सहीफ़ा सज्जादिया की छियालीसवीं दुआ
शाबान 1102 में अब्दुल्लाह यज़्दी द्वारा लिखित साहिफ़ा सज्जादिया की पांडुलिपि | |
अन्य नाम | भलाई का आग्रह करने की दुआ |
---|---|
विषय | ईद उल फ़ित्र और शुक्रवार के दिन की दुआ |
प्रभावी/अप्रभावी | प्रभावी |
किस से नक़्ल हुई | इमाम सज्जाद (अ) |
कथावाचक | मुतवक्किल बिन हारुन |
शिया स्रोत | सहीफ़ा सज्जादिया |
विशेष समय | ईद उल फ़ित्र की नमाज़ और शुक्रवार के दिन नमाज़ जुमा पढ़ने के बाद |
सहीफ़ा सज्जादिया की छियालीसवीं दुआ (अरबीःالدعاء السادس والأربعون من الصحيفة السجادية) इमाम सज्जाद (अ) की प्रसिद्ध दुआओं में से एक है, जिसे वह ईद-उल-फ़ित्र की नमाज़ के बाद और शुक्रवार को पढ़ते थे। इस दुआ में, इमाम सज्जाद (अ) अपने बन्दों को ईश्वर की ओर से दी जाने वाली सभी नेमतों को स्वीकार करते हैं और विभिन्न अभिव्यक्तियों के माध्यम से ईश्वर की दया की कामना करते हैं।
छियालीसवीं दुआ की शरह भी फ़ारसी में हुसैन अंसारियान की किताब दयारे आशेक़ान और हसन ममदूही किरमानशाही की किताब शुहुद व शनाख़्त, और अरबी में सय्यद अली ख़ान मदनी की किताब रियाज़ उस सालेकीन मे हुई है।
शिक्षाएँ
सहीफ़ा सज्जादिया की छियालीसवीं दुआ जिसे इमाम सज्जाद (अ) ईद उल फ़ित्र की नमाज़ के बाद और शुक्रवार को पढ़ते थे। यह दिन अल्लाह की ओर से अपने सेवकों पर विशेष प्रावधान के कारण मुलमानो के यहां बहुत महत्व रखते हैं, और इसलिए इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) विभिन्न व्याख्याओं के माध्यम से अल्लाह की रहमत को आकर्षित करना चाहते हैं।[१] इस दुआ की शिक्षाएं इस प्रकार हैं:
- सभी लोगों और शहरों के बहिष्कृत लोगों के प्रति परमेश्वर का प्रेम और दया
- परमेश्वर की दया और करुणा को स्वीकार करना
- सेवकों को ईश्वरीय दरबार से निराश नहीं होना चाहिए।
- ईश्वर के अनंत अस्तित्व की तुलना में प्राणियों की तुच्छता।
- बेघर लोगों की स्वीकृति
- परमेश्वर अपनी उपस्थिति में जरूरतमंदों को तुच्छ और छोटा नहीं समझता।
- परमेश्वर का अपने सेवकों के तुच्छ कार्यों को स्वीकार करना और उनकी सराहना करना तथा उन्हें बहुमूल्य पुरस्कार देना।
- परमेश्वर अपने सेवकों को दण्ड देने में जल्दबाजी नहीं करता
- जरूरतमंदों का सम्मान
- सेवकों और पापियों की प्रतिक्रिया
- पापी सेवकों को ईश्वरीय दरबार में आमंत्रित करना
- संसार परमेश्वर की संप्रभुता की सीमा है।
- ईश्वर ही अच्छे कर्मों को बढ़ाता है और बुरे कर्मों का नाश करता है।
- मानवीय क्षमता ईश्वरीय परीक्षण और पुरस्कार प्रणाली के लिए आधार तैयार करती है।
- निराशा, हानि और गरीबी ईश्वर से दूरी बनाने का परिणाम हैं।
- ईश्वरीय दया के द्वार खुले हैं।
- आशा और परमेश्वर पर भरोसा
