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शुक्र का सजदा

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शुक्र का सजदा, ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए किया जाने वाला एक मुस्तहब सजदा है, जिसे शिया न्यायशास्त्र में नमाज़ के बाद, किसी नेअमत के प्राप्त होने और मुसीबत के दूर होने जैसे अवसरों पर करने की सिफ़ारिश की गई है। यह सजदा एक बार माथे को ज़मीन पर रखने से पूरा हो जाता है और दो बार सजदा करना भी मुस्तहब माना गया है। रिवायतों में इसके लिए अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त होने और सवाब में वृद्धि जैसी फ़ज़ीलतें बयान हुई हैं तथा इसके लिए विभिन्न ज़िक्र और दुआएँ, जैसे «شکراً لله» (शुक्रन लिल्लाह) और «عفواً عفواً» (अफ़्वन अफ़्वन), भी वर्णित हैं।

महत्व और फ़ज़ीलत

शुक्र का सजदा मुस्तहब आमाल में से और नमाज़ के बाद पढ़े जाने वाले तअक़ीबात में से माना जाता है। रिवायतों में नमाज़ के बाद इसे करने पर ज़ोर दिया गया है और इसके लिए सवाब में वृद्धि, गुनाहों की माफ़ी और अल्लाह की रहमत प्राप्त होने जैसी फ़ज़ीलतें बयान की गई हैं। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से वर्णित एक रिवायत में नमाज़ के बाद शुक्र के सजदे को नमाज़ के मूल्य में वृद्धि और अल्लाह की प्रसन्नता का कारण बताया गया है।[] एक अन्य रिवायत में नेअमत के कारण किए जाने वाले शुक्र के सजदे के लिए नेकियों के लिखे जाने, गुनाहों की माफ़ी और जन्नत में दर्जों की वृद्धि जैसी फ़ज़ीलतें बयान हुई हैं।[] इमाम ज़माना (अ) ने भी शुक्र के सजदे को सबसे महत्वपूर्ण मुस्तहब आमाल में से माना है और उसे वाजिब इबादतों के बाद की दुआ और तस्बीह के समान बताया है।[]

मुस्तहब होने के अवसर

शुक्र का सजदा मुस्तहब है और निम्नलिखित अवसरों पर इसे करने पर विशेष ज़ोर दिया गया है:

  1. वाजिब और मुस्तहब नमाज़ों के बाद। रिवायतों में मग़रिब की नमाज़ के बाद शुक्र के सजदे पर विशेष ज़ोर दिया गया है।[]
  2. नेअमत प्राप्त होने या नेअमत के दोबारा प्राप्त होने के समय।
  3. मुसीबत या विपत्ति के दूर होने के समय।
  4. कोई नेक काम करने या पाप छोड़ने की तौफ़ीक़ (सामर्थ्य) मिलने के बाद।
  5. किसी विपत्ति में पड़े व्यक्ति या किसी पापी व्यक्ति को देखकर, अपनी सलामती और उस स्थिति से सुरक्षित रहने के लिए अल्लाह का शुक्र अदा करने के उद्देश्य से।[]

शुक्र का सजदा करने का तरीका

शुक्र का सजदा एक बार माथे को ज़मीन पर रखने से पूरा हो जाता है, हालाँकि कुछ न्यायविदों ने दो बार सजदा करना बेहतर माना है। इस तरीके में पहले सजदे के बाद दाहिना गाल और फिर बायाँ गाल ज़मीन पर रखा जाता है, जिसे तअफ़ीर कहा जाता है।[]

शुक्र के सजदे, में तकबीर-ए-इफ़्तिताह, तशह्हुद और सलाम नहीं होता।[] हालांकि कुछ न्यायविदों ने सजदे से सिर उठाने के बाद तकबीर कहना मुस्तहब माना है।[] इस बारे में कि शुक्र का सजदा पूरा होने के लिए सजदे के अन्य अंगों को भी ज़मीन पर रखना आवश्यक है या केवल माथे का ज़मीन पर रखना पर्याप्त है, न्यायविदों के बीच मतभेद पाया जाता है।[]

शुक्र के सजदे का ज़िक्र

शुक्र के सजदे के लिए कोई विशेष ज़िक्र (पाठ) निर्धारित नहीं किया गया है कि जिसका कहना सजदे के सही होने के लिए शर्त हो। इसमें कोई भी ज़िक्र और दुआ करना जायज़ है। रिवायतों में इसके लिए विभिन्न ज़िक्र और दुआएँ वर्णित हुई हैं। उनमें से इमाम रज़ा (अ) ने शुक्र के सजदे में 100 बार «شکراً لله» (शुक्रन लिल्लाह) और «عفواً عفواً» कहने की सिफ़ारिश की है।[१०] इमाम सादिक़ (अ) से भी वर्णित है कि नमाज़ के बाद शुक्र के सजदे में सबसे कम ज़िक्र 3 बार «شکراً لله» (शुक्रन लिल्लाह) है।[११]

