सामग्री पर जाएँ

प्रारूप:ख़ुत्बा ए फ़दकिया

wikishia से
यह लेख ख़ुत्बा ए फ़दकिया इन लेखो से संबंधित है।
ख़ुत्बा ए फ़दकिया
फ़दकिया उपदेश का एक अंश, मोहसिन एबादी की ख़ुशनवीसी में।
अन्य नामख़ुत्बा ए लुम्मा
विषयअल्लाह की प्रशंसा, अहकाम का दर्शन, फ़दक पर क़ब्ज़ा, ख़िलाफ़त पर क़ब्ज़ा
किस से नक़्ल हुईहज़रत फ़ातिमा (स)
कथावाचकइमाम हसन (अ), इमाम हुसैन (अ), ज़ैनब (स), इमाम बाक़िर (अ), इमाम सादिक़ (अ), आयशा, अब्दुल्लाह बिन अब्बास, अन्य...
दस्तावेज़ की वैधतामुत्वातिर,
शिया स्रोतमन ला यहज़रोहुल फ़क़ीह, बिहारुल अनवार
सुन्नी स्रोतबलाग़ातुन निसा, शरहे नजहुल बलाग़ा इब्ने अबी अल हदीद
प्रसिद्ध हदीसें
हदीस सिलसिला अल ज़हब • हदीस सक़लैन • हदीसे किसा • मक़बूला ए उमर बिन हंज़ला • हदीसे क़ुर्बे नवाफ़िल • हदीसे मेराज • हदीसे वेलायत • हदीसे वेसायत

ख़ुत्बा ए फ़दकिया या ख़ुत्बा-ए-लुम्मा हज़रत फ़ातिमा (स) द्वारा मस्जिद-ए-नबवी में दिया गया वह प्रसिद्ध उपदेश है, जो उन्होंने फ़दक पर क़ब्ज़ा किए जाने के विरोध में दिया था। अबू बक्र के ख़िलाफ़त पर आसीन होने के बाद, पैग़म्बर मुहम्मद (स) से संबंधित एक हदीस का हवाला देते हुए कहा कि पैग़म्बर अपनी विरासत नहीं छोड़ते। फ़दक नामक गाँव, जिसे पैग़म्बर (स) ने हज़रत फ़ातिमा (स) को प्रदान किया था, ख़िलाफ़त के अधीन कर लिया गया। अपने अधिकार की माँग के लिए किए गए प्रयासों के निष्फल होने के बाद हज़रत फ़ातिमा (स) मस्जिद-ए-नबवी पहुँचीं और वहाँ एक प्रभावशाली उपदेश दिया, जो आगे चलकर “फ़दकिया उपदेश” (ख़ुत्बा ए फ़दकिया) के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस उपदेश में उन्होंने फ़दक पर अपने स्वामित्व और अधिकार को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया। साथ ही उन्होंने हज़रत अली (अ) के ख़िलाफ़त के अधिकार का समर्थन किया और अहले बैत (अ) पर हुए अत्याचार के सामने चुप रहने के लिए मुसलमानों की आलोचना की।

फ़दकिया उपदेश में इस्लामी शिक्षाओं और गहन धार्मिक विचारों का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसमें ईश्वर का जानना, पुनरुत्थान का जानना, नबूवत और पैग़म्बर मुहम्मद (स) की बेअसत, क़ुरआन की महानता, शरीअत के आदेशों की दार्शनिक व्याख्या तथा विलायत जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई है।

इस उपदेश का उल्लेख शिया और सुन्नी दोनों समुदायों के ग्रंथों और स्रोतों में मिलता है। सय्यद इज़्ज़ुद्दीन हुसैनी ज़ंजानी, हुसैन अली मुन्तज़ेरी, मुज्तबा तेहरानी, नासिर मकारिम शिराज़ी, ख़लील कुमरेई और मुहम्मद तक़ी मिस्बाह यज़्दी जैसे अनेक शिया विद्वानों और न्यायविदों ने इस उपदेश की विस्तृत व्याख्याएँ लिखी हैं।

उपदेश का महत्व और स्थान

फ़दकिया उपदेश में हज़रत फ़ातिमा (स) के राजनीतिक विचारों का वर्णन मिलता है, जिसमें उन्होंने तत्कालीन शासन व्यवस्था की आलोचना की और फ़दक तथा ख़िलाफ़त से संबंधित निर्णयों पर आपत्ति जताई।[१] इस उपदेश में इस बात पर विशेष ज़ोर दिया गया है कि अहले बैत (अ) की इमामत और विलायत को स्वीकार करते हुए मुस्लिम समाज में एकता स्थापित की जाए तथा आपसी मतभेद और पाखंड से बचा जाए।[२] इस उपदेश में एकेश्वरवाद, मआद, नबूवत और पैग़म्बर मुहम्मद (स) की बेअसत, क़ुरआन की महानता, इस्लामी आदेशों की दार्शनिक व्याख्या और विलायत[३] जैसे गहन धार्मिक विषयों का समावेश होने के कारण इसे हज़रत फ़ातिमा (स) की बहुमूल्य धार्मिक विरासतों में से एक माना गया है।[४]

उपदेश की उत्कृष्टता और प्रभावशाली शैली के दृष्टिकोण से फ़दकिया उपदेश को हज़रत अली (अ) के उपदेशो के समान माना गया है।[५] वक्तृत्व कला के प्रसिद्ध तार्किक और भाषण संबंधी मानकों का इसमें प्रयोग भी इसकी विशेषताओं में गिना जाता है।[६] इसी कारण इब्ने तैयफ़ूर ने अपनी पुस्तक बलाग़ातुन निसा में इसे उच्च स्तर की वाक्पटुता और प्रभावशाली भाषणों में शामिल किया है।[७]

फ़दकिया उपदेश को मुस्लिम महिलाओं के लिए सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना जायज़ होने के प्रमाण के रूप मे भी उपयोग किया जाता है।[८] इसके अलावा, हज़रत फ़ातिमा (स) के उपदेश देने के लिए मस्जिद में आने के वर्णन से कई महत्वपूर्ण बातें समझी गई हैं। जैसे इस्लामी पर्दा महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भागीदारी में बाधा नहीं है। हज़रत फ़ातिमा (स) का वस्त्र इतना लंबा था कि उनके पैर ढक जाते थे और चलते समय उसका किनारा ज़मीन को छूता था। उन्होंने पैग़म्बर मुहम्मद (स) को अपने विचारों, आध्यात्मिक जीवन और व्यवहार हर स्तर पर अपना आदर्श बनाया था।[९]

शिया न्यायविद और मरज-ए-तक़लीद अब्दुल्लाह जवादी आमोली के अनुसार, हज़रत ज़हरा (स) जैसे महान व्यक्तित्वों के उपदेश को धार्मिक शिक्षण संस्थानों में औपचारिक पाठ्यक्रम के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए।[१०]

उपदेश देने का उद्देश्य: विलायत और इमामत का बचाव

पैग़म्बर मुहम्मद (स) के स्वर्गवास पश्चात अबू बक्र ने पैग़म्बर (स) से संबंधित एक हदीस का हवाला देते हुए यह दावा किया कि हम पैग़म्बर विरासत नहीं छोड़ते।[११] इसी आधार पर उन्होंने फ़दक नामक गाँव को, जिसे पैग़म्बर (स) ने «وَآتِ ذَا الْقُرْ‌بَیٰ حَقَّهُ और रिश्तेदार को उसका हक़ दो»[१२] आयत के नाज़िल होने के बाद हज़रत फ़ातिमा (स) को प्रदान किया था[१३] और जो उस समय हज़रत फ़ातिमा (स) के अधिकार में था,[१४] ख़िलाफ़त के हित में अपने अधीन कर लिया।[१५] हज़रत फ़ातिमा (स) ने यह साबित करने के लिए कि फ़दक विरासत नहीं बल्कि पैग़म्बर (स) द्वारा दिया गया उपहार था, हज़रत अली (अ) और उम्मे ऐमन को अपने दावे के समर्थन में गवाह के रूप में प्रस्तुत किया।[१६] कुछ वर्णनों के अनुसार, अबू बक्र ने एक दस्तावेज़ में फ़दक पर हज़रत फ़ातिमा (स) के स्वामित्व की पुष्टि की, लेकिन उमर इब्ने ख़त्ताब ने उस दस्तावेज़ को फाड़ दिया।[१७] कुछ सुन्नी स्रोतों के अनुसार, अबू बक्र ने हज़रत फ़ातिमा (स) के गवाहों को स्वीकार नहीं किया और इसके लिए दो पुरुष गवाहों की माँग की।[१८] शिया न्यायविद आयतुल्लाह नासिर मकारिम शिराज़ी के अनुसार, ख़लीफ़ाओं ने फ़दक को इसलिए अपने अधिकार में लिया ताकि यह आर्थिक साधन हज़रत अली (अ) और उनके परिवार के लिए शक्ति का आधार न बन सके।[१९]

सय्यद मुहम्मद बाक़िर सद्र ने अपनी पुस्तक फ़दक फ़िल-तारीख़ में लिखा है कि फ़दक की माँग केवल कोई व्यक्तिगत मामला या आर्थिक विवाद नहीं था, बल्कि यह तत्कालीन शासन के विरुद्ध एक प्रकार की आपत्ति थी और सत्ता की बुनियादों, अर्थात् सक़ीफ़ा में लिए गए निर्णयों को चुनौती देने का एक माध्यम था।[२०] उनके अनुसार, फ़दक की माँग हज़रत फ़ातिमा (स) के शासन व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन की शुरुआत और इमामत तथा विलायत के बचाव के महत्वपूर्ण चरणों में से एक थी।[२१] जब हज़रत फ़ातिमा (स) ने देखा कि फ़दक के संबंध में उनकी माँग का कोई परिणाम नहीं निकल रहा है, तो वे अपने कुछ रिश्तेदारों की महिलाओं के साथ मस्जिद ए नबवी में गईं।[२२] इब्ने तैयफ़ूर ने अपनी पुस्तक बलाग़ातुन निसा में वर्णन किया है कि जब हज़रत फ़ातिमा (स) मस्जिद पहुँचीं, तो अबू बक्र और मुहाजिरों तथा अंसार का एक समूह वहाँ मौजूद था। हज़रत फ़ातिमा (स) और वहाँ उपस्थित लोगों के बीच एक पर्दा लगा दिया गया। पैग़म्बर (स) की पुत्री ने पहले एक दर्द भरी आह भरी, जिसे सुनकर वहाँ मौजूद लोग रोने लगे। फिर वे कुछ देर मौन रहीं ताकि लोग शांत हो जाएँ, और इसके बाद उन्होंने अपना उपदेश आरंभ किया।[२३] चूँकि यह उपदेश फ़दक को अपने अधिकार से बाहर किए जाने की घटना के विरोध में और उसी संदर्भ में दिया गया था, इसलिए इसे फ़दकिया उपदेश कहा गया।[२४] क्योंकि हज़रत फ़ातिमा (स) उपदेश देने से पहले अपने कुछ परिजनों के साथ मस्जिद में आई थीं, इसलिए इस उपदेश को ख़ुत्बा-ए-लुम्मा भी कहा जाता है।[२५]

उपदेश की प्रमाणिकता

अल्लामा मजलिसी ने फ़दकिया उपदेश को उन प्रसिद्ध उपदेशो में शामिल किया है, जिन्हें शिया और सुन्नी दोनों विद्वानों ने विभिन्न प्रमाणों और स्रोतों के माध्यम से उद्धृत किया है।[२६] शेख़ सदूक़ ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक मन ला यहज़ुरोहुल फ़क़ीह में इस उपदेश के एक भाग को उद्धृत किया है।[२७] हुसैन अली मुन्तज़ेरी के अनुसार, इस उपदेश का सबसे पुराना स्रोत अहले सुन्नत के विद्वान इब्ने तैयफ़ूर (204–280 हिजरी) की पुस्तक बलाग़ातुन निसा है। इब्ने तैयफ़ूर का जीवनकाल इमाम हादी (अ) और इमाम हसन अस्करी (अ) के दौर से संबंधित था।[२८] इब्ने तैयफ़ूर ने इस उपदेश को दो अलग-अलग रिवायतों के रूप में दर्ज किया है।[२९] हालांकि, सय्यद जाफ़र शहीदी के अनुसार, बाद के स्रोतों में इन दोनों वर्णनों को आपस में मिला दिया गया और एक ही रूप में प्रस्तुत किया गया।[३०] फ़दकिया उपदेश के लिए 16 से अधिक स्रोतों का उल्लेख मिलता है।[३१]

कहा गया है कि इमाम हसन (अ), इमाम हुसैन (अ), हज़रत ज़ैनब (स), इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ), इमाम जाफ़र सादिक़ (अ), आयशा और अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास जैसे व्यक्तित्व इस उपदेश के वर्णन करने वाले कथाकारो में शामिल हैं।[३२]

उपदेश की सामग्री

फ़दकिया उपदेश की शुरुआत अल्लाह की प्रशंसा और उसकी महान विशेषताओं के वर्णन से होती है। इसके बाद इसमें पैग़म्बर मुहम्मद (स) की बेअसत के उद्देश्य का उल्लेख किया गया है। उसके बाद हज़रत अली (अ) के पैग़म्बर (स) से निकट संबंध, ईश्वरीय प्रतिनिधियों में उनके विशेष स्थान और पैग़म्बर (स) तथा इस्लाम की रक्षा में उनकी अद्वितीय वीरता का वर्णन मिलता है। इस उपदेश में हज़रत फ़ातिमा (स) ने उन सहाबा की आलोचना की है, जिन्होंने पैग़म्बर (स) के स्वर्गवास पश्चात सत्य से दूरी बना ली, शैतान के प्रभाव में आ गए और उनके बीच कपट और दोहरा व्यवहार प्रकट होने लगा। इस उपदेश में ख़िलाफ़त हड़पने की घटना का भी उल्लेख है। अबू बक्र द्वारा प्रस्तुत कथन पैग़म्बर विरासत नहीं छोड़ते को क़ुरआन की कुछ आयतों के विपरीत बताया गया है। हज़रत फ़ातिमा (स) ने उपदेश में अबू बक्र के मामले को क़यामत के दिन अल्लाह की अदालत के हवाले किया और पैग़म्बर (स) के साथियों को संबोधित करते हुए पूछा कि वे इन अत्याचारों के सामने मौन क्यों बैठे रहे। उन्होंने कहा कि उन्होंने जो कुछ किया है, वह पैग़म्बर (स) के साथ किए गए अपने वचन को तोड़ना है। उपदेश के अंतिम भाग में उन्होंने उनके इस कार्य को ऐसा कलंक बताया जो हमेशा के लिए रहेगा और इसके परिणाम को दोज़ख़ (नरक) बताया।[३३]

फ़दकिया उपदेश का पाठ और अनुवाद

पाठ
पाठ और अनुवाद
अनुवाद

اَلْحَمْدُللَّـهِ عَلی ما اَنْعَمَ، وَ لَهُ الشُّكْرُ عَلی ما اَلْهَمَ، وَ الثَّناءُ بِما قَدَّمَ، مِنْ عُمُومِ نِعَمٍ اِبْتَدَاَها، وَ سُبُوغِ الاءٍ اَسْداها، وَ تَمامِ مِنَنٍ اَوْلاها، جَمَّ عَنِ الْاِحْصاءِ عَدَدُها، وَ نَأی عَنِ الْجَزاءِ اَمَدُها، وَ تَفاوَتَ عَنِ الْاِدْراكِ اَبَدُها، وَ نَدَبَهُمْ لاِسْتِزادَتِها بِالشُّكْرِ لاِتِّصالِها، وَ اسْتَحْمَدَ اِلَی الْخَلائِقِ بِاِجْزالِها، وَ ثَنی بِالنَّدْبِ اِلی اَمْثالِها.

अल्हमदो लिल्लाहे अला मा अन्अमा, वलहुश शुक्रो अला मा अलहमा, वस सनाओ बेमा कद्दमा, मिन उमूमे नेअमिन इब्तदाहा, व सूबूग़िल अस असदाहा, व तमामे मेननिन ओलाहा, जम्मा अनिल एहसा ए अददोहा, व नाया अनिल जज़ाए अमदोहा, व तफ़ावता अनिल इदराके अबदोहा, व नदबहुम लेइस्तेज़ादतेहा बिश्शुक्रे ले इत्तेसालेहा, वस्तहमदा एलल ख़लाएक़े बेइजज़ालेहा, व सना बिन्नदबे एला अमसालेहा

وَ اَشْهَدُ اَنْ لااِلهَ اِلاَّ اللَّـهُ وَحْدَهُ لاشَریكَ لَهُ، كَلِمَةٌ جَعَلَ الْاِخْلاصَ تَأْویلَها، وَ ضَمَّنَ الْقُلُوبَ مَوْصُولَها، وَ اَنارَ فِی التَّفَكُّرِ مَعْقُولَها، الْمُمْتَنِعُ عَنِ الْاَبْصارِ رُؤْیتُهُ، وَ مِنَ الْاَلْسُنِ صِفَتُهُ، وَ مِنَ الْاَوْهامِ كَیفِیّتُهُ

व अश्हदु अन ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीक लहू, कलिमतुन जअलल इख़्लासा तअवीलहा, व ज़म्मनल क़ुलूबा मौसूलहा, व अनारा फ़ित-तफ़क्कुरे मअक़ूलहा, अल-मुम्तनिउ अनिल-अब्सारे रुईयतूहु, व मिनल-अल्सुने सिफ़तूहु, व मिनल-अवहामे कैफ़िय्यतूहु।

اِبْتَدَعَ الْاَشْیاءَ لامِنْ شَیءٍ كانَ قَبْلَها، وَ اَنْشَاَها بِلاَاحْتِذاءِ اَمْثِلَةٍ اِمْتَثَلَها، كَوَّنَها بِقُدْرَتِهِ وَ ذَرَأَها بِمَشِیّتِهِ، مِنْ غَیرِ حاجَةٍ مِنْهُ اِلی تَكْوینِها، وَ لافائِدَةٍ لَهُ فی تَصْویرِها، اِلاَّ تَثْبیتاً لِحِكْمَتِهِ وَ تَنْبیهاً عَلی طاعَتِهِ، وَ اِظْهاراً لِقُدْرَتِهِ وَ تَعَبُّداً لِبَرِیّتِهِ، وَ اِعْزازاً لِدَعْوَتِهِ، ثُمَّ جَعَلَ الثَّوابَ عَلی طاعَتِهِ، وَ وَضَعَ الْعِقابَ عَلی مَعْصِیتِهِ، ذِیادَةً لِعِبادِهِ مِنْ نِقْمَتِهِ وَ حِیاشَةً لَهُمْ اِلی جَنَّتِهِ

इब्तदअल-अश्या-ला-मिन शैइन काना क़ब्लहा, व अन्शअहा बिला-इहतिज़ाइ अम्सिलतिन इम्तसिलहा, कव्वनहा बेक़ुदरतेही व ज़रअहा बिमशिय्यतेही, मिन ग़ैरे हाजतिन मिन्हो इला तक्वीनेहा, व ला फ़ाइदतिन लहू फ़ी तस्वीरेहा, इल्ला तस्बीतन लिहिकमतेही व तम्बीहन अला ताअतेही, व इज़्हारन लिक़ुदरतेही व तअब्बुदन लेबरिय्यतेही, व इअज़ाज़न लेदअवतेही, सुम्मा जअलस्सवाबा अला ताअतेही, व वज़अल-इक़ाबा अला मअसियतेही, ज़ियादतन लि-इबादेही मिन निक़मतेही व हियाशतन लहुम इला जन्नतेही।

وَ اَشْهَدُ اَنَّ اَبی مُحَمَّداً عَبْدُهُ وَ رَسُولُهُ، اِخْتارَهُ قَبْلَ اَنْ اَرْسَلَهُ، وَ سَمَّاهُ قَبْلَ اَنْ اِجْتَباهُ، وَ اصْطَفاهُ قَبْلَ اَنْ اِبْتَعَثَهُ، اِذ الْخَلائِقُ بِالْغَیبِ مَكْنُونَةٌ، وَ بِسَتْرِ الْاَهاویلِ مَصُونَةٌ، وَ بِنِهایةِ الْعَدَمِ مَقْرُونَةٌ، عِلْماً مِنَ اللَّـهِ تَعالی بِمائِلِ الْاُمُورِ، وَ اِحاطَةً بِحَوادِثِ الدُّهُورِ، وَ مَعْرِفَةً بِمَواقِعِ الْاُمُورِ.

व अश्हदो अन्ना अबी मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू, इख़्तारहू क़ब्ला अन अर्सलहू, व सम्माहु क़ब्ला अन इज्तबाहू, वस्तफ़ाहू क़ब्ला अन इब्तअसहू, इज़िल-ख़लाइक़ु बिल-ग़ैबे मक्नूनतुन, व बिसित्रिल-अहावीले मसूनतुन, व बेनेहायतिल-अदमे मक़रूनतुन, इल्मन मिनल्लाहे तआला बेमाइलिल-उमूरे, व इहाततन बेहवादिसिद-दुहूरे, व मअरेफ़तन बिमवाक़ेअिल-उमूर।

اِبْتَعَثَهُ اللَّـهُ اِتْماماً لِاَمْرِهِ، وَ عَزیمَةً عَلی اِمْضاءِ حُكْمِهِ، وَ اِنْفاذاً لِمَقادیرِ رَحْمَتِهِ، فَرَأَی الْاُمَمَ فِرَقاً فی اَدْیانِها، عُكَّفاً عَلی نیرانِها، عابِدَةً لِاَوْثانِها، مُنْكِرَةً للَّـهِ مَعَ عِرْفانِها.

इब्तअसहुल्लाहो इत्मामन लेअम्रिही, व अज़ीमतन अला इमज़ाए हुक्मेही, व इन्फ़ाज़न लेमक़ादीरे रहमतेही, फ़राअल-उममा फ़ेरक़न फ़ी अदयानेहा, उक्कफ़न अला नीरानेहा, आबेदतन लिऔसानेहा, मुन्किरतन लिल्लाहे मअ इरफ़ानेहा।

فَاَنارَ اللَّـهُ بِاَبی مُحَمَّدٍ صَلَّی اللَّـهُ عَلَیهِ و الِهِ ظُلَمَها، وَ كَشَفَ عَنِ الْقُلُوبِ بُهَمَها، وَ جَلی عَنِ الْاَبْصارِ غُمَمَها، وَ قامَ فِی النَّاسِ بِالْهِدایةِ، فَاَنْقَذَهُمْ مِنَ الْغِوایةِ، وَ بَصَّرَهُمْ مِنَ الْعِمایةِ، وَ هَداهُمْ اِلَی الدّینِ الْقَویمِ، وَ دَعاهُمْ اِلَی الطَّریقِ الْمُسْتَقیمِ.

फ़अनारल्लाहु बेअबी मुहम्मदिन् सल्लल्लाहु अलैहे व आलिही ज़ुलमहा़, व कशफ़ा अनिल-क़ुलूबे बुहमहा, व जल्ला अनिल-अब्सारे ग़ुममहा़, व क़ामा फ़िन्नासे बिल-हिदायते, फ़अन्क़ज़हुम मिनल-ग़ेवायते, व बस्सरहुम मिनल-इमायते, व हदाहुम इला अद-दीनिल-क़वीमे, व दआहुम इला अत-तरीक़िल-मुस्तक़ीम।

ثُمَّ قَبَضَهُ اللَّـهُ اِلَیهِ قَبْضَ رَأْفَةٍ وَ اخْتِیارٍ، وَ رَغْبَةٍ وَ ایثارٍ، فَمُحَمَّدٌ صَلَّی اللَّـهُ عَلَیهِ و الِهِ مِنْ تَعَبِ هذِهِ الدَّارِ فی راحَةٍ، قَدْ حُفَّ بِالْمَلائِكَةِ الْاَبْرارِ وَ رِضْوانِ الرَّبِّ الْغَفَّارِ، وَ مُجاوَرَةِ الْمَلِكِ الْجَبَّارِ، صَلَّی اللَّـهُ عَلی أَبی نَبِیهِ وَ اَمینِهِ وَ خِیرَتِهِ مِنَ الْخَلْقِ وَ صَفِیهِ، وَ السَّلامُ عَلَیهِ وَ رَحْمَةُاللَّـهِ وَ بَرَكاتُهُ.

सुम्मा क़बज़हुल्लाहु इलैहे क़ब्ज़ रअफ़तिन व इख़्तियार, व रग़्बतिन व ईसार, फ़मुहम्मदुन सल्लल्लाहु अलैहे व आलेही मिन तअबे हाज़ेहिद-दारे फ़ी राहतिन, क़द हुफ़्फ़ा बिल-मलाइकतिल-अबरारे व रिज़्वानिर-रब्बिल-ग़फ़्फ़ारे, व मुजावरतिल-मलेकिल-जब्बारे, सल्लल्लाहु अला अबी नबिय्यिहि व अमीनेही व ख़ीरतेही मिनल-ख़ल्क़े व सफ़िय्येही, वस्सलामो अलैहि व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु।

اَنْتُمْ عِبادَ اللَّـهِ نُصُبُ اَمْرِهِ وَ نَهْیهِ، وَ حَمَلَةُ دینِهِ وَ وَحْیهِ، وَ اُمَناءُ اللَّـهِ عَلی اَنْفُسِكُمْ، وَ بُلَغاؤُهُ اِلَی الْاُمَمِ، زَعیمُ حَقٍّ لَهُ فیكُمْ، وَ عَهْدٍ قَدَّمَهُ اِلَیكُمْ، وَ بَقِیةٍ اِسْتَخْلَفَها عَلَیكُمْ:

अन्तुम इबादल्लाहे नुसुबु अम्रेही व नह्येही, व हमलतु दीनेही व वह्येही, व उमनाउल्लाहे अला अन्फ़ुसिकुम, व बुलग़ाउहु एलल-उममे, ज़ईमु हक़्क़िन लहू फ़ीकुम, व अह्दिन क़द्दमहु इलैकुम, व बक़िय्यतिन इस्तख़लफ़हा अलैकुम:

كِتابُ اللَّـهِ النَّاطِقُ وَ الْقُرْانُ الصَّادِقُ، و النُّورُ السَّاطِعُ وَ الضِّیاءُ اللاَّمِعُ، بَینَةً بَصائِرُهُ، مُنْكَشِفَةً سَرائِرُهُ، مُنْجَلِیةً ظَواهِرُهُ، مُغْتَبِطَةً بِهِ اَشْیاعُهُ، قائِداً اِلَی الرِّضْوانِ اِتِّباعُهُ، مُؤَدٍّ اِلَی النَّجاةِ اسْتِماعُهُ، بِهِ تُنالُ حُجَجُ اللَّـهِ الْمُنَوَّرَةُ، وَ عَزائِمُهُ الْمُفَسَّرَةُ، وَ مَحارِمُهُ الْمُحَذَّرَةُ، وَ بَیّناتُهُ الْجالِیةُ، وَ بَراهینُهُ الْكافِیةُ، وَ فَضائِلُهُ الْمَنْدُوبَةُ، وَ رُخَصُهُ الْمَوْهُوبَةُ، وَ شَرائِعُهُ الْمَكْتُوبَةُ.

किताबुल्लाहिन-नातेक़ो वल-क़ुरआनुस-सादिक़, वन्नूरुस्सातिउ वज़्ज़ियाउल्लामिउ, बय्यिनतन बसाइरुहु, मुन्कशिफ़तन सराइरुहु, मुन्जलियतन ज़वाहिरुहु, मुग़्तबिततन बेही अशयाउहु, क़ाइदन इलर रिज़ावाने इत्तिबाउहु, मुअद्दिन इलन नजाते इस्तिमाउहु, बेही तुनालु हुज्जजुल्लाहिल-मुनव्वरतु, व अज़ाइमुहुल-मुफ़स्सरतु, व मह़ारिमुहुल-मुहज़्ज़रतु, व बय्यिनातुहुल-जालियतु, व बराहीनुहुल-काफ़ियतु, व फ़ज़ाइलुहुल-मन्दूबतु, व रुख़सूहुल-मौहूबतु, व शराइउहुल-मक्तूबतु।

فَجَعَلَ اللَّـهُ الْایمانَ تَطْهیراً لَكُمْ مِنَ الشِّرْكِ، وَ الصَّلاةَ تَنْزیهاً لَكُمْ عَنِ الْكِبْرِ، وَ الزَّكاةَ تَزْكِیةً لِلنَّفْسِ وَ نِماءً فِی الرِّزْقِ، وَ الصِّیامَ تَثْبیتاً لِلْاِخْلاصِ، وَ الْحَجَّ تَشْییداً لِلدّینِ، وَ الْعَدْلَ تَنْسیقاً لِلْقُلُوبِ، وَ طاعَتَنا نِظاماً لِلْمِلَّةِ، وَ اِمامَتَنا اَماناً لِلْفُرْقَةِ، وَ الْجِهادَ عِزّاً لِلْاِسْلامِ، وَ الصَّبْرَ مَعُونَةً عَلَی اسْتیجابِ الْاَجْرِ.

फ़जअलल्लाहुल-ईमाना ततहीरन लकुम मिनश-शिर्के, वस्सलाता तन्ज़ीहन लकुम अनिल-किब्रे, वज़्ज़काता तज़्कियतन लिन्नफ़्से व नोमाअन फ़िर्रिज़्क़े, वस्सेयामा तस्बीतन लिल-इख़्लासे, वल-हज्जा तशयीदन लिद्दीने, वल-अद्ला तन्सीक़न लिल-क़ुलूबे, व ताअतना नेज़ामन लिल-मिल्लते, व इमामतना अमानन लिल-फ़ुर्क़ते, वल-जिहादा इज़्ज़न लिल-इस्लामे, वस्सब्रा मऊनतन अला इस्तीजाबिल-अज्र।

وَ الْاَمْرَ بِالْمَعْرُوفِ مَصْلِحَةً لِلْعامَّةِ، وَ بِرَّ الْوالِدَینِ وِقایةً مِنَ السَّخَطِ، وَ صِلَةَ الْاَرْحامِ مَنْساءً فِی الْعُمْرِ وَ مَنْماةً لِلْعَدَدِ، وَ الْقِصاصَ حِقْناً لِلدِّماءِ، وَ الْوَفاءَ بِالنَّذْرِ تَعْریضاً لِلْمَغْفِرَةِ، وَ تَوْفِیةَ الْمَكائیلِ وَ الْمَوازینِ تَغْییراً لِلْبَخْسِ.

वल-अम्रा बिल-मअरूफ़े मस्लहतन लिल-आम्मते, व बिर्रल-वालिदैने वेक़ायतन मिनस्सख़ते, व सिलतल-अर्हामे मन्सअतन फ़िल-उम्रे व मन्मातन लिल-अददे, वल-क़िसासा हिक़्नन लिद्देमाइ, वल-वफ़ा बिन्नज़्रे तअरीज़न लिल-मग़फ़िरते, व तौफ़ियतल-मकायीले वल-मवाज़ीने तग़यीरन लिल-बख़्से।

وَ النَّهْی عَنْ شُرْبِ الْخَمْرِ تَنْزیهاً عَنِ الرِّجْسِ، وَ اجْتِنابَ الْقَذْفِ حِجاباً عَنِ اللَّـعْنَةِ، وَ تَرْكَ السِّرْقَةِ ایجاباً لِلْعِصْمَةِ، وَ حَرَّمَ اللَّـهُ الشِّرْكَ اِخْلاصاً لَهُ بِالرُّبوُبِیةِ.

वन-नह्ये अन शुरबिल-ख़म्रे तन्ज़ीहन अनिर-रिज्से, वज्तिनाबल-क़ज़्फ़े हिजाबन अनिल-लानते, व तर्कस्सिरक़ते ईजाबन लिल-इस्मते, व हर्रमल्लाहुश-शिर्का इख़्लासन लहू बिर्रुबूबियते।

فَاتَّقُوا اللَّـهَ حَقَّ تُقاتِهِ، وَ لاتَمُوتُنَّ اِلاَّ وَ اَنْتُمْ مُسْلِمُونَ، وَ اَطیعُوا اللَّـهَ فیما اَمَرَكُمْ بِهِ وَ نَهاكُمْ عَنْهُ، فَاِنَّهُ اِنَّما یخْشَی اللَّـهَ مِنْ عِبادِهِ الْعُلَماءُ. ثم قالت: .

फ़त्तक़ुल्लाहा हक़्क़ा तुक़ातेही, व ला तमूतुन्ना इल्ला व अन्तुम मुस्लिमून, व अतीउल्लाहा फ़ीमा अमरकुम बेही व नहाकुम अन्हो, फ़इन्नहू इन्नमा यख़्शल्लाहा मिन इबादेहिल-उलमा। सुम्म क़ालत:

اَیهَا النَّاسُ! اِعْلَمُوا اَنّی فاطِمَةُ وَ اَبی مُحَمَّدٌ، اَقُولُ عَوْداً وَ بَدْءاً، وَ لااَقُولُ ما اَقُولُ غَلَطاً، وَ لااَفْعَلُ ما اَفْعَلُ شَطَطاً، لَقَدْ جاءَكُمْ رَسُولٌ مِنْ اَنْفُسِكُمْ عَزیزٌ عَلَیهِ ما عَنِتُّمْ حَریصٌ عَلَیكُمْ بِالْمُؤْمِنینَ رَؤُوفٌ رَحیمٌ.

अय्युहन-नासो! एअलमू अन्नी फ़ातिमतो व अबी मुहम्मदुन, अक़ूलु औदन व बद्अन, व ला अक़ूलु मा अक़ूलु ग़लतन, व ला अफ़अलो मा अफ़अलो शततन, लक़द जाअकुम रसूलुन मिन अन्फ़ुसेकुम अज़ीज़ुन अलैहे मा अनित्तुम, हरीसुन अलैकुम बिल-मुोमेनीना रऊफ़ुर्रहीम।

فَاِنْ تَعْزُوهُ وَتَعْرِفُوهُ تَجِدُوهُ اَبی دُونَ نِسائِكُمْ،وَ اَخَا ابْنِ عَمّی دُونَ رِجالِكُمْ، وَ لَنِعْمَ الْمَعْزِی اِلَیهِ صَلَّی اللَّـهُ عَلَیهِ وَ الِهِ..

फ़इन तअज़ूहु व तअरिफ़ूहु तजिदूहु अबी दूना निसाइकुम, व अख़ा इब्ने अम्मी दूना रि‍जालिकुम, व लनेअ्मल-मअज़िय्यु इलैहे सल्लल्लाहु अलैहे व आलेही।

فَبَلَّغَ الرِّسالَةَ صادِعاً بِالنَّذارَةِ، مائِلاً عَنْ مَدْرَجَةِ الْمُشْرِكینَ، ضارِباً ثَبَجَهُمْ، اخِذاً بِاَكْظامِهِمْ، داعِیاً اِلی سَبیلِ رَبِّهِ بِالْحِكْمَةِ و الْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ، یجُفُّ الْاَصْنامَ وَ ینْكُثُ الْهامَّ، حَتَّی انْهَزَمَ الْجَمْعُ وَ وَ لَّوُا الدُّبُرَ.

