प्रारूप:मारेक़ीन
| नेता / नेतागण | अब्दुल्लाह बिन वह्ब, हमज़ा बिन सेनान |
|---|---|
| प्रभावशाली व्यक्तित्व | शुरैह बिन औफ़ा, ज़ैद बिन हुसैन |
| समूह एवं दल | ख़वारिज के संप्रदाय: एबाज़िया, अज़ारिक़ा, नजदात, अजारिदा, सफ़रिया और शबीबिया |
| पृष्ठभूमि / कारण | सिफ़्फ़ीन के युद्ध और मध्यस्थता (हकमियत की घटना) के बाद दीन (धर्म) से निकल जाने वाले लोग |
| नारा | ला हुक्मा इल्ला लिल्लाह |
| पक्षकार | इमाम अली (अ) और उनके साथी — ख़वारिज |
| हानियाँ / क्षतियाँ | इमाम अली (अ) के 10 से कम साथियों की शहादत; तथा 10 को छोड़कर सभी मारेक़ीन का मारा जाना |
मारेक़ीन, का अर्थ दीन (धर्म) से निकलने वाले हैं। यह उस समूह का नाम है जो सिफ़्फ़ीन के युद्ध और हकमियत की घटना के बाद «ला हुक्म इल्ला लिल्लाह» के नारे के साथ इमाम अली (अ) से अलग हो गया और नहरवान का युद्ध शुरू किया।
यह समूह ख़वारिज के नाम से प्रसिद्ध हुआ और दीन के बारे में सतही सोच रखने के लिए जाना जाता है। नहजुल बलाग़ा में वर्णित विवरण के अनुसार, इमाम अली (अ) ने 12 उपदेशों और एक हिकमत में उनके अक़ीदों (मान्यताओं) और व्यवहार का विश्लेषण और आलोचना की है। उनके अक़ीदों में से एक, हकमियत स्वीकार करने के कारण इमाम अली (अ) को काफ़िर ठहराना था।
मारेक़ीन के प्रमुख व्यक्तियों में अब्दुल्लाह बिन वहब और हमज़ा बिन सिनान शामिल थे। वे नहरवान के युद्ध में इमाम अली (अ) की सेना से पराजित हुए। उनमें से कुछ लोग इमाम हसन (अ) की सेना में मुआविया के मुक़ाबले में शामिल हुए और उनके असफल हत्या-प्रयास में भूमिका निभाई।
परिभाषा
मारेक़ीन उस समूह को कहा जाता है, जो नहरवान के युद्ध में इमाम अली (अ) के सामने खड़ा हुआ।[१] वाक़अत-ए सिफ़्फ़ीन नामक किताब के लेखक नस्र बिन मुज़ाहिम के अनुसार, ख़वारिज शुरू में इमाम अली (अ) की सेना में थे, लेकिन हकमियत की घटना के बाद उनसे मतभेद होने पर उन्होंने «ला हुक्मा इल्ला लिल्लाह» का नारा लगाया और हकमियत को बड़ा गुनाह माना।[२] उनका मानना था कि हकमियत के मामले में सभी लोगों, विशेष रूप से हज़रत अली (अ), को इस ग़लती से तौबा करनी चाहिए।[३] उनका यह भी मानना था कि हज़रत अली (अ) हकमियत स्वीकार करने के कारण काफ़िर हो गए हैं और उनसे बेज़ारी करके उनसे दूर रहना चाहिए।[४]
स्थान और महत्व
अल्लामा मजलिसी के बिहारुल अनवार में किए गए उल्लेख के अनुसार, पैग़म्बर (स) ने हज़रत अली (अ) से कहा: «ऐ अली! मेरे बाद तुम नाकेसीन, क़ासेतीन और मारेक़ीन से जंग करोगे।» यह रिवायत शिया और सुन्नी स्रोतों में मुतवातिर रूप से वर्णित हुई है।[५] नहजुल बलाग़ा में मारेक़ीन के विषय को बारह उपदेशों और एक हिकमत के लिए विशेष रूप से वर्णित किया गया है।[६] इनमें ख़ुत्बा-ए शेक़शेक़िया,[७] ख़ुत्बा-ए क़ासेआ,[८] और नहजुल बलाग़ा का ख़ुत्बा 40 भी शामिल है।[९] इसी प्रकार ईदे ग़दीर के अवसर पर इमाम अली (अ) की ज़ियारत[१०] और दुआ-ए नुदबा[११] में भी मारेक़ीन का उल्लेख हुआ है।
