प्रारूप:लिवात
| कुछ अमली व फ़िक़ही अहकाम |
| ● बुलूग़ ● न्यायशास्त्र ● शरई अहकाम ● तौज़ीहुल मसायल ● वाजिब ● हराम ● मुस्तहब ● मुबाह ● मकरूह ● नीयत ● क़स्दे क़ुरबत ● नए मसायल |
यह लेख एक न्यायशास्त्रीय अवधारणा से संबंधित एक वर्णनात्मक लेख है और धार्मिक आमाल के लिए मानदंड नहीं हो सकता। धार्मिक आमाल के लिए अन्य स्रोतों को देखें। |
लिवात दो पुरुषों के बीच यौन संबंध को कहा जाता है, जिसे बड़े गुनाहों में गिना जाता है। हदीसों में लिवात के गुनाह को ज़िना से बड़ा बताया गया है। न्यायविदों ने क़ुरआन की आयतों और मासूमों की रिवायतों के आधार पर लिवात को हराम घोषित किया है। यदि इसमें प्रवेश हुआ हो, तो इसकी सज़ा मृत्युदंड बताई गई है। प्रवेश के बिना लिवात की सज़ा 100 कोड़े निर्धारित की गई है।
इमामों की हदीसों के अनुसार, लिवात के हराम होने का कारण यह है कि इससे संतानोत्पत्ति रुकती है और संसार के प्रबंधन तथा व्यवस्था में बिगाड़ पैदा होता है। अन्य इब्राहीमी धर्मों और अहले सुन्नत के चारों न्यायशास्त्रीय मज़हबों में भी लिवात को निंदनीय और निषिद्ध घोषित किया गया है।
लिवात: ज़िना से बड़ा गुनाह
लिवात को सबसे बड़े गुनाहों में से एक माना गया है।[१] इमाम सादिक़ (अ) से वर्णित एक हदीस में इसके गुनाह को ज़िना के गुनाह से बड़ा बताया गया है।[२] पैग़म्बरे अकरम (स) से वर्णित एक रिवायत के अनुसार, ऐसा करने वाला अल्लाह के क्रोध और लानत का पात्र होगा।[३]
क़ुरआन में लिवात के लिए «मुनकर» (बुरा और निंदनीय) तथा «फ़ाहिशा» (खुला हुआ पाप) जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है।[४] लूत जनजाति की इस यौन क्रिया के कारण कई बार निंदा की गई है।[५] यह भी बताया गया है कि इस गुनाह में लिप्त होने के कारण ही उन पर अज़ाब आया और वे विनाश का शिकार हुए।[६]
अवधारणा की परिभाषा
न्यायशास्त्र की शब्दावली में लिवात की परिभाषा यह है कि कोई पुरुष अपने यौन अंग को दूसरे पुरुष के गुदा में प्रवेश कराए।[७] शिया विद्वान अली अकबर फ़ैज़ मिशकीनी के अनुसार, कुछ न्यायविदों ने ख़तना की सीमा से कम प्रवेश को भी लिवात कहा है।[८] कुछ अन्य न्यायविदों ने पुरुष और पुरुष के बीच किसी भी प्रकार के यौन संबंध को, भले ही यौन अंग गुदा में प्रवेश न करे, लिवात कहा है।[९]
इमाम रज़ा (अ) से वर्णित एक हदीस के अनुसार, चूँकि लूत जनजाति सबसे पहले इस बड़े गुनाह में लिप्त हुई थी, इसलिए इस बड़े गुनाह का नाम उसी क़ौम के नाम पर रखा गया और इसे «लिवात» कहा जाने लगा।[१०]
शरीअत का हुक्म
लिवात को हराम और बड़ा गुनाह माना गया है।[११] इसके लिए शरई सज़ा (हद) के अलावा कुछ अन्य हुक्म भी हैं, जैसे विवाह से संबंधित पाबंदियाँ।[१२]
विवाह से संबंधित पाबंदियाँ
