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सालेह की ऊँटनी

wikishia से
चमत्कार और पूर्व-संकेत
चमत्कार/पूर्व-संकेत सम्बंधित व्यक्तित्व
चन्द्रमा का दो टुकड़ों में विभाजित होना हज़रत मुहम्मद (स)
क़ुरआन हज़रत मुहम्मद (स)
सूर्य का वापस लौटना हज़रत मुहम्मद (स)
पालने में ईसा (अ) का बात करना ईसा (अ)
मसीह की साँस ईसा (अ)
मूसा की लाठी मूसा (अ)
चमकता हुआ हाथ मूसा (अ)
मूसा से अल्लाह की बातचीत मूसा (अ)
सालेह की ऊँटनी सालेह (अ)
उड़ने वाली कालीन सुलैमान (अ)
जानवरों से बातचीत करना सुलैमान (अ)
चार पक्षियों को जीवित करना इब्राहीम (अ)
आग का ठंडी हो जाना इब्राहीम (अ)
मरियम का गर्भवती होना हज़रत मरियम
उज़ैर का जीवित किया जाना उज़ैर (अ)
नूह की दीर्घायु नूह (अ)

सालेह की ऊँटनी, (सालेह का ऊँट), हज़रत सालेह (अ) की एक मादा ऊँटनी और चमत्कार थी, जिसे क़ुरआन में “नाक़तुल्लाह” (अल्लाह की ऊँटनी) के नाम से याद किया गया है। रिवायतों के अनुसार, समूद जनजाति के अनुरोध के बाद और सालेह (अ) की पैग़म्बरी को सिद्ध करने के लिए एक निशानी के रूप में यह ऊँटनी पहाड़ से प्रकट हुई। क़ुरआन ने ऊँटनी को समूद जनजाति के लिए अल्लाह की निशानी और उन्हें आज़माने का साधन बताया है। समूद जनजाति को आदेश दिया गया था कि वे उसे कोई नुक़सान न पहुँचाएँ और पानी के इस्तेमाल में उसकी बारी का ध्यान रखें; लेकिन उन्होंने उसकी कूचें काट दीं, जिसके बाद उन पर अल्लाह का अज़ाब नाज़िल हुआ।

अल्लाह का चमत्कार

सालेह की ऊँटनी एक मादा ऊँट थी, जो असाधारण रूप से और हज़रत सालेह (अ) की पैग़म्बरी की पुष्टि के लिए प्रकट हुई थी। क़ुरआन की कई आयतों में इसका उल्लेख हुआ है और इसे “नाक़तुल्लाह” (अल्लाह की ऊँटनी) कहा गया है।[१] टीकाकारों ने ऊँटनी को “अल्लाह” की ओर जोड़ने को इज़ाफ़त-ए-तशरीफ़ी (सम्मानसूचक संबोधन) माना है, जो उसके महत्व और विशेष स्थान को दर्शाता है।[२] तफ़्सीरी और रिवायती विवरणों के अनुसार, समूद जनजाति के अनुरोध के उत्तर में ऊँटनी का प्रकट होना सालेह (अ) के चमत्कारों में से था और उनकी पैग़म्बरी को सिद्ध करने वाली एक निशानी थी।[३] तफ़्सीर मजमा-उल-बयान में हसन बसरी से उद्धृत किया गया है कि ऊँटनी की अद्भुत विशेषता यह थी कि जिस दिन उसकी बारी होती थी, वह समूद जनजाति की घाटी में मौजूद पूरा पानी पी जाती थी।[४] क़ुरआन ने भी सूर ए आराफ़ की आयत 73 में ऊँटनी को अल्लाह की निशानी बताया है।[५]

ऊँटनी की उत्पत्ति

कुछ इस्लामी रिवायतों में सालेह की ऊँटनी के प्रकट होने के तरीक़े का विवरण मिलता है। इन रिवायतों के अनुसार, सालेह (अ) द्वारा अपनी क़ौम को कई वर्षों तक एकेश्वरवाद की ओर बुलाने और उनमें से अधिकांश लोगों के ईमान न लाने के बाद, उन्होंने समूद जनजाति से कहा: «यदि तुम चाहो तो मुझसे कोई अनुरोध करो, ताकि मैं अपने अल्लाह से उसका अनुरोध करूँ और वह उसे स्वीकार कर ले; या यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हारे माबूदों (ख़ुदाओं) से कुछ माँगूँ। यदि तुम्हारे माबूद मेरी माँग का जवाब दे दें, तो मैं तुम्हारे बीच से चला जाऊँगा। क्योंकि मैंने भी तुम्हें थका दिया है और तुमने भी मुझे थका दिया है।»[६]