इस्लामी समाज में मारेक़ीन को «क़ारी» या «क़ुर्रा» के नाम से जाना जाता था।[१२] कुछ शोधकर्ताओं ने पैग़म्बर (स) से वर्णित अनेक रिवायतों के आधार पर मारेक़ीन की कुछ विशेषताएँ बताई हैं, जिनमें दीन के बारे में सतही सोच, दीन में अतिशयोक्ति, अल्पबुद्धिता और इस्लाम से निकल जाना शामिल हैं।[१३] मुहम्मद मुहम्मदी रय शहरी, जो हदीस-विशेषज्ञ थे, ने ऐतिहासिक और हदीसी ग्रंथों के आधार पर नहरवान के युद्ध करने वालों को मारेक़ीन (दीन से निकलने वाले), ख़वारिज (इमाम अली (अ) के आदेश की अवज्ञा करने वाले), हरूरिया (उनके एकत्र होने का स्थान), शुरात (या तो क्रोध करने वाले, या आख़िरत के पुरस्कार के लिए अपनी जान क़ुर्बान करने वाले) और बुग़ात (ज़ालिम) के नामों से वर्णित किया है।[१४]
कुछ स्रोतों में मारेक़ीन के प्रमुख व्यक्तियों में शुरैह बिन औफ़ा, ज़ैद बिन हुसैन, हमज़ा बिन सिनान और अब्दुल्लाह बिन वहब का नाम लिया गया है।[१५] अशअस बिन क़ैस किन्दी, जो इमाम अली (अ) की सेना में मुआविया का एक प्रभावशाली जासूस था, के बारे में कहा गया है कि उसने मारेक़ीन को गुमराह करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।[१६] मुहम्मदी रय शहरी के अनुसार, इस विचारधारा का सामना करना, जो देखने में क़ुरआन पर आधारित थी और जिसके अनुयायियों के माथे बहुत अधिक सज्दों के कारण गट्टेदार हो गए थे, कितना कठिन था, यह इमाम अली (अ) के इस कथन से समझा जा सकता है: «فَأَنا فَقَأتُ عَينَ الفِتنَةِ ولَم تَكُن لِيَجتَرِئَ عَلَيها أحَدٌ غَيرى» (फ़अना फ़क़अतु ऐनल-फ़ित्नति व लम तकुन ली यज्तरिअु अलैहा अहदुन ग़ैरि) (अनुवाद:मैंने फ़ितने की आँख निकाल दी, और मेरे अलावा किसी में उसका सामना करने का साहस नहीं था।)[१७] इमाम अली (अ) ने नहरवान के युद्ध के बाद कहा कि ख़वारिज आने वाली नस्लों में बाक़ी रहेंगे और समय-समय पर प्रकट होते रहेंगे; जब भी उनमें से कोई प्रकट होगा, उसे दबा दिया जाएगा, यहाँ तक कि अंत में उनमें से केवल चोरों और लुटेरों का एक समूह ही बाक़ी रह जाएगा।[१८] वे मुआविया के विरुद्ध युद्ध में इमाम हसन (अ) की सेना में भी शामिल हुए, लेकिन उन्होंने उनके लिए बहुत-सी समस्याएँ पैदा कीं,[१९] और इमाम हसन (अ) पर हमला करने तथा उन्हें घायल करने का कारण भी बने।[२०]
अक़ायद
किताब फ़िरक़ुश शिया के लेखक हसन बिन मूसा नौबख़्ती के अनुसार, मारेक़ीन का मानना था कि हज़रत अली (अ), उस्मान, मुआविया और दोनों हकम काफ़िर हैं। उनका मानना था कि ख़लीफ़ा और पैग़म्बर के उत्तराधिकारी का अरब और क़बीला-ए क़ुरैश से होना आवश्यक नहीं है। वे ग़ैर-अरब, बल्कि ग़ुलामों की ख़िलाफ़त को भी जायज़ मानते थे, बशर्ते वह व्यक्ति परहेज़गार, तलवार चलाने वाला और न्यायप्रिय हो।[२१] एबाज़िया, अज़ारिका, नजदात, अजारिदा, सफ़रिया और शबीबिया को मारेक़ीन के प्रसिद्ध फ़िरक़ों में गिना गया है।[२२] शबीबिया संप्रदाय ख़िलाफ़त में पुरुष और स्त्री के बीच कोई अंतर नहीं करता था और महिलाओं की इमामत को भी जायज़ मानता था।[२३]