लिवात करने वाले व्यक्ति के कुछ महिलाओं से विवाह पर पाबंदी लगना, लिवात के शरई प्रभावों में से एक है। मरजा-ए-तक़लीद के फ़तवे के अनुसार, जिस व्यक्ति के साथ लिवात किया गया हो, उसकी माँ, बेटी और बहन से लिवात करने वाले का विवाह हमेशा के लिए हराम[१३] हो जाता है।[१४] हालाँकि, कुछ न्यायविदों का मानना है कि यह हुक्म उस समय लागू होता है, जब लिवात करने वाला व्यक्ति बालिग़ हो।[१५] इसी तरह, यदि माँ, बहन या बेटी से विवाह होने के बाद लिवात की घटना हो, तो वे एक-दूसरे के लिए हराम नहीं होतीं और उनका विवाह अमान्य नहीं होता।[१६]
सज़ा
न्यायविदों के फ़तवे के अनुसार, यदि लिवात करने वाला और जिस व्यक्ति के साथ लिवात किया गया है, दोनों बालिग़ हों, तो उनकी सज़ा मृत्युदंड है।[१७] यदि उनमें से कोई नाबालिग़ हो, तो उसे तादीब (शिष्टाचार सिखाना) की सज़ा दी जाती है।[१८] तादीब ऐसी सज़ा को कहते हैं, जिसे शरई शासक किसी नाबालिग़ अपराधी पर लागू करता है और जिसकी मात्रा शरई हद से कम होती है।[१९]
हालाँकि, कुछ न्यायविद, जैसे सय्यद अबुल क़ासिम ख़ूई, की राय प्रसिद्ध राय से अलग है। वे उस व्यक्ति के लिए मृत्युदंड को स्वीकार करते हैं जिसके साथ लिवात किया गया हो, लेकिन लिवात करने वाले को मृत्युदंड तभी दिए जाने का मत रखते हैं, जब वह मुह्सिन (विवाहित होना) हो। अर्थात उसके पास पत्नी हो और उसके साथ यौन संबंध बनाने की संभावना भी हो। अन्यथा उसकी सज़ा 100 कोड़े है।[२०]
न्यायविदों के अनुसार, यदि इस कृत्य में प्रवेश न हुआ हो, तो उसकी शरई हद 100 कोड़े है।[२१] इसके अलावा, यदि लिवात करने वाला व्यक्ति अपराध सिद्ध होने से पहले तौबा कर ले, तो उससे हद की सज़ा समाप्त हो जाती है।[२२]
मृत्युदंड देने के तरीके़
रिवायतों[२३] और न्यायशास्त्रीय स्रोतों[२४] में लिवात के अपराधी को मृत्युदंड देने के कई तरीके़ बताए गए हैं। इनमें गर्दन काटना, आग में जलाना, पहाड़ से गिराना, संगसार करना और अपराधी पर दीवार गिराना शामिल हैं। इस्लामी शासक इस्लामी समाज के हित को ध्यान में रखते हुए इन तरीक़ों में से किसी एक को लागू करने का आदेश देता है।[२५] हालाँकि, यदि कुछ परिस्थितियों में किसी शरई हद को लागू करने से धर्म की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचती हो या स्वयं धर्म को नुक़सान होने की आशंका हो, तो इस्लामी शासक को इस्लाम के अधिक महत्त्वपूर्ण हितों की रक्षा के लिए हद को अस्थायी रूप से रोकने का अधिकार है।[२६] वह फाँसी या गोली मारकर मृत्युदंड देने जैसे अन्य तरीक़ों का आदेश भी दे सकता है।[२७]
निषेध का दर्शन
लिवात के हराम होने की हिकमत के बारे में इमाम रज़ा (अ) से वर्णित एक हदीस में आया है कि अल्लाह ने महिलाओं को पुरुषों की प्रकृति के अनुकूल पैदा किया है। लिवात से नस्ल का सिलसिला रुकता है और संसार के प्रबंधन तथा व्यवस्था में बिगाड़ पैदा होता है।[२८]