- परमेश्वर द्वारा अपनी उदारता और दया के आधार पर पापियों को राहत और सहनशीलता देना
- ईश्वर के समक्ष महानता और सम्मान के सभी दावेदारों का छोटापन और अपमान।
- शाश्वत और स्थिर ईश्वरीय अधिकार और राज्य
- ईश्वरीय दंड में न्याय
- नेमत का वर्णन करने और उसके लिए आभारी होने में मनुष्य की असमर्थता
- अच्छे अंत के लिए दुआ करना
- ईश्वर के अलावा किसी अन्य की ओर मुड़ने का परिणाम अभाव और निराशा है।
- जो लोग ईश्वर के अलावा दूसरों से हानि चाहते हैं
- जो लोग उत्सुक हैं उनके लिए ईश्वरीय दया के द्वार का खुला रहना।
- मांगने वालों के लिए परमेश्वर की निरन्तर उदारता।
- क्रूरता और दुर्भाग्य से क्षमा मांगने के आलोक में क्षमा मांगने वालों की प्रतिरक्षा
- पापियों के लिए ईश्वरीय प्रावधान की सीमा
- ईश्वर-द्वेषियों के लिए भी ईश्वरीय सहनशीलता सीखना
- पापियों, अपराधियों और अत्याचारियों को राहत देना एक दिव्य परंपरा है।
- जितनी जल्दी हो सके पश्चाताप करने की आवश्यकता[२]
व्याख्यां
सहीफ़ा सज्जादिया की छियालीसवीं दुआ की व्याख्या भी दूसरी दुआओ के भांति इसकी भी व्याख्या की गई है, जिसमें हुसैन अंसारियान की किताब दयारे अशेक़ान,[३] मुहम्मद हसन ममदूही किरमानशाही की किताब शुहुद व शनाख़्त,[४] और सय्यद अहमद फ़हरी द्वारा शरह व तरजुमा सहीफ़ा सज्जादिया फ़ारसी भाषा मे किया गया है।[५]
सहीफ़ा सज्जादिया की छियालीसवीं दुआ का वर्णन अरबी में सय्यद अली खान मदनी की रियाज़ उस सालेक़ीन[६], मुहम्मद जवाद मुग़्निया की किताब फ़ि ज़िलाल अल सहीफ़ा सज्जादिया[७], मुहम्मद इब्न मुहम्मद दाराबी की किताब रियाज़ उल आरेफ़ीन[८] और सय्यद मुहम्मद हुसैन फ़ज़्लुल्लाह की आफ़ाक़ अ रूह[९] पुस्तकों में भी किया गया है। इस दुआ के शब्दों की व्याख्या फ़ैज़ काशानी द्वारा लिखित तालीक़ात अला अल-सहीफ़ा अल-सज्जादिया[१०] और इज़्जुद्दीन जज़ाएरी द्वारा शरह अला सहीफ़ा अला सज्जादिया मे बयान किया गया है।[११]
छियालीसवीं दुआ का पाठ और अनुवाद
وَ كَانَ مِنْ دُعَائِهِ عَلَيْهِ السَّلَامُ فِي يَوْمِ الْفِطْرِإِذَا انْصَرَفَ مِنْ صَلَاتِهِ قَامَ قَائِماً ثُمَّ اسْتَقْبَلَ الْقِبْلَةَ، وَ فِي يَوْمِ الْجُمُعَةِ، فَقَالَ:
يَا مَنْ يَرْحَمُ مَنْ لَا يَرْحَمُهُ الْعِبَادُ
وَ يَا مَنْ يَقْبَلُ مَنْ لَا تَقْبَلُهُ الْبِلَادُ
وَ يَا مَنْ لَا يَحْتَقِرُ أَهْلَ الْحَاجَةِ إِلَيْهِ
وَ يَا مَنْ لَا يُخَيِّبُ الْمُلِحِّينَ عَلَيْهِ.
وَ يَا مَنْ لَا يَجْبَهُ بِالرَّدِّ أَهْلَ الدَّالَّةِ عَلَيْهِ
وَ يَا مَنْ يَجْتَبِي صَغِيرَ مَا يُتْحَفُ بِهِ، وَ يَشْكُرُ يَسِيرَ مَا يُعْمَلُ لَهُ.
وَ يَا مَنْ يَشْكُرُ عَلَى الْقَلِيلِ وَ يُجَازِي بِالْجَلِيلِ
وَ يَا مَنْ يَدْنُو إِلَى مَنْ دَنَا مِنْهُ.
