सूर ए ज़िलज़ाल

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सूर ए ज़िलज़ाल

सूर ए ज़िलज़ाल (अरबी: سورة الزلزلة) क़ुरआन का 99वां सूरह है, जो छोटे सूरों में से एक है और क़ुरआन के 30वें अध्याय में स्थित है। अधिकांश टीकाकारों ने कहा है कि यह सूरह मदनी है। सूरह का नाम इसकी पहली आयत से लिया गया है।

सूर ए ज़िलज़ाल क़यामत के दिन के संकेतों के बारे में बात करता है और उस दिन हर अच्छे और बुरे काम करने वाले उसका परिणाम देखेंगे। हदीसों में कहा गया है कि सूर ए ज़िलज़ाल क़ुरआन के एक-चौथाई के बराबर है और जो कोई भी इसे पढ़ता है, ऐसा है जैसे कि उसने सूर ए बक़रा का पाठ किया है।

परिचय

नामकरण

इस सूरह को ज़लज़ला कहा जाता है; क्योंकि यह क़यामत के दिन की शुरुआत में पृथ्वी के अंतिम भूकंप और ब्रह्मांडीय व्यवस्था के पतन के बारे में बात करता है। इसका दूसरा नाम ज़लज़ला है; क्योंकि इसका उल्लेख पहली आयत में है।[१]

नाज़िल होने का स्थान और क्रम

सूर ए ज़िलज़ाल के मक्की या मदनी होने पर मतभेद है; लेकिन मुहम्मद हादी मारेफ़त के अनुसार इसका मदनी होना प्रसिद्ध है और इसकी प्रामाणिकता की संभावना अधिक है।[२] अल्लामा तबातबाई ने इस सूरह के मक्की और मदनी होने के संभावना दी है।[३] यह सूरह 93वां सूरह है जो पैग़म्बर (स) पर नाज़िल हुआ था। यह सूरह क़ुरआन की वर्तमान रचना में, 99वां सूरह है।[४] और क़ुरआन के 30वें अध्याय में स्थित है।

आयतों एवं शब्दों की संख्या

सूर ए ज़िलज़ाल में 8 आयतें, 36 शब्द और 158 अक्षर हैं। यह सूरह, मुफ़स्सेलात सूरों (छोटी आयतों वाले) और क़ुरआन के छोटे सूरों में से एक है।[५]

सामग्री

सूर ए ज़िलज़ाल की सामग्री तीन अक्षों पर आधारित है: 1. क़यामत के दिन की निशानियाँ (अश्रात अल साआ) 2. क़यामत के दिन पृथ्वी मानवीय कार्यों की साक्षी है; 3. लोगों को अच्छे और बुरे में विभाजित करना और हर किसी को उसके कर्मों के अनुसार इनाम मिलेगा।[६] इस सूरह में, भगवान न्याय के दिन फ़ैसले की सटीकता, गंभीरता और निष्पक्षता पर ज़ोर देता है।[७] मुतह्हरी इस्लामी विद्वान और क़ुरआन के व्याख्याकार क़ुरआन की आयत يَوْمَئِذٍ يَصْدُرُ النَّاسُ أَشْتَاتًا لِيُرَوْا أَعْمَالَهُمْ (यौमएज़िन यस्दोरुन्नासो अश्ताता ले योरव आमालहुम) का प्रयोग करते हुए कहा है कि क़यामत का दिन उन कर्मों की प्रदर्शनी है जो मनुष्य ने इस दुनिया में किए हैं।[८]

मुर्तज़ा मुतह्हरी, क़ुरआन के टिप्पणीकारों में से एक, "ले योरव आमालहुम" आयत के बारे में:

लोगों को (क़यामत के दिन) कार्यों की प्रदर्शनी में ले जाया जाएगा। वहाँ, जीवन के आरंभ से अंत तक इस संसार में लोगों ने जो भी कार्य किए हैं, चाहे वे छोटे हों या बड़े, स्वयं क्रिया (अमल) और क्रिया की आत्मा (और कुछ नहीं) "अवतरित" होती हैं। वे लोगों को उनके कर्मों की प्रदर्शनी में ले जाते हैं और कहते हैं कि अपने कर्मों को देखो।

https://lms.motahari.ir/book-page/31/Ashnaei%20ba%20Qur'an,%20J14?pag

आयत 2 में बताया गया है कि क़यामत के दिन धरती अपना बोझ (अस्क़ाल) उतार फेंकेगी। अल्लामा तबातबाई लिखते हैं कि अधिक सही राय के अनुसार, “अस्क़ाल” का अर्थ "मृतकों का शेष" है।[९] इस सूरह की अंतिम तीन आयतों से यह समझा जाता है कि क़यामत के दिन आमाल शरीर धारण करेंगे। अर्थात व्यक्ति के कर्म उचित रूप में उसके सामने प्रकट होगों और उनके साथ रहना सुख या कष्ट का कारण बनता है।[१०]

