इमाम अली रज़ा (अ) का उत्तराधिकार
इमाम रज़ा (अ) का ख़लीफ़ा का उत्तराधिकारी बनना, मामून अब्बासी के इमाम अली रज़ा (अ) को अपना उत्तराधिकारी बनाने से जुड़ा है, जो शिया धर्म के हिसाब से इमाम रज़ा (अ) की ज़िंदगी की सबसे अहम घटना है। इमाम (अ) का मामून की खिलाफ़त को स्वीकार कर लेना, इस्लामी इतिहास में एक कठिन मुद्दा होने के साथ-साथ, धार्मिक दृष्टिकोण से भी बहुत महत्व रखता है। शिया इतिहासकार सय्यद जाफ़र मुर्तज़ा आमेली के अनुसार, मुतवातिर हदीसों से पता चलता है कि इमाम रज़ा खिलाफ़त के उत्तराधिकारी बनाये जाने पर ख़ुश नहीं थे।
उत्तराधिकारी बनाने से पहले, मामून ने इमाम को खिलाफ़त का पद पेश किया, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका मक़सद अपनी ख़िलाफ़त को मज़बूत करना था। लेकिन, मामून की पेशकश को ठुकराने के अलावा, इमाम अली रज़ा ने मामून की खिलाफ़त के सही होने पर भी सवाल उठाया। जब इमाम ने खिलाफ़त की स्वीकार करने से मना कर दिया, तो मामून ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी, जिससे उन्हें उत्तराधिकारी के पद को स्वीकार करने के लिये मजबूर होना पड़ा; लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि वे सरकारी मामलों में दख़ल नहीं देंगे।
इस कार्य के पीछे मामून के कुछ मकसद इस तरह हैं: इमाम के ख़तरे से सुरक्षित हो जाना और उन्हे अपनी निगरानी में रखना, अलवियों की क्रांति को दबाना, इमाम का इस्तेमाल अपनी खिलाफ़त को सही साबित करने के लिए करना, और ख़ुरासान के लोगों को खुश करना। दूसरी ओर, कुछ लोगों का मानना है कि फ़ज़्ल बिन सहल ने इमाम रज़ा (अ) की उत्तराधिकार-नियुक्ति की योजना इस उद्देश्य से बनाई थी कि इसके माध्यम से ईरान के बादशाह (शासन) तक पहुँच सके। हालांकि, कहते हैं कि इमाम (अ) अपनी योजनाओं और कामों से उन्हें उनके मक़सद हासिल करने से रोकने में कामयाब रहे।
मामून के आदेश से, इमाम रज़ा (अ.स.) को वर्ष 200 हिजरी के आखिर में मदीना से खुरासान बुलाया गया। मामून ने सफ़र का रास्ता ऐसा चुना कि उनका शिया शहरों से गुज़रना न हो। रास्ते में, इमाम रज़ा (अ) ने नैशापूर में सिलसिला अल-ज़हब नाम की हदीस बयान की। मामून ने रमज़ान 201 हिजरी में इमाम के ताजपोशी का समारोह किया। इस तरह, लोगों और सरकारी अधिकारियों ने इमाम के प्रति वफ़ादारी की क़सम खाई। उसके बाद से, मामून के आदेश पर, उपदेशों में इमाम का नाम लिया जाने लगे और उनके नाम पर सिक्के ढाले जाने लगे।