नौबख़्ती के अनुसार, फ़िरक़ुश शिया में मारेक़ीन का मानना था कि बड़े गुनाह करने वाले काफ़िर हैं और उनका ख़ून बहाना मुबाह है। इसी तरह जिन महिलाओं और बेटियों तथा उन समूहों से वे बेज़ारी करते थे, उनसे विवाह को जायज़ नहीं मानते थे और अपने इमामों के साथ काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों के विरुद्ध निकलना एक अनिवार्य कर्तव्य मानते थे।[२४] उनके अनुसार, मारेक़ीन के कुछ समूह उन लोगों को भी काफ़िर मानते थे जो युद्ध से अलग रहते थे, भले ही वे उनके समर्थक ही क्यों न हों।[२५] उनका मानना था कि सूरह यूसुफ़ क़ुरआन का हिस्सा नहीं है और वे कहते थे कि यह सूरह एक प्रेम-कहानी है, जिसे क़ुरआन में नहीं होना चाहिए।[२६]
मारेक़ीन का अंजाम
इमाम अली (अ) ने 37 और 38 हिजरी में नहरवान नामक क्षेत्र में मारेक़ीन से युद्ध किया।[२७] युद्ध शुरू होने से पहले इमाम अली (अ) ने उन्हें वापस लौटने और तौबा करने के लिए बुलाया, जिसके बाद उनमें से बड़ी संख्या में लोग सेना से अलग हो गए।[२८] इस युद्ध में दस लोगों को छोड़कर सभी मारे गए और 400 लोग घायल हुए, जबकि इमाम अली (अ) के साथियों में दस से कम लोग शहीद हुए।[२९] इस युद्ध से बचने वालों में से एक इब्ने मुल्जिम मुरादी था, जिसने 19 रमज़ान, वर्ष 40 हिजरी में ज़हरीली तलवार से मस्जिद-ए कूफ़ा के मेहराब में इमाम अली (अ) को शहीद कर दिया।[३०]
सम्बंधित लेख
फ़ुटनोट
- ↑ आख़ूंदी और अन्य, इस्तिलाहात ए नेज़ामी दर फ़िक़्हे इस्लामी, पृष्ठ 108।
- ↑ अल मिनक़री, वक़अत-ए सिफ़्फ़ीन, पृष्ठ 513।
- ↑ अल मिनक़री, वक़अत-ए सिफ़्फ़ीन, पृष्ठ 513।
- ↑ नौबख़्ती, अनुवाद: फ़िरक़ुश शिया-ए नौबख़्ती, पृष्ठ 6।
- ↑ मजलिसी, बिहारुल अनवार, खंड 30, पृष्ठ 588।
- ↑ ख़ज़अली, «ناکثین، قاسطین و مارقین در نهجالبلاغه», पृष्ठ 398।
- ↑ नहजुल बलाग़ा, संपादन: सुब्ह़ी सालेह, ख़ुत्बा 3, पृष्ठ 49।
- ↑ नहजुल बलाग़ा, संपादन: सुब्ह़ी सालेह, ख़ुत्बा 192, पृष्ठ 300।
- ↑ नहजुल बलाग़ा, संपादन: सुब्ह़ी सालेह, ख़ुत्बा 40, पृष्ठ 82।
- ↑ इब्ने ताऊस, अल-इक़बाल बिल-आमालिल हसना, खंड 2, पृष्ठ 307।
- ↑ मजलिसी, मुहम्मद बाक़िर, ज़ादुल मआद – मिफ़्ताहुल जिनान, पृष्ठ 305।
- ↑ मुहम्मदी रय शहरी, दानिशनामा-ए अमीरुल मोमिनीन (अ) बर पाया-ए क़ुरआन, हदीस व तारीख़, खंड 6, पृष्ठ 359।
- ↑ मुहम्मदी रय शहरी, दानिशनामा-ए अमीरुल मोमिनीन (अ) बर पाया-ए क़ुरआन, हदीस व तारीख़, खंड 6, पृष्ठ 339–345।
- ↑ मुहम्मदी रय शहरी, दानिशनामा-ए अमीरुल मोमिनीन (अ) बर पाया-ए क़ुरआन, हदीस व तारीख़, खंड 6, पृष्ठ 332–337।
- ↑ मुहम्मदी रय शहरी, दानिशनामा-ए अमीरुल मोमिनीन (अ) बर पाया-ए क़ुरआन, हदीस व तारीख़, खंड 6, पृष्ठ 359 और 369।
