प्रारूप:इमाम पर नस्स
यह लेख "इमामत पर नस्स" की अवधारणा से संबंधित है। "नस्स के माध्य से इमाम को पहचानने का तरीका" जानने के लिए, इमामत की तंसीस वाला लेख देखें।

इमाम पर नस्स, कुरआन या हदीस का वह पाठ होता है जो किसी व्यक्ति या ग्रुप की इमामत के बारे में बताता है और इसे अल्लाह, पैग़म्बर (स), या पहले वाले इमाम जारी कर सकते हैं। इमामिया के अनुसार, इमाम की नियुक्ति साफ़ और स्पष्ट होनी चाहिए, और हर इमाम अपने उत्तराधिकारी का परिचय नस्स के माध्यम से कराता है।
इमामत पर नस्स को दो वर्गो में विभाजित होती हैं: नस्से जली जिसमें इमामत साफ़ और स्पष्ट होती है, जैसे हदीस ग़दीर, और नस्से ख़फ़ी जो स्पष्ट नहीं होती और उसे उसके संदर्भ से समझना चाहिए, जैसे हदीस मंज़िलत। कुरान में भी अप्रत्यक्ष रूप से इमामों की इमामत का ज़िक्र है, लेकिन उनके नामों का उल्लेख नहीं किया गया है ताकि अविरूपण से रोका जा सके।
इमामत की नूसूस से संबंधित कई रचनाएँ लिखी गई हैं, जिसमें सभी इमामों नुसूस का संकलन, विशेष नुसूस की जांच जैसे हदीस ग़दीर और दूसरे पंथों के दावों का विशलेषण सम्मिलित है। कुछ समूहो ने दावा किया है कि पैग़म्बर (स) या इमामों की ओर से दूसरे लोगों जैसे अबू बक्र, इमाम सादिक़ (अ) के बेटे इस्माईल और अब्दुल्लाह अफ़्तह के लिए भी नुसूस मौजूद हैं, लेकिन इमामिया विद्वानो ने इन दावों को खारिज किया है। कुछ सुन्नी मानते हैं कि पैग़म्बर (स) के बाद इमाम नियुक्त करने के लिए कोई नस्स नहीं है और इमाम का चुनाव उम्मत की मर्ज़ी या दबदबे पर आधारित होता है।
परिभाषा और स्थान
शिया धर्मशास्त्री शेख मुफ़ीद (मृत्यु 413 हिजरी) के अनुसार, कुरआन के तर्क का नस्स और पैग़म्बर (स) की सुन्नत इमाम की इमामत पर दलालत करती हैं।[१] उनके विचार में, पैग़म्बर (स) के बाद इमामत पर नस्स का अस्तित्व शिया और सुन्नियों के बीच विवाद का विषय था, और इमामिया विद्वानों ने अली (अ) की इमामत से संबंधित नुसूस को एकत्रित करने का प्रयास किया है।[२]
9वीं शताब्दी हिजरी के धर्मशास्त्री फ़ाज़िलल मिक़्दाद का मानना है कि नस्स ईश्वर की ओर से हो सकता है, एक अलौकिक शब्द या ख़ारेक उल आद्दा क्रिया के रूप में जो व्यक्ति की इमामत को इंगित करता है।[३] इब्न मीसम बहरानी (मृत्यू 679 या 699 हिजरी) भी कहते हैं कि नुसूस पैग़म्बर (स) या पहले वाले इमाम से हो सकती है जो मौखिक या व्यावहारिक तरीके से व्यक्ति की इमामत को इंगित करती है।[४]
जली और ख़फ़ी नस्स
इमामत से जुड़ी नुसूस जली और ख़फ़ी नुसूस को विभाजित किया गया है। जली नस्स स्पष्ट तर्क को कहा जाता है क्योंकि इमामत का मतलब उसके साफ़ दिखने से और बिना किसी विशलेषण के पता लगाया जा सकता है। जैसे हदीस ग़दीर।[५] इसके विपरीत, छिपी हुई नस्स वह नुसूस होती हैं जिनमें इमामत को स्पष्ट रूप से नही बताया जाता बल्कि बातचीत के कंटेंट से पता चलता है; जैसे हदीस मंज़िलत।[६] इमामिया के दृष्टिकोण से, इमामत पर नस्स स्पष्ट होना चाहिए और केवल इमाम की विशेषताएँ बताना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इस्मत जैसी उनकी विशेषताओ को पहचानना आम जनता के लिए सम्भव नहीं है।[७]