अल्लामा तबातबाई ने अल-मीज़ान में लिवात और ज़िना की तुलना करते हुए लिखा है कि क़ुरआन ने लिवात के बारे में «تَقْطَعُونَ السَّبِيلَ» (तक़्तऊनस सबीला)अर्थात् «तुम रास्ता रोकते हो»[२९] का उल्लेख किया है।[३०] जबकि ज़िना के बारे में «سَاءَ سَبِيلًا» (साअ सबीला) कहा गया है, अर्थात् «यह बुरा रास्ता है।»[३१] इस प्रकार, क़ुरआन की दृष्टि में लिवात के प्राकृतिक दुष्परिणाम ज़िना से अधिक गंभीर हैं, क्योंकि इससे प्रजनन और संतानोत्पत्ति का मार्ग बाधित होता है।[३२]
लिवात के बारे में अन्य धर्मों और मज़हबों का दृष्टिकोण
अहले सुन्नत के मज़हबों में भी लिवात को हराम माना गया है और इसे करने वाले के लिए शरई हद निर्धारित की गई है।[३३] हालाँकि, अबू हनीफ़ा का फ़तवा है कि ऐसा करने वाले को शरई हद के बजाय ताज़ीर (ऐसे अपराधों की सज़ा, जिनके लिए इस्लाम ने कोई निश्चित दंड निर्धारित नहीं किया है।) की सज़ा दी जाएगी।[३४]
अन्य ईश्वरीय धर्मों में भी लिवात को निंदनीय और निषिद्ध घोषित किया गया है। ज़रथुस्त्र धर्म में लिवात को सबसे बुरे कार्यों में गिना गया है और इसे करने वाले को मृत्युदंड का पात्र माना गया है।[३५] तौरात में लिवात को दुराचार कहा गया है।[३६] नया नियम (ईसाइयों की पवित्र पुस्तक बाइबल का भाग) भी लिवात करने वालों को दुराचारियों, अत्याचारियों और मूर्तिपूजकों की श्रेणी में रखता है और कहता है कि ऐसे लोग अल्लाह की बादशाहत (मलकूत) के वारिस नहीं होंगे।[३७]
फ़ुटनोट
- ↑ अल्लामा हिल्ली, तहरीरुल-अहकामिश-शरइय्या, खंड 2, पृष्ठ 224।
- ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 5, पृष्ठ 543।
- ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 5, पृष्ठ 544।
- ↑ सूरह अन्कबूत, आयत 28 और 29; सूरह आराफ़, आयत 80।
- ↑ फ़क़ीही, तरबियते जिन्सी, पृष्ठ 311।
- ↑ फ़ैज़ुल-इस्लाम, तर्जुमा व तफ़सीरे क़ुरआने करीम, खंड 2, पृष्ठ 443।
- ↑ मिशकीनी, मुस्तलहातुल-फ़िक़्ह, पृष्ठ 457।
- ↑ मिशकीनी, मुस्तलहातुल-फ़िक़्ह, पृष्ठ 457।
- ↑ मिशकीनी, मुस्तलहातुल-फ़िक़्ह, पृष्ठ 457।
- ↑ अली इब्ने मूसा, अल-फ़िक़्हुल-मंसूब लिल-इमामिर-रिज़ा (अ), पृष्ठ 276।
- ↑ अल्लामा हिल्ली, तहरीरुल-अहकामिश-शरइय्या, खंड 2, पृष्ठ 224; सब्ज़वारी, मुहज़्ज़बुल-अहकाम, खंड 27, पृष्ठ 303।
- ↑ अल्लामा हिल्ली, तहरीरुल-अहकामिश-शरइय्या, खंड 2, पृष्ठ 13; ख़ूई, मिन्हाजुस-सालिहीन, खंड 2, पृष्ठ 265।
- ↑ शुबैरी ज़ंजानी, किताबे निकाह, खंड 7, पृष्ठ 2109; शाहरूदी की निगरानी में शोधकर्ताओं का एक समूह, फ़रहंगे फ़िक़्ह, खंड 2, पृष्ठ 365।
- ↑ इमाम ख़ुमैनी, तौज़ीहुल-मसाइल (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 473।
- ↑ इमाम ख़ुमैनी, तौज़ीहुल-मसाइल (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 473।