प्रसिद्ध आयात

  • فَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًا يَرَهُ وَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ شَرًّا يَرَهُ

(फ़मई यामल मिस्क़ाला ज़र्रतिन ख़ैरइ यरह व मई यामल मिस्क़ाला ज़र्रतिन शर्रई यरह) (आयत 7 और 8)

इन दो आयतों में कहा गया है कि जो कोई भी कण के आकार का अच्छा या बुरा कार्य करेगा, वह उसे देखेगा। "मिस्क़ाल" से "सक़ील" शब्द का अर्थ भारीपन की मात्रा है, और "ज़र्रह" शब्द का अर्थ या तो सबसे छोटी चींटी है या हवा में बिखरे हुए प्रकाश के कण। हालांकि, आज परमाणु को भी कण कहा जाता है। टिप्पणी में कहा गया है कि "यरह: वह इसे देखेगा" का अर्थ "कार्य का परिणाम" या "कार्य का पत्र" या "स्वयं कार्य" है।[११] तीसरी राय के अनुसार, अर्थात, क़यामत के दिन व्यक्ति स्वयं कार्य को देखेगा, ये दो आयत और आयत 6 में वाक्य "लेयोरव आमालहुम" कार्यों के अवतार को इंगित करते हैं।[१२]

एक संदेह का उत्तर

यह प्रश्न मन में आ सकता है कि क़ुरआन में ऐसी आयतें हैं जो कुछ कारकों के कारण अच्छे कर्मों की विफलता का संकेत देती हैं, और ऐसी आयतें भी हैं जो लोगों के अच्छे और बुरे कर्मों को दूसरों तक स्थानांतरित करने का संकेत देती हैं।, जैसे कि हत्यारे के अच्छे कर्मों को पीड़ित तक स्थानांतरित करना, और पीड़ित के पापों को हत्यारे तक स्थानांतरित करना, और वह आयतें जो संकेत देती हैं कि कुछ प्रायश्चित्तों में, पाप प्रतिफल (सवाब) में बदल जाता है, तो लोगों का यह समूह अपने कार्यों को किस प्रकार देखेगा? इसका उत्तर यह है कि आयतों का यह समूह इन दो आयतों को नियंत्रित (हाकिम) करता है, और हाकिम और महकूम कारण के बीच कोई विरोधाभास नहीं है, उदाहरण के लिए, जो आयात अच्छे कर्मों के निषेध का संकेत देती हैं, ऐसे व्यक्ति के पास वास्तव में निषेध के बाद देखने के लिए कोई कर्म नहीं होता है, इसके अलावा, जिस हत्यारे ने पीड़ित को जीवित रहने और अच्छे कर्म करने की अनुमति नहीं दी, उसके अच्छे कर्म पीड़ित को दे दिए जाएंगे, और उसके पास खुद अच्छे कर्म नहीं होगें जिसे वह देखे, या पश्चाताप करने वाला व्यक्ति जिसका पाप अच्छे कर्मों में बदल जाएगा, उसके लिए कोई पाप नहीं बचता जिसे वह देखे।[१३]

शाने नुज़ूल

मक़ातिल इब्ने सुलेमान से वर्णित हुआ है कि सूर ए ज़िलज़ाल की सातवीं और आठवीं आयतें (जो कहती हैं कि जो कोई थोड़ा भी अच्छा या बुरा करेगा उसे उसका (नतीजा) देखना होगा) दो लोगों के बारे में नाज़िल हुई थीं। उनमें से एक वह था जो कहता था आयत, "وَ يُطْعِمُونَ الطَّعامَ عَلى‏ حُبِّه" (व युत्एमूना अल तआमा अला हुब्बेह)[१४] (अनुवाद: और भोजन, भले ही वे इसे पसंद करते हों वे गरीबों, अनाथों और बंदियों को दान देते हैं।) वह मुझे पैसे ख़र्च करने (इंफ़ाक़) से रोकता है; क्योंकि जो मेरे पास है वह बहुत कम है और वह मेरा प्रिय नहीं है, और दूसरा वह था जो कहता था कि छोटे पाप हमें नुकसान नहीं पहुँचाते हैं।[१५]

