हदीसे बिज़्आ

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हदीसे बिज़्आ
ग़ुलाम हुसैन अमीर ख़्वानी द्वारा लिखा गया हदीसे बिज़्आ का सुलेख
विषयहज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) के फ़ज़ाएल
किस से नक़्ल हुईपैग़म्बर (स)
मुख्य वक्ताइमाम अली (अ), इब्ने अब्बास, अबूज़रे ग़फ़्फ़ारी
शिया स्रोतअल अमाली शेख़ सदूक़, अल ख़ेसाल, केफ़ायतुल असर,
सुन्नी स्रोतसहीह बोख़ारी

हदीस बज़्आ (अरबी: حديث البَضْعَة)‌ हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाहे अलैहा के बारे मे हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) की एक प्रसिद्ध हदीस है। जिसमे आपने अपनी बेटी हज़रत फ़ातिमा को अपने शरीर का एक टुक्टा बताते हुए उनकी ख़ुशी को अपनी ख़ुशी और उनकी अप्रसंनता को अपनी अप्रसंता बताया है। इस हदीस का मुसलमानों के दोनो (शिया और सुन्नी) संप्रदायो के स्रोतो मे वर्णन हुआ है। हज़रत फ़ातिमा (स) की इस्मत और पाकदामनी, बाग़े फ़िदक हज़रत फ़ातिमा (स) का हक़ और अहले बैत (अ) के सम्मान को वाजिब साबित करने मे हदीसे बिज़्आ को वर्णित किया जाता है।

कुछ सुन्नी स्रोतों में इस हदीस को पैग़म्बर (स) द्वारा बयान करने का कारण इमाम अली अलैहिस सलाम का अबू जहल की पुत्रि से रिश्ता बताया गया है। जबकि शिया विद्वानो के दृष्टिकोण से यह हदीस मनगढ़ंत है। इस प्रकार की हदीसो के वर्णनकर्ताओ (रावीयो) पर हदीस गढ़ने और अहले बैत (अ) से साथ दुश्मनी करने का आरोप है।

हदीस का मत्न और उसका महत्व

हदीस बज़्आ मे पैग़म्बर (स) ने अपनी पुत्रि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) के बारे मे फ़रमाया फ़ातिमा मेरा टुक्ड़ा है जिसने इसे अप्रसन्न किया उसने मुझे अप्रसन्न किया जिसने इसे ख़ुश किया उसने मुझे ख़ुश किया।[१] इस हदीस के सारांश का शिया और सुन्नीयो के विभिन्न स्रोतों में उल्लेख किया गया है।[२] हज़रत अली (अ),[३] इब्ने अब्बास,[४] अबू ज़र ए गफ़्फ़ारी[५] और हज़रत ज़हरा (स),[६] इस हदीस के वर्णनकर्ता (रावि) हैं।

सुन्नी मुफ़स्सिर ए क़ुरआन जलालुद्दीन सुयूती ने इस हदीस को शियों और सुन्नियों के बीच एकमत जाना है।[७] दूसरे सुन्नी मुफ़स्सिर फ़ख़रे राज़ी ने क़ुरआन की कुछ आयतो की व्याख्या करने मे इस हदीस का इस्तेमाल किया है।[८]

बिज़्आ या बज़्आ शब्द का अर्थ है शरीर का हिस्सा।[९] जब कोई व्यक्ति किसी से अत्यधिक निकट होता है और मोहब्बत करता है तो इस शब्द का प्रयोग करता है कि “फ़लानुन बिज़्अतो मिन्नी” अर्थात वह व्यक्ति उसके शरीर का हिस्सा है।[१०] बिज़्आ शब्द पैगंबर (स) ने अधिकांश रूप से हज़रत फ़ातिमा (स) के लिए इस्तेमाल किया है जबकि “बज़्आ तुम मिन्नी” का शब्द पैगंबर ने हज़रत अली (अ)[११] और हज़रत इमाम रज़ा (अ)[१२] के लिए भी इस्तेमाल किया है।

कलामी और फ़िक़्ही मुद्दे मे हदीस से तर्क

हदीसे बिज़्आ का इस्तेमाल कुछ कलामी बहसो को साबित करने मे किया गया है।

  • फ़ातिमा ज़हरा (स) की इस्मतः हज़रत ज़हरा (स) की इस्मत साबित करने के लिए धर्मशास्त्रियों ने इस हदीस का हवाला दिया है।[१३] शिया बुद्धिजीवि आयतुल्लाह जाफ़र सुबहानी (जन्म 1929) का कहना है कि हदीसे बिज़्आ मे हज़रत ज़हरा (स) की खुशी और अप्रसंता को अल्लाह और उसके रसूल की खुशी और अप्रसंता का मानक समझता जाता है। क्योकि अल्लाह बिना अच्छे कर्मो के खुश नही होता और पाप और उसकी आज्ञाओ की अवज्ञा को स्वीकार नही करता, अगर हज़रत ज़हरा (स) ने कोई पाप किया होता, तो वह उस चीज़ से खुश होती, जिससे अल्लाह अप्रसंन होता है; जबकि हदीसे बिज़्आ मे दिव्य संतुष्टि को फ़ातिमा ज़हरा (स) की खुशी से जोड़ा है।[१४] जोकि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) की इस्मत पर दलालत करती है।