जब इमाम को उत्तराधिकारी घोषित किया गया, तो अली इब्ने अबी इमरान, अबू यूनुस और बसरा के गवर्नर जैसे लोगों ने उनका विरोध किया। बग़दाद के लोगों को डर था कि सरकार में उनका असर कम हो जाएगा, इसलिए उन्होंने बग़ावत कर दी और इब्राहिम इब्न महदी के प्रति वफ़ादारी की क़सम खाई। शिया स्रोतों के अनुसार, इमाम रज़ा (अ.स.) इस स्थिति का इस्तेमाल शियों के फ़ायदे के लिए करने में कामयाब रहे। उन्होंने अहले बैत (अ.स.) की बहुत सी शिक्षाओं को आम लोगों को समझाया और अलग-अलग पंथों के नेताओं के साथ बहस की। कुछ शोधकर्ताओ के अनुसार, इमाम रज़ा के वारिस बनाये जाने ने ईरानियों के शिया बनने का रास्ता खोल दिया।
इस्लाम में इमाम रज़ा (अ.स.) के उत्तराधिकार का महत्व
इमाम अली रज़ा (अ.स.) के उत्तराधिकार की कहानी इस्लामी इतिहास में सबसे विवादित मुद्दों में से एक है,[१] राजनीतिक और धार्मिक दोनों दृष्टिकोण से (उत्तराधिकार को स्वीकार करने और इमाम के अचूक होने के बीच विरोधाभास)[२] महत्व रखता है।[३] इमाम रज़ा के उत्तराधिकारी नियुक्ति के समय को उनके राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय माना गया है।[४]
कुछ शोधकर्ताओ के अनुसार, मामून की ख़िलाफ़त के संवेदनशील दौर में इमाम रज़ा (अ) ने उत्तराधिकार नियुक्ति (विलायत-ए-अहदी) को स्वीकार करके और उस समय कुछ गतिविधियाँ करके, अप्रत्यक्ष रूप से समाज का मार्गदर्शन करने में सफलता प्राप्त की; क्योंकि उस समय, अब्बासी खिलाफ़त में अव्यवस्था का वातावरण था, और अलवी लोगों के कई विद्रोहों और कुछ गुमराह पंथों के वुजूद से समाज के पतन का रास्ता बन गया था।[५]
उत्तराधिकार नियुक्ति का प्रस्ताव
मक़ातिल अल-तालेबेईन में अबू अल-फ़रज इस्फ़हानी और ऊयून अख़्बार अल-रज़ा (अ) किताब में शेख़ सदूक़ के अनुसार, इमाम रज़ा का उत्तराधिकारी बनाया जाना मामून के कहने पर किया गया था; क्योंकि उसने क़सम खाई थी कि जब वह अपने भाई अमीन को हरा देगा, तो ख़िलाफ़त इमाम रज़ा (अ) को सौंप देगा।[६] जब अमीन मारा गया और मामून ख़लीफ़ा बन गया, तो मामून के मंत्री फ़ज़्ल इब्ने सहल ने उन्हें भगवान के साथ किए गए अपने वादे की याद दिलाई, और मामून ने ऐसा करने के लिए ज़रूरी क़दम उठाए।[७]
दूसरी ओर, कुछ का मानना है कि इमाम रज़ा को उत्तराधिकारी बनाने का प्रस्ताव फ़ज़्ल इब्ने सहल ने रखा था।[८] ऐसा कहा जाता है कि फ़ज़्ल इमाम के बाद ईरान का राजा बनना चाहता था।[९] तथ्य यह है कि फ़ज़्ल इब्ने सहल के रिश्तेदारों में से एक, रजा इब्ने अबी ज़ह्हाक को इमाम रज़ा को मदीना से मर्व में स्थानांतरित करने के लिए ज़िम्मेदारी दिया जाना, कुछ राजनेताओं द्वारा सहल की योजना के बारे में मामून को चेतावनी देना और अन्य ऐतिहासिक रिपोर्टों को इस दावे का सबूत माना जाता है।[१०]
लक्ष्य