फ़बल्लगर्रिसालत सादिअन बिन्नज़ारते, माइ़लन अन मदरजतिल-मुश्रिकीन, ज़ारिबन सबजहुम, आख़ेज़न बिअक़्ज़ामिहिम, दाइयन इला सबीले रब्बेही बिल-हिक्मते वल-मौइज़तिल-हसनते, यजुफ़्फ़ुल-अस्नाम व यनकुसुल-हाम्म, हत्ता इनहज़मल-जम्उ व वल्लुद-दुबुर।

حَتَّی تَفَرَّی اللَّـیلُ عَنْ صُبْحِهِ، وَ اَسْفَرَ الْحَقُّ عَنْ مَحْضِهِ، و نَطَقَ زَعیمُالدّینِ، وَ خَرَسَتْ شَقاشِقُ الشَّیاطینِ، وَ طاحَ وَ شیظُ النِّفاقِ، وَ انْحَلَّتْ عُقَدُ الْكُفْرِ وَ الشَّقاقِ، وَ فُهْتُمْ بِكَلِمَةِ الْاِخْلاصِ فی نَفَرٍ مِنَ الْبیضِ الْخِماصِ.

हत्ता तफ़र्रल-लैलो अन सुबहेही, व अस्फ़रल-हक़्क़ो अन मह़्ज़ेही, व नतक़ ज़ईमुद्दीने, व ख़रसत शक़ाशेक़ुश-शयातीन, व ताहा वश़ीज़ुन-निफ़ाक़े, वन्हल्लत उक़दुल-कुफ़्रे वश्शिक़ाक़े, व फ़ुहतुम बिकलिमतिल-इख़्लासे फ़ी नफ़रिन मिनल-बैज़िल-ख़ेमासे।

وَ كُنْتُمْ عَلی شَفا حُفْرَةٍ مِنَ النَّارِ، مُذْقَةَ الشَّارِبِ، وَ نُهْزَةَ الطَّامِعِ، وَ قُبْسَةَ الْعِجْلانِ، وَ مَوْطِیءَ الْاَقْدامِ، تَشْرَبُونَ الطَّرْقَ، وَ تَقْتاتُونَ الْقِدَّ، اَذِلَّةً خاسِئینَ، تَخافُونَ اَنْ یتَخَطَّفَكُمُ النَّاسُ مِنْ حَوْلِكُمْ، فَاَنْقَذَكُمُ اللَّـهُ تَبارَكَ وَ تَعالی بِمُحَمَّدٍ صَلَّی اللَّـهُ عَلَیهِ وَ الِهِ بَعْدَ اللَّـتَیا وَ الَّتی، وَ بَعْدَ اَنْ مُنِی بِبُهَمِ الرِّجالِ، وَ ذُؤْبانِ الْعَرَبِ، وَ مَرَدَةِ اَهْلِ الْكِتابِ.

व कुंतुम अला शफ़ा हुफ़्रतिन मिनन-नारे, मुज़्क़तश-शारिबे, व नुह्ज़तत-तामिए, व क़ुब्सतल-इजलाने, व मव्तिअल-अक़्दामे, तशरबूनत-तर्क़ा, व तक़्तातूनल-क़िद्दा, अज़िल्लतन ख़ासिईन, तख़ाफ़ूना अय्यतख़तफ़कुमुन-नासो मिन ह़ौलिकुम, फ़अन्क़ज़कुमुल्लाहो तबारका व तआला बिमुहम्मदिन् सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही बअ्दल्लतिया वल्लती, व बअ्दा अन मुनिया बेबुह़मिर-रेजाले, व ज़ुअ्बानिल-अरबे, व मरदतिल-अह़लिल-किताब।

كُلَّما اَوْقَدُوا ناراً لِلْحَرْبِ اَطْفَأَهَا اللَّـهُ، اَوْ نَجَمَ قَرْنُ الشَّیطانِ، اَوْ فَغَرَتْ فاغِرَةٌ مِنَ الْمُشْرِكینَ، قَذَفَ اَخاهُ فی لَهَواتِها، فَلاینْكَفِیءُ حَتَّی یطَأَ جِناحَها بِأَخْمَصِهِ، وَ یخْمِدَ لَهَبَها بِسَیفِهِ، مَكْدُوداً فی ذاتِ اللَّـهِ، مُجْتَهِداً فی اَمْرِ اللَّـهِ، قَریباً مِنْ رَسُولِاللَّـهِ، سَیداً فی اَوْلِیاءِ اللَّـهِ، مُشَمِّراً ناصِحاً مُجِدّاً كادِحاً، لاتَأْخُذُهُ فِی اللَّـهِ لَوْمَةَ لائِمٍ.

कुल्लमा औक़दू नारन लिल-हरबे अत्फ़अहल्लाहु, औ नम ज क़र्नुश-शैताने, औ फ़ग़रत फ़ाग़िरतुन मिनल-मुश्रिकीन, क़ज़फ़ा अख़ाहु फ़ी लहवातेहा, फ़ला यन्कफ़िउ हत्ता यतअ जेनाहेहा बेअख़्मसेही, व युख़्मेदा लहबहा बिसैफ़ेही, मक्दूदन फ़ी ज़ातिल्लाहे, मुज्तहिदन फ़ी अम्रिल्लाहे, क़रीबन मिर्रसूलिल्लाहे, सय्यिदन फ़ी औलियाइल्लाहे, मुशम्मिरन नासिहन मुजिद्दन कादिहन, ला तअख़ुज़ुहू फ़िल्लाहे लौमतु लाइमिन।

وَ اَنْتُمَ فی رَفاهِیةٍ مِنَ الْعَیشِ، و ادِعُونَ فاكِهُونَ آمِنُونَ، تَتَرَبَّصُونَ بِنَا الدَّوائِرَ، وَ تَتَوَكَّفُونَ الْاَخْبارَ، وَ تَنْكُصُونَ عِنْدَ النِّزالِ، وَ تَفِرُّونَ مِنَ الْقِتالِ.

व अन्तुम फ़ी रफ़ाहिय्यतिन मिनल-ऐशे, वादिऊना फ़ाकेहून आमेनूना, ततरब्बसूना बेना अद-दवाइरा, व ततवक्कफ़ूनल-अख़बार, व तन्कुसून इन्दन-नेज़ाले, व तफ़िर्रून मिनल-क़िताल।

فَلَمَّا اِختارَ اللَّـهُ لِنَبِیهِ‌دار اَنْبِیائِهِ وَ مَأْوی اَصْفِیائِهِ، ظَهَرَ فیكُمْ حَسْكَةُ النِّفاقِ، وَ سَمَلَ جِلْبابُ الدّینِ، وَ نَطَقَ كاظِمُ الْغاوینَ، وَ نَبَغَ خامِلُ الْاَقَلّینَ، وَ هَدَرَ فَنیقُ الْمُبْطِلینَ، فَخَطَرَ فی عَرَصاتِكُمْ، وَ اَطْلَعَ الشَّیطانُ رَأْسَهُ مِنْ مَغْرَزِهِ، هاتِفاً بِكُمْ، فَأَلْفاكُمْ لِدَعْوَتِهِ مُسْتَجیبینَ، وَ لِلْغِرَّةِ فیهِ مُلاحِظینَ، ثُمَّ اسْتَنْهَضَكُمْ فَوَجَدَكُمْ خِفافاً، وَ اَحْمَشَكُمْ فَاَلْفاكُمْ غِضاباً، فَوَسَمْتُمْ غَیرَ اِبِلِكُمْ، وَ وَرَدْتُمْ غَیرَ مَشْرَبِكُمْ.

फ़लम्मख़्तारल्लाहो लेनबिय्यिही दार अम्बियाइहे व मअ्वा अस्फ़ियाइही, ज़हर फ़ीकुम हस्कतुन-निफ़ाक़े, व समल जुल्बाबुद्दीने, व नतक़ काज़िमुल-ग़ावीन, व नबग़ ख़ामिलुल-अक़ल्लीन, व हदर फ़नीक़ुल-मुबतिलीन, फ़ख़तर फ़ी अरसातेकुम, व अत्लअश-शैतानो रअ्सहू मिन मग़रज़ेही, हातिफ़न बिकुम, फ़अल्फ़ाकुम लिदअवतेही मुस्तजीबीन, व लिल-ग़िर्रते फ़ीहे मुलाहेज़ीन, सुम्म स्तन्हज़कुम फ़वजदकुम ख़िफ़ाफ़न, व अह़्मशकुम फ़अल्फ़ाकुम ग़िज़ाबन, फ़वसम्तुम ग़ैर इबेलेकुम, व वरद्तुम ग़ैर मश्रबेकुम।

هذا، وَ الْعَهْدُ قَریبٌ، وَالْكَلْمُ رَحیبٌ، وَ الْجُرْحُ لَمَّا ینْدَمِلُ، وَ الرَّسُولُ لَمَّا یُقْبَرُ، اِبْتِداراً زَعَمْتُمْ خَوْفَ الْفِتْنَةِ، اَلا فِی الْفِتْنَةِ سَقَطُوا، وَ اِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحیطَةٌ بِالْكافِرینَ.

हाज़ा, वल-अह्दु क़रीबुन, वल-कल्मु रहीबुन, वल-जुरहो लम्मा यन्दमिलु, वर्रसूलु लम्मा युक़्बरु, इब्तिदारन ज़अमतुम ख़ौफ़ल-फ़ित्नते, अला फ़िल-फ़ित्नते सक़तू, व इन्न जहन्नमा लमुहीततुन बिल-काफ़ेरीन।

فَهَیهاتَ مِنْكُمْ، وَ كَیفَ بِكُمْ، وَ اَنَّی تُؤْفَكُونَ، وَ كِتابُ اللَّـهِ بَینَ اَظْهُرِكُمْ، اُمُورُهُ ظاهِرَةٌ، وَ اَحْكامُهُ زاهِرَةٌ، وَ اَعْلامُهُ باهِرَةٌ، و زَواجِرُهُ لائِحَةٌ، وَ اَوامِرُهُ واضِحَةٌ، وَ قَدْ خَلَّفْتُمُوهُ وَراءَ ظُهُورِكُمْ، أَرَغْبَةً عَنْهُ تُریدُونَ؟ اَمْ بِغَیرِهِ تَحْكُمُونَ؟ بِئْسَ لِلظَّالمینَ بَدَلاً، وَ مَنْ یبْتَغِ غَیرَ الْاِسْلامِ دیناً فَلَنْ یقْبَلَ مِنْهُ، وَ هُوَ فِی الْاخِرَةِ مِنَ الْخاسِرینِ.

फ़हैहात मिन्कुम, व कैफ़ा बेकुम, व अन्ना तुअफ़कून, व किताबुल्लाहे बैना अज़्होरेकुम, उमूरुहु ज़ाहिरतुन, व अह़कामुहो ज़ाहिरतुन, व आलामुहु बाहिरतुन, व ज़वाजिरुहु लाइहतुन, व अवामिरुहु वाज़िहतुन, व क़द ख़ल्लफ़्तुमूहु वराअ ज़ुहूरिकुम, अरग़्बतन अन्हु तुरीदून? अम बे-ग़ैरेही तह़्कुमून? बिअ्स लिज़्ज़ालिमीन बदलन, व मय्यब्तग़े ग़ैरल-इस्लामे दीनन फ़लन युक़्बल मिन्हो, व हुआ फ़िल-आख़िरते मिनल-ख़ासेरीन।

ثُمَّ لَمْ تَلْبَثُوا اِلی رَیثَ اَنْ تَسْكُنَ نَفْرَتَها، وَ یسْلَسَ قِیادَها،ثُمَّ اَخَذْتُمْ تُورُونَ وَ قْدَتَها، وَ تُهَیجُونَ جَمْرَتَها، وَ تَسْتَجیبُونَ لِهِتافِ الشَّیطانِ الْغَوِی، وَ اِطْفاءِ اَنْوارِالدّینِ الْجَلِی، وَ اِهْمالِ سُنَنِ النَّبِی الصَّفِی، تُسِرُّونَ حَسْواً فِی ارْتِغاءٍ، وَ تَمْشُونَ لِاَهْلِهِ وَ وَلَدِهِ فِی الْخَمَرِ وَ الضَّرَّاءِ، وَ نَصْبِرُ مِنْكُمْ عَلی مِثْلِ حَزِّ الْمَدی، وَ وَخْزِ السنان فی الحشا.

सुम्मा लम तल्बसू इला रैसा अन तसकुना नफ़रतुहा, व यसलसा क़ेयादोहा, सुम्मा अख़ज़्तुम तूरूना वक़्दतहा, व तुहय्यिजूना जम्रतहा, व तस्तजीबूना लेहिताफिश-शैतानिल-ग़विय्ये, व इत्फ़ाइ अनवारिद्दीनिल-जलीय्ये, व इहमाले सुननिन-नबिय्यिस-सफ़िय्ये, तुसिर्रूना हस्वन फ़ी इर्तिग़ाइन, व तम्शूना लिअहलेही व वलदेही फ़िल-ख़मरे वज़-ज़र्राए, व नस्बिरु मिन्कुम अला मिस्ले हज़्ज़िल-मदा, व वख़्ज़िस्सिनाने फ़िल-हशा।

وَ اَنْتُمُ الانَ تَزْعُمُونَ اَنْ لااِرْثَ لَنا أَفَحُكْمَ الْجاهِلِیةِ تَبْغُونَ، وَ مَنْ اَحْسَنُ مِنَ اللَّـهِ حُكْماً لِقَومٍ یوقِنُونَ، أَفَلاتَعْلَمُونَ؟ بَلی، قَدْ تَجَلَّی لَكُمْ كَالشَّمْسِ الضَّاحِیةِ أَنّی اِبْنَتُهُ.

व अन्तुमुल-आन तज़ओमूना अल्ला इर्सा लना, अफ़हुक्मल-जाहिलिय्यते तबग़ूना, व मन अह्सनो मिनल्लाहे हुक्मन लेक़ौमिन यूक़ेनून, अफ़ला तअलमून? बला, क़द तजल्ला लकुम कश्शम्सिज़-ज़ाहियते अन्नी इब्नतोहु।

اَیهَا الْمُسْلِمُونَ! أَاُغْلَبُ عَلی اِرْثی؟ یابْنَ اَبی‌قُحافَةَ! اَفی كِتابِ اللَّـهِ تَرِثُ اَباكَ وَ لااَرِثُ اَبی؟ لَقَدْ جِئْتَ شَیئاً فَرِیّاً، اَفَعَلی عَمْدٍ تَرَكْتُمْ كِتابَ اللَّـهِ وَ نَبَذْتُمُوهُ وَراءَ ظُهُورِكُمْ، إذْ یقُولُ ﴿وَوَرِثَ سُلَیْمَانُ دَاوُدَ﴾ [نمل:16] وَ قالَ فیما اقْتَصَّ مِنْ خَبَرِ زَكَرِیا اِذْ قالَ: ﴿فَهَبْ لِي مِنْ لَدُنْكَ وَلِيًّا ٥ يَرِثُنِي وَيَرِثُ مِنْ آلِ يَعْقُوبَ﴾ [مریم:5–6] وَ قالَ: ﴿وَأُولُو الْأَرْحَامِ بَعْضُهُمْ أَوْلَى بِبَعْضٍ فِي كِتَابِ اللَّهِ﴾ [انفال:75] وَ قالَ ﴿يُوصِيكُمُ اللَّهُ فِي أَوْلَادِكُمْ لِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ الْأُنْثَيَيْنِ﴾ [نساء:11] وَ قالَ ﴿إِنْ تَرَكَ خَيْرًا الْوَصِيَّةُ لِلْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ بِالْمَعْرُوفِ حَقًّا عَلَى الْمُتَّقِينَ ١٨٠﴾ [بقره:180] अय्युहल-मुस्लिमून! आ-उग़्लबु अला इर्सी? या इब्ने अबी-क़ोहाफ़ा! अफ़ी किताबिल्लाहे तरेसु अबाका व ला अरेसो अबी? लक़द जेअता शैअन फ़रिय्या, अफ़अला अम्दिन तरक्तुम किताबल्लाहे व नबज़्तोमूहु वराअ ज़ोहूरेकुम, इज़ यक़ूलु (व वरेसा सुलैमानो दाऊदा) (नम्ल 16) व क़ाला फ़ीमा इक़्तस्सा मिन ख़बरे ज़करिय्या इज़ क़ाला: (फ़हब ली मिल-लदुन्क वलिय्यन, यरेसोनी व यरेसो मिन आले यअक़ूब) (मरियम 5-6) व क़ाला: (व उलुल-अर्हामे बअज़ोहुम औला बेबअ्ज़िन फ़ी किताबिल्लाहे) (अंफ़ाल 75) व क़ाला: (यूसीकुमुल्लाहो फ़ी औलादेकुम, लिज़्ज़करे मिस्लो हज़्ज़िल-उन्सयैन) (निसा 11) व क़ाला: (इन तरका ख़ैरनिल-वसिय्यतो लिल-वालेदैने वल-अक़रबीन बिल-मअरूफ़े हक़्क़न अलल-मुत्तक़ीन) (बक़रा 180)

وَ زَعَمْتُمْ اَنْ لاحَظْوَةَ لی، وَ لااَرِثُ مِنْ اَبی، وَ لارَحِمَ بَینَنا، اَفَخَصَّكُمُ اللَّـهُ بِایةٍ اَخْرَجَ اَبی مِنْها؟ اَمْ هَلْ تَقُولُونَ: اِنَّ اَهْلَ مِلَّتَینِ لایتَوارَثانِ؟ اَوَ لَسْتُ اَنَا وَ اَبی مِنْ اَهْلِ مِلَّةٍ واحِدَةٍ؟ اَمْ اَنْتُمْ اَعْلَمُ بِخُصُوصِ الْقُرْانِ وَ عُمُومِهِ مِنْ اَبی وَابْنِ عَمّی؟ فَدُونَكَها مَخْطُومَةً مَرْحُولَةً تَلْقاكَ یوْمَ حَشْرِكَ.

व ज़अम्तुम अल्ला हज़्वत ली, व ला अरेसो मिन अबी, व ला रहेमा बैनना, अफ़ख़स्सकुमुल्लाहो बिआयतिन अख़रजा अबी मिन्हा? अम हल तक़ूलूना: इन्ना अहला मिल्लतैने ला यतवारसाने? अवलस्तो अना व अबी मिन अहले मिल्लतिन वाहेदतिन? अम अन्तुम आलमो बेख़ुसूसिल-क़ुरआने व उमूमेही मिन अबी व इब्ने अम्मी? फ़दूनकहा मख़्तूमतन मरहूलतन तल्क़ाक यौमा हश्रेका।

فَنِعْمَ الْحَكَمُ اللَّـهُ، وَ الزَّعیمُ مُحَمَّدٌ، وَ الْمَوْعِدُ الْقِیامَةُ، وَ عِنْدَ السَّاعَةِ یخْسِرُ الْمُبْطِلُونَ، وَ لاینْفَعُكُمْ اِذْ تَنْدِمُونَ، وَ لِكُلِّ نَبَأٍ مُسْتَقَرٌّ، وَ لَسَوْفَ تَعْلَمُونَ مَنْ یأْتیهِ عَذابٌ یخْزیهِ، وَ یحِلُّ عَلَیهِ عَذابٌ مُقیمٌ.

फ़नेअमल-हुक्मुल्लाहो, वज़्ज़ईमो मुहम्मदुन, वल-मौइदुल-क़ियामतो, व इन्दस्साअते यख़्सेरुल-मुब्तेलून, व ला यनफ़उकुम इज़ तन्दमूना, व लेकुल्ले नबइन मुस्तक़र्रुन, व लसौफ़ा तअलमूना मन यअतेही अज़ाबुन युख़ज़ीहे, व यहिल्लो अलैहे अज़ाबुन मुक़ीमुन।

ثم رَمت بطَرفها نحو الانصار، فقالت:

सुम्मा रमत बेतरफ़ेहा नहवल अंसार, फ़ा क़ालत:

یا مَعْشَرَ النَّقیبَةِ وَ اَعْضادَ الْمِلَّةِ وَ حَضَنَةَ الْاِسْلامِ! ما هذِهِ الْغَمیزَةُ فی حَقّی وَ السِّنَةُ عَنْ ظُلامَتی؟ اَما كانَ رَسُول‌اللَّـهِ صَلَّی اللَّـهُ عَلَیهِ وَ الِهِ اَبی یقُولُ: «اَلْمَرْءُ یحْفَظُ فی وُلْدِهِ»، سَرْعانَ ما اَحْدَثْتُمْ وَ عَجْلانَ ذا اِهالَةٍ، وَ لَكُمْ طاقَةٌ بِما اُحاوِلُ، وَ قُوَّةٌ عَلی ما اَطْلُبُ وَ اُزاوِلُ.

या मअशरल-नक़ीबते व अअज़ादल-मिल्लते व हज़नतल-इस्लामे! मा हाज़ेहिल-ग़मीज़तो फ़ी हक़्क़े वस्सिन्नतो अन ज़ुलामती? अमा काना रसूलुल्लाहे सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही अबी यक़ूलु: «अल-मरओ यहफ़ज़ो फ़ी वुल्देही», सरआन मा अह़्दस्तुम व अज्लान ज़ा इहालतिन, व लकुम ताक़तुन बिमा उह़ाविलु, व क़ुव्वतुन अला मा अत्लुबु व उज़ाविलु।

اَتَقُولُونَ ماتَ مُحَمَّدٌ؟ فَخَطْبٌ جَلیلٌ اِسْتَوْسَعَ وَ هْنُهُ، وَاسْتَنْهَرَ فَتْقُهُ، وَ انْفَتَقَ رَتْقُهُ، وَ اُظْلِمَتِ الْاَرْضُ لِغَیبَتِهِ، وَ كُسِفَتِ الشَّمْسُ وَ الْقَمَرُ وَ انْتَثَرَتِ النُّجُومُ لِمُصیبَتِهِ، وَ اَكْدَتِ الْامالُ، وَ خَشَعَتِ الْجِبالُ، وَ اُضیعَ الْحَریمُ، وَ اُزیلَتِ الْحُرْمَةُ عِنْدَ مَماتِهِ.

अतक़ूलूना माता मुहम्मदुन? फ़ख़त्बुन जलीलुन इस्तौसआ वहनोहु, वस्तन्हर फ़त्क़ुहु, वन्फ़तक़ रत्क़ुहु, व उज़्लिमतिल-अर्ज़ो लिग़ैबतेही, व कोसेफ़तिश्शम्सु वल-क़मरो वन्तस रतिन-नुजूमो लेमुसीबतेही, व अक़दतिल-आमालो, व ख़शअतिल-जिबालो, व उज़ीअल-हरीमो, व उज़ीलतिल-हुरमतो इन्दा ममातेही।

فَتِلْكَ وَاللَّـهِ النَّازِلَةُ الْكُبْری وَ الْمُصیبَةُ الْعُظْمی، لامِثْلُها نازِلَةٌ، وَ لابائِقَةٌ عاجِلَةٌ اُعْلِنَ بِها، كِتابُ اللَّـهِ جَلَّ ثَناؤُهُ فی اَفْنِیتِكُمْ، وَ فی مُمْساكُمْ وَ مُصْبِحِكُمْ، یهْتِفُ فی اَفْنِیتِكُمْ هُتافاً وَ صُراخاً وَ تِلاوَةً وَ اَلْحاناً، وَ لَقَبْلَهُ ما حَلَّ بِاَنْبِیاءِ اللَّـهِ وَ رُسُلِهِ، حُكْمٌ فَصْلٌ وَ قَضاءٌ حَتْمٌ.

फ़तिल्का वल्लाहिन-नाज़ेलतुल-कुब्रा वल-मुसीबतुल-उज़्मा, ला मिस्लोहा नाज़िलतुन, व ला बाएक़तुन आजेलतुन उअ्लेना बेहा, किताबुल्लाहे जल्ला सनाउहु फ़ी अफ़नियतिकुम, व फ़ी मुम्साकुम व मुस्बहेकुम, यहतेफ़ो फ़ी अफ़नियतेकुम हुताफ़न व सुराख़न व तिलावतन व अल्हानन, व लक़ब्लहु मा हल्ला बिअम्बियाइल्लाहे व रुसुलेही, हुक्मुन फ़स्लुन व क़ज़ाउन हत्मुन।

﴿وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهِ الرُّسُلُ أَفَإِنْ مَاتَ أَوْ قُتِلَ انْقَلَبْتُمْ عَلَى أَعْقَابِكُمْ وَمَنْ يَنْقَلِبْ عَلَى عَقِبَيْهِ فَلَنْ يَضُرَّ اللَّهَ شَيْئًا وَسَيَجْزِي اللَّهُ الشَّاكِرِينَ ١٤٤﴾ [آل عمران:144]

व मा मुहम्मदुन इल्ला रसूलुन क़द ख़लत मिन क़ब्लेहिर्रुसुलो, अफ़इन् माता औ क़ुतिला इन्क़लाब्तुम अला अअक़ाबेकुम, व मय्यन्क़लिब अला अक़ेबैहे फ़लन यज़ुर्रल्लाहा शैअन, व सयजज़िल्लाहुश्शाकेरीन।

اَیها بَنی قیلَةَ! ءَ اُهْضَمُ تُراثَ اَبی وَ اَنْتُمْ بِمَرْأی مِنّی وَ مَسْمَعٍ وَ مُنْتَدی وَ مَجْمَعٍ، تَلْبَسُكُمُ الدَّعْوَةُ وَ تَشْمَلُكُمُ الْخُبْرَةُ، وَ اَنْتُمْ ذَوُو الْعَدَدِ وَ الْعُدَّةِ وَ الْاَداةِ وَ الْقُوَّةِ، وَ عِنْدَكُمُ السِّلاحُ وَ الْجُنَّةُ، تُوافیكُمُ الدَّعْوَةُ فَلاتُجیبُونَ، وَ تَأْتیكُمُ الصَّرْخَةُ فَلاتُغیثُونَ، وَ اَنْتُمْ مَوْصُوفُونَ بِالْكِفاحِ، مَعْرُوفُونَ بِالْخَیرِ وَ الصَّلاحِ، وَ النُّخْبَةُ الَّتی انْتُخِبَتْ، وَ الْخِیرَةُ الَّتِی اخْتیرَتْ لَنا اَهْلَ الْبَیتِ.

अय्युहा बनी क़ीलता! आ-उहज़मो तोरासा अबी व अन्तुम बिमरअइन मिन्नी व मस्मअिन व मुं‍तदन व मज्मअिन, तल्बसोकुमुद-दअ्वतो व तशमलुकुमुल-ख़ुब्रतो, व अन्तुम ज़वुल-अददे वल-उद्दते वल-अदाते वल-क़ुव्वते, व इन्दकुमुस्सेलाहो वल-जुन्नतो, तोवाफ़ीकुमुद-दअ्वतु फ़ला तुजीबून, व तअतीकुमुस्सरख़तो फ़ला तुग़ीसूना, व अन्तुम मौसुफ़ूना बिल-केफ़ाहे, मअरूफ़ून बिल-ख़ैरे वस्सलाहे, वन-नुख़्बतुल्लती इंतुख़िबत, वल-ख़ियरतुल्लती इख़्तीरत लना अह़्लल-बैत।

قاتَلْتُمُ الْعَرَبَ، وَ تَحَمَّلْتُمُ الْكَدَّ وَ التَّعَبَ، وَ ناطَحْتُمُ الْاُمَمَ، وَ كافَحْتُمُ الْبُهَمَ، لانَبْرَحُ اَوْ تَبْرَحُونَ، نَأْمُرُكُمْ فَتَأْتَمِرُونَ، حَتَّی اِذا دارَتْ بِنا رَحَی الْاِسْلامِ، وَ دَرَّ حَلَبُ الْاَیامِ، وَ خَضَعَتْ نُعْرَةُ الشِّرْكِ، وَ سَكَنَتْ فَوْرَةُ الْاِفْكِ، وَ خَمَدَتْ نیرانُ الْكُفْرِ، وَ هَدَأَتْ دَعْوَةُ الْهَرَجِ، وَ اسْتَوْسَقَ نِظامُ الدّینِ، فَاَنَّی حِزْتُمْ بَعْدَ الْبَیانِ، وَاَسْرَرْتُمْ بَعْدَ الْاِعْلانِ، وَ نَكَصْتُمْ بَعْدَ الْاِقْدامِ، وَاَشْرَكْتُمْ بَعْدَ الْایمانِ؟

क़ातल्तुमुल-अरब, व तहम्मल्तुमुल-कद्दा वत-तअब, व नातहतुमुल-उमम, व काफ़हतुमुल-बुहम, ला नबरहु औ तब्रहून, नामुरुकुम फ़तअ्तमिरूना, हत्ता इज़ा दारत बिना रहल-इस्लामे, व दर्रा हल्बुल-अय्यामे, व ख़ज़अत नुअरतुश-शिर्के, व सकनत फ़ौरतुल-इफ़्के, व ख़मदत नीरानुल-कुफ़्रे, व हदअत दअ्वतुल-हरजे, वस्तोसक़ा नज़ामुद्दीने, फ़अन्ना हिज़्तुम बअ्दल-बयाने, व असरर्तुम बअ्दल-इअ्लाने, व नक़सतुम बअ्दल-इक़दामे, व अशरक्तुम बअ्दल-ईमाने?

بُؤْساً لِقَوْمٍ نَكَثُوا اَیمانَهُمْ مِنْ بَعْدِ عَهْدِهِمْ، وَ هَمُّوا بِاِخْراجِ الرَّسُولِ وَ هُمْ بَدَؤُكُمْ اَوَّلَ مَرَّةٍ، اَتَخْشَوْنَهُمْ فَاللَّـهُ اَحَقُّ اَنْ تَخْشَوْهُ اِنْ كُنْتُمْ مُؤمِنینَ.

बुऊसन लेक़ौमिन नक़सू ऐमानहुम मिन बअ्दे अह्देहिम, व हम्मू बिइख़राजिर्रसूले व हुम बदऊकुम अव्वला मर्रतिन, अतख़्शौनहुम फ़ल्लाहु अह़क़्क़ु अन तख़्शौहो इन कुन्तुम मोमेनीना।

اَلا، وَ قَدْ أَری اَنْ قَدْ اَخْلَدْتُمْ اِلَی الْخَفْضِ، وَ اَبْعَدْتُمْ مَنْ هُوَ اَحَقُّ بِالْبَسْطِ وَ الْقَبْضِ، وَ خَلَوْتُمْ بِالدَّعَةِ، وَ نَجَوْتُمْ بِالضّیقِ مِنَ السَّعَةِ، فَمَجَجْتُمْ ما وَعَبْتُمْ، وَ دَسَعْتُمُ الَّذی تَسَوَّغْتُمْ، فَاِنْ تَكْفُرُوا اَنْتُمْ وَ مَنْ فِی الْاَرْضِ جَمیعاً فَاِنَّ اللَّـهَ لَغَنِی حَمیدٌ.

अला, वक़द अरा अन क़द अख़लद्तुम इलल-ख़फ़्ज़े, व अबअद्तुम मन हुवा अह़क़्क़ो बिल-बस्ते वल-क़ब्ज़े, व ख़लव्तुम बिद्दअते, व नजौ्तुम बिज़्ज़ीक़े मिनस्सअते, फ़मजज्तुम मा वअब्दतुम, व दसअ्तुमुल्लज़ी तसव्वग़्तुम, फ़इन तक्फ़ुरू अन्तुम व मन फ़िल-अर्ज़े जमीअन फ़इन्नल्लाहा लग़निय्युन हमीदुन।

اَلا، وَ قَدْ قُلْتُ ما قُلْتُ هذا عَلی مَعْرِفَةٍ مِنّی بِالْخِذْلَةِ الَّتی خامَرْتُكُمْ، وَ الْغَدْرَةِ الَّتِی اسْتَشْعَرَتْها قُلُوبُكُمْ، وَ لكِنَّها فَیضَةُ النَّفْسِ، وَ نَفْثَةُ الْغَیظِ، وَ حَوَزُ الْقَناةِ، وَ بَثَّةُ الصَّدْرِ، وَ تَقْدِمَةُ الْحُجَّةِ، فَدُونَكُمُوها فَاحْتَقِبُوها دَبِرَةَ الظَّهْرِ، نَقِبَةَ الْخُفِّ، باقِیةَ الْعارِ، مَوْسُومَةً بِغَضَبِ الْجَبَّارِ وَ شَنارِ الْاَبَدِ، مَوْصُولَةً بِنارِ اللَّـهِ الْمُوقَدَةِ الَّتی تَطَّلِعُ عَلَی الْاَفْئِدَةِ.

अला, वक़द क़ुल्तो मा क़ुल्तो हाज़ा अला मअरेफ़तिन मिन्नी बिल-ख़िज़्लतिल्लती ख़ामरतकुम, वल-ग़दरतिल्लती इस्तशअरतहा क़ुलूबोकुम, व लाकिन्नहा फ़ैज़तुन-नफ़्से, व नफ़्सतुल-ग़ैज़े, व हौज़ुल-क़नाते, व बस्सतुस्सद्रे, व तक़देमतुल-हुज्जते, फ़दूनकुमूहा फ़हतक़ेबूहा दबेर्तज़-ज़ह्रे, नक़िबतल-ख़ुफ़्फ़े, बाक़ियतल-आरे, मौसूमतन बेग़ज़बिल-जब्बारे व शनारिल-अबदे, मौसूलतन बेनारिल्लाहिल-मूक़दतिल्लती तत्तलेओ अलल-अफ़इदते।

فَبِعَینِ اللَّـهِ ما تَفْعَلُونَ، وَ سَیعْلَمُ الَّذینَ ظَلَمُوا اَی مُنْقَلَبٍ ینْقَلِبُونَ، وَ اَنَا اِبْنَةُ نَذیرٍ لَكُمْ بَینَ یدَی عَذابٌ شَدیدٌ، فَاعْمَلُوا اِنَّا عامِلُونَ، وَ انْتَظِرُوا اِنَّا مُنْتَظِرُونَ.

फ़बेअैनिल्लाहे मा तफ़अलून, व सयअलमो अल्लज़ीना ज़लमू अय्या मुनक़लाबिन यनक़लेबून, व अना इब्नतो नज़ीरिन लकुम बैन यदैय अज़ाबुन शदीद, फ़अमलू इन्ना आमेलूना, वन्तज़ेरू इन्ना मुन्तज़ेरून।

فأجابها أبوبكر عبداللَّـه بن عثمان، و قال:

फ़ा अजाबहा अबू बक्र अब्दुल्लाह बिन उस्मान, व क़ाला:

یا بِنْتَ رَسُول‌اللَّـهِ! لَقَدْ كانَ اَبُوكِ بِالْمُؤمِنینَ عَطُوفاً كَریماً، رَؤُوفاً رَحیماً، وَ عَلَی الْكافِرینَ عَذاباً اَلیماً وَ عِقاباً عَظیماً، اِنْ عَزَوْناهُ وَجَدْناهُ اَباكِ دُونَ النِّساءِ، وَ اَخا اِلْفِكِ دُونَ الْاَخِلاَّءِ، اثَرَهُ عَلی كُلِّ حَمیمٍ وَ ساعَدَهُ فی كُلِّ اَمْرٍ جَسیمِ، لایُحِبُّكُمْ اِلاَّ سَعیدٌ، وَ لایُبْغِضُكُمْ اِلاَّ شَقِی بَعیدٌ.