وَ يَا مَنْ يَدْعُو إِلَى نَفْسِهِ مَنْ أَدْبَرَ عَنْهُ.
وَ يَا مَنْ لَا يُغَيِّرُ النِّعْمَةَ، وَ لَا يُبَادِرُ بِالنَّقِمَةِ.
وَ يَا مَنْ يُثْمِرُ الْحَسَنَةَ حَتَّى يُنْمِيَهَا، وَ يَتَجَاوَزُ عَنِ السَّيِّئَةِ حَتَّى يُعَفِّيَهَا.
انْصَرَفَتِ الْآمَالُ دُونَ مَدَى كَرَمِكَ بِالْحَاجَاتِ، وَ امْتَلَأَتْ بِفَيْضِ جُودِكَ أَوْعِيَةُ الطَّلِبَاتِ، وَ تَفَسَّخَتْ دُونَ بُلُوغِ نَعْتِكَ الصِّفَاتُ، فَلَكَ الْعُلُوُّ الْأَعْلَى فَوْقَ كُلِّ عَالٍ، وَ الْجَلَالُ الْأَمْجَدُ فَوْقَ كُلِّ جَلَالٍ.
كُلُّ جَلِيلٍ عِنْدَكَ صَغِيرٌ، وَ كُلُّ شَرِيفٍ فِي جَنْبِ شَرَفِكَ حَقِيرٌ، خَابَ الْوَافِدُونَ عَلَى غَيْرِكَ، وَ خَسِرَ الْمُتَعَرِّضُونَ إِلَّا لَكَ، وَ ضَاعَ الْمُلِمُّونَ إِلَّا بِكَ، وَ أَجْدَبَ الْمُنْتَجِعُونَ إِلَّا مَنِ انْتَجَعَ فَضْلَكَ
بَابُكَ مَفْتُوحٌ لِلرَّاغِبِينَ، وَ جُودُكَ مُبَاحٌ لِلسَّائِلِينَ، وَ إِغَاثَتُكَ قَرِيبَةٌ مِنَ الْمُسْتَغِيثِينَ.
لَا يَخِيبُ مِنْكَ الْآمِلُونَ، وَ لَا يَيْأَسُ مِنْ عَطَائِكَ الْمُتَعَرِّضُونَ، وَ لا يَشْقَى بِنَقِمَتِكَ الْمُسْتَغْفِرُونَ.
رِزْقُكَ مَبْسُوطٌ لِمَنْ عَصَاكَ، وَ حِلْمُكَ مُعْتَرِضٌ لِمَنْ نَاوَاكَ، عَادَتُكَ الْإِحْسَانُ إِلَى الْمُسِيئِينَ، وَ سُنَّتُكَ الْإِبْقَاءُ عَلَى الْمُعْتَدِينَ حَتَّى لَقَدْ غَرَّتْهُمْ أَنَاتُكَ عَنِ الرُّجُوعِ، وَ صَدَّهُمْ إِمْهَالُكَ عَنِ النُّزُوعِ.
وَ إِنَّمَا تَأَنَّيْتَ بِهِمْ لِيَفِيئُوا إِلَى أَمْرِكَ، وَ أَمْهَلْتَهُمْ ثِقَةً بِدَوَامِ مُلْكِكَ، فَمَنْ كَانَ مِنْ أَهْلِ السَّعَادَةِ خَتَمْتَ لَهُ بِهَا، وَ مَنْ كَانَ مِنْ أَهْلِ الشَّقَاوَةِ خَذَلْتَهُ لَهَا.
كُلُّهُمْ صَائِرُونَ، إِلَى حُكْمِكَ، وَ أَمُورُهُمْ آئِلَةٌ إِلَى أَمْرِكَ، لَمْ يَهِنْ عَلَى طُولِ مُدَّتِهِمْ سُلْطَانُكَ، وَ لَمْ يَدْحَضْ لِتَرْكِ مُعَاجَلَتِهِمْ بُرْهَانُكَ.