फ़ातेमतो बज़अतुम मिन्नी फ़मन आज़ाहा फ़क़द आज़ानी व मन सर्राहा फ़क़द सर्रनी

शेख़ सदूक़, अल अमाली, 1417 हिजरी, पृष्ठ 165
  • दुनिया की महिलाओं पर हज़रत फ़ातिमा (स) की श्रेष्ठता: सुन्नी मुफ़स्सिर शहाबुद्दीन आलूसी (मृत्यु 1854) इस हदीस को निम्नलिखित आयत «وَإِذْ قَالَتِ الْمَلَائِكَةُ يَا مَرْيَمُ إِنَّ اللَهَ اصْطَفَاكِ وَطَهَّرَكِ وَاصْطَفَاكِ[१५] عَلَىٰ نِسَاءِ الْعَالَمِينَ » ] में इस्तेमाल करते हुए दुनिया की कोई भी महिला हो चाहे वह हज़रत मरियम ही क्यो न हो, हज़रत ज़हरा को सर्वश्रेष्ठ बताया है।[१६]
  • फ़िदक[१७] के मामले में हज़रत फ़ातिमा की हक़्क़ानियत का प्रमाणः पैगंबर (स) के दुनिया से चले जाने के पश्चात हज़रत ज़हरा (स) ने बिस्तरे बीमारी पर रहते हुए शेख़ैन (पहले और दूसरे खलीफ़ा) से एहतेजाज मे इस हदीस का हवाला दिया है।[१८]

इसी प्रकार अहलेबैत[१९] (अ) का सम्मान करने के वाजिब होने के संबंध मे पिता और पुत्र[२०] की एक दूसरे के लिए गवाही का इंकार, माताओ और पुत्रियो[२१] से विवाह का अवैध होना, माता पिता[२२] के सम्मान का वाजिब होना और महिलाओ का क़ब्रो की ज़ियारत करना जायज़ होने के संबंध मे इस हदीस के माध्यम से साबित किया गया है।[२३]

हज़रत अली (अ.स.) के ख़िलाफ हदीसे बिज़्आ का इस्तेमाल

कुछ हदीसी ग्रंथो मे हदीसे बिज़्आ को हज़रत अली (अ) का अबू जहल की पुत्रि औरा से विवाह के रिश्ते के संबंध मे बयान की गई है। इब्ने हंबल (मृत्यु 856ई.) ने अब्दुल्लाह बिन ज़ूबैर से रिवायत करते हुए लिखा कि जब हज़रत अली (अ) और अबू जहल की बेटी के विवाह की सूचना पैगंबर (स) तक पहुंची तो आपने फ़रमायाः «اِنّما فَاطِمَةُ بَضْعَةٌ مِنِّی یُوذینی ما آذَاها» फ़ातिमा मेरा हिस्सा है जिसने उसे अप्रसंन किया उसने मुझे अप्रसंन किया।[२४] इस घटना का उल्लेख विभिन्न शब्दो के साथ अन्य स्रोतों में भी किया गया है।[२५]

शिया मुतकल्लिम सय्यद मुर्तज़ा (966-1054ई) के दृष्टिकोण से ऐसी रिवायात मनगढ़त है।[२६] इमाम सादिक़ (अ) के एक कथन के अनुसार, इमाम अली (अ) का अबू जहल की बेटी के साथ शादी वाली रिवायत भी मनंगढ़त है।[२७] इमाम अली (अ) और अबू जहल की बेटी की शादी वाली रिवायत के वर्णनकर्ताओं में से एक अबू हुरैरा है जिस पर हदीस गढ़ने का आरोप है।[२८] अबू हुरैरा के अलावा इस रिवायत को हुसैन क्राबिसी और मिसवर बिन मखरमा ज़ुहरी ने भी बयान किया है जोकि इल्मे रिजाल मे दोनो (हुसैन क्राबिसी और मिसवर बिन मखरमा ज़ुहरी) ही को कमज़ोर और अविश्वासनीय घोषित किया गया है इसलिए इनकी रिवायते अस्वीकार है।[२९] शिया विद्वान सय्यद मुर्तज़ा के अनुसार हुसैन क्राबिसी अहले बैत (अ) का दुश्मन और नासिबी है।[३०]