या बिन्ता रसूलिल्लाह! लक़द काना अबूके बिल-मोमेनीना अतूफ़न करीमन, रऊफ़न रहीमन, व अलल-काफ़ेरीना अज़ाबन अलीमन व इक़ाबन अज़ीमन, इन अज़वैनाहो वजदनाहो अबाके दूनन-निसा, व अख़ा इल्फ़ेके दूनल-अख़िल्लाए, असरहू अला कुल्ले ह़मीमिन व साअदहू फ़ी कुल्ले अम्रिन जसीमे, ला युहिब्बुकुम इल्ला सईदुन, व ला युबग़िज़ुकुम इल्ला शक़िय्युन बईद।

فَاَنْتُمْ عِتْرَةُ رَسُول‌اللَّـهِ الطَّیبُونَ، الْخِیرَةُ الْمُنْتَجَبُونَ، عَلَی الْخَیرِ اَدِلَّتُنا وَ اِلَی الْجَنَّةِ مَسالِكُنا، وَ اَنْتِ یا خِیرَةَ النِّساءِ وَ ابْنَةَ خَیرِ الْاَنْبِیاءِ، صادِقَةٌ فی قَوْلِكِ، سابِقَةٌ فی وُفُورِ عَقْلِكِ، غَیرَ مَرْدُودَةٍ عَنْ حَقِّكِ، وَ لامَصْدُودَةٍ عَنْ صِدْقِكِ.

फ़अन्तुम इत्रतरो रसूलिल्लाहित-तय्यिबून, अल-ख़ियारतुल-मुन्तजाबून, अलल-ख़ैरे अदिल्लतुना व इलल-जन्नते मसालिकुना, व अन्ता या ख़ैरतन-निसा व इब्नता ख़ैरिल-अम्बिया, सादिक़तुन फ़ी क़ौलेके, साबिक़तुन फ़ी वुफ़ूरे अक़्लेके, ग़ैरु मर्दूदतिन अन हक़्क़ेके, व ला मस्दूदतिन अन सिद्क़ेके।

وَ اللَّـهِ ما عَدَوْتُ رَأْی رَسُولِ‌للَّـهِ، وَ لاعَمِلْتُ اِلاَّ بِاِذْنِهِ، وَ الرَّائِدُ لایكْذِبُ اَهْلَهُ، وَ اِنّی اُشْهِدُ اللَّـهَ وَ كَفی بِهِ شَهیداً، اَنّی سَمِعْتُ رَسُول‌اللَّـهِ یقُولُ: «نَحْنُ مَعاشِرَ الْاَنْبِیاءِ لانُوَرِّثُ ذَهَباً وَ لافِضَّةً، وَ لاداراً وَ لاعِقاراً، وَ اِنَّما نُوَرِّثُ الْكِتابَ وَ الْحِكْمَةَ وَ الْعِلْمَ وَ النُّبُوَّةَ، وَ ما كانَ لَنا مِنْ طُعْمَةٍ فَلِوَلِی الْاَمْرِ بَعْدَنا اَنْ یحْكُمَ فیهِ بِحُكْمِهِ».

वल्लाहे मा अदव्तु रअ्य रसूलिल्लाहे, व ला अमिल्तो इल्ला बेइज़्नेही, वर-राइदो ला यक़ज़ेबो अहलहु, व इन्नी उश्हिदुल्लाहा व कफ़ा बेही शहीदन, अन्नी समिअ्तो रसूलल्लाहे यक़ूलु: (नहनो मआशेरल-अम्बिया, ला नुवर्रेसो ज़हबन व ला फ़िज़्ज़तन, व ला दारन व ला एक़ारन, व इन्नमा नुवर्रेसुल-किताबा वल-हिक्मता वल-इल्मा वन-नबुव्वता, व मा काना लना मिन तुइ्मतिन फ़लिवलिय्यिल-अम्रि बअ्दना अन यह्कोमा फ़ीहे बिहुक्मेही।)

وَ قَدْ جَعَلْنا ما حاوَلْتِهِ فِی الْكِراعِ وَ السِّلاحِ، یقاتِلُ بِهَا الْمُسْلِمُونَ وَ یجاهِدُونَ الْكُفَّارَ، وَ یجالِدُونَ الْمَرَدَةَ الْفُجَّارَ، وَ ذلِكَ بِاِجْماعِ الْمُسْلِمینَ، لَمْ اَنْفَرِدْ بِهِ وَحْدی، وَ لَمْ اَسْتَبِدْ بِما كانَ الرَّأْی عِنْدی،

व क़द जअल्ना मा हावल्तेही फ़िल-क़ेराए वस्सेलाहे, युक़ातेलो बेहल-मुस्लिमून व युजाहिदूनल-कुफ़्फ़ार, व युजालेदूनल-मरदतल-फुज्जार, व ज़ालिका बिइज्माइल-मुस्लिमीन, लम अनफ़रिद बेही वह्दी, व लम अस्तबिद बेमा कानर्रअ्यु इन्दी।

وَ هذِهِ حالی وَ مالی، هِی لَكِ وَ بَینَ یدَیكِ، لاتَزْوی عَنْكِ وَ لانَدَّخِرُ دُونَكِ، وَ اَنَّكِ، وَ اَنْتِ سَیدَةُ اُمَّةِ اَبیكِ وَ الشَّجَرَةُ الطَّیبَةُ لِبَنیكِ، لایدْفَعُ مالَكِ مِنْ فَضْلِكِ، وَ لایوضَعُ فی فَرْعِكِ وَ اَصْلِكِ، حُكْمُكِ نافِذٌ فیما مَلَّكَتْ یدای، فَهَلْ‌ترین اَنْ اُخالِفَ فی ذاكَ اَباكِ (صَلَّی اللَّـهُ عَلَیهِ وَ الِهِ وَ سَلَّمَ).

व हाज़ेही हाली व माली, हिया लके व बैना यदैक़े, ला तज़्वी अनके व ला नद्दख़ेरो दूनके, व अन्नके, व अन्ते सय्यिदतो उम्मते अबीक़े वश-शजरतुत-तय्यिबतु लेबनीके, ला यद्फ़उ मालेके मिन फ़ज़्लेके, व ला यूज़ओ फ़ी फ़रएके व अस्लेके, हुक्मुके नाफ़िज़ुन फ़ीमा मल्लकत यदाया, फ़हल तरैन अन उख़ालेफ़ो फ़ी ज़ालेका अबाके (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम)।

فقالت: سُبْحانَ‌اللَّـهِ، ما كانَ اَبی رَسُولُ اللَّـهِ عَنْ كِتابِ اللَّـهِ صادِفاً، وَ لالِاَحْكامِهِ مُخالِفاً، بَلْ كانَ یتْبَعُ اَثَرَهُ، وَ یقْفُو سُوَرَهُ، اَفَتَجْمَعُونَ اِلَی الْغَدْرِ اِعْتِلالاً عَلَیهِ بِالزُّورِ، وَ هذا بَعْدَ وَفاتِهِ شَبیهٌ بِما بُغِی لَهُ مِنَ الْغَوائِلِ فی حَیاتِهِ، هذا كِتابُ اللَّـهِ حُكْماً عَدْلاً وَ ناطِقاً فَصْلاً، یقُولُ: «یرِثُنی وَ یرِثُ مِنْ الِ‌یعْقُوبَ»، وَ یقُولُ: «وَ وَرِثَ سُلَیمانُ داوُدَ».

फ़क़ालत: सुब्हानल्लाहे, मा काना अबी रसूलुल्लाहे अन किताबिल्लाहे सादेफ़न, व ला लेअहकामेही मुख़ालेफ़न, बल काना यत्तबिउ असरहू, व यक़्फ़ू सुवरहू, अफ़तज्मऊन इलल-ग़द्रे इ'तिलालन अलैहे बिज़्ज़ूरे, व हाज़ा बअ्दा वफ़ातेही शबीहुन बेमा बोग़ेया लहू मिनल-ग़वाइले फ़ी हयातेही, हाज़ा किताबुल्लाहे हुक्मन अद्लन व नातेक़न फ़स्लन, यक़ूलो: “यरेसोनी व यरेसो मिन आली यअ्क़ूबा”, व यक़ूलो: “व वरेसा सुलैम़ानो दाऊदा।”

بَینَ عَزَّ وَ جَلَّ فیما وَزَّعَ مِنَ الْاَقْساطِ، وَ شَرَعَ مِنَ الْفَرائِضِ وَالْمیراثِ، وَ اَباحَ مِنْ حَظِّ الذَّكَرانِ وَ الْاِناثِ، ما اَزاحَ بِهِ عِلَّةَ الْمُبْطِلینَ وَ اَزالَ التَّظَنّی وَ الشُّبَهاتِ فِی الْغابِرینَ، كَلاَّ بَلْ سَوَّلَتْ لَكُمْ اَنْفُسُكُمْ اَمْراً، فَصَبْرٌ جَمیلٌ وَ اللَّـهُ الْمُسْتَعانُ عَلی ما تَصِفُونَ.

बय्यन अज़्ज़ा व जल्ला फ़ीमा वज़्ज़आ मिनल-अक़्साते, व शरअ मिनल-फ़राइज़े वल-मीरासे, व अबाहा मिन हज़्ज़िज़-ज़कराने वल-इनासे, मा अज़ाहा बेही इल्लतल-मुब्तेलीन, व अज़ालत-तज़न्नी वश-शुबुहाते फ़िल-ग़ाबेरीन, कल्ला बल सव्वलत लकुम अनफ़ोसुकुम अम्रन, फ़सब्रुन जमी़लुन वल्लाहुल-मुस्तआनो अला मा तसिफ़ून।

فقال أبوبكر: صَدَقَ اللَّـهُ وَ رَسُولُهُ وَ صَدَقَتْ اِبْنَتُهُ، مَعْدِنُ الْحِكْمَةِ، وَ مَوْطِنُ الْهُدی وَ الرَّحْمَةِ، وَ رُكْنُ الدّینِ، وَ عَینُ الْحُجَّةِ، لااَبْعَدُ صَوابَكِ وَ لااُنْكِرُ خِطابَكِ، هؤُلاءِ الْمُسْلِمُونَ بَینی وَ بَینَكِ قَلَّدُونی ما تَقَلَّدْتُ، وَ بِاتِّفاقٍ مِنْهُمْ اَخَذْتُ ما اَخَذْتُ، غَیرَ مَكابِرٍ وَ لامُسْتَبِدٍّ وَ لامُسْتَأْثِرٍ، وَ هُمْ بِذلِكَ شُهُودٌ.

फ़क़ाला अबू बक्र: सदक़ल्लाहो व रसूलुहो व सदक़त इब्नतोहु, मअ्दिनुल-हिक्मते, व मौतिनुल-होदा वर-रहमते, व रुक्नुद्दीने, व ऐनुल-हुज्जते, ला अबअदो सवाबक़े व ला उन्किरो ख़िताबका, हाउलाइल-मुस्लिमून बैनी व बैनके क़ल्लदूनी मा तक़ल्लद्तु, व बित्तिफ़ाक़िन मिन्हुम अख़ज़्तु मा अख़ज़्तो, ग़ैरा मकाबेरिन व ला मुस्तबिद्दिन व ला मुस्तअ्सिरिन, व हुम बिज़ालेका शोहूदुन।

فالتفت فاطمة علیهاالسلام الی النساء، و قالت: مَعاشِرَ الْمُسْلِمینَ الْمُسْرِعَةِ اِلی قیلِ الْباطِلِ، الْمُغْضِیةِ عَلَی الْفِعْلِ الْقَبیحِ الْخاسِرِ، اَفَلاتَتَدَبَّرُونَ الْقُرْانَ اَمْ عَلی قُلُوبٍ اَقْفالُها، كَلاَّ بَلْ رانَ عَلی قُلُوبِكُمْ ما اَسَأْتُمْ مِنْ اَعْمالِكُمْ، فَاَخَذَ بِسَمْعِكُمْ وَ اَبْصارِكُمْ، وَ لَبِئْسَ ما تَأَوَّلْتُمْ، وَ ساءَ ما بِهِ اَشَرْتُمْ، وَ شَرَّ ما مِنْهُ اِعْتَضْتُمْ، لَتَجِدَنَّ وَ اللَّـهِ مَحْمِلَهُ ثَقیلاً، وَ غِبَّهُ وَبیلاً، اِذا كُشِفَ لَكُمُ الْغِطاءُ، وَ بانَ ما وَرائَهُ الضَّرَّاءُ، وَ بَدا لَكُمْ مِنْ رَبِّكُمْ ما لَمْ تَكُونُوا تَحْتَسِبُونَ، وَ خَسِرَ هُنالِكَ الْمُبْطِلُونَ.

फ़ल्तफ़त फ़ातिमतु अलैहस्सलाम इलन्निसा, व क़ालत: मआशिरल-मुस्लिमीनल-मुस्रेअते इला क़ीलिल-बातिले, अल-मुग़ज़ियते अलल-फ़ेअलिल-क़बीहिल-ख़ासेरे, अफ़ला ततदब्बरूनल-क़ुरआन, अम अला क़ुलूबिन अक़्फ़ालोहा, कल्ला बल राना अला क़ुलूबिकुम मा असअ्तुम मिन आमालेकुम, फ़अख़ज़ बिसम्इकुम व अब्सारेकुम, व लबेअ्स मा तअव्वल्तुम, व साअ मा बेही अशर्तुम, व शर्रा मा मिन्हो इतअज़्तुम, लतजिदन्ना वल्लाहे मह्मिलहू सक़ीलन, व ग़िब्बहू वबीलन, इज़ा कोशेफ़ा लकुमुल-ग़ेताओ, व बाना मा वराअहुज़ ज़र्राओ, व बदा लकुम मिन रब्बेकुम मा लम तकूनू तह्तसेबून, व ख़सेरा हुनालेकल-मुब्तिलूना।

ثم عطفت علی قبر النبی صلی اللَّـه علیه و آله، و قالت:

सुम्मा अ'तफ़त अला क़ब्रिन-नबिय्ये सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही, व क़ालत:

قَدْ كانَ بَعْدَكَ اَنْباءٌ وَهَنْبَثَةٌ لَوْ كُنْتَ شاهِدَها لَمْ تَكْثِرِ الْخُطَبُ اِنَّا فَقَدْناكَ فَقْدَ الْاَرْضِ وابِلَها وَ اخْتَلَّ قَوْمُكَ فَاشْهَدْهُمْ وَ لاتَغِبُ وَ كُلُّ اَهْلٍ لَهُ قُرْبی وَ مَنْزِلَةٌ عِنْدَ الْاِلهِ عَلَی الْاَدْنَینِ مُقْتَرِبُ اَبْدَتْ رِجالٌ لَنا نَجْوی صُدُورِهِمُ لمَّا مَضَیتَ وَ حالَتْ دُونَكَ التُّرَبُ تَجَهَّمَتْنا رِجالٌ وَ اسْتُخِفَّ بِنا لَمَّا فُقِدْتَ وَ كُلُّ الْاِرْثِ مُغْتَصَبُ وَ كُنْتَ بَدْراً وَ نُوراً یسْتَضاءُ بِهِ عَلَیكَ تنْزِلُ مِنْ ذِی الْعِزَّةِ الْكُتُبُ وَ كانَ جِبْریلُ بِالْایاتِ یؤْنِسُنا فَقَدْ فُقِدْتَ وَ كُلُّ الْخَیرِ مُحْتَجَبُ فَلَیتَ قَبْلَكَ كانَ الْمَوْتُ صادِفُنا لَمَّا مَضَیتَ وَ حالَتْ دُونَكَ الْكُتُبُ.

क़द काना बअ्दका अम्बाऊँ व हनबसतुन, लौ कुन्ता शाहेदहा लम तक्सेरिल-ख़ुतबो, इन्ना फ़क़द्नाका फ़क़्दल-अर्ज़े वाबेलहा, वख़्तल्ला क़ौमुका फ़श्हद्हुम व ला तग़ेबो, वकुल्लो अहलिन लहू क़ुर्बा व मंज़िलतुन, इन्दल-इलाहे अलल-अदनैने मुक़्तरेबो, अबदत रेजालुन लना नज्वा सदूरेहेमो, लम्मा मज़ैता व हालात दूनकत-तुरबो, तजह्हमत्ना रेजालुन वस्तुख़िफ़्फ़ा बिना, लम्मा फ़ोक़िद्ता व कुल्लुल-इर्से मुग़्तसेबो, वकुन्ता बद्रन व नूरन युस्तज़ाओ बेही, अलैका तंज़िलो मिन ज़िल-इज़्ज़तिल-कुतुबु, व काना जिब्रीलो बिल-आयाते युअ्नेसुना, फ़क़द फ़ोक़ेद्ता व कुल्लुल-ख़ैरे मोहतजेबो, फ़लैता क़ब्लका कानल-मौतो सादेफ़ोना, लम्मा मज़ैता व हालत दूनकल-कुतुबो।[३४]