फ़ज़ीलत

मुख्य लेख: सूरों के फ़ज़ाइल

तफ़सीर मजमा उल बयान में, पैग़म्बर (स) से यह वर्णित हुआ है कि जो कोई भी इस सूरह को पढ़ता है वह सूरह बक़रा को पढ़ने के समान है और उसे दिया गया इनाम कुरआन के एक चौथाई को पढ़ने वाले के इनाम के समान है। साथ ही, पैग़म्बर (स) से यह भी वर्णित हुआ है कि सूर ए ज़िलज़ाल क़ुरआन के एक चौथाई के समान है।[१६]

इमाम सादिक़ (अ) से यह भी वर्णित हुआ है कि "एज़ा ज़ुलज़ेलत" पढ़ते न थको। जो कोई इसे अपनी नाफ़ेला [[[नमाज़]]] में पढ़ता है, वह कभी भी भूकंप का सामना नहीं करेगा, और वह भूकंप, बिजली, या दुनिया की किसी भी महामारी से नहीं मरेगा, और जब भी वह मरेगा, भगवान उसे स्वर्ग में जाने का आदेश देगा। तो सर्वशक्तिमान ईश्वर कहता है: मेरे सेवक (बंदे)! मैंने अपनी जन्नत तुम्हारे लिए मुबाह कर दी है, तुम जहां चाहो बस जाओ, तुम्हारे लिए कोई बाधा या विकर्षण नहीं है।[१७]

नमाज़े जाफ़रे तय्यार के निर्देशों में कहा गया है कि पहली रकअत में सूर ए हम्द के बाद सूर ए ज़िलज़ाल का पाठ किया जाना चाहिए।[१८] शबे जुमा में दो रकअत नमाज़ जिसकी प्रत्येक रकअत में सूर ए हम्द और पंद्रह बार सूर ए ज़िलज़ाल को पढ़ना मुस्तहब है यह भी वर्णन किया गया है कि जो कोई भी इस नमाज़ को पढ़ता है, भगवान उसे क़ब्र की पीड़ा और क़यामत के दिन के डर से बचाएगा।[१९] जमाल अल उबूअ में सय्यद इब्ने ताऊस, इमाम हसन अस्करी (अ) की नमाज़ के तरीके के बारे में कहते हैं कि यह चार रकअत है, पहली दो रकअत में सूर ए हम्द के बाद पंद्रह बार सूर ए "एज़ा ज़ुलज़ेलत" "और दूसरी दो रकअत में सूर ए हम्द के बाद पंद्रह बार सूर ए तौहीद, इस नमाज़ को शुक्रवार के दिन पढ़ना सबसे अच्छा है।[२०]