- ↑ इमाम ख़ुमैनी, तौज़ीहुल-मसाइल (मुहश्शा), खंड 2, पृष्ठ 473।
- ↑ मुहक़्क़िक़ हिल्ली, शराएउल-इस्लाम, खंड 4, पृष्ठ 147; अल्लामा हिल्ली, तहरीरुल-अहकामिश-शरइय्या, खंड 2, पृष्ठ 224; शहीद सानी, मसालिकुल-अफ़हाम, खंड 14, पृष्ठ 402; नजफ़ी, जवाहिरुल-कलाम, खंड 41, पृष्ठ 379–380; इमाम ख़ुमैनी, तहरीरुल-वसीला, खंड 2, पृष्ठ 469, मसला 4।
- ↑ अल्लामा हिल्ली, तहरीरुल-अहकामिश-शरइय्या, खंड 2, पृष्ठ 224; शहीद सानी, मसालिकुल-अफ़हाम, खंड 14, पृष्ठ 403; इमाम ख़ुमैनी, तहरीरुल-वसीला, खंड 2, पृष्ठ 469, मसला 4।
- ↑ तेरहीनी आमिली, अज़-जुबदतुल-फ़िक़्हिय्या, खंड 9, पृष्ठ 305।
- ↑ ख़ूई, तकमिलतुल-मिन्हाज, खंड 2, पृष्ठ 38–39।
- ↑ मुहक़्क़िक़ हिल्ली, शराएउल-इस्लाम, खंड 4, पृष्ठ 147; अल्लामा हिल्ली, तहरीरुल-अहकामिश-शरइय्या, खंड 2, पृष्ठ 224।
- ↑ इमाम ख़ुमैनी, तहरीरुल-वसीला, खंड 2, पृष्ठ 470, मसला 8।
- ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 7, पृष्ठ 200।
- ↑ मुहक़्क़िक़ हिल्ली, शराएउल-इस्लाम, खंड 4, पृष्ठ 147; अल्लामा हिल्ली, तहरीरुल-अहकामिश-शरइय्या, खंड 2, पृष्ठ 224।
- ↑ इमाम ख़ुमैनी, तहरीरुल-वसीला, खंड 2, पृष्ठ 470, मसला 5।
- ↑ इमाम ख़ुमैनी, सहीफ़ए इमाम, खंड 20, पृष्ठ 452।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, इस्तिफ़ाआते जदीद, खंड 3, पृष्ठ 369, सवाल 948।
- ↑ सदूक़, उयूनु अख़बारिर-रिज़ा (अ), खंड 2, पृष्ठ 97; सदूक़, इललुश-शराए, खंड 2, पृष्ठ 547।
- ↑ सूरह अन्कबूत, आयत 29।
- ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 16, पृष्ठ 123।
- ↑ सूरह इसरा, आयत 32; सूरह नम्ल, आयत 54।
- ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 13, पृष्ठ 88।
- ↑ मूसवी अर्दबेली, फ़िक़्हुल-हुदूद वत-ताज़ीरात, खंड 2, पृष्ठ 49।
- ↑ सरख़सी, अल-मबसूत, खंड 9, पृष्ठ 77; मूसवी अर्दबेली, फ़िक़्हुल-हुदूद वत-ताज़ीरात, खंड 2, पृष्ठ 52।
- ↑ रज़ाई, तारीख़े अदयाने जहान, खंड 1, पृष्ठ 197।
- ↑ किताबे मुक़द्दस, किताबे लावियान, अध्याय 18, आयत 22।
- ↑ किताबे मुक़द्दस, किताबे कुरिंथियान, अध्याय 6, आयत 9–10।
स्रोत
- क़ुरआन करीम।
- किताबे मुक़द्दस।
- अली बिन मूसा (आठवें इमाम), अल-फ़िक़्हुल-मंसूब लिल-इमामिर-रिज़ा (अ), मशहद, आले अल-बैत (अ) संस्था, पहला संस्करण, 1406 हिजरी।
- अल्लामा हिल्ली, हसन बिन यूसुफ़, तहरीरुल-अहकामिश-शरइय्या अला मज़हबिल-इमामिय्या, आले-बैत (अ) संस्था, मशहद, पहला संस्करण, प्रकाशित वर्ष उपलब्ध नहीं।
- इमाम ख़ुमैनी, सय्यद रूहुल्लाह, तहरीरुल-वसीला, क़ुम, दारुल-इल्म प्रकाशन संस्था, पहला संस्करण, प्रकाशित वर्ष उपलब्ध नहीं।