कुछ पूर्वी-विद्या विशेषज्ञ (ओरिएंटलिस्ट) और कुछ शिया लेखक, जैसे कि लेबनान के लेखक हसन अमीन, वे इस मान्यता पर हैं कि मामून ने इमाम रज़ा (अ) को उत्तराधिकारी बनाने में ईमानदारी दिखाई और यह कार्य निःस्वार्थ भाव से किया।।[११] हालांकि, बहुत से शोधकर्ता मानते हैं कि इमाम को अपनी उत्तराधिकारी बनाकर मामून ये लक्ष्य पूरे करना चाहता था:
- इमाम के खतरे से सुरक्षित रहना और उन पर नज़र रखना: मामून, जो मदीना में इमाम की गतिविधियों से डरता था, इमाम को मर्व बुलाकर और उन्हें जानशीन बनाकर अपनी सरकार के लिए खतरे से छुटकारा पाना चाहता था।[१२]
- अलवियों की क्रांति को शांत करना: मामून इमाम को उत्तराधिकारी बनाकर अलवी क्रांतियों को शांत करने में कामयाब रहा; इस तरह इमाम के उत्तराधिकारी बनने के बाद, अलवी लोगों के बीच कोई क्रांति (यमन में शुरू हुए और जल्द ही शांत हो गए एक आंदोलन को छोड़कर) नहीं हुई।[१३]
- शियों को इमाम की ओर से भ्रमित करना: अबा सल्त (इमाम रज़ा के साथियों में से एक) की उल्लेख की गई एक हदीस के अनुसार, इमाम को उत्तराधिकारी बनाकर मामून उन्हें संसारिक जीवन चाहने वाले इंसान के तौर पर पेश करना चाहता था ताकि शियों में उनकी सम्मान कम हो जाए।[१४]
- मामून का अपनी खिलाफ़त को सही साबित करने के लिए इमाम का इस्तेमाल करना: मामून, जो जानता था कि इमाम रज़ा (अ) मदीना में लोगों को अपनी ओर बुला रहे हैं, इमाम को युवराज बनाकर, वह इमाम के दावत देने को अपनी ख़िलाफ़त को वैध बनाने का साधन बनाना चाहता था, ताकि इमाम की वैधता के अलावा, उसकी अपनी ख़िलाफ़त को भी वैध माना जाए।[१५]
- खुरासान के लोगों को खुश करना: ख़ुरासान के लोग, जो बनी अब्बास की पुष्टि के बाद, उनकी ख़िलाफ़त के उत्पीड़न से निराश हो गए थे, वह इमाम रज़ा (अ) की ओर मुड़ गए थे।[१६] मामून ने इमाम रज़ा (अ) को उत्तराधिकारी बनाकर उन्हें खुश करना चाहता था।[१७]
- शियों के प्रमुख लोगों की पहचान: शिया, जो हमेशा छिपकर जीवन गुज़ारने पर मजबूर रहते थे, इमाम के उत्तराधिकारी बनने के बाद उन्होने छिपकर रहना बंद कर दिया और परिणामस्वरूप उन्हें अब्बासी सरकार की ओर से पहचान लिया गया।[१८]
- मामून की ताक़त में बढ़ोतरी: बनी अब्बास हमेशा मामून से इसलिये नफ़रत करते थे क्योंकि उसकी माँ एक महल की नौकरानी थीं और उसने सरकार के सारे काम एक ईरानी (फ़ज़्ल इब्न सहल) को सौंप दिये थे। इसलिए, उसने अली इब्ने मूसा (अ) जैसे महान व्यक्ति को अपना उत्तराधिकारी बनाकर अपनी स्थिति मज़बूत करने का फ़ैसला किया था।[१९]