फ़ुटनोट

  1. दानिशाने क़ुरआन व क़ुरआन पजोही, 1377 शम्सी, खंड 2, पृष्ठ 1267।
  2. दानिशनामे क़ुरआन व क़ुरआन पजोही, 1377 शम्सी, खंड 2, पृष्ठ 1267; इसे भी देखें: मारेफ़त, आमोज़िशे उलूमे क़ुरआन, 1371 शम्सी, खंड 1, पृष्ठ 189।
  3. तबातबाई, अल मीज़ान, खंड 20, पृष्ठ 342।
  4. मारेफ़त, आमोज़िशे उलूमे क़ुरआन, 1371 शम्सी, खंड 1, पृष्ठ 168।
  5. दानिशनामे क़ुरआन व क़ुरआन पजोही, 1377 शम्सी, खंड 2, पृष्ठ 1267।
  6. मकारिम शिराज़ी, तफ़सीर नमूना, 1374 शम्सी, खंड 27, पृष्ठ 218।
  7. दानिशनामे क़ुरआन व क़ुरआन पजोही, 1377 शम्सी, खंड 2, पृष्ठ 1267।
  8. https://lms.motahari.ir/book-page/28/Ashnaei%20ba%20Qur'an,%20J11?page=155
  9. तबातबाई, अल मीज़ान, 1974 ईस्वी, खंड 20, पृष्ठ 342।
  10. मकारिम शिराज़ी, तफ़सीर नमूना, 1374 शम्सी, खंड 27, पृष्ठ 227; देखें: तबातबाई, अल मीज़ान, 1974 ईस्वी, खंड 20, पृष्ठ 342।
  11. तय्यब, अत्यब अल बयान, 1378 शम्सी, खंड 14, पृ. 200-199; क़राअती, मोहसिन, तफ़सीर नूर, 1388 शम्सी, खंड 10, पृष्ठ 568।
  12. मकारिम शिराज़ी, तफ़सीर नमूना, 1374 शम्सी, खंड 27, पृष्ठ 227; देखें: तबातबाई, अल-मीज़ान, 1974 ईस्वी, खंड 20, पृष्ठ 343।
  13. तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 20, पृष्ठ 343।
  14. सूर ए इंसान, आयत 8।
  15. अबुल फ़ुतूह राज़ी, रौज़ा अल जिनान, 1371 शम्सी, खंड 20, पृष्ठ 368।
  16. तबरसी, मजमा उल बयान, 1372 शम्सी, खंड 10, पृष्ठ 796।
  17. तबरसी, मजमा उल-बयान, 1372 शम्सी, खंड 10, पृष्ठ 796।
  18. क़ुमी, मफ़ातीह अल जिनान, पृष्ठ 66, "नमाज़ ए जाफ़र ए तय्यार" के अंतर्गत।
  19. क़ुमी, मफ़ातीह अल जिनान, शब ए जुमा के आमाल।
  20. अल सय्यद बिन ताऊस, जमाल अल उसबूअ बे कमाल अल अलम अल मशरूअ, प्रकाशक: दार अल रज़ी, पृष्ठ 279।

स्रोत

  • पवित्र कुरआन, मुहम्मद महदी फौलादवंद द्वारा अनुवादित, तेहरान, दार अल-कुरान अल-करीम, 1418 हिजरी/1376 शम्सी।
  • अबुल फ़ुतूह राज़ी, हुसैन बिन अली, रौज़ा अल जिनान व रूह अल जिनान फ़ी तफ़सीर अल कुरआन, मशहद, आस्ताने कुद्स रज़वी प्रकाशन, 1371 शम्सी।
  • दानिशनामे क़ुरआन व क़ुरआन पजोही, खंड 2, बहाउद्दीन खुर्रमशाही द्वारा प्रयास, तेहरान: दोस्तान-नाहीद, 1377 शम्सी।
  • सय्यद इब्ने ताऊस, रज़ी अल दीन, प्रकाशक: दार अल-रज़ी, क़ुम, पहला संस्करण, दो पृष्ठ।
  • तबरसी, फ़ज़्ल बिन हसन, मजमा अल बयान फ़ी तफसीर अल-कुरआन, मुहम्मद जवाद बलागी द्वारा एक परिचय के साथ, तेहरान, नासिर खोस्रो प्रकाशन, तीसरे संस्करण, 1372 शम्सी।
  • तबातबाई, सय्यद मुहम्मद हुसैन, अल-मीज़ान फ़ी तफ़सीर अल-कुरआन, बेरूत, मोअस्सास ए अल आलमी लिल मतबूआत, दूसरा संस्करण, 1974 ईस्वी।
  • तय्यब, सय्यद अब्दुल हुसैन, अत्यब अल-बयान फ़ी तफ़सीर अल-कुरआन, तेहरान,इंतेशाराते इस्लाम, दूसरा संस्करण, 1378 शम्सी।
  • क़राअती, तफ़सीर ए नूर, तेहरान, मरकज़ ए फ़र्हंगी दर्सहा ए अज़ क़ुरआन, 11वां संस्करण, 1388 शम्सी।
  • क़ुमी, अब्बास, मफ़ातीह अल जिनान,नशर ए मशअर, तेहरान, पहला संस्करण, 1387 शम्सी।
  • मारेफ़त, मुहम्मद हादी, आमोज़िशे उलूमे क़ुरआन, [अप्रकाशित], मरकज़े चाप व नशरे साज़माने तब्लीग़ात ए इस्लामी, पहला संस्करण, 1371 शम्सी।
  • मकारिम शिराज़ी, नासिर, तफ़सीर ए नमूना, तेहरान, दार अल कुतुब अल इस्लामिया, 1374 शम्सी।