इस्लामिक इतिहासकार जाफ़र मुर्तज़ा आमोली ने इमाम अली (अ) की अबू जहल की बेटी के साथ शादी वाली रिवायत की जाच पड़ताल करने के बाद 13 तर्क देते हुए रिवायत का खंडन किया है।[३१]

संबंधित लेख

  • इस्मते हज़रत फ़ातिमा (स)
  • फ़ज़ाइले हज़रत फ़ातिमा (स)

फ़ुटनोट

  1. शेख़ सदूक़, अल अमाली, 1417 हिजरी, पेज 165
  2. शेख़ सदूक़, अल एतेक़ादात, 1414 हिजरी, पेज 105; शेख मुफ़ीद, अल अमाली, 1414 हिजरी, पेज 260; शेख तूसी, अल अमाली, 1414 हिजरी, पेज 24; इब्ने मग़ाज़लि, मनाक़िब ए अली इबने अबी तालिब, 1426 हिजरी, पेज 289; इब्ने जिब्राईल, अल रौज़ा फ़ी फ़ज़ाइल अमीरूल मोमेनीन, 1423 हिजरी, पेज 167; बुखारी, सही उल बुखारी, 1401 हिजरी, भाग 4, पेज 210 और 219
  3. शेख़ सदूक़, अल खिसाल, 1403 हिजरी, पेज 573; फिताल नेशाबुरी, रौज़त उल वाएज़ीन, मनशूरात उल शरीफ उल रज़ी, पेज 149
  4. शेख़ सदूक़, अल अमाली, 1417 हिजरी, पेज 175 और 575
  5. ख़ज़्ज़ाज़ क़ुम्मी, किफायत उल असर, 1401 हिजरी, पेज 37
  6. ख़ज़्ज़ाज़ क़ुम्मी, किफायत उल असर, 1401 हिजरी, पेज 64; मजलिसी, बिहार उल अनवार, 1403 हिजरी, भाग 36, पेज 308
  7. सुवूती, अल सग़ूर उल बासेमा, 1431 हिजरी, पेज 67
  8. फ़ख्रे राज़ी, अल तफ़सीर उल कबीर, तीसरा प्रकाशन, भाग 9, पेज 160, सूरा ए आराफ़ की आयत न. 189 के अंतर्गत, भाग 27, पेज 200, सूरा ए ज़ुख़रफ़ की आयत न. 15 के अंतर्गत, भाग 30, पेज 126, सूरा ए मआरिज की आयत न. 19 के अंतर्गत
  9. इब्ने मंज़ूर, लिसान उल अरब, 1405 हिजरी, भाग 8, पेज 12; इब्ने असीर, अल निहाया, 1364श, भाग 1, पेज 133
  10. राग़िब इस्फ़ाहानी, मुफ़रेदात, 1427 हिजरी, पेज 129
  11. बहरानी, अल बुरहान, मोअस्सेसत उल बेअसत, भाग 1, पेज 261
  12. शेख़ सदूक़, मन ला याहज़ेर उल फ़क़ीह, मोअस्सेसत उल नश्र उल इस्लामी, भाग 2, पेज 583 और 588; फिताल नैशापूरी, रौज़त उल वाएज़ीन, मनशूरात उल शरीफ उल रज़ी, पेज 233
  13. सय्यद मुर्तज़ा, अल शाफ़ी फ़िल इमामत, 1410हिजरी, भाग 4, पेज 95; इब्ने अबिल हदीद, शरह ए नहजुल बलाग़ा, मोअस्सेसा ए इस्माईलीयान, भाग 16, पेज 273; ईजी, अल मवाक़िफ़, 1417हिजरी, भाग 3, पेज 597
  14. सुबहानी, पुज़ुहिशी दर शनाख़्त व इस्मत ए इमाम, 1389 श, पेज 27
  15. सूरा ए आले इमरान, आयत 42
  16. आलूसी, रूह उल मआनी, भाग 3, पेज 155
  17. इब्ने अबिल हदीद, शरह ए नहजुल बलाग़ा, मोअस्सेसा ए इस्माईलीयान, भाग 16, पेज 287; ईजी, अल मवाक़िफ़, 1417 हिजरी, भाग 3, पेज 597 और 607
  18. ख़ज़्ज़ाज़ क़ुम्मी, किफायत उल असर, 1401 हिजरी, पेज 65
  19. फ़ख्रे राज़ी, अल तफ़सीर उल कबीर, तीसरा प्रकाशन, भाग 27, पेज 166
  20. इब्ने अरबी, अहकाम उल क़ुरान, दार उल फ़िक्र, भाग 1, पेज 638; देखे इब्ने क़ुद्दामा, अल मुग़्नी, दार उल किताब उल अरबी, भाग 12, पेज 66
  21. फ़ख्रे राज़ी, अल तफ़सीर उल कबीर, तीसरा प्रकाशन, भाग 10, पेज 26
  22. फ़ख्रे राज़ी, अल तफ़सीर उल कबीर, तीसरा प्रकाशन, भाग 20, पेज 185
  23. शहीद ए अव्वल, ज़िक्र उश शिया, 1419 हिजरी, भाग 2, पेज 63
  24. इब्ने हंबल, मुसनद ए अहमद, दार ए सादिर, भाग 4, पेज 5
  25. नैशापूरी, सही ए मुस्लिम, दार उल फिक्र, भाग 7, पेज 141; बुख़ारी, सही उल बुख़ारी, 1401 हिजरी, भाग 6, पेज 158; इब्ने माज़ा, सुनन इब्ने माजा, दार उल फिक्र, भाग 1, पेज 644; सजिस्तानी, सुनन अबि दाऊद, 1410 हिजरी, भाग 1, पेज 460; नोमान मग़रिबि, शरह उल अख़बार, मोअस्सेसा अल नश्र उल इस्लामी, भाग 3, पेज 61; इब्ने बतरीक़, उम्दतो ओयून सेहाह उल अख़बार, 1407 हिजरी, पेज 385
  26. सय्यद मुर्तज़ा, तंज़ीह उल अम्बिया, 1250 हिजरी, पेज 167
  27. शेख़ सदूक़, अल अमाली, 1417 हिजरी, पेज 165
  28. इब्ने शाज़ान, अल ईज़ाह, 1363 श़, पेज 541; तुस्तरि, क़ामुस उल रिजाल, 1419 हिजरी, भाग 2, पेज 111
  29. फज़्लि, उसूल उल हदीस, 1421क़, पेज 139
  30. सय्यद मुर्तज़ा, तंज़ीह उल अम्बिया, 1250 हिजरी, पेज 167-168
  31. जाफ़र मुर्तज़ा, अल सहीह मिन सीरत अल इमाम अली, 1430 हिजरी, भाग 3, पेज 61-74