कुछ लेखकों ने मामून के इस काम से दूसरे लक्ष्य का भी उल्लेख किया है।[२०] शिया इतिहासकार सय्यद जाफ़र मुर्तज़ा आमेली का मानना है कि मामून को सरकार में जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा, उन्हें देखते हुए इमाम को उत्तराधिकारी के तौर पर चुनना उसकी राजनीतिक काबिलियत और सरकार की समस्याओं के बारे में उसकी जानकारी को दिखाता है।[२१] हालाँकि, ऐसा कहा जाता है कि इमाम रज़ा (अ) ने अपनी नीतियों और रुख़ से मामून को उसके अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल कर दिया था।[२२]
इमाम रज़ा का दृष्टिकोण
सय्यद जाफ़र मुर्तज़ा आमेली के अनुसार, वे रिपोर्टें या ऐतिहासिक सूत्र जो इस बात पर प्रमाण हैं कि इमाम (अ) उत्तराधिकार-नियुक्ति पर संतुष्ट नहीं थे, मुतवातिर हैं।[२३] किताब मनाक़िब में जो उल्लेख किया गया है, उसके अनुसार इमाम रज़ा (अ) ने बता दिया था कि उनके उत्तराधिकारी बनने का कोई परिणाम नहीं होगा।[२४] इस रिपोर्ट के अनुसार, खिलाफ़त स्वीकार करने के बाद, इमाम (अ) ने मामून और फ़ज़्ल इब्ने सहल की मौजूदगी में अपने उत्तराधिकार पर एक पत्र लिखा, और उसमें उन्होंने जो बातें बताईं, उनमें से एक यह भी थी कि जफ़्र और जामेया ने उनके उत्तराधिकार के खिलाफ़ इशारा किया है।[२५]
उत्तराधिकार स्वीकार करने से पहले, मामून ने इमाम को खिलाफ़त की पेशकश की; लेकिन इमाम रज़ा (अ) ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा: "अगर अल्लाह ने तुम्हें खिलाफ़त दी है, तो इसे किसी और को देना जायज़ नहीं है, और अगर उसने तुम्हें खिलाफ़त नहीं दी है, तो तुम किसी और को वह चीज़ कैसे दे सकते हो जो तुम्हारी नहीं है?"[२६] विद्वानों का मानना है कि इमाम (अ) के इस जवाब ने मामून की ख़िलाफ़त की वैधता पर सवाल उठाया।[२७] सय्यद जाफ़र मुर्तज़ा का मानना है कि मामून इमाम रज़ा (अ.स.) को ख़िलाफ़त की पेशकश करने में गंभीर नहीं था और उसकी यह पेशकश उसकी अपनी ख़िलाफ़त को मज़बूत करने की एक कोशिश थी।[२८] फ़ज़्ल इब्न सहल ने भी इस बात पर हैरानी जताई कि मामून ख़िलाफ़त को ख़ुद से अलग कर रहा है और इमाम इसे स्वीकार नहीं कर रहे थे, और इस बात पर भी हैरानी जताई कि ख़िलाफ़त कितनी भ्रष्ट हो गई थी।[२९]
उत्तराधिकारी बनने के प्रस्ताव का भी इमाम रज़ा (अ.स.) ने कड़ा विरोध किया।[३०] इमाम के व्यवहार को देखकर, मामून ने उन्हें उमर इब्ने ख़त्ताब की छह-सदस्यीय परिषद को दी गई धमकी की याद दिलाई कि जो कोई भी उनका विरोध करेगा, वह उसे मार डालेगा, और इमाम को धमकाया और उन्हें उत्तराधिकारी के पद को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया।[३१] इस धमकी के कारण इमाम उत्तराधिकारी का पद स्वीकार करने के लिए मजबूर हुए, लेकिन उन्होंने सरकारी मामलों में दखल न देने की शर्त रखी।[३२] मामून ने भी यह शर्त मान ली।[३३] रय्यान इब्ने सल्त द्वारा इमाम रज़ा (अ) से बयान की गई एक हदीस के अनुसार, अगर इमाम उत्तराधिकारी का पद को स्वीकार नहीं करते, तो मामून उन्हें मार देता।[३४]
