नमाज़ का सजदा
| कुछ अमली व फ़िक़ही अहकाम |
| ● बुलूग़ ● न्यायशास्त्र ● शरई अहकाम ● तौज़ीहुल मसायल ● वाजिब ● हराम ● मुस्तहब ● मुबाह ● मकरूह ● नीयत ● क़स्दे क़ुरबत ● नए मसायल |
- यह लेख नमाज़ के सजदे के बारे में है। सजदे को एक इबादती अमल के रूप में समझने के लिए सजदा प्रविष्टि देखें।
यह लेख एक न्यायशास्त्रीय अवधारणा से संबंधित एक वर्णनात्मक लेख है और धार्मिक आमाल के लिए मानदंड नहीं हो सकता। धार्मिक आमाल के लिए अन्य स्रोतों को देखें। |
नमाज़ का सजदा, नमाज़ के अरकान में से है और मुसलमानों को नमाज़ की हर रकअत में दो बार सजदा करना चाहिए। सजदे में शरीर के सात अंग, जिनमें माथा, दोनों हाथों की हथेलियाँ, घुटने और पैरों की उँगलियाँ शामिल हैं, ज़मीन पर रखे होने चाहिए और ज़िक्र (पाठ) शांत अवस्था में किया जाना चाहिए। जो व्यक्ति असमर्थ हो, उसे अपनी क्षमता के अनुसार झुकना चाहिए और यदि झुकने में भी असमर्थ हो, तो सिर, आँख या दिल की नीयत से इशारा करे।
सजदे की जगह पाक (पवित्र) और ज़मीन या ऐसी वनस्पतियों से बनी होनी चाहिए जो खाने योग्य न हों। इमाम हुसैन (अ) की तुरबत पर सजदा करना श्रेष्ठ माना गया है। सोने, चाँदी या खनिज पत्थरों पर सजदा सही नहीं है और मजबूरी की स्थिति में सूती या लिनन के कपड़े पर सजदा करना जायज़ है। सजदे के मुस्तहब कार्यों में उसे लंबा करना, दोनों सजदों के बीच इस्तिग़फ़ार करना और बैठने तथा उठने के शिष्टाचार (आदाब) का पालन करना शामिल है।
नमाज़ में सज्दे का रुक्न होना
सजदा नमाज़ के वाजिबात में से है और सभी नमाज़ों में हर रकअत में रुकूअ के बाद दो सजदे किए जाते हैं।[१] ये दोनों सजदे मिलकर नमाज़ के अरकान में शामिल हैं।[२] न्यायविदों के फ़तवों,[३] कुछ हदीसों[४] और क़ायदा-ए-ला तुआद[५] के आधार पर, यदि सजदे को जानबूझकर या भूल से छोड़ दिया जाए, तो नमाज़ बातिल हो जाती है।[६] सजदे से संबंधित अहकाम न्यायशास्त्रीय स्रोतों में नमाज़ से संबंधित मसलों के अंतर्गत वर्णित किए गए हैं।[७]
सजदा करने का तरीक़ा
नमाज़ी रुकूअ के बाद खड़ा होता है, फिर सजदे में जाता है और उसे शरीर के सात अंगों, अर्थात् माथा, दोनों हाथों की हथेलियाँ, घुटनों के अगले हिस्से और दोनों पैरों के बड़े अँगूठों के अगले हिस्से को ज़मीन पर रखना चाहिए और सजदे का ज़िक्र (पाठ) पढ़ना चाहिए।[८] ज़िक्र पूरा करने के बाद सजदे से सिर उठाया जाता है और नमाज़ी बैठ जाता है। शरीर के शांत हो जाने के बाद दूसरा सजदा किया जाता है। दूसरे सजदे के बाद नमाज़ी फिर बैठता है और थोड़ी देर ठहरने (जलसा-ए-इस्तिराहत) के बाद नमाज़ को जारी रखता है।[९]
असमर्थ व्यक्ति के सजदा करने का तरीक़ा
जो व्यक्ति अपना माथा ज़मीन पर नहीं रख सकता, उसे नमाज़ की सजदागाह या ऐसी किसी अन्य वस्तु, जिस पर सजदा करना सही हो, को किसी ऊँची जगह पर रखना चाहिए, अपनी क्षमता के अनुसार झुकना चाहिए और इस तरह माथा उस पर रखना चाहिए कि उसे सजदा करना कहा जा सके। साथ ही, दोनों हाथों की हथेलियाँ, घुटनों और पैरों की उँगलियों को सामान्य रूप से ज़मीन पर रखना चाहिए।[१०]