स्रोत

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  • इब्ने असीर, मज्दुद्दीन, अल निहायतो फ़ि ग़रीब इल हदीस वल असर, तहक़ीक़ महमूद मुहम्मद तनाही, क़ुम, इस्माईलीयान, चौथा प्रकाशन, 1364शम्सी
  • इब्ने बतरीक़, याह्या, उम्दतो ओयून सेहाह इल अख़बार फ़ी मनाक़िब ए इमाम इल अबरार, क़ुम, अल नश्र उल इस्लामी, 1407 हिजरी
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  • शेख़ सदूक़, मुहम्मद बिन अली, अल अमाली, क़ुम, मोअस्सेसत उल बेअसत, 1417 हिजरी
  • शेख़ सदूक़, मुहम्मद बिन अली, अल ख़िसाल, तहक़ीक़ अली अकबर ग़फ़्फ़ारी, जामेअत उल मुदर्रेसीन फ़ी हौज़ा तिल इल्मिया
  • शेख़ सदूक़, मुहम्मद बिन अली, मन ला याहज़ेरोह उल फ़क़ीह, तहक़ीक़ अली अकबर ग़फ़्फ़ारी, क़ुम, जामेअत उल मुदर्रेसीन, दूसरा प्रकाशन, 1404 हिजरी
  • शेख़ तूसी, मुहम्मद बिन हसन, अल अमाली, क़ुम, दार उल सक़ाफ़ा, 1414 हिजरी
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  • मुर्तज़ा आमुली, जाफ़र, अल सहीह मिन सीरत इल इमाम अली, क़ुम, विला ए मुर्तज़ा, 1430 हिजरी
  • मग़रिबी, नौमान बिन मुहम्मद, शरह उल अख़बार फ़ी फ़ज़ाए लिल आइम्मा तिल अत्हार, तहक़ीक़ मुहम्मद हुसैनी जलाली, क़ुम, मोअस्सेसत उल नश्र उल इस्लामी
  • नेशाबूरी, मुहम्मद बिन हुज्जाज, सही ए मुस्लिम, बैरूत, दार उल फिक्र
  • बहरानी, हाशिम, अल बुरहान फ़ी तफ़सीरिल क़ुरान, क़ुम, मोअस्सेसत उल बेअसत
  • इब्ने शहर आशोब, मुहम्मद बिन अली, मनाक़िब ए आले अबि तालिब, क़ुम, अल्लामा, पहला प्रकाशन, 1379 शम्सी