क़िब्ती का वध

पैग़म्बर मूसा (अ) द्वारा एक क़िब्ती को मारना क़ुरआन की कहानियों में से एक है। हज़रत मूसा (अ) फिरऔन के साथ एक महल में रहते थे।[१] एक दिन, शहर में बनी इसराइल में से एक और एक क़िब्ती के बीच झगड़ा हो गया।[२] मूसा (अ) ने बनी इसराइल में से उस शख़्स की मदद करने के लिए हस्तक्षेप किया और क़िब्ती को एक घूंसा मारा, जिससे वह मर गया।[३] क़िबती की मौत की खबर पूरे शहर में फैल गई, और फिरऔन के लोगों ने मूसा (अ) का पीछा किया। मूसा (अ) ने मिस्र को छोड़ दिया।[४] इस घटना का उल्लेख सूरह-क़सस की आयत 15 और 16 और सूरह-शोअरा की आयत 20 में किया गया है।[५]
कुछ सुन्नी टिप्पणीकारों ने हज़रत मूसा द्वारा क़िब्ती व्यक्ति को मारने को पैग़म्बरों, खासकर मूसा (अ) के मासूम न होने का संकेत माना है।[६] उन्होंने कहा है कि अगर क़िब्ती व्यक्ति मारे जाने के योग्य था,[७] तो मूसा (अ) ने इसे "शैतान का काम"[८] और "अपने साथ अन्याय" क्यों कहा।[९] और अगर वह मारे जाने के योग्य नहीं था, तो यह कार्य उनकी अचूकता (मासूम होने) के साथ कैसे संगत है?[१०] इसलिए, उन्होंने कहा है कि मूसा (अ) ने एक छोटा पाप किया है क्योंकि उन्होंने भगवान की अनुमति से पहले क़िब्ती को मारने का प्रयास किया और इसलिए क्षमा मांगी है।[११] यह कहा गया है कि मारने के इरादे के बिना मारना छोटे पापों में से एक है जो अनजाने में हत्या का कारण बन गया है, और जिसके लिए शरियत में प्रायश्चित निर्धारित किया गया है।[१२]
शिया टिप्पणीकारों ने पैग़म्बरों को सभी तरह से पापों से मुक्त मानते है, चाहे वे बड़े पाप हो या छोटे सबसे अचूक मानते हैं।[१३] उनके हिसाब से, अल्लाह ने मूसा को क़िब्ती को मारने का हुक्म दिया था और वह मारा जाना ही चाहिए था,[१४] लेकिन मूसा (अ) के लिए यह काम देर से करना बेहतर होता[१५] क्योंकि उन हालात में, क़िब्ती को मारना उनके फ़ायदे में नहीं था और इस कारण उन्हें मिस्र छोड़ना पड़ा।[१६] मूसा ने इस काम में जल्दबाज़ी करते हुए तर्के औला (बेहतर को छोड़ दिया) किया और इसी लिए माफ़ी मांगी।[१७] अल्लाह ने उन्हें अपनी मेहरबानी में शामिल किया।[१८]
अल्लामा तबातबाई के मुताबिक, मूसा (अ) ने अपने मिशन (नबूवत मिलने) से पहले और किसी को मारने पर रोक लगने के शरई क़ानून से से पहले, क़िब्ती को मारा था, और क्योंकि वह (क़िब्ती) काफ़िर था और उसकी जान की सम्मानजनक नही थी।[१९] मूसा (अ) ने हत्या के गुनाह को नहीं माना है, बल्कि एक ऐसे काम को माना है जो उनके फ़ायदे में नहीं था।[२०] नासिर मकारिम शिराज़ी का यह भी मानना है कि फिरऔन के लोगोंं ने बनी इसराइल के हज़ारों नए जन्मे बच्चों को मार डाला था और इसलिये बनी इसराइल के लिये उनका (क़िब्तियों) ख़ून सम्मानजनक नही था।[२१]
इमाम अली रज़ा (अ) की एक हदीस के अनुसार, मूसा (अ) का यह कहना कि, "यह शैतानी का काम था," क़िब्ती आदमी और बनी इज़राइल के व्यक्ति के बीच संघर्ष की ओर इशारा था, और हज़रत मूसा की यह अभिव्यक्ति कि, "मैंने खुद के साथ अन्याय किया," मूसा के मुश्किल परिस्थितियों में फंस जाने की ओर इशारा है।।[२२]
फ़ुटनोट
- ↑ तबातबाई, अल-मिज़ान, 1370 शम्सी, भाग 16, पेज 17; मकारिम शिराज़ी, तफ़सीर नमूना, 1353 शम्सी, भाग 16, पेज 49।
- ↑ मकारिम शिराज़ी, तफ़सीर नमूना, 1353 शम्सी, भाग 16, पेज 54।
- ↑ सूरह अल-क़सस, आयत 15।
- ↑ रावंदी, क़सस अल-अंबिया, 1368 शम्सी, पेज 154-155।
- ↑ सूरह अल-क़सस, आयत 15 और 16; सूरह अल-शोअरा, आयत 20।
- ↑ फ़ख़रे राज़ी द्वारा उल्लेख किया गया, मफ़ातिह अल-ग़ैब, 1420 हिजरी, भाग 24, पेज 585।
- ↑ फ़ाज़िल मिक़दाद, लवामेअ अल-इलाहिया, 1380 शम्सी, पेज 259।
- ↑ सूरह अल-क़सस, आयत 15.