उस अल्लाह की प्रशंसा और स्तुति है, जिसने हमें अपनी अनगिनत नेअमते प्रदान की; और उसका आभार है उन प्रेरणाओं के लिए जो उसने हमारे हृदयों में डालीं। हम उसकी प्रशंसा और शुक्र अदा करते हैं उन नेमतों के लिए जो उसने पहले से हमारे लिए भेजीं। वही है जिसने अपनी सृष्टि को असंख्य अनुग्रहों से लाभान्वित किया, अपनी व्यापक कृपाएँ प्रदान कीं और अपनी अनगिनत दयाओं से हमें सम्मानित किया। उसकी नेमतों की कोई सीमा नहीं है; उनका प्रतिफल किसी भी बदले और इनाम की कल्पना से कहीं अधिक है, और उनकी व्यापकता इतनी अनंत है कि मानव समझ-बूझ की पहुँच से हमेशा परे है। उसने लोगों को इस ओर बुलाया कि वे उसकी नेमतों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें, ताकि वह उनकी नेमतों में और वृद्धि करे। उसने अपनी अपार कृपाओं के माध्यम से लोगों को अपना शुक्र अदा करने की ओर प्रेरित किया और अपनी नेमतों की ओर बुलाकर उन्हें और भी बढ़ा दिया।
اَلْحَمْدُللَّـهِ عَلی ما اَنْعَمَ، وَ لَهُ الشُّكْرُ عَلی ما اَلْهَمَ، وَ الثَّناءُ بِما قَدَّمَ، مِنْ عُمُومِ نِعَمٍ اِبْتَدَاَها، وَ سُبُوغِ الاءٍ اَسْداها، وَ تَمامِ مِنَنٍ اَوْلاها، جَمَّ عَنِ الْاِحْصاءِ عَدَدُها، وَ نَأی عَنِ الْجَزاءِ اَمَدُها، وَ تَفاوَتَ عَنِ الْاِدْراكِ اَبَدُها، وَ نَدَبَهُمْ لاِسْتِزادَتِها بِالشُّكْرِ لاِتِّصالِها، وَ اسْتَحْمَدَ اِلَی الْخَلائِقِ بِاِجْزالِها، وَ ثَنی بِالنَّدْبِ اِلی اَمْثالِها.
अल्हमदो लिल्लाहे अला मा अन्अमा, वलहुश शुक्रो अला मा अलहमा, वस सनाओ बेमा कद्दमा, मिन उमूमे नेअमिन इब्तदाहा, व सूबूग़िल अस असदाहा, व तमामे मेननिन ओलाहा, जम्मा अनिल एहसा ए अददोहा, व नाया अनिल जज़ाए अमदोहा, व तफ़ावता अनिल इदराके अबदोहा, व नदबहुम लेइस्तेज़ादतेहा बिश्शुक्रे ले इत्तेसालेहा, वस्तहमदा एलल ख़लाएक़े बेइजज़ालेहा, व सना बिन्नदबे एला अमसालेहा
मैं गवाही देती हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है और उसका कोई साझीदार नहीं है। तौहीद ऐसा वचन है, जिसमें निष्ठा को उसकी आत्मा और वास्तविकता बनाया गया है। दिल में उसकी गवाही को स्थापित किया गया है, ताकि उसके द्वारा दृष्टि और विचार प्रकाशित हों। वह ऐसा ईश्वर है जिसे आंखों से देखा नहीं जा सकता और न ही जीभ के द्वारा उसका सही-सही वर्णन किया जा सकता है। वह किस प्रकार का है, उसकी वास्तविकता कैसी है—यह बात किसी कल्पना में नहीं आ सकती।
وَ اَشْهَدُ اَنْ لااِلهَ اِلاَّ اللَّـهُ وَحْدَهُ لاشَریكَ لَهُ، كَلِمَةٌ جَعَلَ الْاِخْلاصَ تَأْویلَها، وَ ضَمَّنَ الْقُلُوبَ مَوْصُولَها، وَ اَنارَ فِی التَّفَكُّرِ مَعْقُولَها، الْمُمْتَنِعُ عَنِ الْاَبْصارِ رُؤْیتُهُ، وَ مِنَ الْاَلْسُنِ صِفَتُهُ، وَ مِنَ الْاَوْهامِ كَیفِیّتُهُ
व अश्हदु अन ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीक लहू, कलिमतुन जअलल इख़्लासा तअवीलहा, व ज़म्मनल क़ुलूबा मौसूलहा, व अनारा फ़ित-तफ़क्कुरे मअक़ूलहा, अल-मुम्तनिउ अनिल-अब्सारे रुईयतूहु, व मिनल-अल्सुने सिफ़तूहु, व मिनल-अवहामे कैफ़िय्यतूहु।
उसने इस संसार को शून्य से पैदा किया और उसे पैदा करने के लिए वह किसी का मोहताज नहीं था। उसने अपनी इच्छा और मर्जी के अनुसार सृष्टि की। संसार को पैदा करने में उसका उद्देश्य अपने लिए कोई लाभ प्राप्त करना नहीं था। उसने संसार को इसलिए पैदा किया ताकि अपनी बुद्धिमत्ता और ज्ञान को प्रकट करे, अपनी आज्ञापालन की याद दिलाए, अपनी शक्ति का प्रदर्शन करे, अपने बंदों को अपनी उपासना के लिए प्रेरित करे और अपनी पुकार को फैलाए। उसने अपनी आज्ञा का पालन करने के लिए पुरस्कार निर्धारित किया और अवज्ञा के लिए दंड निश्चित किया, ताकि अपने बंदों को अपने अज़ाब से बचाए और उन्हें जन्नत की ओर ले जाए।
اِبْتَدَعَ الْاَشْیاءَ لامِنْ شَیءٍ كانَ قَبْلَها، وَ اَنْشَاَها بِلاَاحْتِذاءِ اَمْثِلَةٍ اِمْتَثَلَها، كَوَّنَها بِقُدْرَتِهِ وَ ذَرَأَها بِمَشِیّتِهِ، مِنْ غَیرِ حاجَةٍ مِنْهُ اِلی تَكْوینِها، وَ لافائِدَةٍ لَهُ فی تَصْویرِها، اِلاَّ تَثْبیتاً لِحِكْمَتِهِ وَ تَنْبیهاً عَلی طاعَتِهِ، وَ اِظْهاراً لِقُدْرَتِهِ وَ تَعَبُّداً لِبَرِیّتِهِ، وَ اِعْزازاً لِدَعْوَتِهِ، ثُمَّ جَعَلَ الثَّوابَ عَلی طاعَتِهِ، وَ وَضَعَ الْعِقابَ عَلی مَعْصِیتِهِ، ذِیادَةً لِعِبادِهِ مِنْ نِقْمَتِهِ وَ حِیاشَةً لَهُمْ اِلی جَنَّتِهِ
इब्तदअल-अश्या-ला-मिन शैइन काना क़ब्लहा, व अन्शअहा बिला-इहतिज़ाइ अम्सिलतिन इम्तसिलहा, कव्वनहा बेक़ुदरतेही व ज़रअहा बिमशिय्यतेही, मिन ग़ैरे हाजतिन मिन्हो इला तक्वीनेहा, व ला फ़ाइदतिन लहू फ़ी तस्वीरेहा, इल्ला तस्बीतन लिहिकमतेही व तम्बीहन अला ताअतेही, व इज़्हारन लिक़ुदरतेही व तअब्बुदन लेबरिय्यतेही, व इअज़ाज़न लेदअवतेही, सुम्मा जअलस्सवाबा अला ताअतेही, व वज़अल-इक़ाबा अला मअसियतेही, ज़ियादतन लि-इबादेही मिन निक़मतेही व हियाशतन लहुम इला जन्नतेही।
और मैं गवाही देती हूँ कि मेरे पिता मुहम्मद (स) अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं। अल्लाह ने उन्हें रसूल बनाए जाने से पहले ही चुन लिया था, उन्हें अपना पैग़म्बर घोषित करने से पहले ही उनके लिए यह स्थान निर्धारित कर दिया था और उन्हें भेजे जाने से पहले ही उन्हें इस महान दायित्व के लिए तैयार कर दिया था। यह उस समय की बात है जब सारी सृष्टि अज्ञानता और अदृश्यता के पर्दों में छिपी हुई थी, गहरे अंधकार में डूबी हुई थी और अस्तित्व तथा अनस्तित्व की सीमा पर थी। अल्लाह ने अपने असीम ज्ञान के आधार पर उन्हें पैग़म्बर बनाकर भेजा, क्योंकि वह कार्यों के परिणामों को भली-भाँति जानता था, समय की घटनाओं पर पूर्ण अधिकार और ज्ञान रखता था और अपनी निश्चित की हुई तक़दीरों (निर्णयों) के घटित होने से पूरी तरह परिचित था।
وَ اَشْهَدُ اَنَّ اَبی مُحَمَّداً عَبْدُهُ وَ رَسُولُهُ، اِخْتارَهُ قَبْلَ اَنْ اَرْسَلَهُ، وَ سَمَّاهُ قَبْلَ اَنْ اِجْتَباهُ، وَ اصْطَفاهُ قَبْلَ اَنْ اِبْتَعَثَهُ، اِذ الْخَلائِقُ بِالْغَیبِ مَكْنُونَةٌ، وَ بِسَتْرِ الْاَهاویلِ مَصُونَةٌ، وَ بِنِهایةِ الْعَدَمِ مَقْرُونَةٌ، عِلْماً مِنَ اللَّـهِ تَعالی بِمائِلِ الْاُمُورِ، وَ اِحاطَةً بِحَوادِثِ الدُّهُورِ، وَ مَعْرِفَةً بِمَواقِعِ الْاُمُورِ.
व अश्हदो अन्ना अबी मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू, इख़्तारहू क़ब्ला अन अर्सलहू, व सम्माहु क़ब्ला अन इज्तबाहू, वस्तफ़ाहू क़ब्ला अन इब्तअसहू, इज़िल-ख़लाइक़ु बिल-ग़ैबे मक्नूनतुन, व बिसित्रिल-अहावीले मसूनतुन, व बेनेहायतिल-अदमे मक़रूनतुन, इल्मन मिनल्लाहे तआला बेमाइलिल-उमूरे, व इहाततन बेहवादिसिद-दुहूरे, व मअरेफ़तन बिमवाक़ेअिल-उमूर।
अल्लाह ने उन्हें इसलिए भेजा ताकि वह उसके आदेश को पूर्ण करे, उसके निश्चित फ़ैसले को लागू करे और अपनी निर्धारित तक़दीरों को पूरा करे। उस समय पैग़म्बर (स) ने देखा कि विभिन्न समुदाय अलग-अलग धर्मों और मान्यताओं में बँटे हुए थे। कुछ लोग जलती हुई अग्नियों के सामने उपासना में लगे हुए थे, कुछ तराशी हुई मूर्तियो की पूजा कर रहे थे, और उस परमेश्वर का इनकार कर रहे थे जिसकी पहचान अल्लाह ने मनुष्य की फ़ितरत में रखी थी।
اِبْتَعَثَهُ اللَّـهُ اِتْماماً لِاَمْرِهِ، وَ عَزیمَةً عَلی اِمْضاءِ حُكْمِهِ، وَ اِنْفاذاً لِمَقادیرِ رَحْمَتِهِ، فَرَأَی الْاُمَمَ فِرَقاً فی اَدْیانِها، عُكَّفاً عَلی نیرانِها، عابِدَةً لِاَوْثانِها، مُنْكِرَةً للَّـهِ مَعَ عِرْفانِها.
इब्तअसहुल्लाहो इत्मामन लेअम्रिही, व अज़ीमतन अला इमज़ाए हुक्मेही, व इन्फ़ाज़न लेमक़ादीरे रहमतेही, फ़राअल-उममा फ़ेरक़न फ़ी अदयानेहा, उक्कफ़न अला नीरानेहा, आबेदतन लिऔसानेहा, मुन्किरतन लिल्लाहे मअ इरफ़ानेहा।
फिर महान और सर्वशक्तिमान अल्लाह ने मेरे पिता मुहम्मद (स) के माध्यम से उन अंधकारों को प्रकाश से बदल दिया, दिलों की कठिनाइयों और उलझनों को दूर कर दिया और सत्य को देखने की राह में आने वाली रुकावटों को समाप्त कर दिया। उन्होंने लोगों के बीच मार्गदर्शन का ध्वज लेकर खड़े होकर उन्हें गुमराही से मुक्ति दिलाई, उनकी आँखों को सत्य के लिए खोल दिया, उन्हें सुदृढ़ और दृढ़ धर्म की ओर मार्गदर्शन दिया और उन्हें सीधे रास्ते की ओर आमंत्रित किया।
فَاَنارَ اللَّـهُ بِاَبی مُحَمَّدٍ صَلَّی اللَّـهُ عَلَیهِ و الِهِ ظُلَمَها، وَ كَشَفَ عَنِ الْقُلُوبِ بُهَمَها، وَ جَلی عَنِ الْاَبْصارِ غُمَمَها، وَ قامَ فِی النَّاسِ بِالْهِدایةِ، فَاَنْقَذَهُمْ مِنَ الْغِوایةِ، وَ بَصَّرَهُمْ مِنَ الْعِمایةِ، وَ هَداهُمْ اِلَی الدّینِ الْقَویمِ، وَ دَعاهُمْ اِلَی الطَّریقِ الْمُسْتَقیمِ.
फ़अनारल्लाहु बेअबी मुहम्मदिन् सल्लल्लाहु अलैहे व आलिही ज़ुलमहा़, व कशफ़ा अनिल-क़ुलूबे बुहमहा, व जल्ला अनिल-अब्सारे ग़ुममहा़, व क़ामा फ़िन्नासे बिल-हिदायते, फ़अन्क़ज़हुम मिनल-ग़ेवायते, व बस्सरहुम मिनल-इमायते, व हदाहुम इला अद-दीनिल-क़वीमे, व दआहुम इला अत-तरीक़िल-मुस्तक़ीम।
जब तक कि अल्लाह ने उन्हें अपनी ओर बुला लिया ऐसा बुलावा जो अपनी दया, सम्मान और प्रेम के साथ था। उस समय पैग़म्बर (स) ने इस संसार की कठिनाइयों और कष्टों से मुक्ति पाकर शांति और आराम प्राप्त किया। नेक और पवित्र फ़रिश्ते उनके चारों ओर उपस्थित थे, क्षमाशील प्रभु की प्रसन्नता ने उन्हें अपने घेरे में ले लिया था और वे अल्लाह की रहमत के सान्निध्य में पहुँच गए थे। अतः मेरे पिता, अल्लाह के पैग़म्बर, उसके अमानतदार, उसकी सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ और उसके चुने हुए बंदे पर अल्लाह की दया और कृपा हो। उन पर अल्लाह की ओर से शांति, रहमत और बरकतें सदैव बनी रहें।
ثُمَّ قَبَضَهُ اللَّـهُ اِلَیهِ قَبْضَ رَأْفَةٍ وَ اخْتِیارٍ، وَ رَغْبَةٍ وَ ایثارٍ، فَمُحَمَّدٌ صَلَّی اللَّـهُ عَلَیهِ و الِهِ مِنْ تَعَبِ هذِهِ الدَّارِ فی راحَةٍ، قَدْ حُفَّ بِالْمَلائِكَةِ الْاَبْرارِ وَ رِضْوانِ الرَّبِّ الْغَفَّارِ، وَ مُجاوَرَةِ الْمَلِكِ الْجَبَّارِ، صَلَّی اللَّـهُ عَلی أَبی نَبِیهِ وَ اَمینِهِ وَ خِیرَتِهِ مِنَ الْخَلْقِ وَ صَفِیهِ، وَ السَّلامُ عَلَیهِ وَ رَحْمَةُاللَّـهِ وَ بَرَكاتُهُ.
सुम्मा क़बज़हुल्लाहु इलैहे क़ब्ज़ रअफ़तिन व इख़्तियार, व रग़्बतिन व ईसार, फ़मुहम्मदुन सल्लल्लाहु अलैहे व आलेही मिन तअबे हाज़ेहिद-दारे फ़ी राहतिन, क़द हुफ़्फ़ा बिल-मलाइकतिल-अबरारे व रिज़्वानिर-रब्बिल-ग़फ़्फ़ारे, व मुजावरतिल-मलेकिल-जब्बारे, सल्लल्लाहु अला अबी नबिय्यिहि व अमीनेही व ख़ीरतेही मिनल-ख़ल्क़े व सफ़िय्येही, वस्सलामो अलैहि व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु।
हे अल्लाह के बंदो! तुम उसके आदेशों और निषेधों के ध्वजवाहक हो, उसके धर्म और उसकी प्रकाशना के वाहक हो, तुम एक-दूसरे के बीच अल्लाह की अमानतों के रक्षक हो और उसकी ओर से लोगों तक संदेश पहुँचाने वाले हो। तुम्हारे बीच अल्लाह के सत्य का मार्गदर्शन करने वाला नेतृत्व मौजूद है और यह वह वचन है जिसे उसने पहले ही तुम्हारी ओर भेजा है तथा वह अमानत और विरासत है जिसे उसने तुम्हारे लिए बाकी रखा है।
اَنْتُمْ عِبادَ اللَّـهِ نُصُبُ اَمْرِهِ وَ نَهْیهِ، وَ حَمَلَةُ دینِهِ وَ وَحْیهِ، وَ اُمَناءُ اللَّـهِ عَلی اَنْفُسِكُمْ، وَ بُلَغاؤُهُ اِلَی الْاُمَمِ، زَعیمُ حَقٍّ لَهُ فیكُمْ، وَ عَهْدٍ قَدَّمَهُ اِلَیكُمْ، وَ بَقِیةٍ اِسْتَخْلَفَها عَلَیكُمْ:
अन्तुम इबादल्लाहे नुसुबु अम्रेही व नह्येही, व हमलतु दीनेही व वह्येही, व उमनाउल्लाहे अला अन्फ़ुसिकुम, व बुलग़ाउहु एलल-उममे, ज़ईमु हक़्क़िन लहू फ़ीकुम, व अह्दिन क़द्दमहु इलैकुम, व बक़िय्यतिन इस्तख़लफ़हा अलैकुम:
वह अल्लाह की ओर से बोलने वाली पुस्तक, सत्य बोलने वाला क़ुरआन, चमकता हुआ प्रकाश और उज्ज्वल किरण है, उसकी शिक्षाएँ और प्रमाण स्पष्ट हैं, उसके आंतरिक रहस्य प्रकट हैं और उसकी बाहरी निशानियाँ उजागर हैं, उसका अनुसरण करने वाले संसार के लोगों के लिए ईर्ष्या और सम्मान का विषय हैं, और उसकी पैरवी करना अल्लाह की प्रसन्नता का कारण बनता है, उसे ध्यानपूर्वक सुनना मुक्ति और मार्गदर्शन का साधन है। इसी के माध्यम से अल्लाह के प्रकाशमय प्रमाणों, स्पष्ट किए गए अनिवार्य कर्तव्यों, उन हराम कार्यों से जिनसे रोका गया है, उसकी स्पष्ट गवाहियों, पर्याप्त तर्कों, प्रशंसनीय गुणों, दी गई सहूलियतों और निर्धारित किए गए अनिवार्य नियमों को जाना जा सकता है।
كِتابُ اللَّـهِ النَّاطِقُ وَ الْقُرْانُ الصَّادِقُ، و النُّورُ السَّاطِعُ وَ الضِّیاءُ اللاَّمِعُ، بَینَةً بَصائِرُهُ، مُنْكَشِفَةً سَرائِرُهُ، مُنْجَلِیةً ظَواهِرُهُ، مُغْتَبِطَةً بِهِ اَشْیاعُهُ، قائِداً اِلَی الرِّضْوانِ اِتِّباعُهُ، مُؤَدٍّ اِلَی النَّجاةِ اسْتِماعُهُ، بِهِ تُنالُ حُجَجُ اللَّـهِ الْمُنَوَّرَةُ، وَ عَزائِمُهُ الْمُفَسَّرَةُ، وَ مَحارِمُهُ الْمُحَذَّرَةُ، وَ بَیّناتُهُ الْجالِیةُ، وَ بَراهینُهُ الْكافِیةُ، وَ فَضائِلُهُ الْمَنْدُوبَةُ، وَ رُخَصُهُ الْمَوْهُوبَةُ، وَ شَرائِعُهُ الْمَكْتُوبَةُ.
किताबुल्लाहिन-नातेक़ो वल-क़ुरआनुस-सादिक़, वन्नूरुस्सातिउ वज़्ज़ियाउल्लामिउ, बय्यिनतन बसाइरुहु, मुन्कशिफ़तन सराइरुहु, मुन्जलियतन ज़वाहिरुहु, मुग़्तबिततन बेही अशयाउहु, क़ाइदन इलर रिज़ावाने इत्तिबाउहु, मुअद्दिन इलन नजाते इस्तिमाउहु, बेही तुनालु हुज्जजुल्लाहिल-मुनव्वरतु, व अज़ाइमुहुल-मुफ़स्सरतु, व मह़ारिमुहुल-मुहज़्ज़रतु, व बय्यिनातुहुल-जालियतु, व बराहीनुहुल-काफ़ियतु, व फ़ज़ाइलुहुल-मन्दूबतु, व रुख़सूहुल-मौहूबतु, व शराइउहुल-मक्तूबतु।
फिर महान अल्लाह ने ईमान को तुम्हें शिर्क से पवित्र करने, नमाज़ को तुम्हें घमंड और अहंकार से दूर करने, ज़कात को आत्मा की शुद्धि और रोज़ी में वृद्धि, और रोज़े को निष्ठा और सच्ची भक्ति को दृढ़ करने, हज को धर्म की मजबूती, न्याय और इंसाफ़ को दिलों में मेल-मिलाप और शांति स्थापित करने, और हम अहल-ए-बैत की आज्ञापालन को उम्मतों और समाजों में व्यवस्था बनाए रखने, और इमामत को लोगों को मतभेद और बिखराव से मुक्ति दिलाने, जिहाद को इस्लाम की प्रतिष्ठा और सम्मान, और धैर्य को अल्लाह के पुरस्कार और प्रतिफल प्राप्त करने में सहायता का साधन बनाया।
فَجَعَلَ اللَّـهُ الْایمانَ تَطْهیراً لَكُمْ مِنَ الشِّرْكِ، وَ الصَّلاةَ تَنْزیهاً لَكُمْ عَنِ الْكِبْرِ، وَ الزَّكاةَ تَزْكِیةً لِلنَّفْسِ وَ نِماءً فِی الرِّزْقِ، وَ الصِّیامَ تَثْبیتاً لِلْاِخْلاصِ، وَ الْحَجَّ تَشْییداً لِلدّینِ، وَ الْعَدْلَ تَنْسیقاً لِلْقُلُوبِ، وَ طاعَتَنا نِظاماً لِلْمِلَّةِ، وَ اِمامَتَنا اَماناً لِلْفُرْقَةِ، وَ الْجِهادَ عِزّاً لِلْاِسْلامِ، وَ الصَّبْرَ مَعُونَةً عَلَی اسْتیجابِ الْاَجْرِ.
फ़जअलल्लाहुल-ईमाना ततहीरन लकुम मिनश-शिर्के, वस्सलाता तन्ज़ीहन लकुम अनिल-किब्रे, वज़्ज़काता तज़्कियतन लिन्नफ़्से व नोमाअन फ़िर्रिज़्क़े, वस्सेयामा तस्बीतन लिल-इख़्लासे, वल-हज्जा तशयीदन लिद्दीने, वल-अद्ला तन्सीक़न लिल-क़ुलूबे, व ताअतना नेज़ामन लिल-मिल्लते, व इमामतना अमानन लिल-फ़ुर्क़ते, वल-जिहादा इज़्ज़न लिल-इस्लामे, वस्सब्रा मऊनतन अला इस्तीजाबिल-अज्र।
और अच्छाइयों का आदेश देना को समाज की भलाई और सुधार, माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार को अपनी नाराज़गी और प्रकोप से बचने, और रिश्तेदारों से संबंध बनाए रखने को आयु में वृद्धि और जनसंख्या में विस्तार, न्यायपूर्ण प्रतिशोध को लोगों के जीवन और रक्त की सुरक्षा, मन्नतों को पूरा करने को अपनी क्षमा और दया के योग्य बनने का माध्यम बनाया, और माप-तौल में सावधानी और न्याय को कमी करने और धोखाधड़ी से बचाने के लिए निर्धारित किया।
وَ الْاَمْرَ بِالْمَعْرُوفِ مَصْلِحَةً لِلْعامَّةِ، وَ بِرَّ الْوالِدَینِ وِقایةً مِنَ السَّخَطِ، وَ صِلَةَ الْاَرْحامِ مَنْساءً فِی الْعُمْرِ وَ مَنْماةً لِلْعَدَدِ، وَ الْقِصاصَ حِقْناً لِلدِّماءِ، وَ الْوَفاءَ بِالنَّذْرِ تَعْریضاً لِلْمَغْفِرَةِ، وَ تَوْفِیةَ الْمَكائیلِ وَ الْمَوازینِ تَغْییراً لِلْبَخْسِ.
वल-अम्रा बिल-मअरूफ़े मस्लहतन लिल-आम्मते, व बिर्रल-वालिदैने वेक़ायतन मिनस्सख़ते, व सिलतल-अर्हामे मन्सअतन फ़िल-उम्रे व मन्मातन लिल-अददे, वल-क़िसासा हिक़्नन लिद्देमाइ, वल-वफ़ा बिन्नज़्रे तअरीज़न लिल-मग़फ़िरते, व तौफ़ियतल-मकायीले वल-मवाज़ीने तग़यीरन लिल-बख़्से।
और शराब पीने से रोकने का आदेश दिया ताकि मनुष्य बुराइयों और गंदगी से पवित्र रह सके, किसी पर झूठा आरोप लगाने और अनुचित दोष लगाने को हराम किया ताकि लोग अल्लाह की रहमत से दूर न हों, चोरी से बचने को पवित्रता और चरित्र की रक्षा, और शिर्क को निषिद्ध किया ताकि लोग केवल अल्लाह की एकता में पूर्ण निष्ठा और शुद्ध एकेश्वरवाद को अपनाएँ।
وَ النَّهْی عَنْ شُرْبِ الْخَمْرِ تَنْزیهاً عَنِ الرِّجْسِ، وَ اجْتِنابَ الْقَذْفِ حِجاباً عَنِ اللَّـعْنَةِ، وَ تَرْكَ السِّرْقَةِ ایجاباً لِلْعِصْمَةِ، وَ حَرَّمَ اللَّـهُ الشِّرْكَ اِخْلاصاً لَهُ بِالرُّبوُبِیةِ.
वन-नह्ये अन शुरबिल-ख़म्रे तन्ज़ीहन अनिर-रिज्से, वज्तिनाबल-क़ज़्फ़े हिजाबन अनिल-लानते, व तर्कस्सिरक़ते ईजाबन लिल-इस्मते, व हर्रमल्लाहुश-शिर्का इख़्लासन लहू बिर्रुबूबियते।
अतः जिस प्रकार ईश्वर से डरने का हक़ है, उसी प्रकार उससे डरते रहो और इस संसार से विदा न होना मगर इस अवस्था में कि तुम मुसलमान हो, और अल्लाह के उन आदेशों का पालन करो जिनका उसने तुम्हें निर्देश दिया है और उन कार्यों से बचो जिनसे उसने रोका है, निस्संदेह अल्लाह से वास्तविक भय और सावधानी रखने वाले वही हैं जो ज्ञान रखने वाले हैं। फिर उन्होंने फ़रमाया:
فَاتَّقُوا اللَّـهَ حَقَّ تُقاتِهِ، وَ لاتَمُوتُنَّ اِلاَّ وَ اَنْتُمْ مُسْلِمُونَ، وَ اَطیعُوا اللَّـهَ فیما اَمَرَكُمْ بِهِ وَ نَهاكُمْ عَنْهُ، فَاِنَّهُ اِنَّما یخْشَی اللَّـهَ مِنْ عِبادِهِ الْعُلَماءُ. ثم قالت:
फ़त्तक़ुल्लाहा हक़्क़ा तुक़ातेही, व ला तमूतुन्ना इल्ला व अन्तुम मुस्लिमून, व अतीउल्लाहा फ़ीमा अमरकुम बेही व नहाकुम अन्हो, फ़इन्नहू इन्नमा यख़्शल्लाहा मिन इबादेहिल-उलमा। सुम्म क़ालत:
हे लोगो! जान लो कि मैं फ़ातिमा हूँ और मेरे पिता मुहम्मद (स) हैं, जो बात मैं आरंभ में कह रही हूँ, वही अंत में भी कहूँगी, मेरी बात में न कोई गलती है और न ही इसमें कोई अन्याय है, तुम्हारे बीच एक ऐसे पैग़म्बर भेजे गए जो तुम्हारी कठिनाइयों और कष्टों को देखकर व्यथित होते थे, तुम्हारी भलाई के लिए अत्यंत चिंतित रहते थे और ईमान वालों के प्रति अत्यंत दयालु और करुणामय थे।
اَیهَا النَّاسُ! اِعْلَمُوا اَنّی فاطِمَةُ وَ اَبی مُحَمَّدٌ، اَقُولُ عَوْداً وَ بَدْءاً، وَ لااَقُولُ ما اَقُولُ غَلَطاً، وَ لااَفْعَلُ ما اَفْعَلُ شَطَطاً، لَقَدْ جاءَكُمْ رَسُولٌ مِنْ اَنْفُسِكُمْ عَزیزٌ عَلَیهِ ما عَنِتُّمْ حَریصٌ عَلَیكُمْ بِالْمُؤْمِنینَ رَؤُوفٌ رَحیمٌ.
अय्युहन-नासो! एअलमू अन्नी फ़ातिमतो व अबी मुहम्मदुन, अक़ूलु औदन व बद्अन, व ला अक़ूलु मा अक़ूलु ग़लतन, व ला अफ़अलो मा अफ़अलो शततन, लक़द जाअकुम रसूलुन मिन अन्फ़ुसेकुम अज़ीज़ुन अलैहे मा अनित्तुम, हरीसुन अलैकुम बिल-मुोमेनीना रऊफ़ुर्रहीम।
अतः यदि तुम उन्हें पहचानते हो तो जान लोगे कि वे तुम्हारी स्त्रियों में मेरे पिता थे, और तुम्हारे पुरुषों में मेरे चचेरे भाई भाई हैं, कितना ही महान और श्रेष्ठ है वह व्यक्तित्व, जिससे मेरा यह संबंध जुड़ा हुआ है।
فَاِنْ تَعْزُوهُ وَتَعْرِفُوهُ تَجِدُوهُ اَبی دُونَ نِسائِكُمْ،وَ اَخَا ابْنِ عَمّی دُونَ رِجالِكُمْ، وَ لَنِعْمَ الْمَعْزِی اِلَیهِ صَلَّی اللَّـهُ عَلَیهِ وَ الِهِ..
फ़इन तअज़ूहु व तअरिफ़ूहु तजिदूहु अबी दूना निसाइकुम, व अख़ा इब्ने अम्मी दूना रि‍जालिकुम, व लनेअ्मल-मअज़िय्यु इलैहे सल्लल्लाहु अलैहे व आलेही।
उन्होंने अपने दायित्व को चेतावनी के माध्यम से पूरा किया, वे बहुदेववादियों के रास्ते से अलग रहे, उनके विरुद्ध संघर्ष किया, उनके अहंकार और विरोध को परास्त किया और उन्हें सत्य की ओर बुलाया, उन्होंने अपने प्रभु की ओर लोगों को बुद्धिमत्ता, अच्छी नसीहत और उत्तम उपदेश के साथ आमंत्रित किया, वे मूर्तियों को नष्ट करते रहे और सत्य के विरोध में खड़े लोगों के घमंड को तोड़ते रहे, यहाँ तक कि उनके समूह बिखर गए और वे पराजित होकर मैदान से पीछे हट गए।
فَبَلَّغَ الرِّسالَةَ صادِعاً بِالنَّذارَةِ، مائِلاً عَنْ مَدْرَجَةِ الْمُشْرِكینَ، ضارِباً ثَبَجَهُمْ، اخِذاً بِاَكْظامِهِمْ، داعِیاً اِلی سَبیلِ رَبِّهِ بِالْحِكْمَةِ و الْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ، یجُفُّ الْاَصْنامَ وَ ینْكُثُ الْهامَّ، حَتَّی انْهَزَمَ الْجَمْعُ وَ وَ لَّوُا الدُّبُرَ.
फ़बल्लगर्रिसालत सादिअन बिन्नज़ारते, माइ़लन अन मदरजतिल-मुश्रिकीन, ज़ारिबन सबजहुम, आख़ेज़न बिअक़्ज़ामिहिम, दाइयन इला सबीले रब्बेही बिल-हिक्मते वल-मौइज़तिल-हसनते, यजुफ़्फ़ुल-अस्नाम व यनकुसुल-हाम्म, हत्ता इनहज़मल-जम्उ व वल्लुद-दुबुर।
यहाँ तक कि जब उज्ज्वल सुबह रात के पर्दे को चीरकर प्रकट हुई, सत्य ने अपने चेहरे से पर्दा हटा दिया, धर्म का नेतृत्व करने वाला बोल उठा और शैतानों की आवाज़ें शांत हो गईं, कपट के काँटे रास्ते से हटा दिए गए, कुफ़्र और आपसी विभाजन की गाँठें खुल गईं, और तुम्हारे होंठ एकेश्वरवाद की गवाही के उच्चारण के लिए खुल गए, यह सब ऐसे लोगों के बीच हुआ जो कमज़ोर और संघर्षपूर्ण जीवन जी रहे थे, जिनके चेहरे धूप और कठिनाइयों से प्रभावित थे और जिनके पेट भूख के कारण पीठ से लगे हुए थे।
حَتَّی تَفَرَّی اللَّـیلُ عَنْ صُبْحِهِ، وَ اَسْفَرَ الْحَقُّ عَنْ مَحْضِهِ، و نَطَقَ زَعیمُالدّینِ، وَ خَرَسَتْ شَقاشِقُ الشَّیاطینِ، وَ طاحَ وَ شیظُ النِّفاقِ، وَ انْحَلَّتْ عُقَدُ الْكُفْرِ وَ الشَّقاقِ، وَ فُهْتُمْ بِكَلِمَةِ الْاِخْلاصِ فی نَفَرٍ مِنَ الْبیضِ الْخِماصِ.
हत्ता तफ़र्रल-लैलो अन सुबहेही, व अस्फ़रल-हक़्क़ो अन मह़्ज़ेही, व नतक़ ज़ईमुद्दीने, व ख़रसत शक़ाशेक़ुश-शयातीन, व ताहा वश़ीज़ुन-निफ़ाक़े, वन्हल्लत उक़दुल-कुफ़्रे वश्शिक़ाक़े, व फ़ुहतुम बिकलिमतिल-इख़्लासे फ़ी नफ़रिन मिनल-बैज़िल-ख़ेमासे।
और तुम उस समय आग की खाई के किनारे खड़े थे, तुम एक घूंट पानी की तरह थे जिसे पाने के लिए लालची लोग लालायित रहते थे, तुम उस चिंगारी के समान थे जो तुरंत बुझ जाती है, राह चलने वालों के पैरों तले कुचले जाते थे, तुम ऐसा पानी पीते थे जिसे ऊँटों ने गंदा कर दिया था, और पेड़ों की छाल को अपना भोजन बनाते थे, तुम अपमानित और तिरस्कृत जीवन जी रहे थे, तुम्हें भय रहता था कि तुम्हारे आसपास रहने वाले लोग तुम्हें उठा ले जाएँगे और तुम्हारा अस्तित्व मिटा देंगे, फिर अल्लाह तआला ने तुम्हें ऐसी परिस्थितियों के बाद उस पैग़म्बर (स) के माध्यम से मुक्ति प्रदान की, यह उस समय हुआ जब तुमने शक्तिशाली लोगों, अरब के भेड़ियों जैसे अत्याचारी समूहों और अहल-ए-किताब के विद्रोही लोगों के हाथों अनेक कठिनाइयाँ और कष्ट सहे थे।
وَ كُنْتُمْ عَلی شَفا حُفْرَةٍ مِنَ النَّارِ، مُذْقَةَ الشَّارِبِ، وَ نُهْزَةَ الطَّامِعِ، وَ قُبْسَةَ الْعِجْلانِ، وَ مَوْطِیءَ الْاَقْدامِ، تَشْرَبُونَ الطَّرْقَ، وَ تَقْتاتُونَ الْقِدَّ، اَذِلَّةً خاسِئینَ، تَخافُونَ اَنْ یتَخَطَّفَكُمُ النَّاسُ مِنْ حَوْلِكُمْ، فَاَنْقَذَكُمُ اللَّـهُ تَبارَكَ وَ تَعالی بِمُحَمَّدٍ صَلَّی اللَّـهُ عَلَیهِ وَ الِهِ بَعْدَ اللَّـتَیا وَ الَّتی، وَ بَعْدَ اَنْ مُنِی بِبُهَمِ الرِّجالِ، وَ ذُؤْبانِ الْعَرَبِ، وَ مَرَدَةِ اَهْلِ الْكِتابِ.
व कुंतुम अला शफ़ा हुफ़्रतिन मिनन-नारे, मुज़्क़तश-शारिबे, व नुह्ज़तत-तामिए, व क़ुब्सतल-इजलाने, व मव्तिअल-अक़्दामे, तशरबूनत-तर्क़ा, व तक़्तातूनल-क़िद्दा, अज़िल्लतन ख़ासिईन, तख़ाफ़ूना अय्यतख़तफ़कुमुन-नासो मिन ह़ौलिकुम, फ़अन्क़ज़कुमुल्लाहो तबारका व तआला बिमुहम्मदिन् सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही बअ्दल्लतिया वल्लती, व बअ्दा अन मुनिया बेबुह़मिर-रेजाले, व ज़ुअ्बानिल-अरबे, व मरदतिल-अह़लिल-किताब।
जब भी युद्ध की आग भड़काई जाती, अल्लाह उसे बुझा देता, और जब कभी शैतान अपना सिर उठाता या बहुदेववादियों का कोई अजगर समान शक्तिशाली शत्रु अपना मुँह खोलता, तो पैग़म्बर (स) अपने भाई को उसके मुकाबले में भेज देते, वह तब तक वापस नहीं आते थे, जब तक शत्रुओं के सरों को धराशायी न कर देते और अपनी तलवार के वार से उनके भड़काए हुए युद्ध की आग को शांत न कर देते, वे अल्लाह के मार्ग में निरंतर संघर्ष करने वाले, उसके आदेशों को पूरा करने में पूरी मेहनत करने वाले, अल्लाह के रसूल (स) के अत्यंत निकट रहने वाले और अल्लाह के प्रिय बंदों में श्रेष्ठ स्थान रखने वाले थे, वे सदैव सत्य के लिए तत्पर, लोगों के हितैषी, ईमानदार सलाह देने वाले और अथक प्रयास करने वाले थे, और अल्लाह के मार्ग में उन्हें किसी निंदा करने वाले की निंदा का कोई भय नहीं था।
كُلَّما اَوْقَدُوا ناراً لِلْحَرْبِ اَطْفَأَهَا اللَّـهُ، اَوْ نَجَمَ قَرْنُ الشَّیطانِ، اَوْ فَغَرَتْ فاغِرَةٌ مِنَ الْمُشْرِكینَ، قَذَفَ اَخاهُ فی لَهَواتِها، فَلاینْكَفِیءُ حَتَّی یطَأَ جِناحَها بِأَخْمَصِهِ، وَ یخْمِدَ لَهَبَها بِسَیفِهِ، مَكْدُوداً فی ذاتِ اللَّـهِ، مُجْتَهِداً فی اَمْرِ اللَّـهِ، قَریباً مِنْ رَسُولِاللَّـهِ، سَیداً فی اَوْلِیاءِ اللَّـهِ، مُشَمِّراً ناصِحاً مُجِدّاً كادِحاً، لاتَأْخُذُهُ فِی اللَّـهِ لَوْمَةَ لائِمٍ.
कुल्लमा औक़दू नारन लिल-हरबे अत्फ़अहल्लाहु, औ नम ज क़र्नुश-शैताने, औ फ़ग़रत फ़ाग़िरतुन मिनल-मुश्रिकीन, क़ज़फ़ा अख़ाहु फ़ी लहवातेहा, फ़ला यन्कफ़िउ हत्ता यतअ जेनाहेहा बेअख़्मसेही, व युख़्मेदा लहबहा बिसैफ़ेही, मक्दूदन फ़ी ज़ातिल्लाहे, मुज्तहिदन फ़ी अम्रिल्लाहे, क़रीबन मिर्रसूलिल्लाहे, सय्यिदन फ़ी औलियाइल्लाहे, मुशम्मिरन नासिहन मुजिद्दन कादिहन, ला तअख़ुज़ुहू फ़िल्लाहे लौमतु लाइमिन।
और यह उस समय था जब तुम लोग आराम और सुख-सुविधा का जीवन जी रहे थे, सुरक्षा की गोद में आनंदपूर्वक रह रहे थे और प्रतीक्षा करते थे कि कठिनाइयाँ और परेशानियाँ हम पर आ पड़ें, तुम केवल समाचारों की प्रतीक्षा में रहते थे, और जब संघर्ष का समय आता तो पीछे हट जाते थे; युद्ध के मैदान में सामना करने के बजाय तुम भाग खड़े होते थे।
وَ اَنْتُمَ فی رَفاهِیةٍ مِنَ الْعَیشِ، و ادِعُونَ فاكِهُونَ آمِنُونَ، تَتَرَبَّصُونَ بِنَا الدَّوائِرَ، وَ تَتَوَكَّفُونَ الْاَخْبارَ، وَ تَنْكُصُونَ عِنْدَ النِّزالِ، وَ تَفِرُّونَ مِنَ الْقِتالِ.
व अन्तुम फ़ी रफ़ाहिय्यतिन मिनल-ऐशे, वादिऊना फ़ाकेहून आमेनूना, ततरब्बसूना बेना अद-दवाइरा, व ततवक्कफ़ूनल-अख़बार, व तन्कुसून इन्दन-नेज़ाले, व तफ़िर्रून मिनल-क़िताल।
और जब अल्लाह ने अपने पैग़म्बर (स) के लिए नबियों के निवास और अपने चुने हुए बंदों की विश्रामस्थली को चुना, तब तुम लोगों में कपट के लक्षण प्रकट होने लगे, धर्म का वस्त्र पुराना पड़ गया, गुमराह लोगों की चुप्पी टूट गई, और कम दर्जे वाले लोग सम्मान और प्रतिष्ठा के स्थान पर पहुँच गए, असत्य के अनुयायियों का पाला हुआ ऊँट आवाज़ करने लगा और तुम्हारे घरों में आ पहुँचा, शैतान ने अपने छिपने के स्थान से सिर बाहर निकाला और तुम्हें अपनी ओर बुलाया, उसने देखा कि तुम उसकी पुकार का उत्तर देने के लिए तैयार हो और उसके धोखे में आने के लिए उत्सुक हो, फिर उसने तुम्हें उठ खड़े होने के लिए उकसाया और देखा कि तुमने यह काम बहुत आसानी से कर लिया, उसने तुम्हें क्रोध दिलाया और पाया कि तुम क्रोधित हो चुके हो। फिर तुमने दूसरों के ऊँटों पर अपनी पहचान के निशान लगा दिए और उस चीज़ में प्रवेश कर गए जो तुम्हारा अधिकार नहीं थी।
فَلَمَّا اِختارَ اللَّـهُ لِنَبِیهِ‌دار اَنْبِیائِهِ وَ مَأْوی اَصْفِیائِهِ، ظَهَرَ فیكُمْ حَسْكَةُ النِّفاقِ، وَ سَمَلَ جِلْبابُ الدّینِ، وَ نَطَقَ كاظِمُ الْغاوینَ، وَ نَبَغَ خامِلُ الْاَقَلّینَ، وَ هَدَرَ فَنیقُ الْمُبْطِلینَ، فَخَطَرَ فی عَرَصاتِكُمْ، وَ اَطْلَعَ الشَّیطانُ رَأْسَهُ مِنْ مَغْرَزِهِ، هاتِفاً بِكُمْ، فَأَلْفاكُمْ لِدَعْوَتِهِ مُسْتَجیبینَ، وَ لِلْغِرَّةِ فیهِ مُلاحِظینَ، ثُمَّ اسْتَنْهَضَكُمْ فَوَجَدَكُمْ خِفافاً، وَ اَحْمَشَكُمْ فَاَلْفاكُمْ غِضاباً، فَوَسَمْتُمْ غَیرَ اِبِلِكُمْ، وَ وَرَدْتُمْ غَیرَ مَشْرَبِكُمْ.
फ़लम्मख़्तारल्लाहो लेनबिय्यिही दार अम्बियाइहे व मअ्वा अस्फ़ियाइही, ज़हर फ़ीकुम हस्कतुन-निफ़ाक़े, व समल जुल्बाबुद्दीने, व नतक़ काज़िमुल-ग़ावीन, व नबग़ ख़ामिलुल-अक़ल्लीन, व हदर फ़नीक़ुल-मुबतिलीन, फ़ख़तर फ़ी अरसातेकुम, व अत्लअश-शैतानो रअ्सहू मिन मग़रज़ेही, हातिफ़न बिकुम, फ़अल्फ़ाकुम लिदअवतेही मुस्तजीबीन, व लिल-ग़िर्रते फ़ीहे मुलाहेज़ीन, सुम्म स्तन्हज़कुम फ़वजदकुम ख़िफ़ाफ़न, व अह़्मशकुम फ़अल्फ़ाकुम ग़िज़ाबन, फ़वसम्तुम ग़ैर इबेलेकुम, व वरद्तुम ग़ैर मश्रबेकुम।
यह सब ऐसे समय में हुआ जब अभी अधिक समय भी नहीं बीता था, घाव की दरार अभी गहरी और खुली हुई थी, ज़ख्म भरा भी नहीं था और पैग़म्बर (स) को अभी दफ़न भी नहीं किया गया था, तुमने यह बहाना बनाया कि तुम्हें उपद्रव और अशांति का भय है। सुन लो! तुम स्वयं उसी फ़ितने में पड़ चुके हो, और निश्चय ही नरक ने काफ़िरों को चारों ओर से घेर रखा है।
هذا، وَ الْعَهْدُ قَریبٌ، وَالْكَلْمُ رَحیبٌ، وَ الْجُرْحُ لَمَّا ینْدَمِلُ، وَ الرَّسُولُ لَمَّا یُقْبَرُ، اِبْتِداراً زَعَمْتُمْ خَوْفَ الْفِتْنَةِ، اَلا فِی الْفِتْنَةِ سَقَطُوا، وَ اِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحیطَةٌ بِالْكافِرینَ.
हाज़ा, वल-अह्दु क़रीबुन, वल-कल्मु रहीबुन, वल-जुरहो लम्मा यन्दमिलु, वर्रसूलु लम्मा युक़्बरु, इब्तिदारन ज़अमतुम ख़ौफ़ल-फ़ित्नते, अला फ़िल-फ़ित्नते सक़तू, व इन्न जहन्नमा लमुहीततुन बिल-काफ़ेरीन।
यह कार्य तुमसे अपेक्षित नहीं था, तुमने ऐसा कैसे कर दिया? और तुम किस ओर जा रहे हो, जबकि अल्लाह की किताब तुम्हारे सामने मौजूद है, उसकी शिक्षाएँ स्पष्ट हैं, उसके आदेश प्रकाशमान हैं, मार्गदर्शन के चिन्ह प्रकट हैं, उसकी निषिद्ध बातें स्पष्ट रूप से बताई गई हैं और उसके निर्देश साफ़-साफ़ मौजूद हैं, फिर भी तुमने उसे अपने पीछे डाल दिया, क्या तुम उससे विमुख होना चाहते हो? या क़ुरआन के अलावा किसी और के अनुसार निर्णय करना चाहते हो? निस्संदेह अत्याचारियों के लिए यह बहुत बुरा विकल्प है, और जो व्यक्ति इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म की तलाश करेगा, वह उससे स्वीकार नहीं किया जाएगा और आख़िरत में वह घाटा उठाने वालों में से होगा।
فَهَیهاتَ مِنْكُمْ، وَ كَیفَ بِكُمْ، وَ اَنَّی تُؤْفَكُونَ، وَ كِتابُ اللَّـهِ بَینَ اَظْهُرِكُمْ، اُمُورُهُ ظاهِرَةٌ، وَ اَحْكامُهُ زاهِرَةٌ، وَ اَعْلامُهُ باهِرَةٌ، و زَواجِرُهُ لائِحَةٌ، وَ اَوامِرُهُ واضِحَةٌ، وَ قَدْ خَلَّفْتُمُوهُ وَراءَ ظُهُورِكُمْ، أَرَغْبَةً عَنْهُ تُریدُونَ؟ اَمْ بِغَیرِهِ تَحْكُمُونَ؟ بِئْسَ لِلظَّالمینَ بَدَلاً، وَ مَنْ یبْتَغِ غَیرَ الْاِسْلامِ دیناً فَلَنْ یقْبَلَ مِنْهُ، وَ هُوَ فِی الْاخِرَةِ مِنَ الْخاسِرینِ.
फ़हैहात मिन्कुम, व कैफ़ा बेकुम, व अन्ना तुअफ़कून, व किताबुल्लाहे बैना अज़्होरेकुम, उमूरुहु ज़ाहिरतुन, व अह़कामुहो ज़ाहिरतुन, व आलामुहु बाहिरतुन, व ज़वाजिरुहु लाइहतुन, व अवामिरुहु वाज़िहतुन, व क़द ख़ल्लफ़्तुमूहु वराअ ज़ुहूरिकुम, अरग़्बतन अन्हु तुरीदून? अम बे-ग़ैरेही तह़्कुमून? बिअ्स लिज़्ज़ालिमीन बदलन, व मय्यब्तग़े ग़ैरल-इस्लामे दीनन फ़लन युक़्बल मिन्हो, व हुआ फ़िल-आख़िरते मिनल-ख़ासेरीन।
फिर तुमने इतना भी इंतज़ार नहीं किया कि यह विचलित और बेचैन हृदय शांत हो जाए और इस मामले को संभालना आसान हो जाए, बल्कि तुमने आग भड़काने वाली चिंगारियों को और तेज़ कर दिया और उसे हवा देकर भड़काने लगे, तुम शैतान की पुकार का उत्तर देने, अल्लाह के उज्ज्वल धर्म के प्रकाश को बुझाने और चुने हुए पैग़म्बर (स) की परंपराओं को मिटाने के लिए तैयार हो गए, खाने के बहाने तुम दूध के ऊपर जमी मलाई की तरह छिप-छिपकर लाभ उठाने लगे, और उनके परिवार और बच्चों के लिए तुम पहाड़ियों और पेड़ों के पीछे घात लगाकर चलते-फिरते रहे, और हमें उन घटनाओं पर धैर्य रखना पड़ा, जो हमारे लिए तेज़ तलवार के वार और पेट के बीच भाले के आर-पार हो जाने जैसी पीड़ादायक थीं।
ثُمَّ لَمْ تَلْبَثُوا اِلی رَیثَ اَنْ تَسْكُنَ نَفْرَتَها، وَ یسْلَسَ قِیادَها،ثُمَّ اَخَذْتُمْ تُورُونَ وَ قْدَتَها، وَ تُهَیجُونَ جَمْرَتَها، وَ تَسْتَجیبُونَ لِهِتافِ الشَّیطانِ الْغَوِی، وَ اِطْفاءِ اَنْوارِالدّینِ الْجَلِی، وَ اِهْمالِ سُنَنِ النَّبِی الصَّفِی، تُسِرُّونَ حَسْواً فِی ارْتِغاءٍ، وَ تَمْشُونَ لِاَهْلِهِ وَ وَلَدِهِ فِی الْخَمَرِ وَ الضَّرَّاءِ، وَ نَصْبِرُ مِنْكُمْ عَلی مِثْلِ حَزِّ الْمَدی، وَ وَخْزِ السنان فی الحشا.
सुम्मा लम तल्बसू इला रैसा अन तसकुना नफ़रतुहा, व यसलसा क़ेयादोहा, सुम्मा अख़ज़्तुम तूरूना वक़्दतहा, व तुहय्यिजूना जम्रतहा, व तस्तजीबूना लेहिताफिश-शैतानिल-ग़विय्ये, व इत्फ़ाइ अनवारिद्दीनिल-जलीय्ये, व इहमाले सुननिन-नबिय्यिस-सफ़िय्ये, तुसिर्रूना हस्वन फ़ी इर्तिग़ाइन, व तम्शूना लिअहलेही व वलदेही फ़िल-ख़मरे वज़-ज़र्राए, व नस्बिरु मिन्कुम अला मिस्ले हज़्ज़िल-मदा, व वख़्ज़िस्सिनाने फ़िल-हशा।
और अब तुम यह समझते हो कि हमारे लिए कोई विरासत नहीं है? क्या तुम अज्ञानता के युग के निर्णय को चाहते हो? और विश्वास रखने वालों के लिए अल्लाह के निर्णय से बेहतर और किसका निर्णय हो सकता है? क्या तुम नहीं जानते? जबकि यह बात तुम्हारे लिए सूरज की तरह स्पष्ट है कि मैं उसी पैग़म्बर (स) की बेटी हूँ।
وَ اَنْتُمُ الانَ تَزْعُمُونَ اَنْ لااِرْثَ لَنا أَفَحُكْمَ الْجاهِلِیةِ تَبْغُونَ، وَ مَنْ اَحْسَنُ مِنَ اللَّـهِ حُكْماً لِقَومٍ یوقِنُونَ، أَفَلاتَعْلَمُونَ؟ بَلی، قَدْ تَجَلَّی لَكُمْ كَالشَّمْسِ الضَّاحِیةِ أَنّی اِبْنَتُهُ.
व अन्तुमुल-आन तज़ओमूना अल्ला इर्सा लना, अफ़हुक्मल-जाहिलिय्यते तबग़ूना, व मन अह्सनो मिनल्लाहे हुक्मन लेक़ौमिन यूक़ेनून, अफ़ला तअलमून? बला, क़द तजल्ला लकुम कश्शम्सिज़-ज़ाहियते अन्नी इब्नतोहु।
हे मुसलमानों! क्या यह उचित है कि मेरे पिता की विरासत मुझसे छीन ली जाए? हे अबू क़ुहाफ़ा के बेटे! क्या अल्लाह की किताब में यह लिखा है कि तुम अपने पिता की विरासत प्राप्त करो और मैं अपने पिता की विरासत से वंचित कर दी जाऊँ? तुमने तो एक नई और अजीब बात प्रस्तुत की है, क्या तुम जान-बूझकर अल्लाह की किताब को छोड़ रहे हो और उसे अपने पीछे डाल रहे हो? क्या क़ुरआन यह नहीं कहता कि «सुलेमान ने दाऊद से विरासत पाई»[३५] और ज़करिया (अ) के उस कथन का उल्लेख नहीं करता जब उन्होंने कहा था: «हे मेरे पालनहार! मुझे अपनी ओर से एक उत्तराधिकारी प्रदान कर, जो मेरा और याक़ूब के परिवार का वारिस बने»[३६] और क्या अल्लाह ने यह नहीं फ़रमाया कि «रक्त-संबंध रखने वाले लोग एक-दूसरे के अधिक अधिकारी हैं»[३७] और क्या उसने यह नहीं कहा कि «अल्लाह तुम्हें तुम्हारी संतान के संबंध में आदेश देता है कि एक पुत्र का हिस्सा दो पुत्रियों के हिस्से के बराबर है»[३८] और वह यह भी फ़रमाता है कि «जब तुममें से किसी के सामने मृत्यु आ जाए और वह कुछ संपत्ति छोड़ रहा हो, तो माता-पिता और निकट संबंधियों के लिए उचित वसीयत करना तुम्हारे लिए निर्धारित किया गया है; यह आदेश परहेज़गारों के लिए एक अनिवार्य अधिकार है।»[३९]
اَیهَا الْمُسْلِمُونَ! أَاُغْلَبُ عَلی اِرْثی؟ یابْنَ اَبی‌قُحافَةَ! اَفی كِتابِ اللَّـهِ تَرِثُ اَباكَ وَ لااَرِثُ اَبی؟ لَقَدْ جِئْتَ شَیئاً فَرِیّاً، اَفَعَلی عَمْدٍ تَرَكْتُمْ كِتابَ اللَّـهِ وَ نَبَذْتُمُوهُ وَراءَ ظُهُورِكُمْ، إذْ یقُولُ ﴿وَوَرِثَ سُلَیْمَانُ دَاوُدَ﴾ [نمل:16] وَ قالَ فیما اقْتَصَّ مِنْ خَبَرِ زَكَرِیا اِذْ قالَ: ﴿فَهَبْ لِي مِنْ لَدُنْكَ وَلِيًّا ٥ يَرِثُنِي وَيَرِثُ مِنْ آلِ يَعْقُوبَ﴾ [مریم:5–6] وَ قالَ: ﴿وَأُولُو الْأَرْحَامِ بَعْضُهُمْ أَوْلَى بِبَعْضٍ فِي كِتَابِ اللَّهِ﴾ [انفال:75] وَ قالَ ﴿يُوصِيكُمُ اللَّهُ فِي أَوْلَادِكُمْ لِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ الْأُنْثَيَيْنِ﴾ [نساء:11] وَ قالَ ﴿إِنْ تَرَكَ خَيْرًا الْوَصِيَّةُ لِلْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ بِالْمَعْرُوفِ حَقًّا عَلَى الْمُتَّقِينَ ١٨٠﴾ [بقره:180]
अय्युहल-मुस्लिमून! आ-उग़्लबु अला इर्सी? या इब्ने अबी-क़ोहाफ़ा! अफ़ी किताबिल्लाहे तरेसु अबाका व ला अरेसो अबी? लक़द जेअता शैअन फ़रिय्या, अफ़अला अम्दिन तरक्तुम किताबल्लाहे व नबज़्तोमूहु वराअ ज़ोहूरेकुम, इज़ यक़ूलु (व वरेसा सुलैमानो दाऊदा) (नम्ल 16) व क़ाला फ़ीमा इक़्तस्सा मिन ख़बरे ज़करिय्या इज़ क़ाला: (फ़हब ली मिल-लदुन्क वलिय्यन, यरेसोनी व यरेसो मिन आले यअक़ूब) (मरियम 5-6) व क़ाला: (व उलुल-अर्हामे बअज़ोहुम औला बेबअ्ज़िन फ़ी किताबिल्लाहे) (अंफ़ाल 75) व क़ाला: (यूसीकुमुल्लाहो फ़ी औलादेकुम, लिज़्ज़करे मिस्लो हज़्ज़िल-उन्सयैन) (निसा 11) व क़ाला: (इन तरका ख़ैरनिल-वसिय्यतो लिल-वालेदैने वल-अक़रबीन बिल-मअरूफ़े हक़्क़न अलल-मुत्तक़ीन) (बक़रा 180)
और तुम यह समझते हो कि मेरा कोई अधिकार नहीं है और मेरे पिता की विरासत में मेरा कोई हिस्सा नहीं है? क्या अल्लाह ने तुम्हारे लिए कोई ऐसी आयत उतारी है, जिसमें मेरे पिता को विरासत के अधिकार से अलग कर दिया गया हो? या तुम यह कहते हो कि दो अलग-अलग धर्मों वाले लोग एक-दूसरे के वारिस नहीं बनते? क्या तुम मुझे और मेरे पिता को एक ही धर्म के अनुयायी नहीं मानते? या फिर तुम मेरे पिता और मेरे चचेरे भाई से अधिक क़ुरआन के सामान्य और विशेष आदेशों को जानते हो? तो लो, यह रहा यह ऊँट; यह तैयार और सुसज्जित ऊँट है, इसकी लगाम पकड़ो और इसे ले जाओ। लेकिन क़यामत के दिन तुम्हारी इससे मुलाक़ात अवश्य होगी।
وَ زَعَمْتُمْ اَنْ لاحَظْوَةَ لی، وَ لااَرِثُ مِنْ اَبی، وَ لارَحِمَ بَینَنا، اَفَخَصَّكُمُ اللَّـهُ بِایةٍ اَخْرَجَ اَبی مِنْها؟ اَمْ هَلْ تَقُولُونَ: اِنَّ اَهْلَ مِلَّتَینِ لایتَوارَثانِ؟ اَوَ لَسْتُ اَنَا وَ اَبی مِنْ اَهْلِ مِلَّةٍ واحِدَةٍ؟ اَمْ اَنْتُمْ اَعْلَمُ بِخُصُوصِ الْقُرْانِ وَ عُمُومِهِ مِنْ اَبی وَابْنِ عَمّی؟ فَدُونَكَها مَخْطُومَةً مَرْحُولَةً تَلْقاكَ یوْمَ حَشْرِكَ.
व ज़अम्तुम अल्ला हज़्वत ली, व ला अरेसो मिन अबी, व ला रहेमा बैनना, अफ़ख़स्सकुमुल्लाहो बिआयतिन अख़रजा अबी मिन्हा? अम हल तक़ूलूना: इन्ना अहला मिल्लतैने ला यतवारसाने? अवलस्तो अना व अबी मिन अहले मिल्लतिन वाहेदतिन? अम अन्तुम आलमो बेख़ुसूसिल-क़ुरआने व उमूमेही मिन अबी व इब्ने अम्मी? फ़दूनकहा मख़्तूमतन मरहूलतन तल्क़ाक यौमा हश्रेका।
अल्लाह क्या ही उत्तम न्यायाधीश है, और उसका रसूल क्या ही अच्छा निर्णय करने वाला है,और क़यामत कितना अच्छा न्याय का स्थान है, उस दिन और उस घड़ी असत्य के अनुयायी घाटा उठाने वाले होंगे, उस समय पछतावा तुम्हारे किसी काम नहीं आएगा, हर बात और हर घटना के लिए एक निश्चित समय और स्थान निर्धारित है, अतः शीघ्र ही तुम्हें पता चल जाएगा कि अपमानित करने वाला दंड किस पर उतरेगा और कौन उस हमेशा रहने वाली सज़ा का भागी बनेगा।
فَنِعْمَ الْحَكَمُ اللَّـهُ، وَ الزَّعیمُ مُحَمَّدٌ، وَ الْمَوْعِدُ الْقِیامَةُ، وَ عِنْدَ السَّاعَةِ یخْسِرُ الْمُبْطِلُونَ، وَ لاینْفَعُكُمْ اِذْ تَنْدِمُونَ، وَ لِكُلِّ نَبَأٍ مُسْتَقَرٌّ، وَ لَسَوْفَ تَعْلَمُونَ مَنْ یأْتیهِ عَذابٌ یخْزیهِ، وَ یحِلُّ عَلَیهِ عَذابٌ مُقیمٌ.
फ़नेअमल-हुक्मुल्लाहो, वज़्ज़ईमो मुहम्मदुन, वल-मौइदुल-क़ियामतो, व इन्दस्साअते यख़्सेरुल-मुब्तेलून, व ला यनफ़उकुम इज़ तन्दमूना, व लेकुल्ले नबइन मुस्तक़र्रुन, व लसौफ़ा तअलमूना मन यअतेही अज़ाबुन युख़ज़ीहे, व यहिल्लो अलैहे अज़ाबुन मुक़ीमुन।
फिर उन्होंने अंसार की ओर रुख किया और फ़रमाया:
ثم رَمت بطَرفها نحو الانصار، فقالت:
सुम्मा रमत बेतरफ़ेहा नहवल अंसार, फ़ा क़ालत:
ऐ नक़ीबों के समूह! ऐ राष्ट्र की भुजाओं! ऐ इस्लाम के रक्षकों! मेरे अधिकार के मामले में यह कमजोरी और लापरवाही क्यों? और मेरी फरियाद का जवाब देने में यह उदासीनता क्यों? क्या मेरे पिता, अल्लाह के पैगंबर, यह नहीं फरमाते थे कि “हर व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके बच्चों के माध्यम से सुरक्षित रखी जाती है”? फिर तुमने इतनी जल्दी ये कार्य कैसे कर डाले? और कितनी जल्दबाजी में इस दुबली बकरी को दुहा गया, जिससे उसके मुंह और नाक से खून बह निकला, जबकि तुममें इतनी शक्ति और सामर्थ्य मौजूद है कि जिस उद्देश्य के लिए हम प्रयास कर रहे हैं, उसमें हमारा साथ दे सकते हो, और मेरे इस अधिकार तथा मेरे उद्देश्य की रक्षा और समर्थन करने की भी तुममें पूरी क्षमता है।
یا مَعْشَرَ النَّقیبَةِ وَ اَعْضادَ الْمِلَّةِ وَ حَضَنَةَ الْاِسْلامِ! ما هذِهِ الْغَمیزَةُ فی حَقّی وَ السِّنَةُ عَنْ ظُلامَتی؟ اَما كانَ رَسُول‌اللَّـهِ صَلَّی اللَّـهُ عَلَیهِ وَ الِهِ اَبی یقُولُ: «اَلْمَرْءُ یحْفَظُ فی وُلْدِهِ»، سَرْعانَ ما اَحْدَثْتُمْ وَ عَجْلانَ ذا اِهالَةٍ، وَ لَكُمْ طاقَةٌ بِما اُحاوِلُ، وَ قُوَّةٌ عَلی ما اَطْلُبُ وَ اُزاوِلُ.
या मअशरल-नक़ीबते व अअज़ादल-मिल्लते व हज़नतल-इस्लामे! मा हाज़ेहिल-ग़मीज़तो फ़ी हक़्क़े वस्सिन्नतो अन ज़ुलामती? अमा काना रसूलुल्लाहे सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही अबी यक़ूलु: «अल-मरओ यहफ़ज़ो फ़ी वुल्देही», सरआन मा अह़्दस्तुम व अज्लान ज़ा इहालतिन, व लकुम ताक़तुन बिमा उह़ाविलु, व क़ुव्वतुन अला मा अत्लुबु व उज़ाविलु।
क्या तुम यह कहते हो कि मुहम्मद (स) इस दुनिया से विदा हो गए? निस्संदेह, यह बहुत बड़ी और अत्यंत गंभीर विपत्ति है, इसका घाव बहुत गहरा है और इसकी दरार इतनी बड़ी है कि उसे भरना कठिन है, उनके चले जाने से धरती पर चारों ओर अंधकार छा गया, सितारों की चमक फीकी पड़ गई और सारी आशाएं निराशा में बदल गईं,पहाड़ अपनी जगह से हिल गए, पवित्र मर्यादाएं पैरों तले रौंदी गईं, और उनके स्वर्गवास के बाद किसी के सम्मान और प्रतिष्ठा की कोई परवाह नहीं रही।
اَتَقُولُونَ ماتَ مُحَمَّدٌ؟ فَخَطْبٌ جَلیلٌ اِسْتَوْسَعَ وَ هْنُهُ، وَاسْتَنْهَرَ فَتْقُهُ، وَ انْفَتَقَ رَتْقُهُ، وَ اُظْلِمَتِ الْاَرْضُ لِغَیبَتِهِ، وَ كُسِفَتِ الشَّمْسُ وَ الْقَمَرُ وَ انْتَثَرَتِ النُّجُومُ لِمُصیبَتِهِ، وَ اَكْدَتِ الْامالُ، وَ خَشَعَتِ الْجِبالُ، وَ اُضیعَ الْحَریمُ، وَ اُزیلَتِ الْحُرْمَةُ عِنْدَ مَماتِهِ.
अतक़ूलूना माता मुहम्मदुन? फ़ख़त्बुन जलीलुन इस्तौसआ वहनोहु, वस्तन्हर फ़त्क़ुहु, वन्फ़तक़ रत्क़ुहु, व उज़्लिमतिल-अर्ज़ो लिग़ैबतेही, व कोसेफ़तिश्शम्सु वल-क़मरो वन्तस रतिन-नुजूमो लेमुसीबतेही, व अक़दतिल-आमालो, व ख़शअतिल-जिबालो, व उज़ीअल-हरीमो, व उज़ीलतिल-हुरमतो इन्दा ममातेही।
अल्लाह की कसम! यह विपत्ति कहीं अधिक बड़ी और यह मुसीबत कहीं अधिक भयंकर है, संसार में न तो इससे बड़ी कोई विपत्ति हुई है और न ही कोई ऐसी जानलेवा मुसीबत है जो इसकी बराबरी कर सके, अल्लाह की किताब ने इस विपत्ति को स्पष्ट रूप से बयान किया है, यही वह अल्लाह की किताब है जिसे तुम अपने घरों में और अपनी रात-दिन की सभाओं में धीमी और ऊँची आवाज़ में, तिलावत और पाठ के साथ पढ़ते हो, यह ऐसी विपत्ति है जो इससे पहले भी पैगंबरों और रसूलों पर आ चुकी है, यह एक निश्चित आदेश और अटल फैसला है। अल्लाह तआला फरमाता है:
فَتِلْكَ وَاللَّـهِ النَّازِلَةُ الْكُبْری وَ الْمُصیبَةُ الْعُظْمی، لامِثْلُها نازِلَةٌ، وَ لابائِقَةٌ عاجِلَةٌ اُعْلِنَ بِها، كِتابُ اللَّـهِ جَلَّ ثَناؤُهُ فی اَفْنِیتِكُمْ، وَ فی مُمْساكُمْ وَ مُصْبِحِكُمْ، یهْتِفُ فی اَفْنِیتِكُمْ هُتافاً وَ صُراخاً وَ تِلاوَةً وَ اَلْحاناً، وَ لَقَبْلَهُ ما حَلَّ بِاَنْبِیاءِ اللَّـهِ وَ رُسُلِهِ، حُكْمٌ فَصْلٌ وَ قَضاءٌ حَتْمٌ.
फ़तिल्का वल्लाहिन-नाज़ेलतुल-कुब्रा वल-मुसीबतुल-उज़्मा, ला मिस्लोहा नाज़िलतुन, व ला बाएक़तुन आजेलतुन उअ्लेना बेहा, किताबुल्लाहे जल्ला सनाउहु फ़ी अफ़नियतिकुम, व फ़ी मुम्साकुम व मुस्बहेकुम, यहतेफ़ो फ़ी अफ़नियतेकुम हुताफ़न व सुराख़न व तिलावतन व अल्हानन, व लक़ब्लहु मा हल्ला बिअम्बियाइल्लाहे व रुसुलेही, हुक्मुन फ़स्लुन व क़ज़ाउन हत्मुन।
(और मुहम्मद तो केवल एक रसूल हैं। उनसे पहले भी कई रसूल गुजर चुके हैं। तो क्या यदि उनका स्वर्गवास हो जाए या वे शहीद कर दिए जाएँ, तुम अपनी पिछली स्थिति की ओर लौट जाओगे? और जो कोई अपनी पिछली स्थिति की ओर लौट जाए, वह अल्लाह का कुछ भी नुकसान नहीं कर सकता और जो लोग शुक्रगुज़ार हैं, अल्लाह उन्हें शीघ्र ही पुरस्कार प्रदान करेगा। (सूर ए आले-इमरान, आयत 144)
﴿وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهِ الرُّسُلُ أَفَإِنْ مَاتَ أَوْ قُتِلَ انْقَلَبْتُمْ عَلَى أَعْقَابِكُمْ وَمَنْ يَنْقَلِبْ عَلَى عَقِبَيْهِ فَلَنْ يَضُرَّ اللَّهَ شَيْئًا وَسَيَجْزِي اللَّهُ الشَّاكِرِينَ ١٤٤﴾ [آل عمران:144]
व मा मुहम्मदुन इल्ला रसूलुन क़द ख़लत मिन क़ब्लेहिर्रुसुलो, अफ़इन् माता औ क़ुतिला इन्क़लाब्तुम अला अअक़ाबेकुम, व मय्यन्क़लिब अला अक़ेबैहे फ़लन यज़ुर्रल्लाहा शैअन, व सयजज़िल्लाहुश्शाकेरीन।
ऐ क़ैला के बेटों — अर्थात अंसार के समूह! क्या मेरे पिता की विरासत के मामले में मुझ पर अत्याचार किया जाए, जबकि तुम मुझे देख रहे हो और मेरी बात सुन रहे हो, तुम सभाओं और समुदाय वाले हो, मेरी पुकार की आवाज़ सभी तक पहुँच रही है और तुम मेरी स्थिति से भली-भांति परिचित हो, तुम्हारे पास बड़ी संख्या में लोग और पर्याप्त साधन हैं, तुम्हारे पास हथियार, कवच और ढालें मौजूद हैं, मेरी पुकार तुम्हारे कानों तक पहुँचती है, लेकिन तुम उसका उत्तर नहीं देते, तुम मेरी फरियाद और सहायता की पुकार सुनते हो, फिर भी मेरी सहायता के लिए आगे नहीं आते, हालाँकि तुम अपनी बहादुरी के लिए प्रसिद्ध और भलाई तथा नेक आचरण के लिए जाने जाते हो, तुम वो चुनिंदा लोग हो जिन्हें चुना गया, और वे श्रेष्ठ लोग हो जिन्हें हम अहले-बैत के लिए विशेष रूप से चुना गया था।
اَیها بَنی قیلَةَ! ءَ اُهْضَمُ تُراثَ اَبی وَ اَنْتُمْ بِمَرْأی مِنّی وَ مَسْمَعٍ وَ مُنْتَدی وَ مَجْمَعٍ، تَلْبَسُكُمُ الدَّعْوَةُ وَ تَشْمَلُكُمُ الْخُبْرَةُ، وَ اَنْتُمْ ذَوُو الْعَدَدِ وَ الْعُدَّةِ وَ الْاَداةِ وَ الْقُوَّةِ، وَ عِنْدَكُمُ السِّلاحُ وَ الْجُنَّةُ، تُوافیكُمُ الدَّعْوَةُ فَلاتُجیبُونَ، وَ تَأْتیكُمُ الصَّرْخَةُ فَلاتُغیثُونَ، وَ اَنْتُمْ مَوْصُوفُونَ بِالْكِفاحِ، مَعْرُوفُونَ بِالْخَیرِ وَ الصَّلاحِ، وَ النُّخْبَةُ الَّتی انْتُخِبَتْ، وَ الْخِیرَةُ الَّتِی اخْتیرَتْ لَنا اَهْلَ الْبَیتِ.
अय्युहा बनी क़ीलता! आ-उहज़मो तोरासा अबी व अन्तुम बिमरअइन मिन्नी व मस्मअिन व मुं‍तदन व मज्मअिन, तल्बसोकुमुद-दअ्वतो व तशमलुकुमुल-ख़ुब्रतो, व अन्तुम ज़वुल-अददे वल-उद्दते वल-अदाते वल-क़ुव्वते, व इन्दकुमुस्सेलाहो वल-जुन्नतो, तोवाफ़ीकुमुद-दअ्वतु फ़ला तुजीबून, व तअतीकुमुस्सरख़तो फ़ला तुग़ीसूना, व अन्तुम मौसुफ़ूना बिल-केफ़ाहे, मअरूफ़ून बिल-ख़ैरे वस्सलाहे, वन-नुख़्बतुल्लती इंतुख़िबत, वल-ख़ियरतुल्लती इख़्तीरत लना अह़्लल-बैत।
तुमने अरबों से युद्ध किया, कठिनाइयों और कष्टों को सहन किया, विभिन्न समुदायों से संघर्ष किया और वीर योद्धाओं से मुकाबला किया, हम हमेशा तुम्हारे मार्गदर्शक और तुम हमारे आज्ञाकारी रहे, यहाँ तक कि इस्लाम की चक्की चल पड़ी, समय के स्तनों से दूध बहने लगा, शिर्क की आवाज़ें शांत हो गईं, लालच और आरोप-प्रत्यारोप का कोलाहल थम गया, कुफ्र की आग बुझ गई और अव्यवस्था तथा भटकाव की पुकार शांत हो गई, इस प्रकार धर्म की व्यवस्था पूरी तरह स्थापित हो गई, फिर ऐसा क्यों है कि ईमान का इकरार करने के बाद तुम भटक गए? सच्चाई स्पष्ट हो जाने के बाद तुमने स्वयं को छिपा लिया? आगे बढ़ने के बाद पीछे हट गए? और ईमान लाने के बाद फिर शिर्क की ओर लौट गए?
قاتَلْتُمُ الْعَرَبَ، وَ تَحَمَّلْتُمُ الْكَدَّ وَ التَّعَبَ، وَ ناطَحْتُمُ الْاُمَمَ، وَ كافَحْتُمُ الْبُهَمَ، لانَبْرَحُ اَوْ تَبْرَحُونَ، نَأْمُرُكُمْ فَتَأْتَمِرُونَ، حَتَّی اِذا دارَتْ بِنا رَحَی الْاِسْلامِ، وَ دَرَّ حَلَبُ الْاَیامِ، وَ خَضَعَتْ نُعْرَةُ الشِّرْكِ، وَ سَكَنَتْ فَوْرَةُ الْاِفْكِ، وَ خَمَدَتْ نیرانُ الْكُفْرِ، وَ هَدَأَتْ دَعْوَةُ الْهَرَجِ، وَ اسْتَوْسَقَ نِظامُ الدّینِ، فَاَنَّی حِزْتُمْ بَعْدَ الْبَیانِ، وَاَسْرَرْتُمْ بَعْدَ الْاِعْلانِ، وَ نَكَصْتُمْ بَعْدَ الْاِقْدامِ، وَاَشْرَكْتُمْ بَعْدَ الْایمانِ؟
क़ातल्तुमुल-अरब, व तहम्मल्तुमुल-कद्दा वत-तअब, व नातहतुमुल-उमम, व काफ़हतुमुल-बुहम, ला नबरहु औ तब्रहून, नामुरुकुम फ़तअ्तमिरूना, हत्ता इज़ा दारत बिना रहल-इस्लामे, व दर्रा हल्बुल-अय्यामे, व ख़ज़अत नुअरतुश-शिर्के, व सकनत फ़ौरतुल-इफ़्के, व ख़मदत नीरानुल-कुफ़्रे, व हदअत दअ्वतुल-हरजे, वस्तोसक़ा नज़ामुद्दीने, फ़अन्ना हिज़्तुम बअ्दल-बयाने, व असरर्तुम बअ्दल-इअ्लाने, व नक़सतुम बअ्दल-इक़दामे, व अशरक्तुम बअ्दल-ईमाने?
हाय उन लोगों पर जिन्होंने संधि और वचनबद्धता करने के बाद उसे तोड़ दिया और पैगंबर को उनके घर से निकालने का इरादा किया, जबकि उन्होंने ही सबसे पहले युद्ध की शुरुआत की थी, क्या तुम उनसे डरते हो, जबकि यदि तुम ईमान वाले हो तो अल्लाह अधिक योग्य है कि तुम उसी से डरो।
بُؤْساً لِقَوْمٍ نَكَثُوا اَیمانَهُمْ مِنْ بَعْدِ عَهْدِهِمْ، وَ هَمُّوا بِاِخْراجِ الرَّسُولِ وَ هُمْ بَدَؤُكُمْ اَوَّلَ مَرَّةٍ، اَتَخْشَوْنَهُمْ فَاللَّـهُ اَحَقُّ اَنْ تَخْشَوْهُ اِنْ كُنْتُمْ مُؤمِنینَ.
बुऊसन लेक़ौमिन नक़सू ऐमानहुम मिन बअ्दे अह्देहिम, व हम्मू बिइख़राजिर्रसूले व हुम बदऊकुम अव्वला मर्रतिन, अतख़्शौनहुम फ़ल्लाहु अह़क़्क़ु अन तख़्शौहो इन कुन्तुम मोमेनीना।
सावधान! मैं देख रही हूँ कि तुमने हमेशा आराम और सुख-सुविधा में जीवन बिताने को अपना लक्ष्य बना लिया है और उस व्यक्ति को, जो शासन और नेतृत्व का अधिक योग्य था, दूर कर दिया है, तुमने आराम और सुख को अपना लिया है और जीवन की कठिनाइयों और तंगी से निकलकर उसकी सुख-सुविधा और विस्तार में पहुँच गए हो, इसी कारण तुमने जो कुछ अपने भीतर सुरक्षित रखा था, उसे अपने मुँह से बाहर निकाल दिया और जो कुछ निगल लिया था, उसे फिर उगल दिया, अतः जान लो कि यदि तुम और धरती पर रहने वाले सभी लोग भी कुफ्र करें, तो भी अल्लाह सबसे बेनियाज़ और हर प्रकार की प्रशंसा के योग्य है।
اَلا، وَ قَدْ أَری اَنْ قَدْ اَخْلَدْتُمْ اِلَی الْخَفْضِ، وَ اَبْعَدْتُمْ مَنْ هُوَ اَحَقُّ بِالْبَسْطِ وَ الْقَبْضِ، وَ خَلَوْتُمْ بِالدَّعَةِ، وَ نَجَوْتُمْ بِالضّیقِ مِنَ السَّعَةِ، فَمَجَجْتُمْ ما وَعَبْتُمْ، وَ دَسَعْتُمُ الَّذی تَسَوَّغْتُمْ، فَاِنْ تَكْفُرُوا اَنْتُمْ وَ مَنْ فِی الْاَرْضِ جَمیعاً فَاِنَّ اللَّـهَ لَغَنِی حَمیدٌ.
अला, वक़द अरा अन क़द अख़लद्तुम इलल-ख़फ़्ज़े, व अबअद्तुम मन हुवा अह़क़्क़ो बिल-बस्ते वल-क़ब्ज़े, व ख़लव्तुम बिद्दअते, व नजौ्तुम बिज़्ज़ीक़े मिनस्सअते, फ़मजज्तुम मा वअब्दतुम, व दसअ्तुमुल्लज़ी तसव्वग़्तुम, फ़इन तक्फ़ुरू अन्तुम व मन फ़िल-अर्ज़े जमीअन फ़इन्नल्लाहा लग़निय्युन हमीदुन।
सावधान! मैंने जो कुछ कहा है, वह तुम्हारे चरित्र में पैदा हुई कमजोरी, तुम्हारे दिलों में उत्पन्न हुई बेवफाई और छल-कपट को भली-भांति पहचानने के बाद कहा है, लेकिन यह सब एक दुखी हृदय की पीड़ा का उफान, क्रोध और आक्रोश का प्रकटीकरण, मेरे लिए असहनीय बातों की अभिव्यक्ति, मेरे सीने में उमड़ते हुए दर्द और अपने तर्क तथा प्रमाण को स्पष्ट करने का प्रयास है, अतः अब खिलाफत को ले लो, लेकिन जान लो कि इस खिलाफत की सवारी करने वाले ऊँट की पीठ पर घाव है और उसके पैर छिले हुए तथा फोड़े से भरे हैं, इसकी बदनामी और कलंक हमेशा बना रहेगा और इस पर अल्लाह के क्रोध तथा हमेशा के लिए रहने वाली शर्मिंदगी की निशानी होगी, और इसका संबंध अल्लाह की भड़कती हुई उस आग से है, जो दिलों को घेर लेगी।
اَلا، وَ قَدْ قُلْتُ ما قُلْتُ هذا عَلی مَعْرِفَةٍ مِنّی بِالْخِذْلَةِ الَّتی خامَرْتُكُمْ، وَ الْغَدْرَةِ الَّتِی اسْتَشْعَرَتْها قُلُوبُكُمْ، وَ لكِنَّها فَیضَةُ النَّفْسِ، وَ نَفْثَةُ الْغَیظِ، وَ حَوَزُ الْقَناةِ، وَ بَثَّةُ الصَّدْرِ، وَ تَقْدِمَةُ الْحُجَّةِ، فَدُونَكُمُوها فَاحْتَقِبُوها دَبِرَةَ الظَّهْرِ، نَقِبَةَ الْخُفِّ، باقِیةَ الْعارِ، مَوْسُومَةً بِغَضَبِ الْجَبَّارِ وَ شَنارِ الْاَبَدِ، مَوْصُولَةً بِنارِ اللَّـهِ الْمُوقَدَةِ الَّتی تَطَّلِعُ عَلَی الْاَفْئِدَةِ.
अला, वक़द क़ुल्तो मा क़ुल्तो हाज़ा अला मअरेफ़तिन मिन्नी बिल-ख़िज़्लतिल्लती ख़ामरतकुम, वल-ग़दरतिल्लती इस्तशअरतहा क़ुलूबोकुम, व लाकिन्नहा फ़ैज़तुन-नफ़्से, व नफ़्सतुल-ग़ैज़े, व हौज़ुल-क़नाते, व बस्सतुस्सद्रे, व तक़देमतुल-हुज्जते, फ़दूनकुमूहा फ़हतक़ेबूहा दबेर्तज़-ज़ह्रे, नक़िबतल-ख़ुफ़्फ़े, बाक़ियतल-आरे, मौसूमतन बेग़ज़बिल-जब्बारे व शनारिल-अबदे, मौसूलतन बेनारिल्लाहिल-मूक़दतिल्लती तत्तलेओ अलल-अफ़इदते।
जो कुछ तुम कर रहे हो, वह अल्लाह की जागती हुई निगाहों के सामने है, और जिन्होंने अत्याचार किया है, वे शीघ्र ही जान लेंगे कि उन्हें किस स्थान पर लौटकर जाना है, और मैं उस व्यक्ति की बेटी हूँ, जिसने तुम्हें उस दर्दनाक अल्लाह के अज़ाब से आगाह किया था जो तुम्हारे सामने आने वाला है, अतः तुम जो चाहो करो और हम भी अपना काम करते हैं, तुम प्रतीक्षा करो और हम भी प्रतीक्षा करते हैं।
فَبِعَینِ اللَّـهِ ما تَفْعَلُونَ، وَ سَیعْلَمُ الَّذینَ ظَلَمُوا اَی مُنْقَلَبٍ ینْقَلِبُونَ، وَ اَنَا اِبْنَةُ نَذیرٍ لَكُمْ بَینَ یدَی عَذابٌ شَدیدٌ، فَاعْمَلُوا اِنَّا عامِلُونَ، وَ انْتَظِرُوا اِنَّا مُنْتَظِرُونَ.
फ़बेअैनिल्लाहे मा तफ़अलून, व सयअलमो अल्लज़ीना ज़लमू अय्या मुनक़लाबिन यनक़लेबून, व अना इब्नतो नज़ीरिन लकुम बैन यदैय अज़ाबुन शदीद, फ़अमलू इन्ना आमेलूना, वन्तज़ेरू इन्ना मुन्तज़ेरून।
तब अबू बकर ने उत्तर दिया:
فأجابها أبوبكر عبداللَّـه بن عثمان، و قال:
फ़ा अजाबहा अबू बक्र अब्दुल्लाह बिन उस्मान, व क़ाला:
ऐ रसूल की बेटी! तुम्हारे पिता मोमिनों के लिए अत्यंत दयालु, कृपालु और मेहरबान थे, जबकि काफिरों के लिए दर्दनाक अज़ाब और बड़ा दंड थे, यदि हम उनके वंश और रिश्ते पर दृष्टि डालें, तो वे हमारी महिलाओं के लिए तुम्हारे पिता हैं और हमारे मित्रों के बीच तुम्हारे पति के भाई के समान हैं, उन्होंने तुम्हारे पति को हर मित्र पर प्राथमिकता दी और उन्होंने भी हर बड़े कार्य में पैगंबर की सहायता की, तुमसे केवल सौभाग्यशाली लोग ही प्रेम करते हैं और केवल बुरे लोग ही तुमसे दुश्मनी रखते हैं।
یا بِنْتَ رَسُول‌اللَّـهِ! لَقَدْ كانَ اَبُوكِ بِالْمُؤمِنینَ عَطُوفاً كَریماً، رَؤُوفاً رَحیماً، وَ عَلَی الْكافِرینَ عَذاباً اَلیماً وَ عِقاباً عَظیماً، اِنْ عَزَوْناهُ وَجَدْناهُ اَباكِ دُونَ النِّساءِ، وَ اَخا اِلْفِكِ دُونَ الْاَخِلاَّءِ، اثَرَهُ عَلی كُلِّ حَمیمٍ وَ ساعَدَهُ فی كُلِّ اَمْرٍ جَسیمِ، لایُحِبُّكُمْ اِلاَّ سَعیدٌ، وَ لایُبْغِضُكُمْ اِلاَّ شَقِی بَعیدٌ.
या बिन्ता रसूलिल्लाह! लक़द काना अबूके बिल-मोमेनीना अतूफ़न करीमन, रऊफ़न रहीमन, व अलल-काफ़ेरीना अज़ाबन अलीमन व इक़ाबन अज़ीमन, इन अज़वैनाहो वजदनाहो अबाके दूनन-निसा, व अख़ा इल्फ़ेके दूनल-अख़िल्लाए, असरहू अला कुल्ले ह़मीमिन व साअदहू फ़ी कुल्ले अम्रिन जसीमे, ला युहिब्बुकुम इल्ला सईदुन, व ला युबग़िज़ुकुम इल्ला शक़िय्युन बईद।
अतः तुम, ऐ पैगंबर के परिवार, दुनिया के चुने हुए और पवित्र लोग हो, तुम हमें भलाई का मार्ग दिखाने वाले और जन्नत की ओर मार्गदर्शन करने वाले हो, और तुम, ऐ महिलाओं में सबसे श्रेष्ठ और श्रेष्ठतम पैगंबर की बेटी, तुम अपनी बात में सच्ची हो, बुद्धि और समझ में अत्यंत अग्रणी हो, तुम्हें कभी अपने अधिकार से रोका नहीं जाएगा और तुम्हारी सच्ची बात कहने में कोई बाधा उत्पन्न नहीं की जाएगी।
فَاَنْتُمْ عِتْرَةُ رَسُول‌اللَّـهِ الطَّیبُونَ، الْخِیرَةُ الْمُنْتَجَبُونَ، عَلَی الْخَیرِ اَدِلَّتُنا وَ اِلَی الْجَنَّةِ مَسالِكُنا، وَ اَنْتِ یا خِیرَةَ النِّساءِ وَ ابْنَةَ خَیرِ الْاَنْبِیاءِ، صادِقَةٌ فی قَوْلِكِ، سابِقَةٌ فی وُفُورِ عَقْلِكِ، غَیرَ مَرْدُودَةٍ عَنْ حَقِّكِ، وَ لامَصْدُودَةٍ عَنْ صِدْقِكِ.
फ़अन्तुम इत्रतरो रसूलिल्लाहित-तय्यिबून, अल-ख़ियारतुल-मुन्तजाबून, अलल-ख़ैरे अदिल्लतुना व इलल-जन्नते मसालिकुना, व अन्ता या ख़ैरतन-निसा व इब्नता ख़ैरिल-अम्बिया, सादिक़तुन फ़ी क़ौलेके, साबिक़तुन फ़ी वुफ़ूरे अक़्लेके, ग़ैरु मर्दूदतिन अन हक़्क़ेके, व ला मस्दूदतिन अन सिद्क़ेके।
और अल्लाह की कसम! मैंने पैगंबर की राय से एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया और न ही उनकी अनुमति के बिना कोई कार्य किया, किसी समुदाय का अग्रणी व्यक्ति उनसे झूठ नहीं बोलता, और मैं अल्लाह को गवाह बनाता हूँ, और वही सबसे अच्छा गवाह है, मैंने पैगंबर से सुना है कि उन्होंने फरमाया: “हम पैगंबरों का समूह न दीनार और दिरहम विरासत में छोड़ता है, न घर और न खेती-बाड़ी, हम केवल किताब, हिकमत, ज्ञान और पैगंबरी विरासत में छोड़ते हैं, और हमने जो कुछ तुम्हारे अधिकार में था, उसे घोड़ों और हथियारों की व्यवस्था में लगा दिया, ताकि मुसलमान उसके द्वारा युद्ध कर सकें, काफ़िरों के विरुद्ध जिहाद कर सकें और अत्याचारी तथा दुष्ट लोगों से मुकाबला कर सकें। यह निर्णय सभी मुसलमानों की सहमति से लिया गया था। मैंने अकेले अपनी ओर से यह कार्य नहीं किया और न ही अपने विचार तथा निर्णय में मनमानी की। और हमारे बाद जो कुछ हम छोड़ जाते हैं, वह हमारे बाद के उत्तराधिकारी और जिम्मेदार व्यक्ति के अधिकार में होता है; वह उसमें जो फैसला करना चाहे, कर सकता है।”
وَ اللَّـهِ ما عَدَوْتُ رَأْی رَسُولِ‌للَّـهِ، وَ لاعَمِلْتُ اِلاَّ بِاِذْنِهِ، وَ الرَّائِدُ لایكْذِبُ اَهْلَهُ، وَ اِنّی اُشْهِدُ اللَّـهَ وَ كَفی بِهِ شَهیداً، اَنّی سَمِعْتُ رَسُول‌اللَّـهِ یقُولُ: «نَحْنُ مَعاشِرَ الْاَنْبِیاءِ لانُوَرِّثُ ذَهَباً وَ لافِضَّةً، وَ لاداراً وَ لاعِقاراً، وَ اِنَّما نُوَرِّثُ الْكِتابَ وَ الْحِكْمَةَ وَ الْعِلْمَ وَ النُّبُوَّةَ، وَ ما كانَ لَنا مِنْ طُعْمَةٍ فَلِوَلِی الْاَمْرِ بَعْدَنا اَنْ یحْكُمَ فیهِ بِحُكْمِهِ».
वल्लाहे मा अदव्तु रअ्य रसूलिल्लाहे, व ला अमिल्तो इल्ला बेइज़्नेही, वर-राइदो ला यक़ज़ेबो अहलहु, व इन्नी उश्हिदुल्लाहा व कफ़ा बेही शहीदन, अन्नी समिअ्तो रसूलल्लाहे यक़ूलु: (नहनो मआशेरल-अम्बिया, ला नुवर्रेसो ज़हबन व ला फ़िज़्ज़तन, व ला दारन व ला एक़ारन, व इन्नमा नुवर्रेसुल-किताबा वल-हिक्मता वल-इल्मा वन-नबुव्वता, व मा काना लना मिन तुइ्मतिन फ़लिवलिय्यिल-अम्रि बअ्दना अन यह्कोमा फ़ीहे बिहुक्मेही।)
और हमने जो कुछ तुम्हारे अधिकार में था, उसे घोड़ों और हथियारों की व्यवस्था में लगा दिया, ताकि मुसलमान उसके द्वारा युद्ध कर सकें, काफ़िरों के विरुद्ध जिहाद कर सकें और अत्याचारी तथा दुष्ट लोगों से मुकाबला कर सकें, यह निर्णय सभी मुसलमानों की सहमति से लिया गया था, मैंने अकेले अपनी ओर से यह कार्य नहीं किया और न ही अपने विचार तथा निर्णय में मनमानी की,
وَ قَدْ جَعَلْنا ما حاوَلْتِهِ فِی الْكِراعِ وَ السِّلاحِ، یقاتِلُ بِهَا الْمُسْلِمُونَ وَ یجاهِدُونَ الْكُفَّارَ، وَ یجالِدُونَ الْمَرَدَةَ الْفُجَّارَ، وَ ذلِكَ بِاِجْماعِ الْمُسْلِمینَ، لَمْ اَنْفَرِدْ بِهِ وَحْدی، وَ لَمْ اَسْتَبِدْ بِما كانَ الرَّأْی عِنْدی،
व क़द जअल्ना मा हावल्तेही फ़िल-क़ेराए वस्सेलाहे, युक़ातेलो बेहल-मुस्लिमून व युजाहिदूनल-कुफ़्फ़ार, व युजालेदूनल-मरदतल-फुज्जार, व ज़ालिका बिइज्माइल-मुस्लिमीन, लम अनफ़रिद बेही वह्दी, व लम अस्तबिद बेमा कानर्रअ्यु इन्दी।
और यह मेरी स्थिति है और यह मेरी संपत्ति है जो तुम्हारे लिए है और तुम्हारे अधिकार में है, इसे तुमसे रोका नहीं जाएगा और न ही इसे किसी दूसरे व्यक्ति के लिए सुरक्षित रखा गया है, तुम अपने पिता की उम्मत की महिलाओं की सरदार हो, अपने बच्चों के लिए फलदार और पवित्र वृक्ष हो, तुम्हारे गुणों का इनकार नहीं किया गया है और तुम्हारी शाखाओं तथा जड़ों से कुछ भी कम नहीं किया जाएगा, मेरे अधिकार में जो कुछ है, उसमें मेरा निर्णय और अधिकार लागू है, क्या तुम यह पसंद करोगी कि इस मामले में मैं तुम्हारे पिता की बात के विरुद्ध कार्य करूँ?
وَ هذِهِ حالی وَ مالی، هِی لَكِ وَ بَینَ یدَیكِ، لاتَزْوی عَنْكِ وَ لانَدَّخِرُ دُونَكِ، وَ اَنَّكِ، وَ اَنْتِ سَیدَةُ اُمَّةِ اَبیكِ وَ الشَّجَرَةُ الطَّیبَةُ لِبَنیكِ، لایدْفَعُ مالَكِ مِنْ فَضْلِكِ، وَ لایوضَعُ فی فَرْعِكِ وَ اَصْلِكِ، حُكْمُكِ نافِذٌ فیما مَلَّكَتْ یدای، فَهَلْ‌ترین اَنْ اُخالِفَ فی ذاكَ اَباكِ (صَلَّی اللَّـهُ عَلَیهِ وَ الِهِ وَ سَلَّمَ).
व हाज़ेही हाली व माली, हिया लके व बैना यदैक़े, ला तज़्वी अनके व ला नद्दख़ेरो दूनके, व अन्नके, व अन्ते सय्यिदतो उम्मते अबीक़े वश-शजरतुत-तय्यिबतु लेबनीके, ला यद्फ़उ मालेके मिन फ़ज़्लेके, व ला यूज़ओ फ़ी फ़रएके व अस्लेके, हुक्मुके नाफ़िज़ुन फ़ीमा मल्लकत यदाया, फ़हल तरैन अन उख़ालेफ़ो फ़ी ज़ालेका अबाके (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम)।
हज़रत फ़ातिमा (स) ने फ़रमाया: अल्लाह पाक और पवित्र है। मेरे पिता, अल्लाह के पैगंबर, अल्लाह की किताब से मुँह मोड़ने वाले और उसके आदेशों के विरोधी नहीं थे, बल्कि वे उसकी पैरवी करते थे और उसकी आयतों पर अमल करते थे, क्या तुम लोग चाल और कपट के द्वारा मेरे पिता पर आरोप लगाना चाहते हो? और उनकी वफ़ात के बाद यह कार्य उन षड्यंत्रों के समान है, जो उनकी ज़िंदगी में उनके विरुद्ध रचे और बिछाए जाते थे, यह अल्लाह की किताब है, जो न्यायपूर्ण निर्णय करने वाली है और ऐसी वाणी है जो सत्य और असत्य के बीच अंतर स्पष्ट करती है, वह फ़रमाती है: ज़करिया ने कहा: “ऐ मेरे पालनहार! मुझे अपनी ओर से ऐसी संतान प्रदान कर, जो मेरा और याक़ूब के परिवार का उत्तराधिकारी बने।” और वह फ़रमाती है: “और सुलैमान ने दाऊद से विरासत पाई”
فقالت: سُبْحانَ‌اللَّـهِ، ما كانَ اَبی رَسُولُ اللَّـهِ عَنْ كِتابِ اللَّـهِ صادِفاً، وَ لالِاَحْكامِهِ مُخالِفاً، بَلْ كانَ یتْبَعُ اَثَرَهُ، وَ یقْفُو سُوَرَهُ، اَفَتَجْمَعُونَ اِلَی الْغَدْرِ اِعْتِلالاً عَلَیهِ بِالزُّورِ، وَ هذا بَعْدَ وَفاتِهِ شَبیهٌ بِما بُغِی لَهُ مِنَ الْغَوائِلِ فی حَیاتِهِ، هذا كِتابُ اللَّـهِ حُكْماً عَدْلاً وَ ناطِقاً فَصْلاً، یقُولُ: «یرِثُنی وَ یرِثُ مِنْ الِ‌یعْقُوبَ»، وَ یقُولُ: «وَ وَرِثَ سُلَیمانُ داوُدَ».
फ़क़ालत: सुब्हानल्लाहे, मा काना अबी रसूलुल्लाहे अन किताबिल्लाहे सादेफ़न, व ला लेअहकामेही मुख़ालेफ़न, बल काना यत्तबिउ असरहू, व यक़्फ़ू सुवरहू, अफ़तज्मऊन इलल-ग़द्रे इ'तिलालन अलैहे बिज़्ज़ूरे, व हाज़ा बअ्दा वफ़ातेही शबीहुन बेमा बोग़ेया लहू मिनल-ग़वाइले फ़ी हयातेही, हाज़ा किताबुल्लाहे हुक्मन अद्लन व नातेक़न फ़स्लन, यक़ूलो: “यरेसोनी व यरेसो मिन आली यअ्क़ूबा”, व यक़ूलो: “व वरेसा सुलैम़ानो दाऊदा।”
और अल्लाह ने उन हिस्सों और भागों के बारे में, जो उसने निर्धारित किए हैं, तथा विरासत में पुरुषों और महिलाओं के लिए जो हिस्से निश्चित किए हैं, पर्याप्त और स्पष्ट विवरण दिया है, इस प्रकार उसने क़यामत तक के लिए असत्य पर चलने वालों के बहानों तथा उनके संदेहों और शंकाओं को समाप्त कर दिया है, नहीं, ऐसा नहीं है, बल्कि तुम्हारी इच्छाओं और मनमानी ने तुम्हारे सामने यह रास्ता खोल दिया है. अब मेरे लिए सुंदर धैर्य के अलावा कोई उपाय नहीं है, और जो कुछ तुम कर रहे हो, उसमें अल्लाह ही हमारा सहायक है।
بَینَ عَزَّ وَ جَلَّ فیما وَزَّعَ مِنَ الْاَقْساطِ، وَ شَرَعَ مِنَ الْفَرائِضِ وَالْمیراثِ، وَ اَباحَ مِنْ حَظِّ الذَّكَرانِ وَ الْاِناثِ، ما اَزاحَ بِهِ عِلَّةَ الْمُبْطِلینَ وَ اَزالَ التَّظَنّی وَ الشُّبَهاتِ فِی الْغابِرینَ، كَلاَّ بَلْ سَوَّلَتْ لَكُمْ اَنْفُسُكُمْ اَمْراً، فَصَبْرٌ جَمیلٌ وَ اللَّـهُ الْمُسْتَعانُ عَلی ما تَصِفُونَ.
बय्यन अज़्ज़ा व जल्ला फ़ीमा वज़्ज़आ मिनल-अक़्साते, व शरअ मिनल-फ़राइज़े वल-मीरासे, व अबाहा मिन हज़्ज़िज़-ज़कराने वल-इनासे, मा अज़ाहा बेही इल्लतल-मुब्तेलीन, व अज़ालत-तज़न्नी वश-शुबुहाते फ़िल-ग़ाबेरीन, कल्ला बल सव्वलत लकुम अनफ़ोसुकुम अम्रन, फ़सब्रुन जमी़लुन वल्लाहुल-मुस्तआनो अला मा तसिफ़ून।
अबू बकर ने कहा: अल्लाह और उसके रसूल ने सच कहा है, और उनकी बेटी ने भी सच कहा है, वह हिकमत का केंद्र, मार्गदर्शन और रहमत का स्थान, धर्म का स्तंभ तथा प्रमाण और तर्क का स्रोत हैं, और वे सच ही कहती हैं, मैं तुम्हारी सच्ची बात को अस्वीकार नहीं करता और न ही तुम्हारे कथन को झुठलाता हूँ, ये मुसलमान मेरे और तुम्हारे बीच निर्णय करने वाले हैं, उन्होंने ही मुझे यह शासन सौंपा है और उनके निर्णय के आधार पर मैंने यह पद स्वीकार किया है, न तो मैंने अहंकार किया है, न अपनी राय में मनमानी की है और न ही अपने लिए कोई चीज़ ली है, और ये सभी इस बात के गवाह और साक्षी हैं।
فقال أبوبكر: صَدَقَ اللَّـهُ وَ رَسُولُهُ وَ صَدَقَتْ اِبْنَتُهُ، مَعْدِنُ الْحِكْمَةِ، وَ مَوْطِنُ الْهُدی وَ الرَّحْمَةِ، وَ رُكْنُ الدّینِ، وَ عَینُ الْحُجَّةِ، لااَبْعَدُ صَوابَكِ وَ لااُنْكِرُ خِطابَكِ، هؤُلاءِ الْمُسْلِمُونَ بَینی وَ بَینَكِ قَلَّدُونی ما تَقَلَّدْتُ، وَ بِاتِّفاقٍ مِنْهُمْ اَخَذْتُ ما اَخَذْتُ، غَیرَ مَكابِرٍ وَ لامُسْتَبِدٍّ وَ لامُسْتَأْثِرٍ، وَ هُمْ بِذلِكَ شُهُودٌ.
फ़क़ाला अबू बक्र: सदक़ल्लाहो व रसूलुहो व सदक़त इब्नतोहु, मअ्दिनुल-हिक्मते, व मौतिनुल-होदा वर-रहमते, व रुक्नुद्दीने, व ऐनुल-हुज्जते, ला अबअदो सवाबक़े व ला उन्किरो ख़िताबका, हाउलाइल-मुस्लिमून बैनी व बैनके क़ल्लदूनी मा तक़ल्लद्तु, व बित्तिफ़ाक़िन मिन्हुम अख़ज़्तु मा अख़ज़्तो, ग़ैरा मकाबेरिन व ला मुस्तबिद्दिन व ला मुस्तअ्सिरिन, व हुम बिज़ालेका शोहूदुन।
तब हज़रत फ़ातिमा (स) ने लोगों की ओर रुख करके फ़रमाया: ऐ मुसलमानों! तुम बेकार और निरर्थक बातों को सुनने के लिए जल्दी करते हो और बुरे कर्मों को नज़रअंदाज़ कर देते हो, क्या तुम क़ुरआन में विचार नहीं करते, या तुम्हारे दिलों पर मुहर लगा दी गई है? ऐसा नहीं है, बल्कि तुम्हारे बुरे कर्मों ने तुम्हारे दिलों पर अंधकार छा दिया है और तुम्हारे कानों तथा आँखों को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है, तुमने क़ुरआन की आयतों की बहुत बुरी व्याख्या की, उसके लिए बहुत बुरा मार्ग चुना और उसके बदले बहुत बुरी चीज़ को स्वीकार किया। अल्लाह की कसम! इस बोझ को उठाना तुम्हारे लिए बहुत भारी होगा और इसका परिणाम पाप तथा विनाश से भरा हुआ है, जब पर्दे हटा दिए जाएँगे और इसके नुकसान तुम्हारे सामने स्पष्ट हो जाएँगे, तथा वह सब कुछ तुम्हारे सामने आ जाएगा जिसकी तुमने कल्पना भी नहीं की थी, तब असत्य का अनुसरण करने वाले ही सबसे बड़े घाटे में रहने वाले होंगे।
فالتفت فاطمة علیهاالسلام الی النساء، و قالت: مَعاشِرَ الْمُسْلِمینَ الْمُسْرِعَةِ اِلی قیلِ الْباطِلِ، الْمُغْضِیةِ عَلَی الْفِعْلِ الْقَبیحِ الْخاسِرِ، اَفَلاتَتَدَبَّرُونَ الْقُرْانَ اَمْ عَلی قُلُوبٍ اَقْفالُها، كَلاَّ بَلْ رانَ عَلی قُلُوبِكُمْ ما اَسَأْتُمْ مِنْ اَعْمالِكُمْ، فَاَخَذَ بِسَمْعِكُمْ وَ اَبْصارِكُمْ، وَ لَبِئْسَ ما تَأَوَّلْتُمْ، وَ ساءَ ما بِهِ اَشَرْتُمْ، وَ شَرَّ ما مِنْهُ اِعْتَضْتُمْ، لَتَجِدَنَّ وَ اللَّـهِ مَحْمِلَهُ ثَقیلاً، وَ غِبَّهُ وَبیلاً، اِذا كُشِفَ لَكُمُ الْغِطاءُ، وَ بانَ ما وَرائَهُ الضَّرَّاءُ، وَ بَدا لَكُمْ مِنْ رَبِّكُمْ ما لَمْ تَكُونُوا تَحْتَسِبُونَ، وَ خَسِرَ هُنالِكَ الْمُبْطِلُونَ.
फ़ल्तफ़त फ़ातिमतु अलैहस्सलाम इलन्निसा, व क़ालत: मआशिरल-मुस्लिमीनल-मुस्रेअते इला क़ीलिल-बातिले, अल-मुग़ज़ियते अलल-फ़ेअलिल-क़बीहिल-ख़ासेरे, अफ़ला ततदब्बरूनल-क़ुरआन, अम अला क़ुलूबिन अक़्फ़ालोहा, कल्ला बल राना अला क़ुलूबिकुम मा असअ्तुम मिन आमालेकुम, फ़अख़ज़ बिसम्इकुम व अब्सारेकुम, व लबेअ्स मा तअव्वल्तुम, व साअ मा बेही अशर्तुम, व शर्रा मा मिन्हो इतअज़्तुम, लतजिदन्ना वल्लाहे मह्मिलहू सक़ीलन, व ग़िब्बहू वबीलन, इज़ा कोशेफ़ा लकुमुल-ग़ेताओ, व बाना मा वराअहुज़ ज़र्राओ, व बदा लकुम मिन रब्बेकुम मा लम तकूनू तह्तसेबून, व ख़सेरा हुनालेकल-मुब्तिलूना।
फिर वह पैगंबर (स) की क़ब्र की ओर मुड़ीं और फ़रमाया:
ثم عطفت علی قبر النبی صلی اللَّـه علیه و آله، و قالت:
सुम्मा अ'तफ़त अला क़ब्रिन-नबिय्ये सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही, व क़ालत:
आपके बाद ऐसी घटनाएँ और परिस्थितियाँ सामने आईं कि यदि आप जीवित होते तो ये इतनी बड़ी और गंभीर दिखाई न देतीं। हमने आपको ऐसे खो दिया जैसे कोई धरती बारिश से वंचित हो जाए, और आपकी क़ौम बिखर गई। आइए, देखिए कि वे किस तरह रास्ते से भटक गए। हर वह परिवार जो अल्लाह के निकट सम्मान और प्रतिष्ठा रखता था, वह दूसरों के बीच भी सम्मानित था, सिवाय हमारे। आपकी उम्मत के कुछ लोगों ने आपके जाते ही, और हमारे तथा आपके बीच मिट्टी का पर्दा पड़ते ही, अपने दिलों के भेद प्रकट कर दिए। आपके बाद कुछ और लोगों ने हमसे मुँह मोड़ लिया, हमें तुच्छ समझा और हमारा विरसा छीन लिया गया। आप चौदहवीं रात के चाँद और प्रकाश देने वाले दीपक के समान थे, जिन पर अल्लाह की ओर से किताबें नाज़िल की जाती थीं। जिब्राईल (अ) अल्लाह की आयतों के साथ हमारे लिए साथी और हमनवा थे। आपके बाद सारी भलाई हमसे छिप गई। काश! हम आपके जाने और मिट्टी के आपको अपने भीतर छिपा लेने से पहले ही मर गए होते।
قَدْ كانَ بَعْدَكَ اَنْباءٌ وَهَنْبَثَةٌ لَوْ كُنْتَ شاهِدَها لَمْ تَكْثِرِ الْخُطَبُ اِنَّا فَقَدْناكَ فَقْدَ الْاَرْضِ وابِلَها وَ اخْتَلَّ قَوْمُكَ فَاشْهَدْهُمْ وَ لاتَغِبُ وَ كُلُّ اَهْلٍ لَهُ قُرْبی وَ مَنْزِلَةٌ عِنْدَ الْاِلهِ عَلَی الْاَدْنَینِ مُقْتَرِبُ اَبْدَتْ رِجالٌ لَنا نَجْوی صُدُورِهِمُ لمَّا مَضَیتَ وَ حالَتْ دُونَكَ التُّرَبُ تَجَهَّمَتْنا رِجالٌ وَ اسْتُخِفَّ بِنا لَمَّا فُقِدْتَ وَ كُلُّ الْاِرْثِ مُغْتَصَبُ وَ كُنْتَ بَدْراً وَ نُوراً یسْتَضاءُ بِهِ عَلَیكَ تنْزِلُ مِنْ ذِی الْعِزَّةِ الْكُتُبُ وَ كانَ جِبْریلُ بِالْایاتِ یؤْنِسُنا فَقَدْ فُقِدْتَ وَ كُلُّ الْخَیرِ مُحْتَجَبُ فَلَیتَ قَبْلَكَ كانَ الْمَوْتُ صادِفُنا لَمَّا مَضَیتَ وَ حالَتْ دُونَكَ الْكُتُبُ.
क़द काना बअ्दका अम्बाऊँ व हनबसतुन, लौ कुन्ता शाहेदहा लम तक्सेरिल-ख़ुतबो, इन्ना फ़क़द्नाका फ़क़्दल-अर्ज़े वाबेलहा, वख़्तल्ला क़ौमुका फ़श्हद्हुम व ला तग़ेबो, वकुल्लो अहलिन लहू क़ुर्बा व मंज़िलतुन, इन्दल-इलाहे अलल-अदनैने मुक़्तरेबो, अबदत रेजालुन लना नज्वा सदूरेहेमो, लम्मा मज़ैता व हालात दूनकत-तुरबो, तजह्हमत्ना रेजालुन वस्तुख़िफ़्फ़ा बिना, लम्मा फ़ोक़िद्ता व कुल्लुल-इर्से मुग़्तसेबो, वकुन्ता बद्रन व नूरन युस्तज़ाओ बेही, अलैका तंज़िलो मिन ज़िल-इज़्ज़तिल-कुतुबु, व काना जिब्रीलो बिल-आयाते युअ्नेसुना, फ़क़द फ़ोक़ेद्ता व कुल्लुल-ख़ैरे मोहतजेबो, फ़लैता क़ब्लका कानल-मौतो सादेफ़ोना, लम्मा मज़ैता व हालत दूनकल-कुतुबो।