- ↑ मुहम्मदी रय शहरी, दानिशनामा-ए अमीरुल मोमिनीन (अ) बर पाया-ए क़ुरआन, हदीस व तारीख़, खंड 6, पृष्ठ 328।
- ↑ मुहम्मदी रय शहरी, दानिशनामा-ए अमीरुल मोमिनीन (अ) बर पाया-ए क़ुरआन, हदीस व तारीख़, खंड 6, पृष्ठ 293।
- ↑ नहजुल बलाग़ा, संपादन: सुब्ह़ी सालेह, ख़ुत्बा 60।
- ↑ आले यासीन, सुल्हुल हसन (अ), पृष्ठ 39।
- ↑ दीनवरी, अल-अख़बारुत तिवाल, पृष्ठ 319–320।
- ↑ नौबख़्ती, अनुवाद: फ़िरक़ुश शिया-ए नौबख़्ती, पृष्ठ 68।
- ↑ नौबख़्ती, अनुवाद: फ़िरक़ुश शिया-ए नौबख़्ती, पृष्ठ 68।
- ↑ नौबख़्ती, अनुवाद: फ़िरक़ुश शिया-ए नौबख़्ती, पृष्ठ 68।
- ↑ नौबख़्ती, अनुवाद: फ़िरक़ुश शिया-ए नौबख़्ती, पृष्ठ 68।
- ↑ नौबख़्ती, अनुवाद: फ़िरक़ुश शिया-ए नौबख़्ती, पृष्ठ 68।
- ↑ नौबख़्ती, अनुवाद: फ़िरक़ुश शिया-ए नौबख़्ती, पृष्ठ 68।
- ↑ मुहम्मदी रय शहरी, दानिशनामा-ए अमीरुल मोमिनीन (अ) बर पाया-ए क़ुरआन, हदीस व तारीख़, खंड 6, पृष्ठ 373।
- ↑ दीनवरी, अल-अख़बारुत तिवाल, पृष्ठ 309।
- ↑ बलाज़ुरी, अंसाबुल अशराफ़, बेरूत, खंड 2, पृष्ठ 373–375।
- ↑ शेख़ मुफ़ीद, अल-इरशाद, खंड 1, पृष्ठ 20।
स्रोत
- नहजुल बलाग़ा, संपादन: सुब्ह़ी सालेह, क़ुम, हिजरत प्रकाशन, पहला संस्करण, 1414 हिजरी।
- अल-मिनक़री, नस्र बिन मज़ाहिम, वक़अत-ए सिफ़्फ़ीन, संपादन: अब्दुस्सलाम मुहम्मद हारून, क़ुम, आयतुल्लाह मरअशी नजफ़ी पुस्तकालय, दूसरा संस्करण, 1404 हिजरी।
- आख़ूंदी, मुस्तफ़ा, और मुर्तज़ा मुहम्मदियान व मुहम्मद सालेह क़ुमैली, इस्तिलाहात-ए निज़ामी दर फ़िक़्ह-ए इस्लामी, तेहरान, सिपाह-ए पासदारान-ए इंक़िलाब-ए इस्लामी, विलायत-ए फ़क़ीह का प्रतिनिधि कार्यालय, अक़ीदती-सियासी प्रशिक्षण विभाग, पहला संस्करण, 1378 शम्सी।
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- ख़ज़अली, अबुल क़ासिम, «ناکثین، قاسطین و مارقین در نهجالبلاغه», अंतरराष्ट्रीय कांग्रेसी नहजुल बलाग़ा की सहस्राब्दी में प्रस्तुत लेखों और भाषणों का संग्रह, खंड 1, प्रकाशित वर्ष उपलब्ध नहीं।
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- बलाज़ुरी, अंसाबुल अशराफ़, शोध: मुहम्मद बाक़िर महमूदी, बेरूत, अल आलमी लिल-मतबूआत प्रकाशन संस्था, प्रकाशित वर्ष उपलब्ध नहीं।
- मजलिसी, मुहम्मद बाक़िर बिन मुहम्मद तक़ी, ज़ादुल मआद, बेरूत, अल आलमी लिल-मतबूआत संस्था, 1423 हिजरी / 2003 ईस्वी।
- मजलिसी, मुहम्मद बाक़िर, बिहारुल अनवार अल-जामिअत लिदुररि अख़बारिल आइम्मतिल अतहार (अ), बेरूत, दारु इहयाइत-तुरासिल अरबी प्रकाशन, दूसरा संस्करण, 1403 हिजरी।
- मुहम्मदी रय शहरी, मुहम्मद, दानिशनामा-ए अमीरुल मोमिनीन (अ) बर पाय-ए क़ुरआन, हदीस व तारीख़, खंड 6, क़ुम, दारुल हदीस प्रकाशन, पहला संस्करण, 1386 शम्सी।
- शेख़ मुफ़ीद, मुहम्मद बिन मुहम्मद, अल-इरशाद फ़ी मअरिफ़ति हुजजिल्लाह अलल-इबाद, संपादन: आले अल बैत (अ) संस्था, क़ुम, शेख़ मुफ़ीद कांग्रेस, पहला संस्करण, 1413 हिजरी।