- ↑ सूरह अल-क़सस, आयत 16।
- ↑ फ़ाज़िल मिक़दाद, अल-लवामेअ अल-इलाहिया, 1380 शम्सी, पेज 259।
- ↑ ज़मख़शरी, अल-कश्शाफ़, 1407 हिजरी, भाग 3, पेज 398।
- ↑ आलूसी, रूह अल-मआनी, 1415 हिजरी, भाग 10, पेज 264।
- ↑ सय्यद मुर्तज़ा, तंज़ीहुल अंबिया, शरीफ़ रज़ी, पेज 67।
- ↑ शेख़ तूसी, अल-तिब्यान, दार इह्या अल-तुरास अल-अरबी, भाग 8, पेज 137; फ़ाज़िल मिक़दाद, अल-लवामेअ अल-इलाहिया, 1380 शम्सी, पेज 259।
- ↑ शेख़ तूसी, अल-तिब्यान, दार इह्या अल-तुरास अल-अरबी, भाग 8, पेज 137; फ़ाज़िल मिक़दाद, अल-लवामेअ अल-इलाहिया, 1380 शम्सी, पेज 259।
- ↑ मकारिम शिराज़ी, तफ़सीर-नमूना, 1353 शम्सी, भाग 16, पेज 55।
- ↑ शेख़ तूसी, अल-तिब्यान, दार इह्या अल-तुरास अल-अरबी, भाग 8, पेज 137; फ़ाज़िल मिक़दाद, अल-लवामेअ अल-इलाहिया, 1380 शम्सी, पेज 259।
- ↑ मकारिम शिराज़ी, तफ़सीर-नमूना, 1353 शम्सी, भाग 16, पेज 55।
- ↑ तबातबाई, अलमीज़ान, 1370 शम्सी, भाग 6, पेज 278।
- ↑ तबातबाई, अलमीज़ान, 1370 शम्सी, भाग 6, पेज 278।
- ↑ मकारिम शिराज़ी, तफ़सीर-नमूना, 1353 शम्सी, भाग 16, पेज 56।
- ↑ शेख़ सदूक़, उयून अख़बार अल-रिज़ा, 1404 हिजरी, भाग 2, पेज 177।
स्रोत
- अलमुल हुदा, अली इब्न अल-हुसैन, तंज़ीह अल-अनबिया, क़ुम, अल-शरीफ़ अल-रज़ी, अप्रकाशित तारीख़।
- आलूसी, महमूद इब्न अब्दुल्लाह, रूहुल मआनी फ़ी तफ़सीर अल-क़ुरआन अल-अज़ीम वस सब्अ अलमसानी, बेरूत, दार अल-कुतुब अल-इल्मिया, 1415 हिजरी।
- ज़मख़शरी, महमूद इब्न उमर, अल-कश्शाफ़ अन हक़ायक़ अल-ग़वामिज़ अल-तंज़िल, बेरूत, दार अल-कुतुब अल-अरबी, 1407 हिजरी।
- तबातबाई, सय्यद मुहम्मद हुसैन, अल-मिज़ान फ़ी तफ़सीर अल-कुरआन, क़ुम, इस्माइलियान प्रकाशन, 1370 शम्सी।
- फ़ख़्र राज़ी, मुहम्मद इब्न उमर, मफ़ातिह अल-ग़ैब, बेरूत, दार इह्या तुरास अल-अरबी, 1420 हिजरी।
- फ़ाज़िल मिक़दाद, मिक़दाद इब्न अब्दुल्लाह, अल-लवामेअ अल-इलाहिया फ़ी अल-मबाहिस अल-कलामिया, क़ुम, इस्लामी प्रचार कार्यालय, 1380 शम्सी।
- मकारिम शिराज़ी, नासिर, तफ़सीर-नमूना, तेहरान, दार अल-कुतुब अल-इस्लामिया, 1353 शम्सी।
- राज़ी, फ़ख़्र अल-दीन, तफ़सीर अल-कबीर (मफ़ातीहुल ग़ैब), अज्ञात प्रकाशन, अप्रकाशित तारीख़, अज्ञात स्थान।
- रावंदी, कुतुब अल-दीन, क़सस अल-अंबिया, मशहद, आस्तान कुद्स रज़वी, 1368 शम्सी।
- शेख़ तूसी, मुहम्मद इब्न हसन, अल-तिबयान फ़ी तफ़सीर अल-कुरआन, बेरूत, दार इह्या अल-तुरास अल-अरबी, अप्रकाशित तारीख़।
- शेख़ सदूक़, मुहम्मद इब्न अली, उयून अख़बार अल-रिज़ा, बेरूत, अल-आलमी प्रकाशन संस्थान, 1404 हिजरी।