सय्यद मुर्तज़ा (मृत्यु 436 हिजरी) ने भी जली और ख़फ़ी नुसूस एक और विभाजन किया है। इस विभाजन के अनुसार, एक रिवायत जो सिर्फ़ शिया स्रोतो में बताई गई है, उसे नस्से जली माना जाता है। एक रिवायत जो शिया स्रोतों के अलावा, उन विद्वानों के कार्यों में बताई गई है जो समान विश्वासों को साझा नहीं करते हैं, और उनके द्वारा स्वीकार की गई है, उसे "नस्से ख़फ़ी" कहा जाता है।[८]
पैग़म्बर (स) के बाद इमामत पर नस्स से संबंधित दृष्टिकोण
नस्स के माध्यम से इमाम नियुक्त करने का सिद्धांत सभी मुसलमानों द्वारा माना जाता है;[९] हालांकि, अधिकांश सुन्नी मानते हैं कि पैग़म्बर (स) की तरफ़ से उनके बाद इमामत के बारे में कोई नस्स मौजूद नही है।[१०] अबुल हसन अशअरी ने किसी नस्स के होने से इनकार करने के लिए सक़ीफ़ा में अबू बक्र के प्रति उमर की बैयत का उल्लेख किया है और कहा है कि अगर अबू बक्र पैग़म्बर (स) की नस्स के माध्यम से नियुक्त किया गया होता, तो इमामत पर नस्स होने के बावजूद उमर की अबू बक्र के प्रति बैयत की गलत और बेकार होती।[११] इस सुन्नी नज़रिए की आलोचना में, सय्यद मुर्तज़ा कई नुसूस का ज़िक्र करते हैं, जो उनके हिसाब से, साफ़ तौर पर या परोक्ष रूप से अली (अ) की इमामत पर दलालत करती हैं।[१२] ज़ैदिया में, याह्या बिन हमज़ा अलवी, जिन्हें अल मोअय्यद बिल्लाह (मृत्यु 749 हिजरी) के नाम से जाना जाता है, अली (अ) की इमामत पर एक जली नस्स में विश्वास को इमामिया के विशेष आस्था मानते हैं और उनका मानना है कि केवल उनकी इमामत के बारे में एक खफ़ी नस्स है।[१३]
शिया इमामो की इमामत पर नस्स
क़ुरआनिक नुसूस
इस्लाम के रास्ते में मेरी मदद कौन करेगा ताकि वह मेरा भाई, मेरा वारिस और तुममें से मेरा उत्तराधिकारी बने? तो इमाम अली (अ) के समर्थन की घोषणा में उनका ज़िक्र किया गया और कहा गया: “यह (अली) तुममें से मेरा भाई, मेरा वारिस और मेरा ख़लीफ़ा है। उसकी बात सुनो और उसकी बात मानो।”
इमामत से जुड़े कुरानिक नुसूस को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है: पूरे इतिहास में इमामों के संदर्भ, इब्राहीम (अ) के वंशजों से इमामों की नियुक्ति, और पैग़म्बर (अ) के अहले बैत से इमामों की नियुक्ति, जैसे विलायत, तत्हीर, मवद्दत और तब्लीग की आयतें। मोहसिन अराकी के अनुसार, नस्स को संरक्षित करने और इसके अविरूपण को रोकने के लिए कुरआन में इमामों के नामों का उल्लेख नहीं किया गया है।[१४] अल-काफी में वर्णित इमाम सादिक (अ) की एक रिवायत के अनुसार, कुरआन ने इमामों के सिद्धांतों और विशेषताओं को बताया, और मिसदाक़ को निर्धारित करना पैग़म्बर (स) पर निर्भर था।[१५]
हदीसी नुसूस