उस अल्लाह की प्रशंसा और स्तुति है, जिसने हमें अपनी अनगिनत नेअमते प्रदान की; और उसका आभार है उन प्रेरणाओं के लिए जो उसने हमारे हृदयों में डालीं। हम उसकी प्रशंसा और शुक्र अदा करते हैं उन नेमतों के लिए जो उसने पहले से हमारे लिए भेजीं। वही है जिसने अपनी सृष्टि को असंख्य अनुग्रहों से लाभान्वित किया, अपनी व्यापक कृपाएँ प्रदान कीं और अपनी अनगिनत दयाओं से हमें सम्मानित किया। उसकी नेमतों की कोई सीमा नहीं है; उनका प्रतिफल किसी भी बदले और इनाम की कल्पना से कहीं अधिक है, और उनकी व्यापकता इतनी अनंत है कि मानव समझ-बूझ की पहुँच से हमेशा परे है। उसने लोगों को इस ओर बुलाया कि वे उसकी नेमतों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें, ताकि वह उनकी नेमतों में और वृद्धि करे। उसने अपनी अपार कृपाओं के माध्यम से लोगों को अपना शुक्र अदा करने की ओर प्रेरित किया और अपनी नेमतों की ओर बुलाकर उन्हें और भी बढ़ा दिया।