कुछ रिवायतों में शुक्र के सजदे में «یا رؤوف، یا رحیم، یا ربّ، یا سیدی» (या रऊफ़, या रहीम, या रब्ब, या सय्यिदी) कहना और अहले-बैत (अ) की विलायत की नेअमत पर शुक्र अदा करने की सिफ़ारिश की गई है।[१२] इसी प्रकार वर्णित है कि इमाम सादिक़ (अ) और इमाम काज़िम (अ) शुक्र के सजदे में यह दुआ बहुत अधिक पढ़ते थे: «اَسْألُک الرّاحَةَ عِنْدَ الْمَوتِ وَ الْعَفْوَ عِندَ الْحِسابِ» (अस्अलुकर-राहता इंदल-मौते वल-अफ़्वा इंदल-हिसाबे)।[१३]

शर्तें और मुस्तहबात

तहारत और क़िब्ले की ओर रुख़ करना शुक्र के सजदे के सही होने की शर्त नहीं है;[१४] हालांकि दोनों (क़िब्ला[१५] और तहारत[१६]) को इसके मुस्तहब कार्यों में माना गया है। सजदे को लंबा करना, हाथों को ज़मीन पर रखना, सीने और पेट को ज़मीन से लगाना, तअफ़ीर करना (पहले दाहिना और फिर बायाँ गाल ज़मीन पर रखना) और वर्णित दुआएँ पढ़ना भी मुस्तहब है। सजदे से सिर उठाने के बाद सजदे की जगह को हाथ से छूना और उसे चेहरे तथा शरीर के सामने वाले हिस्से पर फेरना भी कुछ स्रोतों में मुस्तहब कार्यों में गिना गया है।[१७]

कुछ विवरणों के बारे में, जैसे स्थान का मुबाह होना और माथा रखने की जगह का सही होना, न्यायविदों के बीच मतभेद पाया जाता है।[१८]

पहला शुक्र का सजदा

कुछ स्रोतों में इमाम अली (अ) द्वारा लैलतुल-मबीत की घटना में पैग़म्बर (स) के सुरक्षित होने की जानकारी प्राप्त होने के बाद किए गए शुक्र के सजदे को इस्लाम में पहला शुक्र का सजदा माना गया है। इस विवरण के अनुसार, पैग़म्बर (स) जब मक्का से मदीना की ओर हिजरत के लिए निकले, तो उन्होंने इमाम अली (अ) को अपने बिस्तर पर सुलाया और अली (अ) ने पैग़म्बर (स) के सुरक्षित होने का विश्वास हो जाने के बाद शुक्र का सजदा अदा किया।[१९]

फ़ुटनोट

  1. शेख़ सदूक़, मन ला यहज़ुरुहुल-फ़क़ीह, खंड 1, पृष्ठ 333।
  2. शेख़ सदूक़, सवाबुल-आमाल, पृष्ठ 35।
  3. मजलिसी, बिहारुल-अनवार, खंड 53, पृष्ठ 161; हुर्रे आमिली, वसाइलुश-शिया, खंड 6, पृष्ठ 409।
  4. शेख़ सदूक़, मन ला यहज़ुरुहुल-फ़क़ीह, खंड 1, पृष्ठ 331।
  5. नजफ़ी, जवाहिरुल-कलाम, खंड 10, पृष्ठ 234-240; तबातबाई यज़्दी, अल-उरवतुल-वुस्का (हाशिये सहित), खंड 2, पृष्ठ 584-585; करकी, जामेउल-मक़ासिद, खंड 2, पृष्ठ 317।
  6. शहीद सानी, मसालिकुल-अफ़्हाम, खंड 1, पृष्ठ 223; बहरानी, अल-हदाइक़ुन-नाज़िरा, खंड 8, पृष्ठ 351।
  7. कर्की, जामेउल-मक़ासिद, खंड 2, पृष्ठ 317।
  8. शेख़ तूसी, अल-मबसूत, खंड 1, पृष्ठ 114।
  9. कर्की, जामेउल-मक़ासिद, खंड 2, पृष्ठ 317; बहरानी, अल-हदाइक़ुन-नाज़िरा, खंड 8, पृष्ठ 349-350।
  10. शेख़ सदूक़, मन ला यहज़ुरुहुल-फ़क़ीह, खंड 1, पृष्ठ 332।
  11. शेख़ सदूक़, मन ला यहज़ुरुहुल-फ़क़ीह, खंड 1, पृष्ठ 333।
  12. बुरूजर्दी, जामेअ अहादीस, खंड 5, पृष्ठ 469।
  13. क़ुम्मी, मफ़ातीहुल-जिनान, पृष्ठ 99-102।
  14. अल्लामा हिल्ली, तज़किरतुल-फ़ुक़हा, खंड 1, पृष्ठ 137; खंड 3, पृष्ठ 15।
  15. तबातबाई यज़्दी, अल-उरवतुल-वुस्का (हाशिये सहित), खंड 2, पृष्ठ 312-313।
  16. नजफ़ी, जवाहिरुल-कलाम, खंड 10, पृष्ठ 245।
  17. कर्की, जामेउल-मक़ासिद, खंड 2, पृष्ठ 316-317; बहरानी, अल-हदाइक़ुन-नाज़िरा, खंड 8, पृष्ठ 347-349; पृष्ठ 352; तबातबाई यज़्दी, अल-उरवतुल-वुस्का (हाशिये सहित), खंड 2, पृष्ठ 585।
  18. कर्की, जामेउल-मक़ासिद, खंड 2, पृष्ठ 317; काशिफ़ुल-ग़िता, कश्फ़ुल-ग़िता, खंड 3, पृष्ठ 215; बहरानी, अल-हदाइक़ुन-नाज़िरा, खंड 8, पृष्ठ 349-350।
  19. मजलिसी, बिहारुल-अनवार, खंड 19, पृष्ठ 60।

