषय दोनों मज़हबों के धर्मशास्त्र, इतिहास और संप्रदाय अध्ययन से संबंधित कार्यों में जांचा गया है।[३]

सुन्नी इमाम अली की ख़लीफ़ाओं के प्रति वफ़ादारी की प्रतिज्ञा को अपनी मर्ज़ी से, पहले खलीफ़ाओं की एक राजनीतिक निशानी और पैग़म्बर (स) की वफ़ात के बाद राजनीतिक झगड़ों के खत्म होने का कारण मानते हैं।[४] शिया दृष्टिकोण से, इमामत एक ईश्वरीय पद है और यह लोगों की वफ़ादारी की प्रतिज्ञा पर निर्भर नहीं है।[५] इसलिए, कुछ शिया विद्वानों ने इमाम अली की खलीफ़ाओं के प्रति वफ़ादारी की प्रतिज्ञा के सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया है, और दूसरों ने, अगर वे इसे स्वीकार करते हैं, तो इसे अनिच्छा, मजबूरी या तक़य्या से पैदा हुआ माना है।[६] लेकिन, शेख़ सदूक़ (मृत्यु 381 हिजरी) ने इमाम महदी (अ.स.) से जुड़ी एक तौक़ीअ का उल्लेख किया है, जिसमें उस समय के शासकों के प्रति इमामों की वफ़ादारी की कसम का उल्लेख़ है।[७] हालांकि, एक शिया इतिहासकार सय्यद जाफ़र मुर्तज़ा आमेली (स्वर्गवास 1441 हिजरी) ने इन बैअतों को ज़बरदस्ती और शासकों की वैधता को मानने के किसी भी संकेत से रहित माना है।[८]

बैअत का मतलब

नहजुल-बलाग़ा के विवरणकर्ता मुहम्मद तक़ी जाफ़री (स्वर्गवास 1377 शम्सी) बैअत को लोगों और नेता के बीच एक जानबूझकर और अपनी मर्ज़ी से किया गया समझौता मानते हैं, जो इन शर्तें पूरी न होने पर अपनी वैधता खो देता है।[९] मुहम्मद तक़ी मिस्बाह यज़्दी (स्वर्गवास 1399 शम्सी) के अनुसार, सुन्नी विचारधारा में निष्ठा सरकार की वैधता का स्रोत है, लेकिन शिया दृष्टिकोण में, यह केवल दैवीय वैधता के साथ शासक के प्रति वफादारी की घोषणा है।[१०]

क्या इमाम अली ने खलीफ़ाओं की बैअत की थी?

शिया विद्वानों के खलीफ़ाओं के प्रति इमाम अली की वफ़ादारी की क़सम पर दो विचार हैं:

इमाम अली ने खलीफ़ाओं की बैअत नही की

शेख़ मुफ़ीद[११] और सय्यद मुर्तज़ा[१२] (स्वर्गवास: 436 हिजरी) सहित कई शिया विद्वानों का मानना ​​है कि इमाम अली (अ) ने कभी खलीफ़ाओं के प्रति वफ़ादारी की कसम नहीं खाई। शिया धर्मशास्त्री ख़्वाजा नसीर तूसी (मृत्यु 672 हिजरी)[१३] और सुन्नी इतिहासकार ख्वांद मीर (स्वर्गवास 942 हिजरी) ने इसे शिया मान्यता के तौर पर पेश किया है।[१४] शेख़ मुफीद, इमाम अली (अ.स.) के अबू बक्र से वफ़ादारी करने में देरी का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि अगर वफ़ादारी की कसम ज़रूरी (वाजिब) होती, तो इसमें देरी करने का मतलब ग़लती या ज़िद होता, जो कि ग़लती न करने वाले (मासूम) के लिए स्वीकार्य नहीं है।[१५]

कुछ लोगों ने शेख़ मुफीद की बात का मतलब अपनी मर्ज़ी से बैअत से इनकार करना निकाला है। क्योकि ज़बरदस्ती की गई बैअत को सच्ची बैअत नहीं माना जा सकता है।[१६] मुक़ातिल इब्न अतिया (स्वर्गवास 505 हिजरी) के मुताबिक, अगर अबू बक्र का हाथ इमाम अली के बंधे हुए हाथ पर भी रख दिया जाता, तो भी यह वफ़ादारी की निशानी नहीं होती, क्योंकि बंधा हुआ हाथ वफ़ादारी से इनकार और स्वीकार से इनकार को दिखाता है।[१७]