मैं गवाही देती हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है और उसका कोई साझीदार नहीं है। तौहीद ऐसा वचन है, जिसमें निष्ठा को उसकी आत्मा और वास्तविकता बनाया गया है। दिल में उसकी गवाही को स्थापित किया गया है, ताकि उसके द्वारा दृष्टि और विचार प्रकाशित हों। वह ऐसा ईश्वर है जिसे आंखों से देखा नहीं जा सकता और न ही जीभ के द्वारा उसका सही-सही वर्णन किया जा सकता है। वह किस प्रकार का है, उसकी वास्तविकता कैसी है—यह बात किसी कल्पना में नहीं आ सकती।

उसने इस संसार को शून्य से पैदा किया और उसे पैदा करने के लिए वह किसी का मोहताज नहीं था। उसने अपनी इच्छा और मर्जी के अनुसार सृष्टि की। संसार को पैदा करने में उसका उद्देश्य अपने लिए कोई लाभ प्राप्त करना नहीं था। उसने संसार को इसलिए पैदा किया ताकि अपनी बुद्धिमत्ता और ज्ञान को प्रकट करे, अपनी आज्ञापालन की याद दिलाए, अपनी शक्ति का प्रदर्शन करे, अपने बंदों को अपनी उपासना के लिए प्रेरित करे और अपनी पुकार को फैलाए। उसने अपनी आज्ञा का पालन करने के लिए पुरस्कार निर्धारित किया और अवज्ञा के लिए दंड निश्चित किया, ताकि अपने बंदों को अपने अज़ाब से बचाए और उन्हें जन्नत की ओर ले जाए।

और मैं गवाही देती हूँ कि मेरे पिता मुहम्मद (स) अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं। अल्लाह ने उन्हें रसूल बनाए जाने से पहले ही चुन लिया था, उन्हें अपना पैग़म्बर घोषित करने से पहले ही उनके लिए यह स्थान निर्धारित कर दिया था और उन्हें भेजे जाने से पहले ही उन्हें इस महान दायित्व के लिए तैयार कर दिया था। यह उस समय की बात है जब सारी सृष्टि अज्ञानता और अदृश्यता के पर्दों में छिपी हुई थी, गहरे अंधकार में डूबी हुई थी और अस्तित्व तथा अनस्तित्व की सीमा पर थी। अल्लाह ने अपने असीम ज्ञान के आधार पर उन्हें पैग़म्बर बनाकर भेजा, क्योंकि वह कार्यों के परिणामों को भली-भाँति जानता था, समय की घटनाओं पर पूर्ण अधिकार और ज्ञान रखता था और अपनी निश्चित की हुई तक़दीरों (निर्णयों) के घटित होने से पूरी तरह परिचित था।

अल्लाह ने उन्हें इसलिए भेजा ताकि वह उसके आदेश को पूर्ण करे, उसके निश्चित फ़ैसले को लागू करे और अपनी निर्धारित तक़दीरों को पूरा करे। उस समय पैग़म्बर (स) ने देखा कि विभिन्न समुदाय अलग-अलग धर्मों और मान्यताओं में बँटे हुए थे। कुछ लोग जलती हुई अग्नियों के सामने उपासना में लगे हुए थे, कुछ तराशी हुई मूर्तियो की पूजा कर रहे थे, और उस परमेश्वर का इनकार कर रहे थे जिसकी पहचान अल्लाह ने मनुष्य की फ़ितरत में रखी थी।

फिर महान और सर्वशक्तिमान अल्लाह ने मेरे पिता मुहम्मद (स) के माध्यम से उन अंधकारों को प्रकाश से बदल दिया, दिलों की कठिनाइयों और उलझनों को दूर कर दिया और सत्य को देखने की राह में आने वाली रुकावटों को समाप्त कर दिया। उन्होंने लोगों के बीच मार्गदर्शन का ध्वज लेकर खड़े होकर उन्हें गुमराही से मुक्ति दिलाई, उनकी आँखों को सत्य के लिए खोल दिया, उन्हें सुदृढ़ और दृढ़ धर्म की ओर मार्गदर्शन दिया और उन्हें सीधे रास्ते की ओर आमंत्रित किया।

जब तक कि अल्लाह ने उन्हें अपनी ओर बुला लिया—ऐसा बुलावा जो अपनी दया, सम्मान और प्रेम के साथ था। उस समय पैग़म्बर (स) ने इस संसार की कठिनाइयों और कष्टों से मुक्ति पाकर शांति और आराम प्राप्त किया। नेक और पवित्र फ़रिश्ते उनके चारों ओर उपस्थित थे, क्षमाशील प्रभु की प्रसन्नता ने उन्हें अपने घेरे में ले लिया था और वे अल्लाह की रहमत के सान्निध्य में पहुँच गए थे। अतः मेरे पिता, अल्लाह के पैग़म्बर, उसके अमानतदार, उसकी सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ और उसके चुने हुए बंदे पर अल्लाह की दया और कृपा हो। उन पर अल्लाह की ओर से शांति, रहमत और बरकतें सदैव बनी रहें।

हे अल्लाह के बंदो! तुम उसके आदेशों और निषेधों के ध्वजवाहक हो, उसके धर्म और उसकी प्रकाशना के वाहक हो, तुम एक-दूसरे के बीच अल्लाह की अमानतों के रक्षक हो और उसकी ओर से लोगों तक संदेश पहुँचाने वाले हो। तुम्हारे बीच अल्लाह के सत्य का मार्गदर्शन करने वाला नेतृत्व मौजूद है और यह वह वचन है जिसे उसने पहले ही तुम्हारी ओर भेजा है तथा वह अमानत और विरासत है जिसे उसने तुम्हारे लिए बाकी रखा है।

वह अल्लाह की ओर से बोलने वाली पुस्तक, सत्य बोलने वाला क़ुरआन, चमकता हुआ प्रकाश और उज्ज्वल किरण है, उसकी शिक्षाएँ और प्रमाण स्पष्ट हैं, उसके आंतरिक रहस्य प्रकट हैं और उसकी बाहरी निशानियाँ उजागर हैं, उसका अनुसरण करने वाले संसार के लोगों के लिए ईर्ष्या और सम्मान का विषय हैं, और उसकी पैरवी करना अल्लाह की प्रसन्नता का कारण बनता है, उसे ध्यानपूर्वक सुनना मुक्ति और मार्गदर्शन का साधन है। इसी के माध्यम से अल्लाह के प्रकाशमय प्रमाणों, स्पष्ट किए गए अनिवार्य कर्तव्यों, उन हराम कार्यों से जिनसे रोका गया है, उसकी स्पष्ट गवाहियों, पर्याप्त तर्कों, प्रशंसनीय गुणों, दी गई सहूलियतों और निर्धारित किए गए अनिवार्य नियमों को जाना जा सकता है।