इमाम रज़ा (अ) ने विभिन्न अवसरों पर उत्तराधिकारी के मामले पर मामून की योजना को विफल बनाने के लिये उसका मुक़ाबला किया।[३५] इमाम के उन कार्यों में कुछ निम्नलिखित हैं: मदीना में अलविदा कहने के समय पर इमाम का अपने परिवार को रोने का आदेश देना,[३६] पैग़म्बर (स) की क़ब्र को अलविदा कहना,[३७] किसी भी सरकारी मामलों में हस्तक्षेप न करना, सरकार के केंद्र को शिया प्रचार का केन्द्र बना देना और विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के नेताओं के साथ बहस करना।[३८]
इमाम का मदीना से मर्व की ओर जाना
याक़ूबी के इतिहास के अनुसार, मामून के आदेश पर, रजा इब्ने अबी ज़ह्हाक (फ़ज़्ल इब्ने सहल के एक रिश्तेदार) को इमाम रज़ा (अ.स.) को मदीना से ख़ुरासान लाने की ज़िम्मेदारी दी गई।[३९] हालांकि, शेख़ मुफ़ीद के अनुसार, मामून का दूत ईसा जलूदी था।[४०] मामून ने इमाम रज़ा की मर्व यात्रा के लिए एक विशिष्ट मार्ग चुना ताकि वह शिया केंद्रों से न गुज़रे, क्योंकि वह शियों के इमाम के चारों ओर इकट्ठा हो जाने से डरता था।[४१] उसने विशेष रूप से आदेश दिया कि इमाम को कूफ़ा के मार्ग से नहीं ले जाया जाए; बल्कि, उन्हें बसरा, खुज़िस्तान और फ़ार्स के रास्ते नैशापूर ले जाया जाये।[४२] शिया एटलस के अनुसार, इमाम की यात्रा का मार्ग इस प्रकार था: मदीना, नुकरह, हौस्जा, नबाज, हफ़्र अबू मूसा, बसरा, अहवाज़, बहबहान, इस्तख़र, अब्रकूह, देहशीर (फ़राशाह), यज़्द, ख़रानक, रबात पूश्ते-बाम, नैशापूर, क़दमगाह, देहसुर्ख, तूस, सरख्स और मर्व।[४३] ऐसा कहा जाता है कि इमाम की यात्रा का समय वर्ष 200 हिजरी के अंत में था।[४४] कहा जाता है कि रास्ते में सबसे महत्वपूर्ण और प्रलेखित घटना नैशापूर में हुई, जब इमाम रज़ा (अ.स.) ने एक हदीस सुनाई जिसे सोने की जंजीर (सिलसिला अल-ज़हब) के रूप में जाना जाता है।[४५]
राज्याभिषेक समारोह
सोमवार को, वर्ष 201 हिजरी में रमज़ान के सातवें[४६] या पांचवें[४७] या दूसरे दिन,[४८] मामून ने इमाम रज़ा (अ.स.) के उत्तराधिकारी के लिए लोगों से वफ़ादारी की शपथ ली और लोगों को अब्बासियों के प्रतीक काले कपड़ों के बजाय[४९] हरे कपड़े पहनाए (हरा रंग अलवी लोगों का प्रतीक था)[५०] और विभिन्न क्षेत्रों के लिए ऐसा करना का फ़रमान जारी किया।[५१]
उसके बाद, इमाम के नाम पर मिम्बरों पर उपदेश दिए गए और उनके नाम पर दीनार और दिरहम के सिक्के ढाले गए।[५२] मामून ने अपनी बेटी उम्मे हबीब का विवाह इमाम रज़ा से किया।[५३] साथ ही, कुछ रिपोर्टों के अनुसार, मामून ने उन्हें रज़ा (अल-रज़ा मिन आले-मुहम्मद, जिसका अर्थ है मुहम्मद के परिवार से वह व्यक्ति जिससे आप राज़ी हैं)[५४] की उपाधि दी। [५५] लेकिन, इमाम मुहम्मद तक़ी (अ.स.) की एक रिवायत के अनुसार, "रज़ा" की उपाधि उनके पिता को अल्लाह द्वारा दी गई है।[५६]