जो व्यक्ति किसी भी तरह झुक नहीं सकता, उसे सज्दे के लिए बैठकर सिर से इशारा करना चाहिए और यदि यह भी संभव न हो, तो आँखों से इशारा करना चाहिए। ऐसा व्यक्ति यदि सक्षम हो तो सजदागाह को इतना ऊँचा करे कि माथा उस पर रख सके और यदि वह ऐसा नहीं कर सकता, तो कोई दूसरा व्यक्ति सजदागाह को उठाए ताकि वह अपना माथा सजदागाह पर रख सके। इसी प्रकार, यदि नमाज़ी सिर या आँखों से इशारा करने में भी सक्षम न हो, तो उसे दिल में सजदे की नीयत करनी चाहिए और हाथ आदि के द्वारा सजदे का इशारा करना चाहिए।[११]
सज्दे के वाजिबात
न्यायशास्त्रीय किताबों के अनुसार, नमाज़ का सजदा करने के लिए कुछ बातें आवश्यक हैं:
- शरीर के सभी सात अंगों का ज़मीन पर होना।[१२]
- सजदे का ज़िक्र शांत अवस्था में, न कि हरकत की स्थिति में, पढ़ना।[१३]
- दोनों सजदों के बीच थोड़ी देर ठहरकर बैठना।[१४]
- हर रकअत में दो सजदे करना: सजदे को जानबूझकर कम या ज़्यादा करना नमाज़ को बातिल कर देता है। लेकिन यदि नमाज़ी केवल एक सजदा भूल जाए और रुकूअ से पहले उसे याद आ जाए, तो उसे बैठकर भूले हुए सजदे को अदा करना चाहिए और नमाज़ के बाद दो सजदा-ए-सहव करना चाहिए। लेकिन यदि उसे रुकूअ के दौरान या उसके बाद याद आए, तो उसे नमाज़ जारी रखनी चाहिए और नमाज़ के बाद भूले हुए सजदे की क़ज़ा के साथ दो सजदा-ए-सहव भी करने चाहिए।[१५]
सज्दे के मुस्तहब और मकरूह कार्य
न्यायशास्त्रीय किताबों में नमाज़ के सजदे के लिए कुछ मुस्तहब और मकरूह कार्य बयान किए गए हैं।
सजदे के मुस्तहब कार्य:

- पहले और दूसरे सजदे से पहले तथा दोनों सजदों के बाद तकबीर कहना;
- सजदे में जाते समय पुरुष पहले हाथ और महिलाएँ पहले घुटने ज़मीन पर रखें;
- नाक को ऐसी चीज़ पर रखना जिस पर सजदा करना सही हो;
- उँगलियों को क़िब्ला की ओर रखना और उन्हें आपस में मिला देना—अँगूठे के अलावा;
- सजदे के ज़िक्र को विषम संख्या में, जैसे तीन, पाँच या सात बार दोहराना;
- सलवात का ज़िक्र कहना और सजदे को लंबा करना;
- सजदे के बाद तवर्रुक की अवस्था में बैठना (बाएँ कूल्हे पर बैठना और दाएँ पैर की पीठ को बाएँ पैर के तलवे पर रखना);
- दोनों सजदों के बीच शरीर के शांत हो जाने के बाद इस्तिग़फ़ार करना;
- सजदे के समय महिलाओं का कोहनियों को पहलुओं से सटाकर रखना और पुरुषों का उन्हें खुला रखना;
- बैठते समय हाथों को जाँघों पर रखना;
- अगली रकअत के लिए उठते समय «بِحَولِ اللهِ وَ قُوَّتِهِ أقُومُ وَ أقْعُدُ» (बिहौलिल्लाहे व क़ुव्वतिही अक़ूमु व अक़ऊदु) या «اللهُمَّ بِحَولِكَ وَقُوَّتِكَ أقومُ وَ أقْعُدُ» (अल्लाहुम्मा बिहौलिका व क़ुव्वतिका अक़ूमु व अक़ऊदु) का ज़िक्र कहना;
- ज़मीन से उठते समय पुरुष पहले घुटनों और फिर हाथों को ज़मीन से उठाएँ और महिलाएँ इसके विपरीत करें।[१६]
सज्दे में दुआ, विशेष रूप से नमाज़ के आख़िरी सज्दे में