स्रोत

  • अल्लामा हिल्ली, हसन बिन यूसुफ़, तज़किरतुल-फ़ुक़हा, क़ुम, अहलुल-बैत ले अहयाए अल तोरास संस्थान।
  • क़ुम्मी, अब्बास, मफ़ातीहुल-जिनान, क़ुम, उस्वा प्रकाशन, प्रकाशन वर्ष उपलब्ध नहीं।
  • काशिफ़ुल-ग़िता, शेख़ जाफ़र, कश्फ़ुल-ग़िता अन मुबह्मातिश-शरीअतिल-ग़र्रा, क़ुम, इस्लामी प्रचार कार्यालय।
  • तबातबाई यज़्दी, सय्यद मुहम्मद काज़िम, अल-उरवतुल-वुस्का (हाशिये सहित), शोधकर्ता: अहमद मोहसिनी सब्ज़वारी, क़ुम, इस्लामी प्रकाशन कार्यालय, 1419 हिजरी।
  • नजफ़ी, मुहम्मद हसन, जवाहिरुल-कलाम, तेहरान, दारुल-कुतुबिल-इस्लामिय्या प्रकाशन, 1365 शम्सी।
  • बहरानी, यूसुफ़ बिन अहमद, अल-हदाइक़ुन-नाज़िरा फ़ी अहकामिल-इतरतित-ताहिरा, क़ुम, इस्लामी प्रकाशन संस्थान (क़ुम के प्रतिष्ठित मदरसे के अध्यापकों की जमाअत के अधीन)।
  • बुरूजर्दी, सय्यद हुसैन, जामेअ अहादीसिश-शिया, अनुवादक: अहमद इस्माईल तबार, अहमद रज़ा हुसैनी, मुहम्मद हुसैन महवरी, तेहरान, फ़रहंग-ए-सब्ज़ प्रकाशन, 1388 शम्सी।
  • मजलिसी, मुहम्मद बाक़िर, बिहारुल-अनवार, बेरूत, दारु इहयाइत-तुरासिल-अरबी प्रकाशन, प्रकाशन वर्ष उपलब्ध नहीं।
  • मुहक़्क़िक़ कर्की, अली बिन हुसैन, जामेउल-मक़ासिद, क़ुम, अहलुल-बैत ले अहयाए अल तोरास संस्थान, प्रकाशन वर्ष उपलब्ध नहीं।
  • शहीद सानी, ज़ैनुद्दीन बिन अली, मसालिकुल-अफ़्हाम, क़ुम, दारुल-होदा मुद्रण एवं प्रकाशन, प्रकाशन वर्ष उपलब्ध नहीं।
  • शेख़ तूसी, मुहम्मद बिन हसन, अल-मबसूत फ़ी फ़िक़्हिल-इमामिय्या, तेहरान, मुर्तज़विय्या पुस्तकालय, 1387 शम्सी।
  • शेख़ सदूक़, मुहम्मद बिन अली, मन ला यहज़ुरुहुल-फ़क़ीह, शोधकर्ता एवं संपादक: ग़फ़्फ़ारी, अली अकबर, इस्लामी प्रकाशन कार्यालय, क़ुम, दूसरा संस्करण, 1413 हिजरी।
  • शेख़ सदूक़, मुहम्मद बिन अली, सवाबुल-आमाल व एक़ाबुल-आमाल, दारुश-शरीफ़ अर-रज़ी प्रकाशन, क़ुम, दूसरा संस्करण, 1406 हिजरी।
  • हुर्रे आमिली, मुहम्मद बिन हसन, वसाइलुश-शिया इला तहसीले मसाइलिश-शरीआ, क़ुम, अहलुल-बैत ले अहयाए अल तोरास संस्थान।