حُجَّتُكَ قَائِمَةٌ لَا تُدْحَضُ، وَ سُلْطَانُكَ ثَابِتٌ لَا يَزُولُ، فَالْوَيْلُ الدَّائِمُ لِمَنْ جَنَحَ عَنْكَ، وَ الْخَيْبَةُ الْخَاذِلَةُ لِمَنْ خَابَ مِنْكَ، وَ الشَّقَاءُ الْأَشْقَى لِمَنِ اغْتَرَّ بِكَ.
مَا أَكْثَرَ تَصَرُّفَهُ فِي عَذَابِكَ، وَ مَا أَطْوَلَ تَرَدُّدَهُ فِي عِقَابِكَ، وَ مَا أَبْعَدَ غَايَتَهُ مِنَ الْفَرَجِ، وَ مَا أَقْنَطَهُ مِنْ سُهُولَةِ الْمَخْرَجِ!! عَدْلًا مِنْ قَضَائِكَ لَا تَجُورُ فِيهِ، وَ إِنْصَافاً مِنْ حُكْمِكَ لَا تَحِيفُ عَلَيْهِ.
فَقَدْ ظَاهَرْتَ الْحُجَجَ، وَ أَبْلَيْتَ الْأَعْذَارَ، وَ قَدْ تَقَدَّمْتَ بِالْوَعِيدِ، وَ تَلَطَّفْتَ فِي التَّرْغِيبِ، وَ ضَرَبْتَ الْأَمْثَالَ، وَ أَطَلْتَ الْإِمْهَالَ، وَ أَخَّرْتَ وَ أَنْتَ مُسْتَطِيعٌ لِلمُعَاجَلَةِ، وَ تَأَنَّيْتَ وَ أَنْتَ مَلِيءٌ بِالْمُبَادَرَةِ
لَمْ تَكُنْ أَنَاتُكَ عَجْزاً، وَ لَا إِمْهَالُكَ وَهْناً، وَ لَا إِمْسَاكُكَ غَفْلَةً، وَ لَا انْتِظَارُكَ مُدَارَاةً، بَلْ لِتَكُونَ حُجَّتُكَ أَبْلَغَ، وَ كَرَمُكَ أَكْمَلَ، وَ إِحْسَانُكَ أَوْفَى، وَ نِعْمَتُكَ أَتَمَّ، كُلُّ ذَلِكَ كَانَ وَ لَمْ تَزَلْ، وَ هُوَ كَائِنٌ وَ لَا تَزَالُ.
حُجَّتُكَ أَجَلُّ مِنْ أَنْ تُوصَفَ بِكُلِّهَا، وَ مَجْدُكَ أَرْفَعُ مِنْ أَنْ يُحَدَّ بِكُنْهِهِ، وَ نِعْمَتُكَ أَكْثَرُ مِنْ أَنْ تُحْصَى بِأَسْرِهَا، وَ إِحْسَانُكَ أَكْثَرُ مِنْ أَنْ تُشْكَرَ عَلَى أَقَلِّهِ
وَ قَدْ قَصَّرَ بِيَ السُّكُوتُ عَنْ تَحْمِيدِكَ، وَ فَهَّهَنِيَ الْإِمْسَاكُ عَنْ تَمْجِيدِكَ، وَ قُصَارَايَ الْإِقْرَارُ بِالْحُسُورِ، لَا رَغْبَةً- يَا إِلَهِي- بَلْ عَجْزاً.
فَهَا أَنَا ذَا أَؤُمُّكَ بِالْوِفَادَةِ، وَ أَسْأَلُكَ حُسْنَ الرِّفَادَةِ، فَصَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَ آلِهِ، وَ اسْمَعْ نَجْوَايَ، وَ اسْتَجِبْ دُعَائِي، وَ لَا تَخْتِمْ يَوْمِي بِخَيْبَتِي، وَ لَا تَجْبَهْنِي بِالرَّدِّ فِي مَسْأَلَتِي، وَ أَكْرِمْ مِنْ عِنْدِكَ مُنْصَرَفِي، وَ إِلَيْكَ مُنْقَلَبِي، إِنَّكَ غَيْرُ ضَائِقٍ بِمَا تُرِيدُ، وَ لَا عَاجِزٍ عَمَّا تُسْأَلُ، وَ أَنْتَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، وَ لَا حَوْلَ وَ لَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيمِ.