नमाज़ के सजदोंं में हलाल रोज़ी और दुनिया व आख़िरत की अन्य ज़रूरतों के लिए दुआ करना मुस्तहब माना गया है।[१७] यद्यपि अधिकांश मरज-ए-तक़लीद के फ़तवों में यह इस्तिहबाब सभी सजदों के लिए बयान किया गया है और आख़िरी सजदे में इसके मुस्तहब होने का अलग से उल्लेख किया गया है,[१८] कुछ मरज-ए-तक़लीद के फ़तवों में यह इस्तिहबाब केवल नमाज़ के आख़िरी सजदे के संबंध में बताया गया है[१९] और कुछ अन्य के अनुसार यह अमल नमाज़ के आख़िरी सजदे में अधिक प्रचलित है।[२०] न्यायविदों ने इमाम बाक़िर (अ.) से वर्णित एक रिवायत के आधार पर[२१] सजदे में निम्नलिखित दुआ पढ़ना मुस्तहब माना है: «يَا خَيْرَ الْمَسْئُولِينَ وَ يَا خَيْرَ الْمُعْطِينَ، اُرْزُقْنِي وَ ارْزُقْ عِيَالِي مِنْ فَضْلِكَ الْوَاسِعِ فَإِنَّكَ ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ» (या ख़ैरल मसऊलीन व या ख़ैरल मोअतीन, उर्ज़ुक़नी वर्ज़ुक़ एयाली मिन फ़ज़लेकल वासेए फ़इन्नका ज़ुल फ़ज़्लिल अज़ीम) (ऐ सबसे अच्छे माँगे जाने वाले और ऐ सबसे अच्छे प्रदान करने वाले! अपने व्यापक फ़ज़्ल से मुझे और मेरे परिवार को रोज़ी प्रदान कर, निःसंदेह तू महान फ़ज़्ल वाला है।) हालाँकि अन्य दुआएँ माँगना भी जायज़ माना गया है।[२२] आख़िरी सज्दे में पढ़ी जाने वाली दुआओं में निम्नलिखित शामिल हैं:
- «یٰا لَطیفُ اِرْحَمْ عَبْدَکَ الضَّعیف» (या लतीफ़ो इरहम अब्दकज़ ज़ईफ़) (ऐ लतीफ़! अपने कमज़ोर बंदे पर रहम फ़रमा।)
- «یٰا مَنْ لَهُ الدُّنْیٰا وَ الْاٰخِرَةُ، اِرْحَمْ مَنْ لَیْسَ لَهُ الدُّنْیٰا وَ الْاٰخِرَة» (या मन लहुद दुनिया वल आख़ेरतो, इरहम मन लैसा लहुद दुनिया वल आख़ेरते) (ऐ वह जो दुनिया और आख़िरत का मालिक है! उस व्यक्ति पर रहम फ़रमा जिसके पास न दुनिया है और न आख़िरत।)
- «رَبِّ اغْفِرْ وَ ارْحَمْ وَ تَجٰاوَزْ عَمّٰا تَعْلَمُ، اِنَّکَ اَنْتَ الْاَعَزُّ الْاَجَلُّ الْاَکْرَمُ» (रब्बिग़ फ़िर वरहम व तजावज़ अम्मा ताअलमो, इन्नका अन्तल अअज़्ज़ुल अजल्लुल अकरम) (ऐ मेरे पालनहार! मुझे बख़्श दे, मुझ पर रहम फ़रमा और जो कुछ तू मेरे बारे में जानता है, उसे माफ़ कर दे। निःसंदेह तू सबसे शक्तिशाली, सबसे महान और सबसे अधिक उदार है)।[२३]
शियों की जमाअत की नमाज़ में, ताकि मुक़्तदियों को पता चल सके कि आख़िरी सजदा आ गया है, आम तौर पर मुकब्बिर «یا وَلِیَّ العافِیة» (या वलीयल आफ़िया) या «یا لطیف» (या लतीफ़ो) जैसे अज़कार (वाक्यांश) को ऊँची आवाज़ में दोहराता है। «یا وَلِیَّ العافِیة» (या वलिय्युल-आफ़ियह) वाक्यांश «يَا وَلِيَّ الْعَافِيَةِ، أَسْأَلُكَ الْعَافِيَةَ، عَافِيَةَ الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ» दुआ से लिया गया है, जिसे नमाज़ के अंतिम सजदे में पढ़ना प्रचलित है।
