सामरी का बछड़ा
- यह लेख सामरी के बछड़े के बारे में है। बनी इस्राईल द्वारा ईश्वर के आदेश से ज़िब्ह किए गए बछड़े के बारे में जानकारी के लिए बनी इस्राईल की गाय प्रविष्टि देखें।
| चमत्कार और पूर्व-संकेत | |||||||||||||||||||||||||||||||||||
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सामरी का बछड़ा, या स्वर्णिम बछड़ा, सोने की बनी एक मूर्ति थी, जिसे सामरी ने मूसा की मीक़ात में अनुपस्थिति के दौरान बनाया और बनी इस्राईल को उसकी पूजा करने के लिए बुलाया। मूसा के उत्तराधिकारी हारून ने लोगों को इस कार्य से रोका और इसे ईश्वरीय परीक्षा बताया, लेकिन बनी इस्राईल के अधिकांश लोग उसकी पूजा करने लगे।
मूसा के मीक़ात से लौटने और इस घटना को देखने के बाद उन्होंने तख़्तियों को ज़मीन पर डाल दिया और अपनी क़ौम को फटकार लगाई। उन्होंने अपनी क़ौम को गुमराही से रोकने में असफल रहने के कारण हारून से पूछताछ की और सामरी से भी जवाब-तलब किया। क़ुरआन के अनुसार, मूसा ने उस बछड़े को जला दिया और उसकी राख को पानी में बहा दिया।
क़ुरआन बनी इस्राईल द्वारा बछड़े की पूजा को एक ईश्वरीय परीक्षा बताता है। संबंधित आयतों में इस घटना के बाद “तौबा करो और एक-दूसरे को क़त्ल करो” का आदेश आया है। अधिकांश टीकाकारों ने इस वाक्य का अर्थ यह लिया है कि कुछ गुनाहगारों को दूसरे लोगों द्वारा क़त्ल किया जाए, जबकि कुछ ने इसे कठिन तौबा और नफ़्स की रियाज़त के रूपक के रूप में व्याख्यायित किया है। आगे की आयतों में उनकी तौबा की स्वीकृति का उल्लेख मिलता है। यह घटना कुछ भिन्नताओं के साथ तौरात में भी वर्णित हुई है।
इस्लामी स्रोतों में आया है कि इस बछड़े से गाय जैसी आवाज़ निकलती थी। उसकी आवाज़ के स्रोत के बारे में विभिन्न मत प्रस्तुत किए गए हैं; इनमें मूर्ति के भीतर हवा के चलने से आवाज़ पैदा होना या जिब्राईल की सवारी के पैरों के निशान से ली गई मिट्टी का प्रभाव शामिल है। अधिकांश टीकाकारों का मानना है कि सामरी ने बनी इस्राईल के नदी पार करते समय जिब्राईल की सवारी के पैरों के निशान से कुछ मिट्टी ली और उसे बछड़े के भीतर डाल दिया।
बछड़े की विशेषताएँ
«وَإِذْ وَاعَدْنَا مُوسَیٰ أَرْبَعِینَ لَیلَةً ثُمَّ اتَّخَذْتُمُ الْعِجْلَ مِن بَعْدِهِ وَأَنتُمْ ظَالِمُونَ... وَإِذْ قَالَ مُوسَیٰ لِقَوْمِهِ یا قَوْمِ إِنَّکمْ ظَلَمْتُمْ أَنفُسَکم بِاتِّخَاذِکمُ الْعِجْلَ فَتُوبُوا إِلَیٰ بَارِئِکمْ فَاقْتُلُوا أَنفُسَکمْ ذَٰلِکمْ خَیرٌ لَّکمْ عِندَ بَارِئِکمْ فَتَابَ عَلَیکمْ إِنَّهُ هُوَ التَّوَّابُ الرَّحِیمُ»