- इमाम ख़ुमैनी, सय्यद रूहुल्लाह, सहीफ़ए इमाम, तेहरान, इमाम ख़ुमैनी के आसार के संकलन और प्रकाशन का संस्थान, पाँचवाँ संस्करण, 1389 शम्सी।
- कुलैनी, मुहम्मद बिन याक़ूब, अल-काफ़ी, तेहरान, दारुल-कुतुबिल-इस्लामिय्या संस्थान, चौथा संस्करण, 1407 हिजरी ।
- ख़ूई, सय्यद अबुल-क़ासिम, तकमिलतुल-मिन्हाज, मदीनतुल-इल्म प्रकाशन, क़ुम, 28वाँ संस्करण, 1410 हिजरी।
- तबातबाई, सय्यद मुहम्मद हुसैन, अल-मीज़ान फ़ी तफ़सीरिल-क़ुरआन, इस्माईलियान प्रकाशन, प्रकाशित वर्ष उपलब्ध नहीं।
- तरहीनी आमिली, सय्यद मुहम्मद हुसैन, अज़-जुबदतुल-फ़िक़्हिय्या फ़ी शरहे-रौज़तिल-बहिय्या, दारुल-फ़िक़्ह प्रकाशन एवं मुद्रण संस्था, क़ुम, चौथा संस्करण, 1427 हिजरी।
- नजफ़ी, मुहम्मद हसन, जवाहिरुल-कलाम फ़ी शरहे शराएइल-इस्लाम, बेरूत, दारु इहयाइत-तुरासिल-अरबी संस्थान, 1404 हिजरी।
- फ़क़ीही, अली नक़ी, तरबियते जिन्सी, क़ुम, दारुल-हदीस वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संस्था, पहला संस्करण, 1387 शम्सी।
- बनी हाशिमी ख़ुमैनी, सय्यद मुहम्मद हसन, तौज़ीहुल-मसाइल मराजे, क़ुम, क़ुम के मदरिसे इल्मिया के जामेअ मुदर्रिसीन का इस्लामी प्रकाशन कार्यालय, 1424 हिजरी।
- मकारिम शीराज़ी, नासिर, इस्तिफ़ाआते जदीद, इमाम अली बिन अबी तालिब (अ) मदरसा प्रकाशन, क़ुम, दूसरा संस्करण, 1427 हिजरी।
- मिशकीनी, मिर्ज़ा अली, मुस्तलहातुल-फ़िक़्ह, क़ुम, अल-हादी प्रकाशन, तीसरा संस्करण, 1381 शम्सी।
- मुहक़्क़िक़ हिल्ली, नज्मुद्दीन, शराएउल-इस्लाम फ़ी मसाइलिल-हलालि वल-हराम, क़ुम, इस्माईलियान संस्था, दूसरा संस्करण, 1408 हिजरी।
- मूसवी अर्दबेली, सय्यद अब्दुल-करीम, फ़िक़्हुल-हुदूद वत-ताज़ीरात, क़ुम, मुफ़ीद विश्वविद्यालय का प्रकाशन संस्थान, दूसरा संस्करण, 1427 हिजरी।
- रज़ाई, अब्दुर्रहीम, तारीख़े अदयाने जहान, तेहरान, इल्मी प्रकाशन, दूसरा संस्करण, 1380 शम्सी।
- शहीद सानी, ज़ैनुद्दीन बिन अली, मसालिकुल-अफ़हाम इला तनक़ीहि शराएइल-इस्लाम, इस्लामी मआरिफ़ संस्था, क़ुम, पहला संस्करण, 1413 हिजरी।
- शाहरूदी, सय्यद महमूद हाशिमी की निगरानी में शोधकर्ताओं का समूह, फ़रहंगे फ़िक़्ह मुताबिक़े मज़हबे अहले-बैत (अ), क़ुम, मज़हबे अहले-बैत (अ) के अनुसार इस्लामी फ़िक़्ह विश्वकोश संस्था, 1426 हिजरी।
- शुबैरी ज़ंजानी, सय्यद मूसा, किताबे निकाह, क़ुम, राए-पर्दाज़ शोध संस्था, पहला संस्करण, 1419 हिजरी।
- सदूक़, मुहम्मद बिन अली, इललुश-शराए, नजफ़, हैदरिय्या प्रकाशन संस्थान, प्रकाशित वर्ष उपलब्ध नहीं।
- सदूक़, मुहम्मद बिन अली, उयूनु अख़बारिर-रिज़ा (अ), तेहरान, जहाँ प्रकाशन, पहला संस्करण, 1378 हिजरी।
- सब्ज़वारी, सय्यद अब्दुल-आला, मुहज़्ज़बुल-अहकाम, क़ुम, अल-मनार संस्था, चौथा संस्करण, 1413 हिजरी।
- सरख़सी, मुहम्मद बिन अहमद, अल-मबसूत, बेरूत, दारुल-मआरिफ़ा संस्थान, 1414 हिजरी/ 1993 ईस्वी।