शेख़ तूसी (स्वर्गवास 460 हिजरी) ने एक हदीस का उल्लेख किया है जिससे पता चलता है कि इमाम अली (अ) अबू बक्र ने वफ़ादारी की कसम के अनुरोध पर बैअत करने मना कर दिया और खुद को पैग़म्बर (स) की जानशीनी के लायक़ बताया है।[१८] मुहम्मद बाक़िर मजलिसी (स्वर्गवास 1110 हिजरी) का भी मानना ​​है कि इमाम अली (अ) ने अबू बक्र के राज शुरू करने के छह महीने बाद भी उनके प्रति वफ़ादारी की कसम नहीं खाई थी।[१९]

इस दृष्टिकोण के अनुसार, इमाम अली के व्यवहार का मतलब चुप्पी और अपने अधिकार का पीछा करने से इनकार करना बताया गया है, किसी मसलहत के कारण नही।[२०] यह नज़रिया उन लोगों के कर्तव्यों की अनिश्चितता के कारण ध्यान का केन्द्र बन गया जिन्होंने इमाम का अनुसरण करने के लिए वफ़ादारी की क़सम खाने से इनकार कर दिया था।[२१]

ख़लीफ़ाओं का इमाम अली से ज़बरदस्ती बैअत लेना

कुछ शिया स्रोतो में बताया गया है कि इमाम अली (अ) ने दबाव और धमकियों के तहत खलीफ़ाओं के प्रति वफ़ादारी की क़सम खाई थी।[२२] इतिहासकार रसूल जाफ़रयान के अनुसार, यह दृष्टिकोण कुछ सुन्नियों द्वारा भी ज़ाहिर किया गया है।[२३] सुन्नी स्रोतों में कुछ रिपोर्टों में यह भी उल्लेख है कि सक़ीफ़ा के नेताओं ने इमाम अली (अ) को अबू बक्र के प्रति वफ़ादारी की कसम खाने की धमकी दी थी।[२४] तीसरी सदी के इमामी धर्मगुरु तबरी ने सात ऐसी हदीसों का उल्लेख किया हैं जो अबू बक्र के प्रति वफ़ादारी की क़सम खाने में ज़बरदस्ती और धमकी के बारे में बताती हैं।[२५] बलाज़ोरी (स्वर्गवास 279 हिजरी) ने उल्लेख किया है कि इमाम अली ने उस्मान के प्रति वफ़ादारी की क़सम अब्द अल-रहमान इब्न औफ़ द्वारा धमकी के बाद खाई थी।[२६]

सक़फ़ी (स्वर्गवास 283 हिजरी) ने अल-ग़ारात में इमाम अली (अ.स.) के एक खत का उल्लेख किया है जो इमरजेंसी हालात में वफ़ादारी की क़सम खाने का इशारा करता है।[२७] नहजुल अल-बलाग़ा के खत 28 में, इमाम अली (अ.स.) ने भी वफ़ादारी की कसम खाने के लिए मजबूर किए जाने को अपने ऊपर ज़ुल्म की निशानी माना है।[२८] मैडेलोंग (मृत्यु: 2023 ईस्वी), एक प्राच्यविद् और इस्लामी विद्वान, का मानना ​​​​है कि अली की अबू बक्र के शासन को स्पष्ट रूप से स्वीकार करने का मतलब मतभेदों को हल करना नहीं था, और अबू बक्र जानते थे कि यह स्वीकृति दबाव में की गई थी।[२९]

ज़बरदस्ती बैअत की रिपोर्ट

कुछ शिया स्रोत बताते हैं कि सक़ीफ़ा की घटना के बाद फ़ातेमा (स) के घर पर हमला हुआ था, जिसका मकसद इमाम अली (अ) से बैअत हासिल करना था।[३०] कुछ सहाबा अली (अ) के साथ फ़ातेमा के घर में बैठ गए और बैअत करने से मना कर दिया।[३१] उमर इब्न अल-ख़त्ताब ने घर जलाने की धमकी दी और अली (अ) को ज़बरदस्ती अबू बक्र के पास ले गए।[३२] कई सुन्नी स्रोतों ने भी फ़ातेमा के घर पर हमले की अस्ल घटना का उल्लेख किया है, लेकिन विवरण में अंतर है।[३३]