मामून ने सरकारी अफ़सरों, फ़ौज के कमांडरों, न्यायधिशों और लोगों को इमाम रज़ा (अ) के प्रति वफ़ादारी की क़सम दिलाने के लिए एक समारोह में इकट्ठा किया।[५७] इमाम ने पैग़म्बर (स) की तरह अपने हाथों को अपने चेहरे के सामने रखा, उनके हाथ का पिछला हिस्सा उनके चेहरे की तरफ़ और हथेली लोगों की तरफ़ थी।[५८] समारोह के सम्मान में वक्ताओं ने उपदेश दिए और और कवियों ने कविताएँ रचीं। कवियों में से एक थे देबल बिन अली ख़ुज़ाई, जिन्होंने अपनी कविता लिखकर इमाम से आशीर्वाद प्राप्त किया।[५९] मामून ने इमाम से लोगों को उपदेश देने के लिए कहा। इमाम ने भी लोगों के लिये बहुत छोटा सा उपदेश दिया।[६०]
इमाम के उत्तराधिकार का फ़ैसला मामून की लिखावट में एक दस्तावेज़ पर लिखा गया था, और इमाम ने भी उस दस्तावेज़ के पीछे कुछ चीज़ें लिखी थी।[६१] कश्फ़ अल-ग़ुम्मा किताब के लेखक अली इब्न ईसा-इरबेली ने 670 हिजरी में मामून और इमाम के हस्तलेख में उस समझौते को देखा था और इसे अपनी किताब कश्फ़ अल-ग़ुम्मा में दर्ज किया है।[६२]
इमाम रज़ा के उत्तराधिकारी नियुक्ति के विरोधी
याक़ूबी के अनुसार, इस्माईल इब्ने जाफ़र इब्ने सुलेमान, जिसे मामून ने बसरा का गवर्नर बनाया था, ने इमाम रज़ा (अ.स.) के प्रति वफ़ादारी करने से इनकार कर दिया, और मामून ने ईसा इब्न यज़ीद-जलूदी को उसके पास भेजा, और वह बसरा से भाग गया।[६३] याक़ूबी ने लिखा है कि ईसा इब्ने यज़ीद जलूदी ही वह व्यक्ति था जिसे मामून ने मक्का में वफ़ादारी का आदेश देने के लिए भेजा था।[६४] वह हरे कपड़े के साथ मक्का में दाखिल हुआ और उसने लोगों से इमाम रज़ा (अ.स.) के प्रति वफ़ादारी ली।[६५] शेख़ सदूक़ ने उल्लेख किया है कि ईसा जलूदी बाद में इमाम रज़ा के उत्तराधिकार का कट्टर विरोधी बन गया था, और मामून ने उसे इमाम रज़ा (अ.स.) के प्रति वफ़ादारी न करने के लिए क़ैद कर लिया था।[६६] अली इब्ने अबू इमरान और अबू यूनुस उन अन्य लोगों में से हैं जिन्हें इमाम रज़ा (अ) के उत्तराधिकार का विरोधी माना गया है।[६७]
परिणाम
इमाम रज़ा (अ) के उत्तराधिकार नियुक्ति के कुछ परिणाम इस तरह बयान किये गये हैं:
- बग़दाद के लोगों का विद्रोह: बग़दाद के लोगों को इस बात का डर था कि सरकार में उनका प्रभाव कम हो जाएगा, इसलिए उन्होंने इमाम रज़ा (अ) के उत्तराधिकार को स्वीकार नहीं किया और मामून के एजेंट को बग़दाद से निकाल दिया और इब्राहीम इब्ने महदी के प्रति वफ़ादारी की क़सम खाई।[६८]