(व इज़ वाअद्ना मूसा अरबईना लैलतन सुम्मत्तख़ज़्तुमुल-इज्ला मिम् बअ्देही व अन्तुम ज़ालिमून... व इज़ क़ाला मूसा लेक़ौमेही या क़ौमे इन्नकुम ज़लम्तुम अन्फ़ोसकुम बित्तिख़ाज़िकुमुल-इज्ला फ़तूबू इला बारेएकुम फ़क़्तुलू अन्फ़ोसकुम, ज़ालेकुम ख़ैरुल्लकुम इन्दा बारेएकुम फ़ताबा अलैकुम, इन्नहू हुवत-तव्वाबुर-रहीम।)
और जब हमने मूसा के लिए चालीस रातों का वचन निर्धारित किया, तो उनके बाद तुमने बछड़े को पूज्य बना लिया, जबकि तुम अत्याचारी थे... और जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा: “ऐ मेरी क़ौम! तुमने बछड़े की पूजा करके स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया है। अतः अपने पैदा करने वाले के समक्ष तौबा करो और अपने आपको क़त्ल करो। यही तुम्हारे पैदा करने वाले के निकट तुम्हारे लिए बेहतर है।” फिर उसने तुम्हारी तौबा स्वीकार कर ली। निश्चय ही वही बहुत तौबा स्वीकार करने वाला, अत्यन्त दयावान है।[१]
मूसा के चालीस दिनों तक मीक़ात में रहने के दौरान बनी इस्राईल ने सोने का एक बछड़ा बनाया और उसकी पूजा की।[२] प्राचीन मिस्र की संस्कृति में गाय की पवित्रता, जिसे कृषि-जीवन का प्रतीक माना जाता था, इस प्रवृत्ति के प्रभावकारी कारणों में से एक मानी गई है।[३] क़ुरआन इस कार्य के निर्माता[४] और इसके प्रचारक के रूप में सामरी का परिचय कराता है।[५] लेकिन तौरात बछड़े के निर्माण का श्रेय हारून को देती है।[६] इस मूर्ति को स्वर्णिम बछड़े के नाम से भी जाना जाता है।[७]
क़ुरआन बछड़े का वर्णन “जसदन लहू ख़ुवार” (गाय जैसी आवाज़ वाला एक शरीर)[८] के शब्दों में करता है।[९] आवाज़ के स्रोत के बारे में विभिन्न मत प्रस्तुत किए गए हैं: कुछ टीकाकारों ने कहा है कि मूर्ति को हवा के रास्ते में रखा गया था और हवा के चलने से आवाज़ पैदा होती थी;[१०] कुछ ने इसे जिब्राईल के पैरों के निशान की मिट्टी का परिणाम माना है, जिसे मूर्ति के भीतर रखा गया था;[११] और कुछ रिवायतों में इस आवाज़ को ईश्वरीय परीक्षा के रूप में प्रस्तुत किया गया है।[१२]
कुछ रिवायतों में इस बछड़े के लिए मांस और चमड़ी जैसी विशेषताएँ भी वर्णित हुई हैं, लेकिन इन रिवायतों की प्रामाणिकता पर संदेह किया गया है।[१३]
बछड़े की पूजा
ईश्वर के वादे के अनुसार, मूसा (अ.) तीस दिनों के लिए नियत स्थान पर गए और इस अवधि में दस दिन और बढ़ा दिए गए।[१४] उनकी अनुपस्थिति लंबी होने पर बनी इस्राईल के बीच यह अफ़वाह फैल गई कि मूसा (अ.) का निधन हो गया है।[१५] सामरी ने इस अवसर का लाभ उठाकर लोगों के सोने से एक बछड़ा बनाया[१६] और अपने अनुयायियों के साथ[१७] उन्हें उसकी पूजा करने के लिए बुलाया।[१८] हारून (अ.), जो मूसा के उत्तराधिकारी थे, ने लोगों को इस कार्य से रोका और इसे ईश्वरीय परीक्षा बताया;[१९] लेकिन बनी इस्राईल के अधिकांश लोगों ने सामरी का निमंत्रण स्वीकार कर लिया और बछड़े की पूजा करने लगे।[२०]