तीसरी शताब्दी हिजरी के स्रोतों में से एक किताब अल इमाम व अल सियासा के अनुसार, इमाम अली (अ) ने अबू बक्र से वफ़ादारी की कसम तब खाई जब उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई।[३४] शिया इतिहासकार मसऊदी (स्वर्गवास 346 हिजरी) के अनुसार, अली इब्न अबी तालिब (अ) को जबरदस्ती अबू बक्र के पास ले जाया गया ताकि वह निष्ठा की प्रतिज्ञा कर सकें और उनका हाथ दबाया गया, लेकिन उनकी उंगलियां बंधी हुई थीं और नहीं खुल रही थीं। अबू बक्र ने उनका बंधा हुआ हाथ लिया और इसे निष्ठा की प्रतिज्ञा के रूप में मान लिया।[३५]

इमाम अली (अ) की ज़बरदस्ती बैअत या चुप्पी का कारण

शिया विद्वानों का मानना ​​है कि इमाम अली (अ) की ख़लीफ़ाओं के प्रति निष्ठा की प्रतिज्ञा न करना या उसमें देरी करना उच्च हितों के बारे में उनके विचार और इस्लामी समुदाय में विभाजन को रोकने के कारण था।[३६] कुछ रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि इमाम अली (अ.स.) ने अबू बक्र[३७] के खिलाफ़ विद्रोह को रोका और केवल इस्लामी समुदाय की एकता को बनाए रखने के लिए उनके प्रति निष्ठा की प्रतिज्ञा की थी।[३८]

बलाज़ोरी की रिपोर्ट के अनुसार, उस्मान ने अली के उनके प्रति बैअत न करने को मुसलमानों की एकता और रिद्दा की लड़ाइयों में मुसलमानो की हिस्सेदारी में रुकावट माना, और उसके बाद, अली (अ) ने वफ़ादारी की कसम खाई।[३९] सय्यद मुर्तज़ा[४०] और शेख़ तूसी[४१] से उल्लेखित एक हदीस के मुताबिक, इमाम अली (अ) दो में एक रास्ते चुनने की मंज़िल पर खड़े में थे कि या वह अबू बक्र के प्रति वफ़ादारी करें या इस्लामी समुदाय के धर्मत्याग को स्वीकार कर लें। शिया इतिहासकार रसूल जाफ़रियान के मुताबिक, सरकार को उम्मीद थी कि अली (अ) रिद्दा की लड़ाइयों में शामिल होंगे, ठीक वैसे ही जैसे अली (अ) ने उनके प्रति वफ़ादारी की थी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।[४२]

ऐतिहासिक वर्णन बताते हैं कि इमाम अली (अ) को ख़लीफ़ाओं के प्रति बैअत न करने में मामले ज़्यादा समर्थन नहीं प्राप्त था,[४३] और विद्रोह की स्तिथि में उनके साथ बहुत कम समर्थक शामिल हुए।[४४] शिया हदीसकार-तबरी ने लिखा है कि पैग़म्बर (स) ने अली (अ) से वादा लिया था कि अगर उनके पास हक़ को साबित करने के लिए समर्थक नहीं होंगे तो वे चुप रहेंगे।[४५]

सुन्नियों की नज़र में इमाम अली (अ) की खलीफ़ाओं से बैअत

सुन्नी विद्वान इमाम अली (अ.स.) की खलीफ़ाओं के प्रति वफ़ादारी की क़सम (बैअत) को उनकी संतुष्टि के कारण मानते हैं और इमाम अली (अ.स.) के खलीफ़ाओं के प्रति समर्थन को उनके लिए मंज़ूरी और वैधता का संकेत मानते हैं।[४६] नहज अल-बलाग़ा के विवरणकर्ता इब्न अबिल-हदीद मोअतज़ेली[४७] और रशीद रज़ा (स्वर्गवास 1354 हिजरी) का मानना ​​है कि अली (अ.स.) ने इस्लामी समुदाय की एकता बनाए रखने के लिए अबू बक्र के प्रति वफ़ादारी की क़सम खाई।[४८] हालांकि, इब्न अबी अल-हदीद के अनुसार, वह ख़िलाफ़त के लिए ज़्यादा योग्य थे।[४९]

इमामत के शोधकर्ता एक शिया विद्वान मीर हामिद हुसैन लखनवी के अनुसार, बैअत की क़सम में देरी से जुड़ी हदीसें, जो भरोसेमंद सुन्नी स्रोतों में उल्लेख की गई हैं, सक़ीफ़ा (अबू बक्र के प्रति एकमत (इजमा) होकर बैअत की क़सम) में विश्वास के आधार को कमज़ोर करती हैं।[५०]