…फिर उन्होंने सजदा किया और अपनी दोनों हथेलियों को, जबकि उनकी उँगलियाँ आपस में मिली हुई थीं, घुटनों के सामने और चेहरे के निकट उठाया और तीन बार कहा: «سبحان ربی الأعلی و بحمده» (सुब्हाना रब्बियल आ‘ला व बे हम्दे)। फिर उन्होंने इस प्रकार सजदा किया कि अपने शरीर के किसी अंग को दूसरे अंग पर टिकाया नहीं। सज्दे के समय उन्होंने शरीर के आठ स्थान ज़मीन पर रखे थे: दोनों हथेलियाँ, दोनों घुटने, दोनों पैरों के दोनों अंगूठे, माथा और नाक। और उन्होंने फ़रमाया: इनमें से सात अंगों का ज़मीन पर रखना वाजिब है।
सज्दे के मकरूह कार्य
- सजदे में क़ुरआन पढ़ना;[२४]
- गर्द-ओ-ग़ुबार हटाने के लिए सजदे की जगह को फूँकना;[२५]
- दोनों सजदों के बीच हाथों को ज़मीन पर ही रखे रहना और अवस्था बदले बिना दूसरे सजदे में चले जाना।[२६]
नमाज़ के सज्दे का ज़िक्र
नमाज़ के सजदे में ज़िक्र (पाठ) कहना वाजिब है। इसका मुख्य ज़िक्र «سُبْحانَ رَبِّی الاَعْلیٰ وَ بِحَمْدِهِ» (सुब्हाना रब्बिय आला व बे हम्दे) है।[२७] हालाँकि नमाज़ी इसके स्थान पर तीन बार «سُبْحانَ اللهِ» (सुब्हानल्लाह) या इसी मात्रा में कोई अन्य ज़िक्र कह सकता है।[२८] कुछ मरजा-ए-तक़लीद रुकू के ज़िक्र (سُبْحانَ رَبِّی العَظیمِ وَ بِحَمْدِهِ) (सुब्हाना रब्बियल अज़ीमे व बे हम्दे) और सज्दे के ज़िक्र (سُبْحانَ رَبِّی الاَعْلیٰ وَ بِحَمْدِهِ) (सुब्हाना रब्बियल आला व बे हम्दे) को जानबूझकर एक-दूसरे की जगह पढ़ने को जायज़ नहीं मानते हैं।[२९]
सज्दे की जगह
सजदे की जगह पाक (पवित्र) होनी चाहिए[३०] और वह ज़मीन या उससे उगने वाली चीज़ों (जैसे लकड़ी और पेड़ के पत्तों) से बनी हो, बशर्ते कि वह खाने योग्य (जैसे अंगूर के पेड़ का पत्ता) या पहनने योग्य (जैसे कपास और लिनन) न हो।[३१] इसलिए लकड़ी या वनस्पति से बने काग़ज़ या टिश्यू पेपर पर सजदा करना सही है।[३२] खनिज पदार्थों जैसे सोना, चाँदी और तारकोल पर सजदा करना सही नहीं है और अधिकांश न्यायविद खनिज पत्थरों जैसे अक़ीक़ और फ़िरोज़ा पर भी सजदा करना सही नहीं मानते हैं।[३३]
शिया रिवायतों के अनुसार, सबसे श्रेष्ठ सजदे की जगह इमाम हुसैन (अ) की तुरबत है।[३४] लेकिन कुछ सुन्नी विद्वानों ने इसे बिदअत माना है।[३५] ऐसी चीज़ उपलब्ध न होने पर जिस पर सजदा करना सही हो, या मजबूरी की स्थिति में, लिनन या कपास के कपड़े पर सजदा करना जायज़ है। यदि वह भी उपलब्ध न हो, तो किसी भी प्रकार के कपड़े पर सजदा किया जा सकता है। और यदि ये भी उपलब्ध न हों, तो हाथ की पीठ या कुछ अन्य पदार्थों पर सजदा करने के संबंध में न्यायविद के बीच मतभेद पाया जाता है।[३६]
सजदे की अवस्था में माथे के रखने की जगह नमाज़ी के पैरों की जगह के लगभग बराबर ऊँचाई पर होनी चाहिए और दोनों के बीच ऊँचाई का अंतर चार बंद उँगलियों से अधिक नहीं होना चाहिए।[३७] सजदे की जगह स्थिर होनी चाहिए और हिलनी नहीं चाहिए, ताकि माथा उस पर रखा जा सके और ठहर सके।[३८]
सम्बंधित लेख
फ़ुटनोट
- ↑ सिस्तानी, मिन्हाज अल सालेहीन, खंड 1, पृष्ठ 218।
- ↑ अल्लामा हिल्ली, मुख़्तलिफ़ अल शिया, खंड 2, पृष्ठ 139।
- ↑ अल्लामा हिल्ली, मुख़्तलिफ़ अल शिया, खंड 2, पृष्ठ 139; सिस्तानी, मिन्हाज अल सालेहीन, खंड 1, पृष्ठ 218।
- ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 3, पृष्ठ 348, हदीस 3।
- ↑ मिश्कीनी, मुस्तलहात अल-फ़िक़्ह, पृष्ठ 477-479।
- ↑ सिस्तानी, मिन्हाज अल सालेहीन, खंड 1, पृष्ठ 218।
- ↑ नजफ़ी, साहिब जवाहिर, जवाहिर अल-कलाम, खंड 10, पृष्ठ 123; बहरानी, अल-हदाइक़ अल-नाज़िरा, खंड 8, पृष्ठ 273।
- ↑ बनी-हाशमी ख़ुमैनी, तौज़ीहुल-मसाइल (मुहश्शा), खंड 1, पृष्ठ 569।
- ↑ बहरानी, अल-हदाइक़ अल-नाज़िरा, खंड 8, पृष्ठ 290; नजफ़ी, जवाहिर अल-कलाम, खंड 10, पृष्ठ 168-169।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस्क़ा (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 566-567।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस्क़ा (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 566-567।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस्क़ा (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 556।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस्क़ा (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 555।
- ↑ बहरानी, अल-हदाइक़ अल-नाज़िरा, खंड 8, पृष्ठ 290; नजफ़ी, जवाहिर अल-कलाम, खंड 10, पृष्ठ 168-169।
- ↑ इस्फ़हानी, वसीला अल-नजात, खंड 1, पृष्ठ 178।
- ↑ नजफ़ी, जवाहिर अल-कलाम, खंड 10, पृष्ठ 169-189; तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस्क़ा (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 573-575।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस्क़ा (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 574।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस्क़ा (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 574; बहजत, वसीला अल-नजात, पृष्ठ 214।
- ↑ ग़र्वी नाइनी, किताब अल-हज, पृष्ठ 232।
- ↑ मुदर्रिसी, अहकामे इबादात, पृष्ठ 293।
- ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 2, पृष्ठ 551।
- ↑ शोबैरी ज़ंजानी, इस्तिफ़्ताआत, खंड 1, पृष्ठ 383।
- ↑ हाशिमी, अल-अख़लाक़ वल-आदाबुल-इस्लामिया, पृष्ठ 330।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस्क़ा (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 576।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस्क़ा (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 575।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस्क़ा (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 576।
- ↑ ख़ुमैनी, तहरीर अल-वसीला, खंड 1, पृष्ठ 182।
- ↑ बनी-हाशमी ख़ुमैनी, तौज़ीहुल-मसाइल (मुहश्शा), खंड 1, पृष्ठ 570।
- ↑ तबरीज़ी, सिरात अल-नजात, खंड 10, पृष्ठ 67; हाइरी, अल-फ़तावा अल-मुन्तख़बा, पृष्ठ 73-74।
- ↑ इस्फ़हानी, वसीला अल-नजात, खंड 1, पृष्ठ 135।
- ↑ इस्फ़हानी, वसीला अल-नजात, खंड 1, पृष्ठ 157।
- ↑ नजफ़ी, जवाहिर अल-कलाम, खंड 8, पृष्ठ 430-432।
- ↑ नजफ़ी, जवाहिर अल-कलाम, खंड 8, पृष्ठ 412।