मूसा (अ.) को मीक़ात में ही अपनी क़ौम द्वारा बछड़े की पूजा किए जाने की जानकारी हो गई।[२१] लौटने के बाद, अत्यधिक क्रोध में उन्होंने तख़्तियाँ फेंक दीं और उन्हें तोड़ दिया[२२] तथा अपनी क़ौम को फटकार लगाई।[२३] उन्होंने हारून के साथ भी सख़्ती से व्यवहार किया कि उन्होंने क़ौम को गुमराही से क्यों नहीं रोका।[२४] इसके बाद उन्होंने सामरी से पूछताछ की और उसे दंडित किया।[२५] सामरी ने मूसा (अ.) के यह पूछने पर कि तुमने ऐसा क्यों किया? उत्तर दिया: “मैंने वह चीज़ देखी जो उन्होंने नहीं देखी। मैंने रसूल के पदचिह्नों में से कुछ लिया, फिर उसे फेंक दिया।”[२६] अधिकांश टीकाकारों का मानना है कि यहाँ रसूल से तात्पर्य जिब्राईल से है। सामरी ने बनी इस्राईल के नदी पार करते समय उनके सवारी के पैरों के नीचे की मिट्टी उठाई[२७] और उसे बछड़े के भीतर डाल दिया।[२८] कुछ अन्य लोगों का मानना है कि सामरी का आशय मूसा (अ.) पर अपने पूर्व विश्वास से था, जिसके बारे में बाद में उसे संदेह हो गया।[२९]
बछड़े को जलाना
क़ुरआन के अनुसार, बछड़े को मूसा और उनके अनुयायियों ने जलाया और उसकी राख को समुद्र में बहा दिया।[३०] तौरात में भी उल्लेख है कि बछड़े को आग में जलाकर पीसा गया, ताकि वह चूर्ण बन जाए, फिर उसे पानी पर छिड़का गया और बनी इस्राईल को पिलाया गया।[३१]
बछड़े की पूजा करने वालों की सज़ा

कई चमत्कारों को देखने के बाद बनी इस्राईल द्वारा बछड़े की पूजा को एक महत्वपूर्ण घटना माना गया है।[३२] क़ुरआन के अनुसार, जिन लोगों ने बछड़े की पूजा की, उन्हें ईश्वरीय क्रोध और सांसारिक जीवन में अपमान का सामना करना पड़ा।[३३] सूरह बक़रा की आयत 54 में उनके दंड की ओर भी संकेत किया गया है, जिसमें एक-दूसरे को क़त्ल करना शामिल था[३४] और इसमें करीबी रिश्तेदार तथा परिवार के लोग भी शामिल थे।[३५] कुछ स्रोतों के अनुसार, जिन लोगों ने बछड़े की पूजा नहीं की थी, उन्होंने बछड़े की पूजा करने वालों को क़त्ल किया।[३६]
कई हज़ार लोगों[३७] या सभी गुनाहगारों के मारे जाने के बाद,[३८] उनकी तौबा स्वीकार कर ली गई और क़ातिल तथा मक़तूल दोनों को क्षमा कर दिया गया।[३९] यह दंड तौरात में भी वर्णित है, जिसके अनुसार लगभग तीन हज़ार लोग मारे गए।[४०]
कुछ टीकाकारों, जिनमें नासिर मकारिम शीराज़ी भी शामिल हैं, का मानना है कि पैग़म्बरों के इतिहास में इस दंड का कोई समान उदाहरण नहीं मिलता और इसका उद्देश्य बनी इस्राईल को दोबारा मूर्तिपूजा की ओर लौटने से रोकना था।[४१] सय्यद मुर्तज़ा और इब्ने अरबी ने इस आदेश को वास्तविक रूप से क़त्ल करने के अर्थ में नहीं लिया, बल्कि इसे नफ़्स की रियाज़त और कठिन तौबा के रूपक के रूप में व्याख्यायित किया है।[४२]