इन रिवायतों के अनुसार, समूद जनजाति ने सालेह (अ) के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। आवश्यक तैयारियाँ करने के बाद, सालेह (अ) ने एक-एक करके सभी बुतों से उत्तर माँगा, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद सालेह (अ) के अल्लाह से अनुरोध करने की बारी आई। जनजाति के 70 सरदार सालेह (अ) के साथ एक पहाड़ के पास गए और उनसे अनुरोध किया कि वे एक विशेष विशेषताओं वाली मादा ऊँटनी को पहाड़ के भीतर से बाहर निकालें। सालेह (अ) ने अल्लाह से उनका अनुरोध पूरा करने की प्रार्थना की। इसके बाद पहाड़ फट गया और उन लोगों द्वारा माँगी गई विशेषताओं वाली एक ऊँटनी प्रकट हो गई। फिर जनजाति ने सालेह (अ) से अनुरोध किया कि ऊँटनी एक बच्चा पैदा करे, और यह अनुरोध भी पूरा हुआ। इन रिवायतों के अनुसार, उन 70 लोगों में से केवल कुछ ही लोग ईमान लाए और उन्होंने इस घटना को दूसरों को बताया।[७]

समूद जनजाति की परीक्षा

सालेह (अ) की ऊँटनी अल्लाह के चमत्कार से प्रकट हुई थी और सालेह (अ) तथा ईमान लाने वाले लोग उसका दूध पीते थे।[८] अल्लाह ने इस ऊँटनी की देखभाल और सुरक्षा पर ज़ोर दिया और उसे समूद जनजाति की परीक्षा का साधन बताया।[९] क़ुरआन की आयतों के अनुसार, समूद जनजाति की ऊँटनी के संबंध में दो ज़िम्मेदारियाँ थीं: पहली, पानी के इस्तेमाल में बारी का ध्यान रखना; अर्थात एक दिन पानी ऊँटनी के लिए और दूसरे दिन लोगों के लिए हो।[१०] दूसरी, ऊँटनी को किसी प्रकार की क्षति पहुँचाने से बचना।[११] क़ुरआन उनसे यह भी कहता है कि ऊँटनी को अल्लाह की धरती पर स्वतंत्र छोड़ दें, ताकि वह वहाँ के चरागाहों का उपयोग कर सके।[१२]

ऊँटनी को क़त्ल करना और अल्लाह का अज़ाब

समूद जनजाति ने सालेह (अ) के आदेश की अवज्ञा करने के बाद ऊँटनी की कूचें काट दीं और उनसे कहा कि जिस अज़ाब का उनसे वादा किया गया है, उसे उन पर नाज़िल करें।[१३] इस अवज्ञा के परिणामस्वरूप समूद जनजाति पर अल्लाह का अज़ाब नाज़िल हुआ[१४] और ईमान वालों के अलावा सभी लोग हलाक हो गए।[१५]

क़ुरआन में एक आयत में ऊँटनी को क़त्ल करने की घटना को एक व्यक्ति[१६] और दूसरी आयतों में समूद जनजाति की ओर मंसूब किया गया है।[१७] कुछ टीकाकारों ने ऊँटनी को क़त्ल करने की बात पूरी जनजाति की ओर मंसूब किए जाने का कारण उनके द्वारा इस कार्य में सहभागिता या उसकी सहमति को बताया है।[१८] इमाम अली (अ) ने भी इस घटना के आधार पर कहा है कि किसी कार्य पर सहमति उस कार्य के परिणाम और उसके दंड में सहभागिता का कारण बनती है।[१९]