पैग़म्बर (स) और इमामों के रिवायतों में, उनके वारिसों का भी ज़िक्र है। शिया स्रोत में इमामों की संख्या के अलावा उनके नाम भी बताए गए हैं, जबकि सुन्नी स्रोत में आमतौर पर सिर्फ़ खलीफ़ाओं की संख्या का उल्लेख होता है।[१६] शिया स्रोत में, पैग़म्बर (स) के वारिसों के नाम भी संख्या के अलावा बताए गए हैं; कुछ रिवायतों में, सिर्फ़ पहले इमाम का नाम[१७] बताया गया है, और दूसरों में, जैसे कि हदीस लौह में सभी इमामों के नामो का उल्लेख किया गया हैं।[१८]
इमामिया विश्वास का आधार यह है कि हर इमाम का परिचय पैग़म्बर (स) या पहले वाले इमाम की नस्स से होता है।[१९] इसलिए, इमाम अली (अ) पैग़म्बर (स) की नस्स के माध्यम से[२०] इमाम हसन (अ) पैग़म्बर (स) और अली (अ) की नस्स के माध्यम से,[२१] इमाम हुसैन (अ) पैग़म्बर (स), इमाम अली (अ), और इमाम हसन (अ) की नस्स के माध्यम से।[२२] अगले नौ इमामों का भी उनके पहले के इमाम की नस्स के माध्यम से परिचय कराया गया है।[२३]
इमामो की इमामत पर नुसूस से संबंधित रचनाएँ
इमामत पर नुसूस के होने को सिद्ध करने के लिए, ऐसी रचनाओ की रचना की गई हैं जिन्हें दो श्रेणियो में विभाजित किया जा सकता है:
- ऐसी रचनाएँ जिनमें सभी शिया इमामों की इमामत से जुड़े लेख इकट्ठा किए गए हैं, जिनमें पहले सदूक़ की अल इमामा वल तब्सरा, मसऊदी की इस्बात अल वसिया, इब्न खज़ाज़ कुमी की किफ़ायातुल असर, जोहरी की मुक़्तज़ब अल असर, हुसैन बिन अब्दुल वहाब की ओयून अल मोअजेज़ात और कराजकी की अल इस्तिंसार शामिल हैं, जो चंद्र कैलेंडर की चौथी और पाँचवीं सदी से हैं। इसके अलावा मुहम्मद ताहिर कुमी की अल अरबईन, हुर्रे आमोली की इस्बात अल हुदात, अल्लामा बहरानी की बहजत अल-नज़र और अल-इंसाफ़, और हामिद हुसैन की अब्क़ात अल अनवार जैसी रचनाएँ भी हैं, जो चंद्र कैलेंडर की 10वीं से 14वीं सदी की हैं।
- ऐसी रचनाएँ जो किसी विशेष नस्स पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जिसमें हदीस ग़दीर पर अध्ययन शामिल हैं, जैसे कि कराजकी (मृत्यु 449 हिजरी) की दलील अल नस्स बे खबर अल ग़दीर, मूसवी शफ़्ती (मृत्यु 1290 हिजरी) की अल इमामा, और अल्लामा अमिनी (मृत्यु 1390 हिजरी) की अल ग़दीर। इसके अलावा, शिया हदीसी स्रोतों में इमामत के नुसूस को बयान करने के लिए अलग-अलग अध्याय समर्पित हैं।[२४]

अन्य संप्रदायों के कथित नुसूस
अबू बक्र
बकरिया, हंबली और ख़वारिज के एक समूह का मानना है कि पैग़म्बर (स) ने स्पष्ट रूप से अबू बक्र को उत्तराधिकारी बनाया था।[२५] बैहक़ी सहित एक दूसरे समूह का मानना है कि पैग़म्बर (स) ने सिर्फ़ इनडायरेक्टली उनको (अबू बक्र) जमात का इमाम बनाकर इमामत का ज़िक्र किया था।[२६] अधिकांश सुन्नी इस नज़रिए को नहीं मानते और मानते हैं कि पैग़म्बर (स) की ओर से उनके बाद उत्तराधिकारी की नियुक्ति के बारे में कोई नस्स नहीं है।[२७] सय्यद मुर्तज़ा ने रावीयो के ज़ईफ़ होने, हदीसो का स्पष्ट ना होने और दूसरे बाहरी सबूतों का हवाला देते हुए इस दावा को खारिज किया है।[२८]
रावंदिया का यह भी मानना था कि पैग़म्बर (स) ने अपने चाचा अब्बास को अप्रत्यक्ष रूप से इमाम नियुक्त किया था। यह नज़रिया अब्बासी शासन के प्रारम्भिक दौर में सामने आया था।[२९]
इस्माईल बिन जाफ़र