बछड़े की पूजा का कारण
मिस्र में और बनी इस्राईल के उस भूमि से निकलने के बाद हज़रत मूसा (अ.) के अनेक चमत्कारों के बावजूद,[४३] जब उन्होंने मूर्तिपूजक क़ौमों को देखा तो मूसा (अ.) से अपने लिए एक ईश्वर निर्धारित करने का अनुरोध किया।[४४] इसी कारण क़ुरआन ने उन्हें अज्ञानी और नासमझ बताया है।[४५] मूसा (अ.) की अनुपस्थिति के बाद भी बनी इस्राईल के अधिकांश लोग बछड़े की पूजा करने लगे।[४६] क़ुरआन ने इस घटना को उनके लिए एक परीक्षा बताया है[४७] और ईश्वरीय चमत्कारों को देखने के बावजूद बछड़े की पूजा करने के कारण उन्हें अत्याचारी बताया है।[४८]
सय्यद मुहम्मद तकी मुदर्रेसी ने मिन हुदल-क़ुरआन की तफ़्सीर में इस प्रवृत्ति का कारण बनी इस्राईल की संस्कृति में मूर्तिपूजा की प्रवृत्तियों की निरंतरता को बताया है। उनके विचार में, यद्यपि उन्होंने फ़िरऔन के विरुद्ध संघर्ष में मूसा (अ.) का अनुसरण किया था, फिर भी मूर्तिपूजक संस्कृति के प्रभाव उनके बीच अब भी मौजूद थे।[४९] कुछ शोधकर्ताओं का भी मानना है कि हज़रत मूसा (अ.) के चमत्कारों से बनी इस्राईल के बीच केवल बाहरी रूप से तौहीद की स्वीकृति हुई थी और उनके विश्वासों में गहरा परिवर्तन लाने के लिए वे पर्याप्त प्रभावी नहीं रहे।[५०]
फ़ुटनोट
- ↑ सूर ए बक़रा, आयतें 51–54।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर नमूना, खंड 6, पृष्ठ 371।
- ↑ मुदर्रेसी, मिन हुदल-क़ुरआन, खंड 3, पृष्ठ 450।
- ↑ क़ुरशी, क़ामूस क़ुरआन, खंड 6, पृष्ठ 315।
- ↑ मुग़्निया, अत-तफ़्सीर अल-मुबीन, खंड 16, पृष्ठ 260।
- ↑ बाइबिल, किताब-ए-ख़ुरूज, अध्याय 32, आयतें 1–6।
- ↑ तय्यब, अत्यबुल बयान, खंड 9, पृष्ठ 82।
- ↑ शेख़ त़ूसी, अत-तिबयान, खंड 4, पृष्ठ 544।
- ↑ सूर ए ताहा, आयत 88।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर नमूना, खंड 6, पृष्ठ 372।
- ↑ ज़मख़्शरी, अल-कश्शाफ़, खंड 2, पृष्ठ 160।
- ↑ क़ुम्मी, अली बिन इब्राहीम, तफ़्सीर क़ुम्मी, खंड 2, पृष्ठ 62।
- ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 14, पृष्ठ 201–203।
- ↑ सूर ए आराफ़, आयत 142।
- ↑ मुदर्रेसी, मिन हुदल-क़ुरआन, खंड 3, पृष्ठ 450।
- ↑ क़ुरशी, क़ामूस क़ुरआन, खंड 6, पृष्ठ 315।
- ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 14, पृष्ठ 192।
- ↑ मुग़्निया, अत-तफ़्सीर अल-मुबीन, खंड 16, पृष्ठ 260।
- ↑ सूर ए ताहा, आयत 90।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर नमूना, खंड 6, पृष्ठ 371।
- ↑ सूर ए ताहा, आयत 85।
- ↑ सूर ए आराफ़, आयत 150।
- ↑ सूर ए ताहा, आयत 86।
- ↑ सूर ए ताहा, आयतें 92–94।
- ↑ सूर ए ताहा, आयत 97।
- ↑ सूर ए ताहा, आयत 96।