फिर महान अल्लाह ने ईमान को तुम्हें शिर्क से पवित्र करने, नमाज़ को तुम्हें घमंड और अहंकार से दूर करने, ज़कात को आत्मा की शुद्धि और रोज़ी में वृद्धि, और रोज़े को निष्ठा और सच्ची भक्ति को दृढ़ करने, हज को धर्म की मजबूती, न्याय और इंसाफ़ को दिलों में मेल-मिलाप और शांति स्थापित करने, और हम अहल-ए-बैत की आज्ञापालन को उम्मतों और समाजों में व्यवस्था बनाए रखने, और इमामत को लोगों को मतभेद और बिखराव से मुक्ति दिलाने, जिहाद को इस्लाम की प्रतिष्ठा और सम्मान, और धैर्य को अल्लाह के पुरस्कार और प्रतिफल प्राप्त करने में सहायता का साधन बनाया।

और अच्छाइयों का आदेश देना को समाज की भलाई और सुधार, माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार को अपनी नाराज़गी और प्रकोप से बचने, और रिश्तेदारों से संबंध बनाए रखने को आयु में वृद्धि और जनसंख्या में विस्तार, न्यायपूर्ण प्रतिशोध को लोगों के जीवन और रक्त की सुरक्षा, मन्नतों को पूरा करने को अपनी क्षमा और दया के योग्य बनने का माध्यम बनाया, और माप-तौल में सावधानी और न्याय को कमी करने और धोखाधड़ी से बचाने के लिए निर्धारित किया।

और शराब पीने से रोकने का आदेश दिया ताकि मनुष्य बुराइयों और गंदगी से पवित्र रह सके, किसी पर झूठा आरोप लगाने और अनुचित दोष लगाने को हराम किया ताकि लोग अल्लाह की रहमत से दूर न हों, चोरी से बचने को पवित्रता और चरित्र की रक्षा, और शिर्क को निषिद्ध किया ताकि लोग केवल अल्लाह की एकता में पूर्ण निष्ठा और शुद्ध एकेश्वरवाद को अपनाएँ।

अतः जिस प्रकार ईश्वर से डरने का हक़ है, उसी प्रकार उससे डरते रहो और इस संसार से विदा न होना मगर इस अवस्था में कि तुम मुसलमान हो, और अल्लाह के उन आदेशों का पालन करो जिनका उसने तुम्हें निर्देश दिया है और उन कार्यों से बचो जिनसे उसने रोका है, निस्संदेह अल्लाह से वास्तविक भय और सावधानी रखने वाले वही हैं जो ज्ञान रखने वाले हैं। फिर उन्होंने फ़रमाया:

हे लोगो! जान लो कि मैं फ़ातिमा हूँ और मेरे पिता मुहम्मद (स) हैं, जो बात मैं आरंभ में कह रही हूँ, वही अंत में भी कहूँगी, मेरी बात में न कोई गलती है और न ही इसमें कोई अन्याय है, तुम्हारे बीच एक ऐसे पैग़म्बर भेजे गए जो तुम्हारी कठिनाइयों और कष्टों को देखकर व्यथित होते थे, तुम्हारी भलाई के लिए अत्यंत चिंतित रहते थे और ईमान वालों के प्रति अत्यंत दयालु और करुणामय थे।

अतः यदि तुम उन्हें पहचानते हो तो जान लोगे कि वे तुम्हारी स्त्रियों में मेरे पिता थे, और तुम्हारे पुरुषों में मेरे चचेरे भाई भाई हैं, कितना ही महान और श्रेष्ठ है वह व्यक्तित्व, जिससे मेरा यह संबंध जुड़ा हुआ है।

उन्होंने अपने दायित्व को चेतावनी के माध्यम से पूरा किया, वे बहुदेववादियों के रास्ते से अलग रहे, उनके विरुद्ध संघर्ष किया, उनके अहंकार और विरोध को परास्त किया और उन्हें सत्य की ओर बुलाया, उन्होंने अपने प्रभु की ओर लोगों को बुद्धिमत्ता, अच्छी नसीहत और उत्तम उपदेश के साथ आमंत्रित किया, वे मूर्तियों को नष्ट करते रहे और सत्य के विरोध में खड़े लोगों के घमंड को तोड़ते रहे, यहाँ तक कि उनके समूह बिखर गए और वे पराजित होकर मैदान से पीछे हट गए।

यहाँ तक कि जब उज्ज्वल सुबह रात के पर्दे को चीरकर प्रकट हुई, सत्य ने अपने चेहरे से पर्दा हटा दिया, धर्म का नेतृत्व करने वाला बोल उठा और शैतानों की आवाज़ें शांत हो गईं, कपट के काँटे रास्ते से हटा दिए गए, कुफ़्र और आपसी विभाजन की गाँठें खुल गईं, और तुम्हारे होंठ एकेश्वरवाद की गवाही के उच्चारण के लिए खुल गए, यह सब ऐसे लोगों के बीच हुआ जो कमज़ोर और संघर्षपूर्ण जीवन जी रहे थे, जिनके चेहरे धूप और कठिनाइयों से प्रभावित थे और जिनके पेट भूख के कारण पीठ से लगे हुए थे।

और तुम उस समय आग की खाई के किनारे खड़े थे, तुम एक घूंट पानी की तरह थे जिसे पाने के लिए लालची लोग लालायित रहते थे, तुम उस चिंगारी के समान थे जो तुरंत बुझ जाती है, राह चलने वालों के पैरों तले कुचले जाते थे, तुम ऐसा पानी पीते थे जिसे ऊँटों ने गंदा कर दिया था, और पेड़ों की छाल को अपना भोजन बनाते थे, तुम अपमानित और तिरस्कृत जीवन जी रहे थे, तुम्हें भय रहता था कि तुम्हारे आसपास रहने वाले लोग तुम्हें उठा ले जाएँगे और तुम्हारा अस्तित्व मिटा देंगे, फिर अल्लाह तआला ने तुम्हें ऐसी परिस्थितियों के बाद उस पैग़म्बर (स) के माध्यम से मुक्ति प्रदान की, यह उस समय हुआ जब तुमने शक्तिशाली लोगों, अरब के भेड़ियों जैसे अत्याचारी समूहों और अहल-ए-किताब के विद्रोही लोगों के हाथों अनेक कठिनाइयाँ और कष्ट सहे थे।

जब भी युद्ध की आग भड़काई जाती, अल्लाह उसे बुझा देता, और जब कभी शैतान अपना सिर उठाता या बहुदेववादियों का कोई अजगर समान शक्तिशाली शत्रु अपना मुँह खोलता, तो पैग़म्बर (स) अपने भाई को उसके मुकाबले में भेज देते, वह तब तक वापस नहीं आते थे, जब तक शत्रुओं के सरों को धराशायी न कर देते और अपनी तलवार के वार से उनके भड़काए हुए युद्ध की आग को शांत न कर देते, वे अल्लाह के मार्ग में निरंतर संघर्ष करने वाले, उसके आदेशों को पूरा करने में पूरी मेहनत करने वाले, अल्लाह के रसूल (स) के अत्यंत निकट रहने वाले और अल्लाह के प्रिय बंदों में श्रेष्ठ स्थान रखने वाले थे, वे सदैव सत्य के लिए तत्पर, लोगों के हितैषी, ईमानदार सलाह देने वाले और अथक प्रयास करने वाले थे, और अल्लाह के मार्ग में उन्हें किसी निंदा करने वाले की निंदा का कोई भय नहीं था।

और यह उस समय था जब तुम लोग आराम और सुख-सुविधा का जीवन जी रहे थे, सुरक्षा की गोद में आनंदपूर्वक रह रहे थे और प्रतीक्षा करते थे कि कठिनाइयाँ और परेशानियाँ हम पर आ पड़ें, तुम केवल समाचारों की प्रतीक्षा में रहते थे, और जब संघर्ष का समय आता तो पीछे हट जाते थे; युद्ध के मैदान में सामना करने के बजाय तुम भाग खड़े होते थे।

और जब अल्लाह ने अपने पैग़म्बर (स) के लिए नबियों के निवास और अपने चुने हुए बंदों की विश्रामस्थली को चुना, तब तुम लोगों में कपट के लक्षण प्रकट होने लगे, धर्म का वस्त्र पुराना पड़ गया, गुमराह लोगों की चुप्पी टूट गई, और कम दर्जे वाले लोग सम्मान और प्रतिष्ठा के स्थान पर पहुँच गए, असत्य के अनुयायियों का पाला हुआ ऊँट आवाज़ करने लगा और तुम्हारे घरों में आ पहुँचा, शैतान ने अपने छिपने के स्थान से सिर बाहर निकाला और तुम्हें अपनी ओर बुलाया, उसने देखा कि तुम उसकी पुकार का उत्तर देने के लिए तैयार हो और उसके धोखे में आने के लिए उत्सुक हो, फिर उसने तुम्हें उठ खड़े होने के लिए उकसाया और देखा कि तुमने यह काम बहुत आसानी से कर लिया, उसने तुम्हें क्रोध दिलाया और पाया कि तुम क्रोधित हो चुके हो। फिर तुमने दूसरों के ऊँटों पर अपनी पहचान के निशान लगा दिए और उस चीज़ में प्रवेश कर गए जो तुम्हारा अधिकार नहीं थी।

यह सब ऐसे समय में हुआ जब अभी अधिक समय भी नहीं बीता था, घाव की दरार अभी गहरी और खुली हुई थी, ज़ख्म भरा भी नहीं था और पैग़म्बर (स) को अभी दफ़न भी नहीं किया गया था, तुमने यह बहाना बनाया कि तुम्हें उपद्रव और अशांति का भय है। सुन लो! तुम स्वयं उसी फ़ितने में पड़ चुके हो, और निश्चय ही नरक ने काफ़िरों को चारों ओर से घेर रखा है।

यह कार्य तुमसे अपेक्षित नहीं था, तुमने ऐसा कैसे कर दिया? और तुम किस ओर जा रहे हो, जबकि अल्लाह की किताब तुम्हारे सामने मौजूद है, उसकी शिक्षाएँ स्पष्ट हैं, उसके आदेश प्रकाशमान हैं, मार्गदर्शन के चिन्ह प्रकट हैं, उसकी निषिद्ध बातें स्पष्ट रूप से बताई गई हैं और उसके निर्देश साफ़-साफ़ मौजूद हैं, फिर भी तुमने उसे अपने पीछे डाल दिया, क्या तुम उससे विमुख होना चाहते हो? या क़ुरआन के अलावा किसी और के अनुसार निर्णय करना चाहते हो? निस्संदेह अत्याचारियों के लिए यह बहुत बुरा विकल्प है, और जो व्यक्ति इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म की तलाश करेगा, वह उससे स्वीकार नहीं किया जाएगा और आख़िरत में वह घाटा उठाने वालों में से होगा।

फिर तुमने इतना भी इंतज़ार नहीं किया कि यह विचलित और बेचैन हृदय शांत हो जाए और इस मामले को संभालना आसान हो जाए, बल्कि तुमने आग भड़काने वाली चिंगारियों को और तेज़ कर दिया और उसे हवा देकर भड़काने लगे, तुम शैतान की पुकार का उत्तर देने, अल्लाह के उज्ज्वल धर्म के प्रकाश को बुझाने और चुने हुए पैग़म्बर (स) की परंपराओं को मिटाने के लिए तैयार हो गए, खाने के बहाने तुम दूध के ऊपर जमी मलाई की तरह छिप-छिपकर लाभ उठाने लगे, और उनके परिवार और बच्चों के लिए तुम पहाड़ियों और पेड़ों के पीछे घात लगाकर चलते-फिरते रहे, और हमें उन घटनाओं पर धैर्य रखना पड़ा, जो हमारे लिए तेज़ तलवार के वार और पेट के बीच भाले के आर-पार हो जाने जैसी पीड़ादायक थीं।

और अब तुम यह समझते हो कि हमारे लिए कोई विरासत नहीं है? क्या तुम अज्ञानता के युग के निर्णय को चाहते हो? और विश्वास रखने वालों के लिए अल्लाह के निर्णय से बेहतर और किसका निर्णय हो सकता है? क्या तुम नहीं जानते? जबकि यह बात तुम्हारे लिए सूरज की तरह स्पष्ट है कि मैं उसी पैग़म्बर (स) की बेटी हूँ।

हे मुसलमानों! क्या यह उचित है कि मेरे पिता की विरासत मुझसे छीन ली जाए? हे अबू क़ुहाफ़ा के बेटे! क्या अल्लाह की किताब में यह लिखा है कि तुम अपने पिता की विरासत प्राप्त करो और मैं अपने पिता की विरासत से वंचित कर दी जाऊँ? तुमने तो एक नई और अजीब बात प्रस्तुत की है, क्या तुम जान-बूझकर अल्लाह की किताब को छोड़ रहे हो और उसे अपने पीछे डाल रहे हो? क्या क़ुरआन यह नहीं कहता कि सुलेमान ने दाऊद से विरासत पाई? और ज़करिया (अ) के उस कथन का उल्लेख नहीं करता जब उन्होंने कहा था: हे मेरे पालनहार! मुझे अपनी ओर से एक उत्तराधिकारी प्रदान कर, जो मेरा और याक़ूब के परिवार का वारिस बने? और क्या अल्लाह ने यह नहीं फ़रमाया कि रक्त-संबंध रखने वाले लोग एक-दूसरे के अधिक अधिकारी हैं? और क्या उसने यह नहीं कहा कि अल्लाह तुम्हें तुम्हारी संतान के संबंध में आदेश देता है कि एक पुत्र का हिस्सा दो पुत्रियों के हिस्से के बराबर है? और वह यह भी फ़रमाता है कि जब तुममें से किसी के सामने मृत्यु आ जाए और वह कुछ संपत्ति छोड़ रहा हो, तो माता-पिता और निकट संबंधियों के लिए उचित वसीयत करना तुम्हारे लिए निर्धारित किया गया है; यह आदेश परहेज़गारों के लिए एक अनिवार्य अधिकार है।

और तुम यह समझते हो कि मेरा कोई अधिकार नहीं है और मेरे पिता की विरासत में मेरा कोई हिस्सा नहीं है? क्या अल्लाह ने तुम्हारे लिए कोई ऐसी आयत उतारी है, जिसमें मेरे पिता को विरासत के अधिकार से अलग कर दिया गया हो? या तुम यह कहते हो कि दो अलग-अलग धर्मों वाले लोग एक-दूसरे के वारिस नहीं बनते? क्या तुम मुझे और मेरे पिता को एक ही धर्म के अनुयायी नहीं मानते? या फिर तुम मेरे पिता और मेरे चचेरे भाई से अधिक क़ुरआन के सामान्य और विशेष आदेशों को जानते हो? तो लो, यह रहा यह ऊँट; यह तैयार और सुसज्जित ऊँट है, इसकी लगाम पकड़ो और इसे ले जाओ। लेकिन क़यामत के दिन तुम्हारी इससे मुलाक़ात अवश्य होगी।

अल्लाह क्या ही उत्तम न्यायाधीश है, और उसका रसूल क्या ही अच्छा निर्णय करने वाला है,और क़यामत कितना अच्छा न्याय का स्थान है, उस दिन और उस घड़ी असत्य के अनुयायी घाटा उठाने वाले होंगे, उस समय पछतावा तुम्हारे किसी काम नहीं आएगा, हर बात और हर घटना के लिए एक निश्चित समय और स्थान निर्धारित है, अतः शीघ्र ही तुम्हें पता चल जाएगा कि अपमानित करने वाला दंड किस पर उतरेगा और कौन उस हमेशा रहने वाली सज़ा का भागी बनेगा।

फिर उन्होंने अंसार की ओर रुख किया और फ़रमाया:

ऐ नक़ीबों के समूह! ऐ राष्ट्र की भुजाओं! ऐ इस्लाम के रक्षकों! मेरे अधिकार के मामले में यह कमजोरी और लापरवाही क्यों? और मेरी फरियाद का जवाब देने में यह उदासीनता क्यों? क्या मेरे पिता, अल्लाह के पैगंबर, यह नहीं फरमाते थे कि “हर व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके बच्चों के माध्यम से सुरक्षित रखी जाती है”? फिर तुमने इतनी जल्दी ये कार्य कैसे कर डाले? और कितनी जल्दबाजी में इस दुबली बकरी को दुहा गया, जिससे उसके मुंह और नाक से खून बह निकला, जबकि तुममें इतनी शक्ति और सामर्थ्य मौजूद है कि जिस उद्देश्य के लिए हम प्रयास कर रहे हैं, उसमें हमारा साथ दे सकते हो, और मेरे इस अधिकार तथा मेरे उद्देश्य की रक्षा और समर्थन करने की भी तुममें पूरी क्षमता है।

क्या तुम यह कहते हो कि मुहम्मद (स) इस दुनिया से विदा हो गए? निस्संदेह, यह बहुत बड़ी और अत्यंत गंभीर विपत्ति है, इसका घाव बहुत गहरा है और इसकी दरार इतनी बड़ी है कि उसे भरना कठिन है, उनके चले जाने से धरती पर चारों ओर अंधकार छा गया, सितारों की चमक फीकी पड़ गई और सारी आशाएं निराशा में बदल गईं,पहाड़ अपनी जगह से हिल गए, पवित्र मर्यादाएं पैरों तले रौंदी गईं, और उनके स्वर्गवास के बाद किसी के सम्मान और प्रतिष्ठा की कोई परवाह नहीं रही।

अल्लाह की कसम! यह विपत्ति कहीं अधिक बड़ी और यह मुसीबत कहीं अधिक भयंकर है, संसार में न तो इससे बड़ी कोई विपत्ति हुई है और न ही कोई ऐसी जानलेवा मुसीबत है जो इसकी बराबरी कर सके, अल्लाह की किताब ने इस विपत्ति को स्पष्ट रूप से बयान किया है, यही वह अल्लाह की किताब है जिसे तुम अपने घरों में और अपनी रात-दिन की सभाओं में धीमी और ऊँची आवाज़ में, तिलावत और पाठ के साथ पढ़ते हो, यह ऐसी विपत्ति है जो इससे पहले भी पैगंबरों और रसूलों पर आ चुकी है, यह एक निश्चित आदेश और अटल फैसला है। अल्लाह तआला फरमाता है:

(और मुहम्मद तो केवल एक रसूल हैं। उनसे पहले भी कई रसूल गुजर चुके हैं। तो क्या यदि उनका स्वर्गवास हो जाए या वे शहीद कर दिए जाएँ, तुम अपनी पिछली स्थिति की ओर लौट जाओगे? और जो कोई अपनी पिछली स्थिति की ओर लौट जाए, वह अल्लाह का कुछ भी नुकसान नहीं कर सकता और जो लोग शुक्रगुज़ार हैं, अल्लाह उन्हें शीघ्र ही पुरस्कार प्रदान करेगा। (सूर ए आले-इमरान, आयत 144)

ऐ क़ैला के बेटों — अर्थात अंसार के समूह! क्या मेरे पिता की विरासत के मामले में मुझ पर अत्याचार किया जाए, जबकि तुम मुझे देख रहे हो और मेरी बात सुन रहे हो, तुम सभाओं और समुदाय वाले हो, मेरी पुकार की आवाज़ सभी तक पहुँच रही है और तुम मेरी स्थिति से भली-भांति परिचित हो, तुम्हारे पास बड़ी संख्या में लोग और पर्याप्त साधन हैं, तुम्हारे पास हथियार, कवच और ढालें मौजूद हैं, मेरी पुकार तुम्हारे कानों तक पहुँचती है, लेकिन तुम उसका उत्तर नहीं देते, तुम मेरी फरियाद और सहायता की पुकार सुनते हो, फिर भी मेरी सहायता के लिए आगे नहीं आते, हालाँकि तुम अपनी बहादुरी के लिए प्रसिद्ध और भलाई तथा नेक आचरण के लिए जाने जाते हो, तुम वो चुनिंदा लोग हो जिन्हें चुना गया, और वे श्रेष्ठ लोग हो जिन्हें हम अहले-बैत के लिए विशेष रूप से चुना गया था।

तुमने अरबों से युद्ध किया, कठिनाइयों और कष्टों को सहन किया, विभिन्न समुदायों से संघर्ष किया और वीर योद्धाओं से मुकाबला किया, हम हमेशा तुम्हारे मार्गदर्शक और तुम हमारे आज्ञाकारी रहे, यहाँ तक कि इस्लाम की चक्की चल पड़ी, समय के स्तनों से दूध बहने लगा, शिर्क की आवाज़ें शांत हो गईं, लालच और आरोप-प्रत्यारोप का कोलाहल थम गया, कुफ्र की आग बुझ गई और अव्यवस्था तथा भटकाव की पुकार शांत हो गई, इस प्रकार धर्म की व्यवस्था पूरी तरह स्थापित हो गई, फिर ऐसा क्यों है कि ईमान का इकरार करने के बाद तुम भटक गए? सच्चाई स्पष्ट हो जाने के बाद तुमने स्वयं को छिपा लिया? आगे बढ़ने के बाद पीछे हट गए? और ईमान लाने के बाद फिर शिर्क की ओर लौट गए?

हाय उन लोगों पर जिन्होंने संधि और वचनबद्धता करने के बाद उसे तोड़ दिया और पैगंबर को उनके घर से निकालने का इरादा किया, जबकि उन्होंने ही सबसे पहले युद्ध की शुरुआत की थी, क्या तुम उनसे डरते हो, जबकि यदि तुम ईमान वाले हो तो अल्लाह अधिक योग्य है कि तुम उसी से डरो।

सावधान! मैं देख रही हूँ कि तुमने हमेशा आराम और सुख-सुविधा में जीवन बिताने को अपना लक्ष्य बना लिया है और उस व्यक्ति को, जो शासन और नेतृत्व का अधिक योग्य था, दूर कर दिया है, तुमने आराम और सुख को अपना लिया है और जीवन की कठिनाइयों और तंगी से निकलकर उसकी सुख-सुविधा और विस्तार में पहुँच गए हो, इसी कारण तुमने जो कुछ अपने भीतर सुरक्षित रखा था, उसे अपने मुँह से बाहर निकाल दिया और जो कुछ निगल लिया था, उसे फिर उगल दिया, अतः जान लो कि यदि तुम और धरती पर रहने वाले सभी लोग भी कुफ्र करें, तो भी अल्लाह सबसे बेनियाज़ और हर प्रकार की प्रशंसा के योग्य है।

सावधान! मैंने जो कुछ कहा है, वह तुम्हारे चरित्र में पैदा हुई कमजोरी, तुम्हारे दिलों में उत्पन्न हुई बेवफाई और छल-कपट को भली-भांति पहचानने के बाद कहा है, लेकिन यह सब एक दुखी हृदय की पीड़ा का उफान, क्रोध और आक्रोश का प्रकटीकरण, मेरे लिए असहनीय बातों की अभिव्यक्ति, मेरे सीने में उमड़ते हुए दर्द और अपने तर्क तथा प्रमाण को स्पष्ट करने का प्रयास है, अतः अब खिलाफत को ले लो, लेकिन जान लो कि इस खिलाफत की सवारी करने वाले ऊँट की पीठ पर घाव है और उसके पैर छिले हुए तथा फोड़े से भरे हैं, इसकी बदनामी और कलंक हमेशा बना रहेगा और इस पर अल्लाह के क्रोध तथा हमेशा के लिए रहने वाली शर्मिंदगी की निशानी होगी, और इसका संबंध अल्लाह की भड़कती हुई उस आग से है, जो दिलों को घेर लेगी।

जो कुछ तुम कर रहे हो, वह अल्लाह की जागती हुई निगाहों के सामने है, और जिन्होंने अत्याचार किया है, वे शीघ्र ही जान लेंगे कि उन्हें किस स्थान पर लौटकर जाना है, और मैं उस व्यक्ति की बेटी हूँ, जिसने तुम्हें उस दर्दनाक अल्लाह के अज़ाब से आगाह किया था जो तुम्हारे सामने आने वाला है, अतः तुम जो चाहो करो और हम भी अपना काम करते हैं, तुम प्रतीक्षा करो और हम भी प्रतीक्षा करते हैं।

तब अबू बकर ने उत्तर दिया:

ऐ रसूल की बेटी! तुम्हारे पिता मोमिनों के लिए अत्यंत दयालु, कृपालु और मेहरबान थे, जबकि काफिरों के लिए दर्दनाक अज़ाब और बड़ा दंड थे, यदि हम उनके वंश और रिश्ते पर दृष्टि डालें, तो वे हमारी महिलाओं के लिए तुम्हारे पिता हैं और हमारे मित्रों के बीच तुम्हारे पति के भाई के समान हैं, उन्होंने तुम्हारे पति को हर मित्र पर प्राथमिकता दी और उन्होंने भी हर बड़े कार्य में पैगंबर की सहायता की, तुमसे केवल सौभाग्यशाली लोग ही प्रेम करते हैं और केवल बुरे लोग ही तुमसे दुश्मनी रखते हैं।

अतः तुम, ऐ पैगंबर के परिवार, दुनिया के चुने हुए और पवित्र लोग हो, तुम हमें भलाई का मार्ग दिखाने वाले और जन्नत की ओर मार्गदर्शन करने वाले हो, और तुम, ऐ महिलाओं में सबसे श्रेष्ठ और श्रेष्ठतम पैगंबर की बेटी, तुम अपनी बात में सच्ची हो, बुद्धि और समझ में अत्यंत अग्रणी हो, तुम्हें कभी अपने अधिकार से रोका नहीं जाएगा और तुम्हारी सच्ची बात कहने में कोई बाधा उत्पन्न नहीं की जाएगी।

और अल्लाह की कसम! मैंने पैगंबर की राय से एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया और न ही उनकी अनुमति के बिना कोई कार्य किया, किसी समुदाय का अग्रणी व्यक्ति उनसे झूठ नहीं बोलता, और मैं अल्लाह को गवाह बनाता हूँ, और वही सबसे अच्छा गवाह है, मैंने पैगंबर से सुना है कि उन्होंने फरमाया: “हम पैगंबरों का समूह न दीनार और दिरहम विरासत में छोड़ता है, न घर और न खेती-बाड़ी, हम केवल किताब, हिकमत, ज्ञान और पैगंबरी विरासत में छोड़ते हैं, और हमने जो कुछ तुम्हारे अधिकार में था, उसे घोड़ों और हथियारों की व्यवस्था में लगा दिया, ताकि मुसलमान उसके द्वारा युद्ध कर सकें, काफ़िरों के विरुद्ध जिहाद कर सकें और अत्याचारी तथा दुष्ट लोगों से मुकाबला कर सकें। यह निर्णय सभी मुसलमानों की सहमति से लिया गया था। मैंने अकेले अपनी ओर से यह कार्य नहीं किया और न ही अपने विचार तथा निर्णय में मनमानी की। और हमारे बाद जो कुछ हम छोड़ जाते हैं, वह हमारे बाद के उत्तराधिकारी और जिम्मेदार व्यक्ति के अधिकार में होता है; वह उसमें जो फैसला करना चाहे, कर सकता है।”

और हमने जो कुछ तुम्हारे अधिकार में था, उसे घोड़ों और हथियारों की व्यवस्था में लगा दिया, ताकि मुसलमान उसके द्वारा युद्ध कर सकें, काफ़िरों के विरुद्ध जिहाद कर सकें और अत्याचारी तथा दुष्ट लोगों से मुकाबला कर सकें, यह निर्णय सभी मुसलमानों की सहमति से लिया गया था, मैंने अकेले अपनी ओर से यह कार्य नहीं किया और न ही अपने विचार तथा निर्णय में मनमानी की,

और यह मेरी स्थिति है और यह मेरी संपत्ति है जो तुम्हारे लिए है और तुम्हारे अधिकार में है, इसे तुमसे रोका नहीं जाएगा और न ही इसे किसी दूसरे व्यक्ति के लिए सुरक्षित रखा गया है, तुम अपने पिता की उम्मत की महिलाओं की सरदार हो, अपने बच्चों के लिए फलदार और पवित्र वृक्ष हो, तुम्हारे गुणों का इनकार नहीं किया गया है और तुम्हारी शाखाओं तथा जड़ों से कुछ भी कम नहीं किया जाएगा, मेरे अधिकार में जो कुछ है, उसमें मेरा निर्णय और अधिकार लागू है, क्या तुम यह पसंद करोगी कि इस मामले में मैं तुम्हारे पिता की बात के विरुद्ध कार्य करूँ?

हज़रत फ़ातिमा (स) ने फ़रमाया: अल्लाह पाक और पवित्र है। मेरे पिता, अल्लाह के पैगंबर, अल्लाह की किताब से मुँह मोड़ने वाले और उसके आदेशों के विरोधी नहीं थे, बल्कि वे उसकी पैरवी करते थे और उसकी आयतों पर अमल करते थे, क्या तुम लोग चाल और कपट के द्वारा मेरे पिता पर आरोप लगाना चाहते हो? और उनकी वफ़ात के बाद यह कार्य उन षड्यंत्रों के समान है, जो उनकी ज़िंदगी में उनके विरुद्ध रचे और बिछाए जाते थे, यह अल्लाह की किताब है, जो न्यायपूर्ण निर्णय करने वाली है और ऐसी वाणी है जो सत्य और असत्य के बीच अंतर स्पष्ट करती है, वह फ़रमाती है: ज़करिया ने कहा: “ऐ मेरे पालनहार! मुझे अपनी ओर से ऐसी संतान प्रदान कर, जो मेरा और याक़ूब के परिवार का उत्तराधिकारी बने।” और वह फ़रमाती है: “और सुलैमान ने दाऊद से विरासत पाई”

और अल्लाह ने उन हिस्सों और भागों के बारे में, जो उसने निर्धारित किए हैं, तथा विरासत में पुरुषों और महिलाओं के लिए जो हिस्से निश्चित किए हैं, पर्याप्त और स्पष्ट विवरण दिया है, इस प्रकार उसने क़यामत तक के लिए असत्य पर चलने वालों के बहानों तथा उनके संदेहों और शंकाओं को समाप्त कर दिया है, नहीं, ऐसा नहीं है, बल्कि तुम्हारी इच्छाओं और मनमानी ने तुम्हारे सामने यह रास्ता खोल दिया है. अब मेरे लिए सुंदर धैर्य के अलावा कोई उपाय नहीं है, और जो कुछ तुम कर रहे हो, उसमें अल्लाह ही हमारा सहायक है।

अबू बकर ने कहा: अल्लाह और उसके रसूल ने सच कहा है, और उनकी बेटी ने भी सच कहा है, वह हिकमत का केंद्र, मार्गदर्शन और रहमत का स्थान, धर्म का स्तंभ तथा प्रमाण और तर्क का स्रोत हैं, और वे सच ही कहती हैं, मैं तुम्हारी सच्ची बात को अस्वीकार नहीं करता और न ही तुम्हारे कथन को झुठलाता हूँ, ये मुसलमान मेरे और तुम्हारे बीच निर्णय करने वाले हैं, उन्होंने ही मुझे यह शासन सौंपा है और उनके निर्णय के आधार पर मैंने यह पद स्वीकार किया है, न तो मैंने अहंकार किया है, न अपनी राय में मनमानी की है और न ही अपने लिए कोई चीज़ ली है, और ये सभी इस बात के गवाह और साक्षी हैं।

तब हज़रत फ़ातिमा (स) ने लोगों की ओर रुख करके फ़रमाया: ऐ मुसलमानों! तुम बेकार और निरर्थक बातों को सुनने के लिए जल्दी करते हो और बुरे कर्मों को नज़रअंदाज़ कर देते हो, क्या तुम क़ुरआन में विचार नहीं करते, या तुम्हारे दिलों पर मुहर लगा दी गई है? ऐसा नहीं है, बल्कि तुम्हारे बुरे कर्मों ने तुम्हारे दिलों पर अंधकार छा दिया है और तुम्हारे कानों तथा आँखों को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है, तुमने क़ुरआन की आयतों की बहुत बुरी व्याख्या की, उसके लिए बहुत बुरा मार्ग चुना और उसके बदले बहुत बुरी चीज़ को स्वीकार किया। अल्लाह की कसम! इस बोझ को उठाना तुम्हारे लिए बहुत भारी होगा और इसका परिणाम पाप तथा विनाश से भरा हुआ है, जब पर्दे हटा दिए जाएँगे और इसके नुकसान तुम्हारे सामने स्पष्ट हो जाएँगे, तथा वह सब कुछ तुम्हारे सामने आ जाएगा जिसकी तुमने कल्पना भी नहीं की थी, तब असत्य का अनुसरण करने वाले ही सबसे बड़े घाटे में रहने वाले होंगे।

सुम्मा अतफ़त अला कब्रिन नबी (स), वा क़ालत

फिर वह पैगंबर (स) की क़ब्र की ओर मुड़ीं और फ़रमाया:

आपके बाद ऐसी घटनाएँ और परिस्थितियाँ सामने आईं कि यदि आप जीवित होते तो ये इतनी बड़ी और गंभीर दिखाई न देतीं। हमने आपको ऐसे खो दिया जैसे कोई धरती बारिश से वंचित हो जाए, और आपकी क़ौम बिखर गई। आइए, देखिए कि वे किस तरह रास्ते से भटक गए। हर वह परिवार जो अल्लाह के निकट सम्मान और प्रतिष्ठा रखता था, वह दूसरों के बीच भी सम्मानित था, सिवाय हमारे। आपकी उम्मत के कुछ लोगों ने आपके जाते ही, और हमारे तथा आपके बीच मिट्टी का पर्दा पड़ते ही, अपने दिलों के भेद प्रकट कर दिए। आपके बाद कुछ और लोगों ने हमसे मुँह मोड़ लिया, हमें तुच्छ समझा और हमारा विरसा छीन लिया गया। आप चौदहवीं रात के चाँद और प्रकाश देने वाले दीपक के समान थे, जिन पर अल्लाह की ओर से किताबें नाज़िल की जाती थीं। जिब्राईल (अ) अल्लाह की आयतों के साथ हमारे लिए साथी और हमनवा थे। आपके बाद सारी भलाई हमसे छिप गई। काश! हम आपके जाने और मिट्टी के आपको अपने भीतर छिपा लेने से पहले ही मर गए होते।

🌞
🔄
➖
➕

कुछ पुस्तकों में इस उपदेश के लिए एक अतिरिक्त भाग भी बयान किया गया है, जिसमें वर्णित है कि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) घर लौटने के बाद हज़रत अली (अ) से अपनी शिकायत और व्यथा व्यक्त करती हैं।[४०] कुछ विद्वानों ने इस भाग की सनद को मासूम तक जुड़ा हुआ नहीं माना है और इसे मुरसल हदीस कहा है। कुछ धार्मिक विद्वानों ने इसके मज़मून को भी स्वीकार नहीं किया है।[४१]

पाठ
पाठ और अनुवाद
अनुवाद

ثم انكفأت علیها السلام و امیرالمؤمنین علیه‌السلام یتوقّع رجوعها الیه و یتطلّع طلوعها علیه، فلمّا استقرّت بها الدار، قالت لامیرالمؤمنین علیهماالسلام:

सुम्मा इंकफ़त अलैहस सलामो व अमीरुल मोमेनीना अलैहिस सलामो यतवक़्क़ओ रुजूऐहा इलैहे व यततल्लओ तुलूऐहा अलैहे, फ़लम्मा इस्तक़र्रत बेहद दार, क़ालत लेअमीरिल मोमेनीना अलैहेमस सलामः

یابْنَ اَبیطالِبٍ! اِشْتَمَلْتَ شِمْلَةَ الْجَنینِ، وَ قَعَدْتَ حُجْرَةَ الظَّنینِ، نَقَضْتَ قادِمَةَ الْاَجْدَلِ، فَخانَكَ ریشُ الْاَعْزَلِ.