- ↑ हुर आमिली, वसाइल अल शिया, खंड 5, पृष्ठ 365-366।
- ↑ अल्बानी, मौसूआ अल-अल्बानी फ़िल-अक़ीदा, खंड 3, पृष्ठ 915।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस्क़ा (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 394-395।
- ↑ बनी-हाशमी ख़ुमैनी, तौज़ीहुल-मसाइल (मुहश्शा), खंड 1, पृष्ठ 573।
- ↑ बनी-हाशमी ख़ुमैनी, तौज़ीहुल-मसाइल (मुहश्शा), खंड 1, पृष्ठ 583।
स्रोत
- अल्बानी, मुहम्मद, मौसूआ अल-अल्बानी फ़िल-अक़ीदा, सनआ, अल-नोअमान इस्लामी अनुसंधान एवं अध्ययन केंद्र, 1431 हिजरी।
- अल्लामा हिल्ली, हसन बिन यूसुफ़, मुख़्तलिफ़ अल शिया फ़ी अहकाम अल शरिया, क़ुम, इस्लामी प्रकाशन कार्यालय, 1413 हिजरी।
- इस्फ़हानी, अबुल हसन, वसीला अल-नजात, सय्यद मुहम्मद रज़ा गुलपायगानी की टिप्पणियों के साथ, क़ुम, मेहर-ए-इस्तेवार प्रकाशन, 1393 हिजरी।
- कुलैनी, मुहम्मद बिन याक़ूब, अल-काफ़ी, तेहरान, इस्लामी किताब प्रकाशन गृह, 1407 हिजरी।
- ख़ुमैनी, सय्यद रूहुल्लाह, तहरीर अल-वसीला, तेहरान, इमाम ख़ुमैनी (र.) के कार्यों के संकलन और प्रकाशन संस्थान, 1434 हिजरी।
- ग़र्वी नाइनी, मुहम्मद हुसैन, किताब अल-हज व अहकाम अल-इबादात वल-मुआमलात, क़ुम, हौज़ा-ए-इल्मिया प्रबंधन केंद्र, 1403 हिजरी।
- तबरीज़ी, जवाद, सिरात अल-नजात, क़ुम, अल सिद्दीका अल शहीदा प्रकाशन, 1427 हिजरी।
- तबातबाई यज़्दी, सय्यद मुहम्मद काज़िम, अल-उर्वतुल-वुस्क़ा (मुहश्शा), शोधकर्ता: अहमद मोहसिनी सब्ज़वारी, क़ुम, इस्लामी प्रकाशन कार्यालय, 1419 हिजरी।
- नजफ़ी, मुहम्मद हसन, जवाहिर अल-कलाम फ़ी शरहे शराए अल-इस्लाम, बेरूत, एहिया अल तोरास अल अरबी प्रकाशन गृह, सातवाँ संस्करण, प्रकाशन वर्ष उपलब्ध नहीं।
- बनी-हाशमी ख़ुमैनी, सय्यद मुहम्मद हुसैन, तौज़ीहुल-मसाइल (मुहश्शा), क़ुम, इस्लामी प्रकाशन कार्यालय, 1424 हिजरी।
- बहजत, मुहम्मद तक़ी, वसीला अल-नजात, क़ुम, शफ़क़ प्रकाशन, 1423 हिजरी।
- बहरानी, यूसुफ़ बिन अहमद, अल-हदाइक़ अल-नाज़िरा फ़ी अहकाम अल-इत्रत अल-ताहिरा, क़ुम, इस्लामी प्रकाशन कार्यालय, 1363 शम्सी।
- मिश्कीनी, अली अकबर, मुस्तलहात अल-फ़िक़्ह, क़ुम, दार अल-हदीस प्रकाशन, 1392 शम्सी / 1434 हिजरी।
- मुदर्रिसी, मुहम्मद तक़ी, अहकामे इबादात, तेहरान, मुहिब्बाने हुसैन (अ) प्रकाशन, 1381 शम्सी।
- शोबैरी ज़ंजानी, सय्यद मूसा, इस्तिफ़्ताआत, क़ुम, इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) फ़िक़्ह केंद्र, 1396 शम्सी।
- सिस्तानी, सय्यद अली, मिन्हाज अल सालिहीन, क़ुम, आयतुल्लाह सय्यद सिस्तानी पुस्तकालय, 1415 हिजरी।
- हाइरी, सय्यद मुहम्मद काज़िम, अल-फ़तावा अल मुन्तख़बा, क़ुम, दार अल तफ़्सीर प्रकाशन, 1424 हिजरी।
- हाशिमी, अब्दुल्लाह, अल-अख़्लाक़ वल-आदाब अल-इस्लामिया, बेरूत, दार अल-अमीन प्रकाशन, 1427 हिजरी।
- हुर्र आमिली, मुहम्मद बिन हसन, तफ़्सील वसाइल अल शिया इला तहसील मसाइल अल शरिया, क़ुम, आले-बैत (अ) संस्थान, 1409 हिजरी।