ईद उल फ़ित्र और जुमा के दिन की दुआ, नमाज़ से वापसी पर क़िबला की ओर मुंह करके खड़े होकर फ़रमाते थे
हे वह जो उन पर दया करता है जिन पर उसके बन्दे दया नहीं करते!
हे वह जो उसे स्वीकार करता है जिसे देश स्वीकार नहीं करते!
हे वह जो अपने दरबार में जरूरतमंदों को तुच्छ और छोटा नहीं समझता!
हे वह जो अपने समक्ष बने रहने वालों को निराश नहीं करता!
हे वह जो अपने कर्मों को महान मानने वालों के हृदयों को महामहिम के समक्ष अस्वीकार नहीं करता!
हे वह जो छोटे-छोटे उपहार और भेंट स्वीकार करता है और जो थोड़ा-बहुत उसके लिए किया जाता है उसके लिए कृतज्ञ होता है!
और ऐ वह जो छोटे कामों की कद्र करता है और बड़ा पुरस्कार देता है!
और ऐ वह जो उसके निकट जाना चाहता है, वह उसके निकट आता है!
और ऐ वह जो उन लोगों को अपनी ओर बुलाता है जो उससे विमुख हो गए हैं!
और ऐ वह जो नेमत को नहीं बदलता और बदला लेने में जल्दी नहीं करता!
और ऐ वह जो भलाई को बढ़ाता है और बुराई को नष्ट करने और मिटा देने के लिए उसे छोड़ देता है!
इच्छाएँ तेरी कृपा के क्षेत्र में पहुँचने से पहले ही पूरी हो गईं, और माँगने के बर्तन तेरी दया से भर गए। विशेषताएँ तेरी विशेषता तक पहुँचने से पहले ही बिखर गईं। उच्चतम स्तर पर जो श्रेष्ठता है, वह केवल तेरे लिए है, और वह महानता और ऐश्वर्य, जो हर महानता और ऐश्वर्य से परे है, केवल तेरे लिए है।
हर बड़ी बात तेरे सामने छोटी है, और हर आदरणीय बात तेरे सम्मान के सामने तुच्छ है। जो लोग तेरे अलावा कही चले गये, वे निराश हुए; और जिन लोगों ने तेरे अलावा किसी और को खोजा, वे घाटे में पड़ गये। और जो लोग तेरे अलावा किसी और की ओर उतरे, वे विनष्ट हो गये। और जो लोग आशीर्वाद चाहते हैं, उनके अलावा जो तेरा अनुग्रह और भलाई से आशीर्वाद चाहते हैं, वे गरीबी और अकाल से पीड़ित थे।
तेरी दया का द्वार सब मांगने वालों के लिए खुला है, और तेरा दान भिखारियों के लिए मुफ़्त है, और तेरी पुकार उन लोगों के निकट है जो पुकारते हैं,
जो लोग तुझ से आशा रखते हैं वे निराश नहीं होंगे, जो लोग तुझ से नेमते मांगते हैं वे निराश नहीं होंगे, और जो लोग क्षमा चाहते हैं वे तेरी सज़ा के कारण दुखी नहीं होंगे।
पापियों के लिए तेरी भोजन-वस्तु विस्तृत है और जिन लोगों ने तुमसे शत्रुता दिखाई है, उनके प्रति तेरा धैर्य विस्तृत है। तेरी आदत यह है कि तू बुरे लोगों के प्रति दयालु है और तेरा तरीका यह है कि तू अत्याचारियों को छूट देता है, इस हद तक कि तेरी सहनशीलता ने उन्हें धोखा दिया है और वे तेरे पास लौटकर पश्चाताप करने से बेपरवाह हो गए हैं। और तेरी मोहलत ने उन्हें गुनाह से बाज़ रहने से रोक दिया।
यह केवल इतना है कि तूने उन्हें समय दिया ताकि वे तेरे आदेश की ओर लौट आएं। और अपने शासन की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए, तूने उन्हें मोहलत दी; तो, तूने उस व्यक्ति को, जो सुखी था, सुख में अन्त कर दिया। और जो दुखी था, उसे तूने उसके दुख में ही छोड़ दिया।