अबू बक्र के प्रति बैअत की जगह और समय

बैअत की क़सम की जगह के बारे में रिपोर्टें अलग-अलग हैं[५१] और इसमें मस्जिदे पैग़म्बर (स),[५२] उनके घर और मस्जिद के बीच का रास्ता,[५३] साद इब्न उबादा का घर[५४] और इमाम अली (अ) का घर शामिल हैं।[५५] समय के बारे में भी रिवायतें अलग-अलग हैं। शेख़ मुफ़ीद की रिवायत के अनुसार, सभी मुसलमान इस बात पर एकमत हैं कि बैअत की क़सम तुरंत नहीं ली गई थी और इसमें कम से कम तीन दिन की देरी हुई थी।[५६] ऐतिहासिक स्रोतों में, वफ़ादारी की क़सम का समय इस प्रकार दिया गया है:

कुछ स्रोतों ने यह भी बताया गया है कि इमाम अली (अ) ने हज़रत फ़ातेमा (अ) के जीवित रहने तक वफ़ादारी की क़सम नहीं खाई थी।[६१] तदनुसार, वफ़ादारी की क़सम का समय पैग़म्बर (स) की वफ़ात के लगभग सत्तर दिन बाद[६२] या उसके छह महीने बाद था।[६३]

संबंधित लेख

फ़ुटनोट

  1. ↑ ओरेई मोमेनी, “बैअते इमाम अली बा ख़ोलफ़ा”, पेज 163।
  2. ↑ हाशेमी, बरर्सी बैअते इमाम अली (अ) बा ख़ोलफ़ा, 1391, पेज 12।
  3. ↑ उदाहरण के लिए, देखें: सय्यद मुर्तज़ा, अल-शाफ़ी फ़ी अल-इमामा, 1407 हिजरी, खंड 3, पेज 237; इब्न हज़म, अल-फ़स्ल, 1416 हिजरी, खंड 3, पेज 79।
  4. ↑ बुखारी, सहीह अल-बुखारी, 1410 हिजरी, खंड 6, पेज 396; कुशैरी, मुस्लिम इब्न हज्जाज, सहीह मुस्लिम, 1412 हिजरी, खंड 3, पेज 1381; इब्न अब्द अल-बर्र, अल-इस्तियाब, 1412 हिजरी, खंड 3, पेज 973।
  5. ↑ इब्न मयसम, अल-निजात फी अल-कियामा, 1417 हिजरी, पेज 69।
  6. ↑ फ़ख़री, तारीख़े तशय्यो अज़ सद्रे इस्लाम ता पायान दौरए ख़ोलफ़ाए राशेदीन, 1388 शम्सी, पेज 129।
  7. ↑ शेख़ सदूक़, कमाल अल-दीन, 1395 हिजरी, खंड 2, पेज 485।
  8. ↑ आमेली, सहीह मिन सिरत अल-इमाम अली (अ.स.), 1430 हिजरी, खंड 9, पेज 314।
  9. ↑ जाफरी, शरह वा तफसीर नहजुल-बलाग़ा, 1376 शम्सी, खंड 3, पेज 18।
  10. ↑ मिस्बाह यज़्दी, सवाल और जवाब, 1391 शम्सी, पेज 29।
  11. ↑ शेख मुफ़ीद, सिलसिला मुवल्लेफ़ात शेख़ अल-मुफ़ीद, 1414 हिजरी, खंड 2, पेज 56।
  12. ↑ सैय्यद मुर्तज़ा, अल-शाफ़ी फ़ि अल-इमामा, 1407 हिजरी, खंड 3, पेज 239।
  13. ↑ ख्वाजा नसीर अल-दीन तूसी, अली (अ.स.) मिज़ान अल-हक़, 1386 शम्सी, पेज 199।
  14. ↑ ख़्वांदमीर, तारीख़ हबीब अल-सियर, 1380 शम्सी, खंड 1, पेज 447।
  15. ↑ शेख मुफ़ीद, सिलसिला मुवल्लेफ़ात शेख़ अल-मुफ़ीद, 1414 हिजरी, खंड 2, पेज 144. 56.
  16. ↑ कूरानी, ​​सिरत-ए-नामा अमीर अल-मोमिनीन, 1401 शम्सी, खंड 1, पृष्ठ 668.
  17. ↑ इब्न अतिया, अबहा अल-मद्दाद, 1423 हिजरी, खंड 1, पेज 203।
  18. ↑ शेख़ तूसी, अल-अमाली, 1414 हिजरी, पेज 568।