इस्माइली संमप्रदाय में, इमाम सादिक़ (अ) के पुत्र इस्माईल को उनके पिता के बाद इमाम के रूप में मान्यता दी गई है और इस स्कूल में, इमामत को साबित करने के लिए नस्स ही एकमात्र मानदंड है;[३०] हालांकि, इस्माईली स्रोतों में इस्माईल की इमामत के बारे में कोई स्पष्ट नस्स बयान नहीं किया गया है।[३१] हालांकि, इस संबंध में जाफ़र बिन मंसूर अल यमन द्वारा बिना संचरण श्रृंखला के वर्णित रिवायत हैं[३२] जिन्हें वे अलोकप्रिय मानते हैं।[३३] इमामिया धर्मशास्त्री इस्माईल की इमामत पर हर प्रकार की नस्स को अस्वीकार करते हैं और इमाम सादिक़ (अ) के जीवनकाल के दौरान उनकी मृत्यु को इस बात का प्रमाण मानते हैं कि वह इमाम नही है।[३४]
अब्दुल्लाह अफ़्तह
इमाम सादिक़ (अ) के एक और बेटे अब्दुल्लाह अफ़्तह ने इमाम की शहादत के बाद इमामत का दावा किया, और कुछ शिया उनकी इमामत पर विश्वास करते थे।[३५] ऐसा कहा गया है कि उनके दावे के पीछे एक कारक इमाम सादिक़ (अ) की वसीयत थी,[३६] जिसमें उन्होंने अपने सहित पाँच लोगों को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।[३७] अल्लामा मजलिसी ने इस कथन की प्रसारण श्रृंखला की कमजोरी का उल्लेख करते हुए, कुछ लोगों, जैसे मंसूर अल दवानीकी और इमाम की पत्नी हुमैयदा, को उत्तराधिकरी के रूप में नियुक्ति को तक़य्या के कारण माना।[३८] उनका यह भी मानना था कि हुमैयदा का महिला होना उन्हें इमामत ग्रहण करने से रोकता था, और यदि बड़े बेटे में इमामत की योग्यताएँ होतीं, तो छोटे बेटे का उल्लेख करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। इसलिए, दो बच्चों का उल्लेख केवल मूसा इब्न जाफ़र (अ) की इमामत को इंगित करता है।[३९]
फ़ुटनोट
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- ↑ सय्यद मुर्रज़ा, अल शाफ़ी फ़ी अल इमामत, 1407 हिजरी, भाग 2, पेज 67; जमई अज़ नवीसंदेगान, शरह अल मुस्तलेहात अल कलामिया, 1415 हिजरी, पेज 367।
- ↑ शेख तूसी, अल इक़्तेसाद, 1406 हिजरी, पेज 314-315 अमीर ख़ानी, नस्स, पेज 338।
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स्रोत
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- सय्यद मुर्तज़ा, अली बिन अल हुसैन, अल शाफ़ी फ़ी अल इमामा, तेहरान, अल सादिक़ संस्थान, 1407 हिजरी।
- सय्यद मुर्तज़ा, अली हुसैन, अल फ़ुसूल अल मुखतारोह मिन अल ओयून वल महासिन शेख मुफ़ीद, नजफ़, हैदरिया प्रकाशन, अप्रकाशित तिथि।
- सादाबादी, उबैदुल्लाह बिन अब्दुल्लाह, अल मुक़नेअ फ़ी अल इमामा, क़ुम, जमाअत अल मुदर्रेसीन फ़ी अल हौज़ा अल इल्मिया, बेक़ुम, मोअस्सेसा अल नशर अल इस्लामी, 1414 हिजरी।
- सीवती, जलालुद्दीन, जामेअ अल अहादी, अप्रकाशित स्थान, हसन अब्बास ज़की प्रकाशक, अप्रकाशित तारीख
- हबीब मज़ाहेरी, मसऊद, इस्माईल बिन जाफ़र, दायरतुल मआरिफ़ बुजुर्ग इस्लामी, भाग 11, तेहरान, मरकज़ दाएरातुल मआरिफ़ बुजुर्ग इस्लामी, अप्रकाशित तिथि।
- हुसैनी खतीब, अब्दुज जहरा, अल शाफ़ी फ़ी अल इमामा (सय्यद मुर्तज़ा), मुकद़्दमा अल तहकीक, तेहरान, अल सादिक़ संस्थान, 1407 हिजरी।