इमाम सादिक़ (अ) से अल-काफ़ी में वर्णित एक रिवायत में क़ुदार नामक व्यक्ति को ऊँटनी का क़ातिल बताया गया है। इस रिवायत के अनुसार, ऊँटनी के क़त्ल किए जाने के बाद समूद जनजाति एकत्र हुई और उसका मांस खाया। इस घटना के बाद सालेह (अ) ने उन्हें तीन दिन की मोहलत दी और मोहलत समाप्त होने के बाद अल्लाह का अज़ाब नाज़िल हुआ।[२०] कुछ रिवायती विवरणों में आया है कि ऊँटनी का बच्चा अपनी माँ के क़त्ल किए जाने के बाद पहाड़ की ओर भाग गया और उसकी दर्दनाक चीख़ ने लोगों को प्रभावित किया। उनमें से एक समूह सालेह (अ) के पास गया और ऊँटनी को क़त्ल करने का आरोप दूसरे लोगों पर लगाते हुए स्वयं को निर्दोष बताया। सालेह (अ) ने उनसे कहा कि यदि वे ऊँटनी के बच्चे को जीवित खोजकर उनके पास वापस ले आएँ, तो उम्मीद है कि उनसे अज़ाब टल जाए। उन्होंने ऊँटनी के बच्चे की तलाश की, लेकिन उसे खोजने में सफल नहीं हुए।[२१]

फ़ुटनोट

  1. ↑ सूर ए आराफ़, आयत 73; सूर ए हूद, आयत 64।
  2. ↑ हुसैनी शीराज़ी, तक़रीब अल-क़ुरआन, खंड 2, पृष्ठ 200।
  3. ↑ तबरसी, तफ़्सीर मजमा-उल-बयान, खंड 5, पृष्ठ 298।
  4. ↑ तबरसी, तफ़्सीर मजमा-उल-बयान, खंड 4, पृष्ठ 291।
  5. ↑ सूर ए आराफ़, आयत 73।
  6. ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 8, पृष्ठ 185।
  7. ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 8, पृष्ठ 185।
  8. ↑ इब्ने असाकिर, तारीख़ मदीना दमिश्क़, खंड 10, पृष्ठ 458।
  9. ↑ सूर ए क़मर, आयत 27।
  10. ↑ सूर ए शोअरा, आयत 155।
  11. ↑ सूर ए आराफ़, आयत 73।
  12. ↑ सूर ए आराफ़, आयत 73।
  13. ↑ सूर ए आराफ़, आयत 77।
  14. ↑ सूर ए शोअरा, आयत 157।
  15. ↑ सूर ए आराफ़, आयत 78।
  16. ↑ सूर ए क़मर, आयत 29।
  17. ↑ सूर ए आराफ़, आयत 77।
  18. ↑ फ़ज़्लुल्लाह, तफ़्सीर मिन वही अल-क़ुरआन, खंड 24, पृष्ठ 287।
  19. ↑ सय्यद रज़ी, नहजुल-बलाग़ा, ख़ुत्बा 201, पृष्ठ 319।
  20. ↑ अल-कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 8, पृष्ठ 187।
  21. ↑ मजलिसी, बिहार अल-अनवार, खंड 11, पृष्ठ 392।

स्रोत

  • क़ुरआन करीम।
  • इब्ने असाकिर, अबुल क़ासिम अली बिन हसन, तारीख़ मदीना दमिश्क़, बेरूत, अल-फ़िक्र प्रकाशन संस्थान, 1415 हिजरी।
  • कुलैनी, मुहम्मद बिन याक़ूब, अल-काफ़ी, शोध एवं संपादन: अली अकबर ग़फ़्फ़ारी, मुहम्मद आख़ूंदी, तेहरान, इस्लामी पुस्तकों का प्रकाशन संस्थान, चतुर्थ संस्करण, 1407 हिजरी।
  • तबरसी, फ़ज़्ल बिन हसन, तफ़्सीर मजमा-उल-बयान, बेरूत, अल-आलमी प्रकाशन संस्थान, 1415 हिजरी।
  • फ़ज़्लुल्लाह, सय्यद मुहम्मद हुसैन, तफ़्सीर मिन वही अल-क़ुरआन, बेरूत, दारुल-मलाक़ मुद्रण एवं प्रकाशन संस्थान, द्वितीय संस्करण, 1419 हिजरी।
  • मजलिसी, मुहम्मद बाक़िर, बिहार अल-अनवार अल-जामेअ ले दुरर अख़्बार अल-आइम्मा अल-अतहार, बेरूत, दार एहिया अल तोरास अल अरबी प्रकाशन, दूसरा संस्करण, 1403 हिजरी।
  • सय्यद रज़ी, मुहम्मद बिन हुसैन, नहजुल-बलाग़ा, शोध: सुब्ही सालेह, क़ुम, हिजरत प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1414 हिजरी।
  • हुसैनी शीराज़ी, सय्यद मुहम्मद, तक़रीब अल-क़ुरआन इला अल-अज़्हान, बेरूत, दारुल-उलूम प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1424 हिजरी।