  19. ↑ मजलिसी, बेहार अल-अनवार, 1403 हिजरी, खंड 28, पेज 366।
  20. ↑ लबाफ़, मज़लूमी गुमशुदा दर सकीफ़ा, 1385 शम्सी, खंड 4, पेज 149।
  21. ↑ फ़ख़री, तारीख़ तशय्यो अज़ सदरे इस्लाम ता ख़ोलफ़ाए राशेदीन, 1388 शम्सी, पेज 130।
  22. ↑ उदाहरण के लिए, देखें: अस्करी, नक़शे आयशा दर तारीख़े इस्लाम, 1391 शम्सी, खंड 1, पेज 105; आमिली, अल-सहीह मिन सिरत अल-इमाम अली (अ.स.), 1430 हिजरी, खंड 9, पेज 308; बेज़ून, रफ़तार शेनासी इमाम अली दर आईनए तारीख़, 1379 शम्सी, पेज 34; हुसैनी मिलानी, जवाहिर अल-कलाम, खंड 1, पेज 337।
  23. ↑ जाफरयान, तारीख वल सीरए सियासी अमीरुल मोमिनान अली इब्न अबी तालिब (अ), 1380 शम्सी, पेज 19 और यह भी देखें: ग़लामी, पस-अज़-ग़ुरूब, 1388 शम्सी, पेज 187।
  24. ↑ उदाहरण के लिए, देखें: इब्न कुतैबा अल-दिनवरी, इमामा वा अल-सियासा, 1410 हिजरी, खंड 1, पेज 30-33; सुल्तान अल-वाएज़िन शिराज़ी, शबहाय पेशावर, 1379 शम्सी, पेज 507-517।
  25. ↑ तबरी, अल-मुस्तरिश्द फी अल-इमामा, 1415 हिजरी, पेज 373-384।
  26. ↑ बलाज़ोरी, जुमल मिन अंसाब अल-अशराफ़, 1417 हिजरी, खंड 6, पेज 128।
  27. ↑ सक़फी, अल-ग़ारात, 1395 हिजरी, खंड 1, पेज 306।
  28. ↑ सैय्यद रज़ी, नहजुल अल-बलाग़ा, 1407 हिजरी, पेज 387-388।
  29. ↑ मैडलोंग, जानशीनी हज़रत मुहम्मद (स), 1377 शम्सी, पेज 80।
  30. ↑ उदाहरण के लिए, देखें: हिलाली, किताब सुलैम इब्न क़ैस, 1407 हिजरी, पेज 40; मसऊदी, इसबात अल-वसिया, 1417 हिजरी, पेज 146; अयाशी, तफ़सीर अल-अयाशी, 1380 शम्सी, खंड 2, पेज 67।
  31. ↑ याक़ूबी, तारीख अल-याक़ूबी, दार सादिर, खंड 2, पेज 124।
  32. ↑ इब्न कुतैबा, इमामा वा अल-सियासा, 1410 हिजरी, खंड 1, पेज 30-31।
  33. ↑ उदाहरण के लिए, देखें: सफ़दी, अल-वाफ़ी बिल-वफ़यात, 1420 हिजरी, खंड 6, पेज ...15, ज़हबी, सियर अल-आलाम अल-नुब्ला, 1405 हिजरी, खंड 15, पेज 578; इब्न हजर असक़लानी, लिसान अल-मिज़ान, 2002 ई., खंड 1, पेज 609।
  34. ↑ इब्न कुतैबा अल-दिनवरी, इमामा वा अल-सियासा, 1410 हिजरी, खंड 1, पेज 31।
  35. ↑ मसऊदी, इसबातुल वसीया, 14017 हिजरी, पेज 146।
  36. ↑ बैज़ून, रफ़तार शेनासी इमाम अली दर आईनए तारीख़, 1379 शम्सी, पेज 40-41।
  37. ↑ तबरी, तारीख़ अलउमम वल मुलूक, बेरूत, खंड 3, पेज 209।
  38. ↑ इब्न शहर-आशोब, अल-मनाकिब, अल्लामा प्रकाशन, खंड 1, पेज 263; ग़ुलामी, पस अज़ ग़ुरूब, 1388 शम्सी, पेज 192।
  39. ↑ बलाज़ोरी, अंसाब अल-अशराफ़, दार अल-मआरिफ, खंड 1, पेज 587।
  40. ↑ सैय्यद मुर्तजा, अल-शाफी फी अल-इमामा, 1407 हिजरी, खंड 3, पेज 243-244।