ये सभी, सुखी और दुखी, तेरे शासन में लौट आएंगे; और उनका काम तेरे आदेश पर ख़त्म हो जाएगा। पापियों के जीवन का लम्बा होना तेरे शासन की शक्ति को कमजोर नहीं करेगा; और उन्हें दंडित करने और उनसे पूछताछ करने में जल्दबाजी न करने से तेरे सबूत और साक्ष्य अमान्य नहीं हो जाते।
तेरा तर्क ठोस और अडिग है, तथा इसे अमान्य नहीं किया जा सकेगा। और तेरा शासन सदा का शासन है, जो कभी न मिटेगा। अतः जो तुझसे विमुख हो जाए, उसके लिए अनन्त दण्ड है, जो तुझसे निराश हो जाए, उसके लिए अपमानजनक निराशा है, तथा जो तेरी दया और उदारता का अहंकार करे, उसके लिए सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।
उसके लिए तेरी यातना में कितने परिवर्तन होंगे, और तेरी सज़ा का आना और जाना कितना लम्बा होगा। और ऐसे व्यक्ति से मुक्ति और मोक्ष कितनी दूर है, तथा उसे आसानी और सुविधा से नरक से मुक्ति मिलने की कितनी आशा नहीं है। ये दण्ड तेरे न्याय पर आधारित हैं, जिसमें तू अत्याचार नहीं करता; और यह तेरे आदेश में न्याय की बात है कि तू उसमें अन्याय की अनुमति नहीं देता।
निस्संदेह तूने लोगों को जगाने के लिए एक के बाद एक अपनी दलीलें पेश कीं और तूने उनके पास अपना प्रमाण और बहाना भेजा और तूने उन्हें अपनी धमकी की याद दिलाई और तूने अपने बन्दों को ईमान लाने और अमल करने के लिए प्रेरित करने में दयालुता और सहनशीलता का प्रयोग किया। और तूने उन्हें जगाने के लिए दृष्टान्तों का प्रयोग किया; और तूने लोगों को राहत दी। तूने दण्ड में देरी की, जबकि तू उसे शीघ्र करने में समर्थ था। और तूने मुझे समय दिया, भले ही तेरे पास जल्दबाजी करने की शक्ति थी।
तेरी असमर्थता के कारण सहनशीलता, तेरी कमजोरी के कारण समय देना, तेरी लापरवाही के कारण टालमटोल करना, और तेरा विलम्ब करना, ये सब सहनशीलता और समझौते के कारण नहीं था; बल्कि, ऐसा इसलिए था कि तेरा प्रमाण अधिक स्पष्ट हो, तेरी उदारता अधिक पूर्ण हो, तेरी परोपकारिता अधिक व्यापक हो, और तेरी नेमते अधिक पूर्ण हो। ये सब कुछ था, है, और रहेगा।
तेरा अधिकार इतना बड़ा है कि उसे शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता, तेरी महानता इतनी महान है कि उसकी गहराई तक नहीं पहुंचा जा सकता, तेरी नेमते इतनी अधिक हैं कि उन्हें गिना नहीं जा सकता, और तेरी दयालुता इतनी अधिक है कि उसके छोटे से छोटे अंश के लिए भी धन्यवाद नहीं दिया जा सकता।
अब भाषा के अभाव के कारण मैं तेरे प्रति अपना आभार व्यक्त करने में असमर्थ हूँ; और तेरा सम्मान न करने से मैं असहाय और शक्तिहीन हो गया हूँ; और मेरी अंतिम शक्ति कृतज्ञता के माध्यम से अपनी असहायता को स्वीकार करना है। हे पालनहार! कृतज्ञता की यह लाचारी अनिच्छा के कारण नहीं, बल्कि मेरी असमर्थता के कारण है।