- कुछ अलवी लोगों का मामून के प्रति वफ़ादारी: हालांकि इमाम रज़ा (अ) के उत्तराधिकार से सभी अलवी मामून के क़रीब नहीं आए, लेकिन उनमें से कुछ मामून से खुश थे और उन्होंने उसके प्रति वफ़ादारी की क़सम खाई।[६९]
- इमाम द्वारा उत्तराधिकार का फ़ायदा: हालाँकि इमाम रज़ा (अ) ने अनिच्छा से मामून के ताज और उत्तराधिकारी बनने के पद को स्वीकार किया था, लेकिन उन्होने इस पद का उपयोग सार्वजनिक रूप से और सबके लिये उन बहुत सी शिक्षाओं को व्यक्त करने के लिए सक्षम किया, जो केवल उनके अनुयायियों और शियों को ही ज्ञात थीं, और उन्होने इस का उपयोग विभिन्न विचारधाराओं के विद्वानों के साथ बहस करने के लिए भी किया।[७०]
- ईरान में शिया धर्म की नींव रखना: तफ़सीर अहसन अल-हदीस के लेखक सय्यद अली अकबर कुरशी के अनुसार, इमाम रज़ा (आ)मके उत्तराधिकार ने ईरानियों के शिया बनने की नींव रखी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ईरान में इमाम रज़ा के होने का कारण, अलवी सादात ईरान आए और उन्होने शिया विचारधारा को बढ़ावा दिया।[७१]
फ़ुटनोट
- ↑ अल-दौरी, अल-अस्र अल-अब्बासी अल-अव्वल, पृष्ठ 161।
- ↑ सय्यद मुर्तज़ा, तंज़ीह अल-अम्बिया (अ), पृष्ठ 179; शेख़ तूसी, तल्ख़ीस अल-शाफ़ी, खंड 4, पृष्ठ 206।
- ↑ बाग़ेस्तानी, «الرضا، امام (ولایتعهدی)», पृष्ठ 83।
- ↑ जाफ़ेरियान, हयाते फिक्री व सियासी इमामाने शिया (अ.स.), पृष्ठ 430; इफ़्तेख़ारी, इमाम रज़ा (अ.स.), मामून और मौज़ूए विलायत अहदी, पृष्ठ 104।
- ↑ अकबरी और बराती, «نقش امام رضا(ع) در وحدت دینی و انسجام اسلامی در عصر عباسی», पृष्ठ 45।
- ↑ अबू अल-फ़रज इस्फ़हानी, मक़ातिल अल-तालेबेईन, पृष्ठ 454; शेख़ सदूक़, ऊयून अख़्बार अल-रज़ा (अ.स.), खंड 2, पृष्ठ 166।
- ↑ बैहक़ी, तारीख़ बैहक़ी, खंड 3, पृष्ठ 190।
- ↑ शेख़ सदूक़, ऊयून अख़्बार अल-रज़ा (अ), खंड 2, पृष्ठ 165; अल-दौरी, अस्र अल-अब्बासी अल-अव्वल, पृष्ठ 162।
- ↑ जहशियारी, अल वुज़रा वल-किताब, पृष्ठ 203।
- ↑ अल-दौरी, अस्र अल-अब्बासी अल-अव्वल, पृष्ठ 162।
- ↑ फ़वज़ी, बुहूस फ़ी अल-तारीख़ अल-अब्बासी, पृष्ठ 135; अमीन, अल-रज़ा व अल-मामून व विलायत अहदी, पृष्ठ 123-126.
- ↑ शेख़ सदूक़, ऊयून अख़्बार अल-रज़ा (अ), खंड 2, पृष्ठ 170।
- ↑ आमेली, अल-हयात अल-सियासिया लिल इमाम अल-रज़ा (अ), पृष्ठ 226।
- ↑ शेख़ सदूक़, ऊयून अख़्बार अल-रज़ा (अ), खंड 2, पृष्ठ 239।
- ↑ शेख़ सदूक़, ऊयून अख़्बार अल-रज़ा (अ), खंड 2, पृष्ठ 170।
- ↑ अल-दौरी, अल-अस्र अल-अब्बासी अल-अव्वल, पृष्ठ 162।
- ↑ अल-दौरी, अल-अस्र अल-अब्बासी अल-अव्वल, पृष्ठ 162।
- ↑ क़रशी, अल-हयात अल-इमाम अल-रज़ा (अ), खंड 2, पृष्ठ 283।
- ↑ क़रशी, अल-हयात अल-इमाम अल-रज़ा (अ), खंड 2, पृष्ठ 282।