  41. ↑ शेख़ तूसी, तल्खिस अल-शाफी, 1382 शम्सी, खंड 3, पेज 79।
  42. ↑ जाफरियान, हयाते फ़िकरी व सियासी इमामाने शिया, 1381 शम्सी, पेज 53।
  43. ↑ जवहरी बसरी, अल-सकीफा व फदक, मकतबा नैनवा अल-हदीसा, पेज 69।
  44. ↑ याकूबी, तारीख़ी याकूबी, दार सादिर, खंड 2, पेज 126।
  45. ↑ तबरी अलमुसतरशिद फ़िल इमामह, 1415 हिजरी, पेज 370-373।
  46. ↑ उदाहरण के लिए, देखें: बुखारी, सहीह अल-बुखारी, 1410 हिजरी, खंड 6, पेज 396-397; इब्न हनबल, फ़ज़ायल अल-सहाबा, 1403 हिजरी, खंड 1, पेज 336; कुशयरी, सहीह मुस्लिम, 1412 हिजरी, खंड 3, पेज 1381; इब्न अब्द अल-बर्र, अल-इस्तियाब, 1412 हिजरी, खंड 3, पेज 973; इब्न तैमिया, मिनहाज अल-सुन्नह अन-नबविया, 1406 हिजरी, खंड 5, पेज 490 और खंड 8, पेज 293।
  47. ↑ .इब्न अबी अल-हदीद, शरह नहजुल अल-बलाग़ा, मकतबा अल-मरअशी, खंड 11, पेज 111-113।
  48. ↑ इब्न अबी अल-हदीद, शरह नहजुल अल-बलाग़ा, मकतबा अल-मरअशी, खंड 11, पेज 111-113।
  49. ↑ रज़ा, तफ़सीर अल-मनार, 1414 हिजरी, खंड 8, पेज 224; इब्न अबी अल-हदीद, शरह नहजुल अल-बलाग़ा, मकतबा अल-मरअशी, खंड 11, पेज 111-113।
  50. ↑ कंतूरी, अबक़ातुल अनवार, 1404 हिजरी, खंड 2, पेज 287।
  51. ↑ ओरई मोमिनी, “बैअते इमाम अली बा ख़ोलफ़ा”, पेज 166।
  52. ↑ हिलाली, किताब सुलैम इब्न क़ैस अल-हिलाली, 1407 हिजरी, पेज 45; बुखारी, सहीह अल-बुखारी, 1410 हिजरी, खंड 6, पेज 396।
  53. ↑ बलाज़ोरी, अंसाब अल-अशराफ़, दार अल-मआरिफ, खंड 1, पेज 585।
  54. ↑ इब्न कसीर, अल-बिदाया वा अल-निहाया, दार अल-फ़िक्र, खंड 5, पेज 249; इब्न असाकिर, तारीख़ मदीना दमिश्क़, 1415 हिजरी, खंड 30, पेज 277।
  55. ↑ इब्न अब्द रब्बोह, अल-अक़्द अल-फ़रीद, 1407 हिजरी, खंड 5, पेज 14।
  56. ↑ शेख़ मुफ़ीद, सिलसिला मुवल्लेफ़ात शेख़ मुफ़ीद, 1414 हिजरी, खंड 2, पेज 56।
  57. ↑ इब्न कसीर, अल-बिदाया और अल-निहाया, दार अल-फ़िक्र, खंड 6, पेज 302।
  58. ↑ तबरी, तारीख़ अल-उमम व अल-मुलूक, बेरूत, खंड 3, पेज 207; मसऊदी, इसबात अल-वसिया, 1417 हिजरी, पेज 146।
  59. ↑ बलाज़ोरी, अंसाब अल-अशराफ, दार अल-मआरिफ, खंड 1, पेज 586; इब्न अब्द अल-बर्र, अल-इस्तियाब, 1412 हिजरी, खंड 3, पेज 974।
  60. ↑ याकूबी, तारीख अल-याकूबी, दार सादिर, खंड 2, पेज 126।
  61. ↑ जवहरी बसरी, अल-सकीफा व फदक, मकतबा नैनवह अल-हदीसा, पेज 61।
  62. ↑ मसऊदी, मुरुज अल-ज़हब, 1409 हिजरी, खंड 2, पेज 309; इब्न कुतैबा अल-दिनवरी, इमामा व अलसियासा, 1410 हिजरी, खंड 1, पेज 31।
  63. ↑ तबरी, तारीख़ अलउमम व अलमुलूक, बेरूत, खंड 3, पेज 208।

स्रोत

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