- ↑ फ़ख़्रे राज़ी, मफ़ातीहुल-ग़ैब, खंड 22, पृष्ठ 95।
- ↑ ज़मख़्शरी, अल-कश्शाफ़, खंड 2, पृष्ठ 160।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर नमूना, खंड 13, पृष्ठ 285–286।
- ↑ सूर ए ताहा, आयत 97।
- ↑ तौरात, ख़ुरूज, अध्याय 32, आयत 20।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर नमूना, खंड 1, पृष्ठ 255।
- ↑ सूर ए आराफ़, आयत 152।
- ↑ हुसैनी शीराज़ी, तबयीनुल-क़ुरआन, पृष्ठ 18।
- ↑ जवादी आमोली, तस्नीम, खंड 4, पृष्ठ 455।
- ↑ फ़ैज़ काशानी, तफ़्सीर अस-साफ़ी, खंड 1, पृष्ठ 132।
- ↑ क़ुम्मी, तफ़्सीर अल-क़ुम्मी, खंड 1, पृष्ठ 47।
- ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 1, पृष्ठ 189।
- ↑ हुसैनी शीराज़ी, तबयीनुल-क़ुरआन, पृष्ठ 18।
- ↑ तौरात, ख़ुरूज, अध्याय 32, आयतें 27–28।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर नमूना, खंड 1, पृष्ठ 255–256।
- ↑ सय्यद मुर्तज़ा, अमाली, खंड 2, पृष्ठ 372; इब्ने अरबी, तफ़्सीर इब्ने अरबी, खंड 1, पृष्ठ 54।
- ↑ शेख़ त़ूसी, अत-तिब्यान, खंड 1, पृष्ठ 352।
- ↑ सूर ए आराफ़, आयत 138।
- ↑ सूर ए आराफ़, आयत 138।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर नमूना, खंड 6, पृष्ठ 371।
- ↑ सूर ए ताहा, आयत 85।
- ↑ सूर ए बक़रा, आयत 92।
- ↑ मुदर्रेसी, मिन हुदल-क़ुरआन, खंड 3, पृष्ठ 450।
- ↑ इब्राहीमी, «گوساله سامری», पृष्ठ 1043।
स्रोत
- पवित्र बाइबिल, नया हज़ारा अनुवाद, लंदन, ईलाम प्रकाशन, 2014 ईस्वी।
- इब्ने अरबी, मोह्युद्दीन, तफ़्सीर इब्ने अरबी, संशोधन: शेख़ अब्दुल वारिस मुहम्मद अली, बेरूत, दारुल-कुतुब अल-इल्मिय्या प्रकाशन, 1422 हिजरी, 2001 ईस्वी।
- इब्राहीमी, मोहसिन, «گوساله سامری» (सामरी का बछड़ा), मआसिरे क़ुरआन करीम विश्वकोश, क़ुम, सलमान आज़ादेह, 1397 शम्सी।
- क़ुम्मी, अली बिन इब्राहीम, तफ़्सीर अल-क़ुम्मी, शोध एवं संशोधन: मूसवी जज़ाएरी, सय्यद तय्यब, क़ुम, दारुल-किताब प्रकाशन, तीसरा संस्करण, 1404 हिजरी।
- क़ुरशी, सय्यद अली अकबर, क़ामूस क़ुरआन, तेहरान, दारुल-कुतुब अल-इस्लामिय्या प्रकाशन, छठा संस्करण, 1371 शम्सी।
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- शेख़ त़ूसी, मुहम्मद बिन हसन, अत-तिबयान फ़ी तफ़्सीरिल-क़ुरआन, शोध: अहमद क़सीर आमिली, बेरूत, दारु इह्याइत-तुरास अल-अरबी प्रकाशन, प्रकाशन वर्ष उपलब्ध नहीं।
- सय्यद मुर्तज़ा, अली बिन हुसैन, अमाली, शोध एवं संशोधन: इब्राहीम, मुहम्मद अबुल फ़ज़्ल इब्राहीम, क़ाहिरा, दारुल-फ़िक्र अल-अरबी प्रकाशन, पहला संस्करण, 1998 ईस्वी।
- हुसैनी शीराज़ी, सय्यद मुहम्मद, तबयीनुल-क़ुरआन, बेरूत, दारुल-उलूम प्रकाशन, दूसरा संस्करण, 1423 हिजरी।