अब मैं तेरे दरबार में आना चाहता हूँ और तेरे अच्छे स्वागत की आशा करता हूँ। अतः मुहम्मद और उनके परिवार पर दया भेज, मेरे रहस्य को सुन, मेरी दुआ का उत्तर दे, मेरे दिन को निराशा में समाप्त मत कर, और मेरी विनती को अस्वीकार ना कर। और मेरे तेरे पास से जाने और मेरे तेरे पास वापस आने का सम्मान कर। क्योंकि जो भी तू चाहेगा, उसे करने में तुझे कोई कठिनाई नहीं होगी; और जो कुछ तुझ से मांगा जाए, उसे पूरा करने में तू असमर्थ न होगा; और तेरा किसी वस्तु पर कोई अधिकार या सामर्थ्य नहीं, सिवाय परमप्रधान और महान परमेश्वर के।
संबंधित लेख
फ़ुटनोट
- ↑ ममदूही, शुहूद व शनाख़त, 1388 शम्सी, भाग 4, पेज 28
- ↑ अंसारीयान, दयारे आशेक़ान, 1373 शम्सी, भाग 7, पेज 503-515 ममदूही, शुहूद व शनाख़त, 1388 शम्सी, भाग 4, पेज 28-46 शरह फ़राज़हाए दुआ चहलो शिशुम अज़ साइट इरफ़ान
- ↑ अंसारीयान, दयारे आशेक़ान, 1373 शम्सी, भाग 7, पेज 497-515
- ↑ ममदूही, शुहूद व शनाख़त, 1388 शम्सी, भाग 4, पेज 345-364
- ↑ फ़हरि, शरह व तफसीर सहीफ़ा सज्जादिया, 1388 शम्सी, भाग 3, पेज 345-346
- ↑ मदनी शिराज़ी, रियाज़ उस सालेकीन, 1435 हिजरी, भाग 6, पेज 199-252
- ↑ मुग़्निया, फ़ी ज़िलाल अल सहीफ़ा, 1428 हिजरी , पेज 539-549
- ↑ दाराबी, रियाज़ उल आरेफ़ीन, 1379 शम्सी, पेज 575-588
- ↑ फ़ज़्लुल्लाह, आफ़ाक़ अल रूह, 1420 शम्सी, भाग 2, पेज 433-462
- ↑ फ़ैज़ काशानी, तालीक़ात अलस सहीफ़ा अल-सज्जादिया, 1407 हिजरी, पेज 91-92
- ↑ जज़ाएरी, शरह अल-सहीफ़ा अल-सज्जादिया, 1402 हिजरी, पेज 236-241
स्रोत
- अंसारीयान, हुसैन, दयारे आशेक़ान, तफ़सीर जामेअ सहीफ़ा सज्जादिया, तेहरान, पयाम आज़ादी, 1372 शम्सी
- जज़ाएरी, इज़्ज़ुद्दीन, शरह अल-सहीफ़ा अल-सज्जादिया, बैरूत, दार उत तआरुफ लिलमतबूआत, 1402 हिजरी
- दाराबी, मुहम्मद बिन मुहम्मद, रियाज़ अल आरेफ़ीन फ़ी शरह अल सहीफ़ा सज्जादिया, शोधः हुसैन दरगाही, तेहरान, नशर उस्वा, 1379 शम्सी
- फ़ज़्लुल्लाह, सय्यद मुहम्मद हुसैन, आफ़ाक़ अल-रूह, बैरूत, दार उल मालिक, 1420 हिजरी
- फ़हरि, सय्यद अहमद, शरह व तरजुमा सहीफ़ा सज्जादिया, तेहरान, उस्वा, 1388 शम्सी
- फ़ैज़ काशानी, मुहम्मद बिन मुर्तज़ा, तालीक़ात अलस सहीफ़ा अल-सज्जादिया, तेहरान, मोअस्सेसा अल बुहूस वत तहक़ीक़ात अल सक़ाफ़ीया, 1407 हिजरी
- मदनी शिराज़ी, सय्यद अली ख़ान, रियाज उस-सालेकीन फ़ी शरह सहीफ़ा तुस साजेदीन, क़ुम, मोअस्सेसा अल-नश्र उल-इस्लामी, 1435 हिजरी
- मुग़्निया, मुहम्मद जवाद, फ़ी ज़िलाल अल-सहीफ़ा सज्जादिया, क़ुम, दार उल किताब उल इस्लामी, 1428 हिजरी
- ममदूही किरमानशाही, हसन, शुहूद व शनाख़्त, तरजुमा व शरह सहीफ़ा सज्जादिया, मुकद्मा आयतुल्लाह जवादी आमोली, क़ुम, बूस्तान किताब, 1388 शम्सी