- ↑ आमेली, अल-हयात अल-सियासिया लिल इमाम अल-रज़ा (अ), पृष्ठ 254-260।
- ↑ आमेली, अल-हयात अल-सियासिया लिल इमाम अल-रज़ा (अ), पृष्ठ 207।
- ↑ इफ्तिखारी, इमाम अल-रज़ा (अ.स.), मामून व मौज़ूए विलायत अहदी, पृष्ठ 104।
- ↑ आमेली, अल-हयात अल-सियासिया लिल इमाम अल-रज़ा (अ), पृष्ठ 286।
- ↑ इब्ने शहर-आशोब, अल-मनाक़िब, खंड 4, पृष्ठ 365।
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- ↑ शेख़ सदूक़, अमाली, पृष्ठ 69।
- ↑ दरख्शा, हुसैनी फाएक़, «سیره سیاسی امام رضا(ع) در برخورد با حکومت جور», पृष्ठ 21।
- ↑ आमेली, अल-हयात अल-सियासिया लिल इमाम अल-रज़ा (अ), पृष्ठ 286।
- ↑ शेख़ मुफीद, अल-इरशाद, खंड 2, पृष्ठ 260; शेख़ सदूक़, ऊयून अख़्बार अल-रज़ा (अ), खंड 2, पृष्ठ 141।
- ↑ शेख़ मुफीद, अल-इरशाद, खंड 2, पृष्ठ 259।
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- ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 1, पृष्ठ 489।
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- ↑ शेख़ सदूक़, एलल अल-शराया, खंड 1, पृष्ठ 239।
- ↑ अमीनी, निगाही बे ज़िन्दगी व विलायत अहदी इमाम रज़ा, पृष्ठ 102-103।
- ↑ मसऊदी, इस्बात अल-वसिया, पृष्ठ 211।
- ↑ शेख़ सदूक़, ऊयून अख़्बार अल-रज़ा (अ), खंड 2, पृष्ठ 217।
- ↑ अमीनी, निगाही बे ज़िन्दगी व विलायत अहदी इमाम रज़ा, पृष्ठ 103-106।
- ↑ याक़ूबी, तारीख़ अल-याक़ूबी, खंड 2, पृष्ठ 448।
- ↑ शेख मुफ़ीद, अल-इरशाद, खंड 2, पृष्ठ 259।
- ↑ मुतह्हरी, मजमूआ ए आसार, खंड 18, पृष्ठ 124।
- ↑ मुतह्हरी, मजमूआ ए आसार, खंड 18, पृष्ठ 124।
- ↑ जाफ़रियान, एटलस अल-शिया, पृष्ठ 102।
- ↑ नौबख़्ती, फ़ेरक़ अल-शिया, पृष्ठ 87; अशअरी क़ुम्मी, अल-मक़ालात वा फ़ेरक़, पृष्ठ 95।
- ↑ फ़ज़्लुल्लाह, तहलीली अज़ ज़िन्दगानी इमाम रज़ा, पृष्ठ 133।
- ↑ याक़ूबी, तारीख़ अल-याक़ूबी, खंड 2, पृष्ठ 448।
- ↑ शेख़ सदूक़, ऊयून अख़बार अल-रज़ा (अ), खंड 2, पृष्ठ 245।
- ↑ तबरी, तारीख़ अल-तबरी, खंड 8, पृष्ठ 554।
- ↑ इरफ़ान मनिश, जुग़राफ़ियाए तारीख़ी हिजरते इमाम रज़ा, पृष्ठ 168।
- ↑ इरफ़ान मनिश, जुग़राफ़ियाए तारीख़ी हिजरते इमाम रज़ा, पृष्ठ 168।
- ↑ याक़ूबी, तारीख़ अल-याक़ूबी, खंड 2, पृष्ठ 448।
- ↑ याक़ूबी, तारीख़ अल-याक़ूबी, खंड 2, पृष्ठ 448।
- ↑ शेख़ सदूक़, ऊयून अख़बार अल-रज़ा (अ.स.), खंड 2, पृष्ठ 147।
- ↑ मुतह्हरी, मजमूआ ए आसार, खंड 18, पृष्ठ 122।
- ↑ शेख मुफ़ीद, अल-इरशाद, खंड 2, पृष्ठ 261; इब्ने शहर-आशोब, अल-मनाक़िब, खंड 4, पृष्ठ 363।
- ↑ शेख़ सदूक़, ऊयून अख़बार अल-रज़ा (अ.स.), खंड 1, पृष्ठ 13।
- ↑ शेख मुफ़ीद, अल-इरशाद, खंड 2, पृष्ठ 261।
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