यब्ना अबी तालिब! इश्तमल्ता शिम्लतल-जनीन, व क़अद्ता हुज्रतज़-ज़नीन, नक़ज़्ता क़ादिमतल-अज्दल, फ़ख़ानका रीशुल-आअज़ल।

هذا اِبْنُ اَبی قُحافَةَ یبْتَزُّنی نِحْلَةَ اَبی وَ بُلْغَةَ ابْنَی! لَقَدْ اَجْهَرَ فی خِصامی وَ اَلْفَیتُهُ اَلَدَّ فی كَلامی حَتَّی حَبَسَتْنی قیلَةُ نَصْرَها وَ الْمُهاجِرَةُ وَصْلَها، وَ غَضَّتِ الْجَماعَةُ دُونی طَرْفَها، فَلا دافِعَ وَ لامانِعَ، خَرَجْتُ كاظِمَةً، وَ عُدْتُ راغِمَةً.

हाज़ा इब्नो अबी क़हाफ़ता यब्तज़्ज़ुनी नेहलता अबी व बुल्ग़ता इब्नय्य, लक़द अज्हर फ़ी ख़िसामी, व अल्फ़ैतुहू अलद्द फ़ी कलामी, हत्ता हबसत्नी क़ीलतु नस्रहा, वल-मुहाजिरतु वस्लहा, व ग़ज़्ज़तिल-जमाअतो दूनी तर्फ़हा, फ़ला दाफ़ेअ व ला मानेअ, ख़रज्तो काज़िमतन, व उद्तु राग़िमतन।

اَضْرَعْتَ خَدَّكَ یوْمَ اَضَعْتَ حَدَّكَ، اِفْتَرَسْتَ الذِّئابَ وَ افْتَرَشت التُّرابَ، ما كَفَفْتَ قائِلاً وَ لااَغْنَیتَ باطلاً وَ لاخِیارَ لی، لَیتَنی مِتُّ قَبْلَ هَنیئَتی وَ دُونَ ذَلَّتی، عَذیرِی اللَّـهُ مِنْكَ عادِیاً وَ مِنْكَ حامِیاً.

अज़्रअ्ता ख़द्दका यौम अज़अ्ता हद्दक, इफ़्तरस्तज़्-ज़िआब वफ़्तरश्तत-तुराब, मा कफ़फ़्ता क़ाइलन व ला अग़्नैता बातिलन व ला ख़ियार लि, लैता-नी मित्तु क़ब्ला हनीअती व दूना ज़िल्लती, अज़ीरील्लाहु मिन्क आदेयन व मिन्क हामेयन।

وَیلای فی كُلِّ شارِقٍ، وَیلای فی كُلِّ غارِبٍ، ماتَ الْعَمَدُ وَ وَهَنَ الْعَضُدُ، شَكْوای اِلی اَبی وَ عَدْوای اِلی رَبّی، اَللَّـهُمَّ اِنَّكَ اَشَدُّ مِنْهُمْ قُوَّةً وَ حَوْلاً، وَ اَشَدُّ بَأْساً وَ تَنْكیلاً.

वैलाय फ़ी कुल्ले शारेक़िन, वैलाय फ़ी कुल्ले ग़ारेबिन, मातल-अमदो व वहनल-अज़ुदु, शक्वाय इला अबी व अद्वाय इला रब्बी, अल्लाहुम्म इन्नका अशद्दु मिन्हुम क़ुव्वतन व हौलन, व अशद्दु बअ्सन व तन्कीलन।

فقال امیرالمؤمنین علیه السلام: لا وَیلَ لَكِ، بَلِ الْوَیلُ لِشانِئِكِ، نَهْنِهْنی عَنْ وُجْدِكِ، یا اِبْنَةَ الصَّفْوَةِ وَ بَقِیةَ النُّبُوَّةِ، فَما وَنَیتُ عَنْ دینی، وَ لااَخْطَأْتُ مَقْدُوری، فَاِنْ كُنْتِ تُریدینَ الْبُلْغَةَ فَرِزْقُكِ مَضْمُونٌ، وَ كَفیلُكِ مَأْمُونٌ، وَ ما اُعِدَّ لَكِ اَفْضَلُ مِمَّا قُطِعَ عَنْكِ، فَاحْتَسِبِی اللَّـهَ. فقالت: حَسْبِی اللَّـهُ، و أمْسَكَتْ.

फ़क़ाला अमीरुल-मोमिनीन अलैहिस्सलाम: ला वैल लके, बलिल-वैलो लेशानेएके, नहनेहनी अन वुज्देके, या इब्नतस-सफ़्वते व बक़िय्यतन-नबुव्वते, फ़मा वनैतु अन दीनी, व ला अख़्तअ्तु मक़दूरी, फ़इन कुन्ते तुरीदीनल-बुल्ग़त फ़रिज़्क़ोके मज़मून, व कफ़ीलोके मामूनुन, व मा ओइद्दा लके अफ़्ज़लु मिम्मा क़ोतेआ अनके, फ़हतसेबिल्लाह। फ़क़ालत: हसबियल्लाहु, व अम्सक़त।[४२]

इसके बाद हज़रत फ़ातिमा (स) घर वापस लौटीं। हज़रत अली (अ) उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे और उनके सौंदर्य रूपी सूर्य के उदय की प्रतीक्षा में थे। जब वे घर में आकर शांत हुईं, तो अमीरुल मोमिनीन से कहा:
ثم انكفأت علیها السلام و امیرالمؤمنین علیه‌السلام یتوقّع رجوعها الیه و یتطلّع طلوعها علیه، فلمّا استقرّت بها الدار، قالت لامیرالمؤمنین علیهماالسلام:
सुम्मा इंकफ़त अलैहस सलामो व अमीरुल मोमेनीना अलैहिस सलामो यतवक़्क़ओ रुजूऐहा इलैहे व यततल्लओ तुलूऐहा अलैहे, फ़लम्मा इस्तक़र्रत बेहद दार, क़ालत लेअमीरिल मोमेनीना अलैहेमस सलामः
ऐ अबू तालिब के बेटे! तुमने अपने आपको ऐसे पर्दे में छिपा लिया है जैसे माँ के गर्भ में भ्रूण छिपा रहता है और घर में ही बैठे रहने को अपना लिया है, तुमने बाज़ के मज़बूत और बड़े पंख तोड़ दिए हैं, जबकि अब उसके छोटे-छोटे पंख भी उड़ने में तुम्हारा साथ नहीं देंगे।
یابْنَ اَبیطالِبٍ! اِشْتَمَلْتَ شِمْلَةَ الْجَنینِ، وَ قَعَدْتَ حُجْرَةَ الظَّنینِ، نَقَضْتَ قادِمَةَ الْاَجْدَلِ، فَخانَكَ ریشُ الْاَعْزَلِ.
यब्ना अबी तालिब! इश्तमल्ता शिम्लतल-जनीन, व क़अद्ता हुज्रतज़-ज़नीन, नक़ज़्ता क़ादिमतल-अज्दल, फ़ख़ानका रीशुल-आअज़ल।
यह अबू क़ुहाफ़ा का बेटा है, जिसने मेरे पिता की दी हुई भेंट और मेरे दोनों बेटों के जीवन-निर्वाह के साधन को मुझसे छीन लिया है, उसने खुले तौर पर मुझसे दुश्मनी की और मैंने पाया कि वह मुझसे बात करने में बहुत हठ्ठी और द्वेषपूर्ण है, यहाँ तक कि अंसार ने भी मेरी सहायता से हाथ खींच लिया, मुहाजिरों ने अपनी मदद मुझसे रोक ली और लोगों ने मेरी सहायता से मुँह मोड़ लिया, न मेरे पास कोई रक्षक है और न कोई ऐसा व्यक्ति है जो उनके इस कार्य को रोक सके, मैं अपना क्रोध अपने भीतर दबाए हुए घर से निकली और बिना किसी परिणाम के वापस लौट आई।
هذا اِبْنُ اَبی قُحافَةَ یبْتَزُّنی نِحْلَةَ اَبی وَ بُلْغَةَ ابْنَی! لَقَدْ اَجْهَرَ فی خِصامی وَ اَلْفَیتُهُ اَلَدَّ فی كَلامی حَتَّی حَبَسَتْنی قیلَةُ نَصْرَها وَ الْمُهاجِرَةُ وَصْلَها، وَ غَضَّتِ الْجَماعَةُ دُونی طَرْفَها، فَلا دافِعَ وَ لامانِعَ، خَرَجْتُ كاظِمَةً، وَ عُدْتُ راغِمَةً.
हाज़ा इब्नो अबी क़हाफ़ता यब्तज़्ज़ुनी नेहलता अबी व बुल्ग़ता इब्नय्य, लक़द अज्हर फ़ी ख़िसामी, व अल्फ़ैतुहू अलद्द फ़ी कलामी, हत्ता हबसत्नी क़ीलतु नस्रहा, वल-मुहाजिरतु वस्लहा, व ग़ज़्ज़तिल-जमाअतो दूनी तर्फ़हा, फ़ला दाफ़ेअ व ला मानेअ, ख़रज्तो काज़िमतन, व उद्तु राग़िमतन।
जिस दिन से तुमने अपनी तलवार की धार को कुंद कर दिया है, तुमने अपने चेहरे को अपमानित कर लिया है, एक समय तुम भेड़ियों को फाड़ डालते थे, और आज मिट्टी को अपना बिछौना बना लिया है और एक कोने में बैठे हो, तुम किसी बोलने वाले को रोकते नहीं हो और न ही इस मौजूदा फितने को दूर करने के लिए कोई प्रभावी कदम उठाया है, मेरे पास भी अब कोई अधिकार और सामर्थ्य नहीं रही, काश! इस निष्क्रियता और एकांत में बैठने की स्थिति से पहले ही मैं मर गई होती, और काश! इस दिखाई देने वाली बेबसी की अवस्था में पहुँचने से पहले ही मेरी मृत्यु हो गई होती, अल्लाह मेरी ओर से तुम्हारा पक्ष लेकर मेरा बचाव करे, क्योंकि तुमने कई अवसरों पर मुझसे अन्याय और अत्याचार को दूर किया और कई मौकों पर मेरी सहायता और रक्षा की।
اَضْرَعْتَ خَدَّكَ یوْمَ اَضَعْتَ حَدَّكَ، اِفْتَرَسْتَ الذِّئابَ وَ افْتَرَشت التُّرابَ، ما كَفَفْتَ قائِلاً وَ لااَغْنَیتَ باطلاً وَ لاخِیارَ لی، لَیتَنی مِتُّ قَبْلَ هَنیئَتی وَ دُونَ ذَلَّتی، عَذیرِی اللَّـهُ مِنْكَ عادِیاً وَ مِنْكَ حامِیاً.
अज़्रअ्ता ख़द्दका यौम अज़अ्ता हद्दक, इफ़्तरस्तज़्-ज़िआब वफ़्तरश्तत-तुराब, मा कफ़फ़्ता क़ाइलन व ला अग़्नैता बातिलन व ला ख़ियार लि, लैता-नी मित्तु क़ब्ला हनीअती व दूना ज़िल्लती, अज़ीरील्लाहु मिन्क आदेयन व मिन्क हामेयन।
हाय मेरा दुर्भाग्य! हर सुबह मेरा यही हाल है, और हर शाम भी मेरा यही हाल है, हमारा सहारा हमसे चला गया और हमारी शक्ति तथा बाज़ू कमजोर पड़ गए, मैं अपनी शिकायत अपने पिता के सामने और अपनी व्यथा अपने पालनहार के सामने प्रस्तुत करती हूँ, और उसका अज़ाब तथा बदला दूसरों की अपेक्षा कहीं अधिक कठोर होगा।
وَیلای فی كُلِّ شارِقٍ، وَیلای فی كُلِّ غارِبٍ، ماتَ الْعَمَدُ وَ وَهَنَ الْعَضُدُ، شَكْوای اِلی اَبی وَ عَدْوای اِلی رَبّی، اَللَّـهُمَّ اِنَّكَ اَشَدُّ مِنْهُمْ قُوَّةً وَ حَوْلاً، وَ اَشَدُّ بَأْساً وَ تَنْكیلاً.
वैलाय फ़ी कुल्ले शारेक़िन, वैलाय फ़ी कुल्ले ग़ारेबिन, मातल-अमदो व वहनल-अज़ुदु, शक्वाय इला अबी व अद्वाय इला रब्बी, अल्लाहुम्म इन्नका अशद्दु मिन्हुम क़ुव्वतन व हौलन, व अशद्दु बअ्सन व तन्कीलन।
हज़रत अली (अ) ने उत्तर दिया: तुम पर वाय नहीं है, बल्कि तुम्हारे अत्याचारी शत्रु के लिए वाय है, ऐ अल्लाह द्वारा चुनी हुई बेटी! ऐ पैगंबरी की विरासत को सँभालने वाली! अपने दुख और क्रोध को छोड़ दो, मैंने अपने धर्म के मामले में कोई कमजोरी नहीं दिखाई है और अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी कार्य में कोई कमी नहीं छोड़ी है, यदि तुम अपने जीवन-निर्वाह को लेकर चिंतित हो, तो जान लो कि तुम्हारी रोज़ी अल्लाह के ज़िम्मे है और तुम्हारा पालन करने वाला विश्वसनीय है, और तुम्हारे लिए जो कुछ तैयार किया गया है, वह उस चीज़ से बेहतर है जो तुमसे ले ली गई है, अतः अल्लाह के लिए धैर्य रखो, हज़रत फ़ातिमा (स) ने फ़रमाया: अल्लाह मेरे लिए पर्याप्त है। इसके बाद वे शांत हो गईं।
فقال امیرالمؤمنین علیه السلام: لا وَیلَ لَكِ، بَلِ الْوَیلُ لِشانِئِكِ، نَهْنِهْنی عَنْ وُجْدِكِ، یا اِبْنَةَ الصَّفْوَةِ وَ بَقِیةَ النُّبُوَّةِ، فَما وَنَیتُ عَنْ دینی، وَ لااَخْطَأْتُ مَقْدُوری، فَاِنْ كُنْتِ تُریدینَ الْبُلْغَةَ فَرِزْقُكِ مَضْمُونٌ، وَ كَفیلُكِ مَأْمُونٌ، وَ ما اُعِدَّ لَكِ اَفْضَلُ مِمَّا قُطِعَ عَنْكِ، فَاحْتَسِبِی اللَّـهَ. فقالت: حَسْبِی اللَّـهُ، و أمْسَكَتْ.
फ़क़ाला अमीरुल-मोमिनीन अलैहिस्सलाम: ला वैल लके, बलिल-वैलो लेशानेएके, नहनेहनी अन वुज्देके, या इब्नतस-सफ़्वते व बक़िय्यतन-नबुव्वते, फ़मा वनैतु अन दीनी, व ला अख़्तअ्तु मक़दूरी, फ़इन कुन्ते तुरीदीनल-बुल्ग़त फ़रिज़्क़ोके मज़मून, व कफ़ीलोके मामूनुन, व मा ओइद्दा लके अफ़्ज़लु मिम्मा क़ोतेआ अनके, फ़हतसेबिल्लाह। फ़क़ालत: हसबियल्लाहु, व अम्सक़त।

इसके बाद हज़रत फ़ातिमा (स) घर वापस लौटीं। हज़रत अली (अ) उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे और उनके सौंदर्य रूपी सूर्य के उदय की प्रतीक्षा में थे। जब वे घर में आकर शांत हुईं, तो अमीरुल मोमिनीन से कहा:

ऐ अबू तालिब के बेटे! तुमने अपने आपको ऐसे पर्दे में छिपा लिया है जैसे माँ के गर्भ में भ्रूण छिपा रहता है और घर में ही बैठे रहने को अपना लिया है, तुमने बाज़ के मज़बूत और बड़े पंख तोड़ दिए हैं, जबकि अब उसके छोटे-छोटे पंख भी उड़ने में तुम्हारा साथ नहीं देंगे।

यह अबू क़ुहाफ़ा का बेटा है, जिसने मेरे पिता की दी हुई भेंट और मेरे दोनों बेटों के जीवन-निर्वाह के साधन को मुझसे छीन लिया है, उसने खुले तौर पर मुझसे दुश्मनी की और मैंने पाया कि वह मुझसे बात करने में बहुत हठ्ठी और द्वेषपूर्ण है, यहाँ तक कि अंसार ने भी मेरी सहायता से हाथ खींच लिया, मुहाजिरों ने अपनी मदद मुझसे रोक ली और लोगों ने मेरी सहायता से मुँह मोड़ लिया, न मेरे पास कोई रक्षक है और न कोई ऐसा व्यक्ति है जो उनके इस कार्य को रोक सके, मैं अपना क्रोध अपने भीतर दबाए हुए घर से निकली और बिना किसी परिणाम के वापस लौट आई।

जिस दिन से तुमने अपनी तलवार की धार को कुंद कर दिया है, तुमने अपने चेहरे को अपमानित कर लिया है, एक समय तुम भेड़ियों को फाड़ डालते थे, और आज मिट्टी को अपना बिछौना बना लिया है और एक कोने में बैठे हो, तुम किसी बोलने वाले को रोकते नहीं हो और न ही इस मौजूदा फितने को दूर करने के लिए कोई प्रभावी कदम उठाया है, मेरे पास भी अब कोई अधिकार और सामर्थ्य नहीं रही, काश! इस निष्क्रियता और एकांत में बैठने की स्थिति से पहले ही मैं मर गई होती, और काश! इस दिखाई देने वाली बेबसी की अवस्था में पहुँचने से पहले ही मेरी मृत्यु हो गई होती, अल्लाह मेरी ओर से तुम्हारा पक्ष लेकर मेरा बचाव करे, क्योंकि तुमने कई अवसरों पर मुझसे अन्याय और अत्याचार को दूर किया और कई मौकों पर मेरी सहायता और रक्षा की।

हाय मेरा दुर्भाग्य! हर सुबह मेरा यही हाल है, और हर शाम भी मेरा यही हाल है, हमारा सहारा हमसे चला गया और हमारी शक्ति तथा बाज़ू कमजोर पड़ गए, मैं अपनी शिकायत अपने पिता के सामने और अपनी व्यथा अपने पालनहार के सामने प्रस्तुत करती हूँ, और उसका अज़ाब तथा बदला दूसरों की अपेक्षा कहीं अधिक कठोर होगा।

हज़रत अली (अ) ने उत्तर दिया: तुम पर वाय नहीं है, बल्कि तुम्हारे अत्याचारी शत्रु के लिए वाय है, ऐ अल्लाह द्वारा चुनी हुई बेटी! ऐ पैगंबरी की विरासत को सँभालने वाली! अपने दुख और क्रोध को छोड़ दो, मैंने अपने धर्म के मामले में कोई कमजोरी नहीं दिखाई है और अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी कार्य में कोई कमी नहीं छोड़ी है, यदि तुम अपने जीवन-निर्वाह को लेकर चिंतित हो, तो जान लो कि तुम्हारी रोज़ी अल्लाह के ज़िम्मे है और तुम्हारा पालन करने वाला विश्वसनीय है, और तुम्हारे लिए जो कुछ तैयार किया गया है, वह उस चीज़ से बेहतर है जो तुमसे ले ली गई है, अतः अल्लाह के लिए धैर्य रखो, हज़रत फ़ातिमा (स) ने फ़रमाया: अल्लाह मेरे लिए पर्याप्त है। इसके बाद वे शांत हो गईं।

🌞
🔄
➖
➕


फ़दकिया उपदेश की व्याख्याएँ

फ़दक़िया उपदेश पर कई व्याख्याएँ लिखी गई हैं। आग़ा बुज़ुर्ग तेहरानी ने अपनी पुस्तक अल ज़रिआ में उनमें से कुछ के नाम बताए हैं। इनमें सय्यद अब्दुल्लाह शुब्बर की कश्फ़ुल-मोहज्जा फ़ी शरह ख़ुत्बतिल-लुम्मा, किरमानी मशहदी की शरह ए ख़ुत्बतिल-लुम्मा, सय्यद अली मुहम्मद नक़वी लखनवी, जो ताजुल उलमा के नाम से प्रसिद्ध थे (मृत्यु: 1312 हिजरी), की शरहे ख़ुत्बतिल-लुम्मा और फ़ज़्ल अली क़ज़वीनी की शरहे ख़ुत्बतिल लुम्मा शामिल हैं।[४३] इसी प्रकार मुहम्मद बाक़िर मजलिसी ने बिहारुल-अनवार में उपदेश और उसके स्रोतों का उल्लेख करने के बाद उसकी व्याख्या और विवेचना की है।[४४] कहा जाता है कि अल्लामा मजलिसी की व्याख्या इस विषय की सबसे महत्वपूर्ण व्याख्याओं में से एक है।[४५]

संबंधित लेख

फ़ुटनोट

  1. ↑ आज़रबादगान, «نگاهی گذرا به اسناد و منابع مکتوب خطبه فدک», पृष्ठ 47-48; «هفت‌گانه خطبه تاریخی حضرت زهراء», आयतुल्लाह मकारिम शिराज़ी की सूचना वेबसाइट।
  2. ↑ मिर्ज़ाई, «اهمیت ضرورت و جایگاه امامت در نگاه حضرت صدیقه طاهره(س)», पृष्ठ 41 और 45।
  3. ↑ «هفت‌گانه خطبه تاریخی حضرت زهراء», आयतुल्लाह मकारिम शिराज़ी की सूचना वेबसाइट।
  4. ↑ पूर सय्यद आक़ाई, ख़ुत्बेहाए फ़ातेमी, पृष्ठ 47।
  5. ↑ शरफ़ुद्दीन मूसा‍वी, अल-मुराजेआत, पृष्ठ 392।
  6. ↑ नदरी अबियानेह, «ویژگی‌های خطابی خطبه فدکیه», पृष्ठ 133।
  7. ↑ इब्ने तैयफ़ूर, बलाग़ातुन-निसा, पृष्ठ 16।
  8. ↑ बहराम, «فعالیت‌های اجتماعی زنان از دیدگاه فقه و حقوق», पृष्ठ 118।
  9. ↑ क़ादरी, «گزارش چگونگی ورود حضرت فاطمه سلام الله علیها به مسجدالنبی», बलाग़ वेबसाइट।
  10. ↑ «جوادی آملی: علم‌ها را از هیات‌ها بردارید», ताबनाक।
  11. ↑ बलाज़ोरी, फ़ोतूह अल बुल्दान, पृष्ठ 40 और 41।
  12. ↑ सूर ए इस्रा, आयत 26।
  13. ↑ शेख़ तूस़ी, अस-तिब्यान, खंड 6, पृष्ठ 468; तबरसी, मजमा उल-बयान, खंड 6, पृष्ठ 633-634; हस्कानी, शवाहिद अल-तंज़ील, खंड 1, पृष्ठ 438-439; सियूती, अल-दुर्रुल-मंसूर, खंड 4, पृष्ठ 177।
  14. ↑ तबरसी, अल-एहतिजाज, खंड 1, पृष्ठ 91; सय्यद जाफ़र मुर्तज़ा, अल-सहीह मिन सीरतिन-नबी, खंड 18, पृष्ठ 241।
  15. ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 1, पृष्ठ 543; शेख़ मुफ़ीद, अल-मुक़नेआ, पृष्ठ 289 और 290।
  16. ↑ हलबी, अल-सीरतुल-हल्बिया, खंड 3, पृष्ठ 512।
  17. ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 1, पृष्ठ 543; हलबी, अल-सीरतुल-हल्बिया, खंड 3, पृष्ठ 512।
  18. ↑ बलाज़ोरी, फ़ोतूह अल-बुल्दान, पृष्ठ 40।
  19. ↑ मकारिम शिराज़ी, पयाम-ए अमीरुल-मोमिनीन, खंड 10, पृष्ठ 202।
  20. ↑ सद्र, फ़दक फ़ित-तारीख़, पृष्ठ 63-66।
  21. ↑ सद्र, फ़दक फ़ित-तारीख़, पृष्ठ 113-117।
  22. ↑ अरबली, कश्फ़ुल-ग़ुम्मा, खंड 1, पृष्ठ 353-364।
  23. ↑ इब्ने तैयफ़ूर, बलाग़ातुन-निसा, पृष्ठ 16।
  24. ↑ अलवीरी, «خطبة اللمة سندها و مکانتها عند الشیعه», पृष्ठ 15।
  25. ↑ अलवीरी, «خطبة اللمة سندها و مکانتها عند الشیعه», पृष्ठ 15।
  26. ↑ मजलिसी, बिहारुल-अनवार, खंड 29, पृष्ठ 215।
  27. ↑ सदूक़, मन ला यहज़रोहुल-फ़क़ीह, खंड 3, पृष्ठ 567-568।
  28. ↑ मुन्तज़ेरी, ख़ुत्बा-ए हज़रत ज़हरा अलैहास्सलाम, पृष्ठ 37।
  29. ↑ इब्ने तैयफ़ूर, बलाग़ातुन-निसा, पृष्ठ 17-25।
  30. ↑ शहीदी, ज़िन्दगानी-ए फ़ातिमा ज़हरा, पृष्ठ 122।
  31. ↑ आज़रबादगान, «نگاهی گذرا به اسناد و منابع مکتوب خطبه فدک», पृष्ठ 49-56।
  32. ↑ पूर सय्यद आक़ाई, ख़ुत्बेहाए फ़ातेमी, पृष्ठ 51।
  33. ↑ शहीदी, ज़िन्दगानी-ए फ़ातिमा ज़हरा अलैहास्सलाम, पृष्ठ 126-135।
  34. ↑ तबरसी, अल एहतेजाज अला अहले लोजाज, खंड 1, पृष्ठ 97-107।
  35. ↑ सूर ए नम्ल आयत 16।
  36. ↑ सूर ए मरियम आयत 5 और 6।
  37. ↑ सूर ए अंफ़ाल, आयत 75।
  38. ↑ सूर ए निसा, आयत 11।
  39. ↑ सूर ए बक़रा, आयत 180।
  40. ↑ तबरसी, अल एहतेजाज अला अहले अल लोजाज, खंड 1, पृष्ठ 107 और 108; इब्ने शहर आशोब, मनाक़िबे आले अबी तालिब, खंड 2, पृष्ठ 50।
  41. ↑ मजलिसी, बिहारुल अनवार, खंड 29, पृष्ठ 234; «آيا حضرت زهرا به حضرت علي عليهما السلام اعتراض كرد؟», वली अस्र साइट।]
  42. ↑ तबरसी, अल एहतेजाज अला अहले अल लोजाज, खंड 1, पृष्ठ 107 और 108।
  43. ↑ आग़ा बुज़ुर्ग तेहरानी, अल ज़रिआ, खंड 13, पृष्ठ 224 और खंड 18 पृष्ठ 58।
  44. ↑ मजलिसी, बिहारुल अनवार, खंड 29, पृष्ठ 215-335।
  45. ↑ पूर सय्यद आक़ाई, ख़ुत्बेहाए फ़ातेमी, पृष्ठ 47।

स्रोत

  • «جوادی آملی: علم‌ها را از هیات‌ها بردارید», (जवादी आमोली: समूहों से झंडे हटा दीजिए), ताबनाक वेबसाइट, लेख प्रकाशित होने की तारीख़: 28 दिसंबर 2007 ईस्वी, देखने की तारीख़: 27 अगस्त 2026 ईस्वी।
  • अरबली, अली बिन ईसा, कश्फ़ुल-ग़ुम्मा फ़ी मअरिफ़तिल आइम्मा, क़ुम, रज़ी, प्रथम संस्करण, 1421 हिजरी।
  • अलवीरी, मोहसिन, «خطبة اللمة سندها و مکانتها عند الشیعه», (ख़ुत्बतुल लुम्मा इसकी सनद और शिया दृष्टिकोण में इसकी स्थिति), उलूमे इंसानी अध्ययन, वर्ष 16, अंक 4, शव्वाल 2009 ईस्वी।
  • आग़ाबुज़ुर्ग तेहरानी, मुहम्मद मोहसिन, अल ज़रिआ इला तसानीफ़ अल-शिया, बेरूत, दारुल-अज़वा प्रकाशन, 1403 हिजरी।
  • आज़रबादगान, हुसैनअली, «نگاهی گذرا به اسناد و منابع مکتوب خطبه فدک», (ख़ुत्बा-ए फ़दक के दस्तावेज़ों और लिखित स्रोतों पर एक संक्षिप्त दृष्टि), त्रैमासिक पत्रिका उलूम-ए हदीस, अंक 26, 2007 ईस्वी।
  • इब्ने शहर आशूब, मुहम्मद बिन अली, मनाक़िबे आले अबी तालिब, नजफ़, हैदरिया पुस्तकालय और मुद्रणालय, 1376 हिजरी।
  • क़ादरी, «گزارش چگونگی ورود حضرت فاطمه سلام الله علیها به مسجدالنبی», (हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा के मस्जिद-ए-नबवी में प्रवेश की स्थिति का विवरण), बलाग़ वेबसाइट, लेख प्रकाशित होने की तारीख़: 21 जनवरी 2019 ईस्वी, देखने की तारीख़: 27 अगस्त 2026 ईस्वी।
  • कुलैनी, मुहम्मद बिन याक़ूब, अल-काफ़ी, शोध: अली अकबर ग़फ़्फ़ारी, तेहरान, दारुल-कुतुब अल-इस्लामिया प्रकाशन, 1363 शम्सी।
  • तबरसी, अहमद बिन अली, अल-एहतेजाज अला अहलिल-लोजाज, शोध: मुहम्मद बाक़िर ख़ुरासान, मशहद, मुर्तज़ा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1403 हिजरी।
  • तबरसी, फ़ज़्ल बिन हसन, मजमा अल-बयान फ़ी तफ़्सीर अल-क़ुरआन, तेहरान, नासिर ख़ुस्रो प्रकाशन, 1372 शम्सी।
  • नदरी अबियानेह, फ़रिश्तेह, «ویژگی‌های خطابی خطبه فدکیه», (ख़ुत्बा-ए फ़दकिया की भाषणात्मक विशेषताएँ), बनवाने शिया पत्रिका में, संख्या 4, 2005 ईस्वी।
  • पूर सय्यद आक़ाई, मसऊद, ख़ुत्बेहाए फ़ातेमी, फ़ातिमी विश्वकोश में, 1393 शम्सी।
  • बलाज़ोरी, अहमद बिन यह्या, फ़ोतूह अल-बुल्दान, बेरूत, दार व हिलाल पुस्तकालय, 1988 ईस्वी।
  • बहराम, फ़रीदा, «فعالیت‌های اجتماعی زنان از دیدگاه فقه و حقوق», (फ़िक़्ह और क़ानून की दृष्टि से महिलाओं की सामाजिक गतिविधियाँ), फ़िक़्ह व हुक़ूक़-ए नवीन, अंक 3, 2020 ईस्वी।
  • मकारिम शीराज़ी, नासिर, «هفت‌گانه خطبه تاریخی حضرت زهراء», (आमूज़ेहा-ए हफ़्तगाने ख़ुत्बा-ए तारीखी-ए हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा), आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी के कार्यालय की सूचना वेबसाइट।
  • मजलिसी, मुहम्मद बाक़िर, बिहारुल-अनवार, बेरूत, दार एहया अल तोरास अल-अरबी प्रकाशन, 1403 हिजरी।
  • मिर्ज़ाई, अली रज़ा, «اهمیت ضرورت و جایگاه امامت در نگاه حضرت صدیقه طاهره(س)», (हज़रत सिद्दीक़ा ताहिरा (स) की दृष्टि में इमामत का महत्व, स्थान और आवश्यकता), दो-वार्षिक पत्रिका अंदेशनामे विलायत, संख्या 2, 2015 ईस्वी।
  • मुन्तज़ेरी, हुसैन अली, ख़ुत्बा-ए हज़रत फ़ातिमा ज़हरा अलैहास्सलाम व मजराए-ए फ़दक, तेहरान, ख़ुर्दआवा सांस्कृतिक संस्थान, 1385 शम्सी।
  • शरफ़ुद्दीन मूसा‍वी, सय्यद अब्दुल हुसैन, अल-मुराजेआत, बेरूत, अल-जमइयतुल-इस्लामिया प्रकाशन, 1402 हिजरी।
  • शहीदी, सय्यद जाफ़र, ज़िन्दगानी-ए फ़ातिमा ज़हरा अलैहास्सलाम, तेहरान, फ़रहंग-ए इस्लामी का प्रकाशन कार्यालय, 1362 शम्सी।
  • शेख़ तूस़ी, मुहम्मद बिन हसन, अल-तिब्यान फ़ी तफ़्सीर अल-क़ुरआन, बेरूत, दार एहया अल-तोरास अल-अरबी प्रकाशन, प्रकाशित तारीख़ उपलब्ध नहीं।
  • शेख़ मुफ़ीद, मुहम्मद बिन मुहम्मद बिन नोमान, अल-मुक़नेआ, क़ुम, इस्लामी प्रकाशन संस्थान, दूसरा संस्करण, 1410 हिजरी।
  • सदूक़, मुहम्मद बिन अली, मन ला यहज़ुरोहुल-फ़क़ीह, क़ुम, इस्लामी प्रकाशन, 1404 हिजरी।
  • सद्र, सय्यद मुहम्मद बाक़िर, फ़दक फ़ित-तारीख़, शोध: अब्दुल जब्बार शरारा, अल ग़दीर इस्लामी अध्ययन केंद्र, प्रथम संस्करण, 1415 हिजरी/1994 ईस्वी।
  • सय्यद जाफ़र मुर्तज़ा आमेली, अल-सहीह मिन सीरतिन-नबिय्यिल-आज़म, क़ुम, दारुल-हदीस प्रकाशन, 1426 हिजरी।
  • सियूती, जलालुद्दीन, अल-दुर्रुल-मंसूर फ़ित-तफ़्सीर बिल-मासूर, बेरूत, मआरिफ़त मुद्रण एवं प्रकाशन संस्थान, प्रकाशित तारीख़ उपलब्ध नहीं।
  • हल्बी, अली बिन इब्राहीम, अल-सीरतुल-हल्बिय्या, शोध: अब्दुल्लाह मुहम्मद ख़लीली, बेरूत, दारुल-कुतुब अल-इल्मिय्या प्रकाशन, 1971 ईस्वी।
  • शंकाओं के उत्तर देने वाला समूह, «حضرت زهرا به حضرت علي عليهما السلام اعتراض كرد؟», (क्या हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) ने हज़रत अली (अ.) से आपत्ति की थी?), हज़रत वली-ए-अस्र (अ ज) अनुसंधान संस्थान, लेख प्रकाशित होने की तारीख़: 21 अक्टूबर 2020 ईस्वी, देखने की तारीख़ 27 अगस्त 2026 ईस्वी।