तक़वा
| अख़्लाक़ी आयतें | |
|---|---|
| आयात ए इफ़्क • आय ए उख़ूव्वत • आय ए इत्आम • आयत ए नबा • आय ए नजवा • आय ए बिर्र • आय ए इस्लाह ज़ात अल-बैन • आय ए ईसार | |
| अख़्लाक़ी हदीसें | |
| हदीस ए क़ुर्ब अल नवाफ़िल • हदीसे मकारिम अल-अख़लाक़ • हदीसे मेअराज | |
| अख़लाक़ी गुण | |
| विनम्रता • संतोष • उदारता • कज़्मे ग़ैज़ • इख़्लास • ईश्वर का भय • हिल्म • ज़ोहद • साहस • शुद्धता • इंसाफ़ • इस्लाह ज़ात अल-बैन | |
| अख़लाक़ी दोष | |
| अभिमान • हिर्स • हसद • झूठ • चुगली करना • नामिमा (कहानी सुनाना) • लाछन लगाना • कंजूसी • आक़े वालेदैन • उज्ब • दोष ढूँढना • क़तए रहम • गप करना • कृतघ्नता | |
| अख़लाक़ी शब्द | |
| आत्म जिहाद • नफ़्से लव्वामा • नफ़्से अम्मारा • नफ़्से मुतमइन्ना • मुहासबा • मुराक़ेबा • पाप • इस्तिदराज | |
| अख़्लाक़ी विद्वान | |
| मुहम्मद महदी नराक़ी • मुल्ला अहमद नराक़ी • मिर्ज़ा जवाद मलेकी तबरीज़ी • सय्यद अली क़ाज़ी • सय्यद रज़ा बहाउद्दीनी • अब्दुल करीम हक़ शेनास • मुहम्मद तक़ी बहजत • अली अकबर मिशकीमी • हुसैन मज़ाहिरी | |
| अख़लाक़ी संसाधन | |
| क़ुरआन • नहज अल बलाग़ा • मकारिम अल अख़्लाक़ • जामेअ अल-सआदात • मेराज अल सआदा • मुराक़ेबात | |
तक़वा, मनुष्य की आत्मा की एक ऐसी अवस्था या शक्ति है, जो उसे आध्यात्मिक और नैतिक सुरक्षा प्रदान करती है। इस प्रकार जब कोई व्यक्ति पाप के वातावरण में भी रहता है, तो उसके भीतर मौजूद यह आध्यात्मिक अवस्था और आत्मिक शक्ति उसे पाप से सुरक्षित रखती है। क़ुरआन, पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (स) की रिवायतों, शिया इमामों की शिक्षाओं और धार्मिक विद्वानों के कथनों में तक़वा के महत्व पर विशेष ज़ोर दिया गया है। साथ ही, सांसारिक जीवन और आख़िरत में तक़वा के अनेक प्रभाव और लाभ का वर्णन किया गया हैं। विद्वानों ने तक़वा के प्रभावों में पापो की क्षमा, अल्लाह के निकट कर्मो की स्वीकृति, मुक्ति और सफलता प्राप्त होना, सत्य और असत्य के बीच अंतर करने की शक्ति मिलना, हलाल जीवीका प्राप्त होना तथा कठिनाइयों से छुटकारा मिलना आदि को सम्मिलित किया है।
इस विषय पर बहुत सी हदीसों के अलावा नहजुल बलाग़ा के उपदेश नंबर 193 जिसे हमाम उपदेश या मुत्तक़ीन उपदेश कहा जाता है, में परहेज़गार लोगों के गुणों और विशेषताओं का विस्तार से वर्णन किया गया है।
तक़वा के भी अलग-अलग वर्ग हैं। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से वर्णित एक हदीस में तक़वा के तीन वर्ग बताए गए हैं। पहला सार्वजनिक तक़वा है, जिसमें व्यक्ति नर्क के पीड़ा के डर से हराम कामों से बचता है। दूसरा विशेष तक़वा है, जिसमें व्यक्ति केवल हराम कामों से ही नहीं, बल्कि उन संदिग्ध कार्यों से भी बचता है, जिनके हराम होने की संभावना हो। तीसरा ख़ासुल-ख़ास (अति-विशिष्ट) तक़वा है। इस दर्जे में व्यक्ति संदिग्ध और हराम कार्यों से बचने के साथ-साथ कुछ ऐसे हलाल कामों को भी छोड़ देता है, जिनसे उसके आध्यात्मिक स्तर में कमी आने की आशंका हो।
इसी प्रकार, धर्मगुरुओं ने रिवायतों के आधार पर शरीर के प्रत्येक उस अंग के लिए, जो पाप में पड़ सकता है, जैसे कान, आँख, ज़बान और दिल, उस अंग के अनुरूप उसका तक़वा (परहेज़गारी) का उल्लेख किया है।
महत्व
तक़वा धार्मिक शब्दावली में बहुत प्रचलित और महत्वपूर्ण शब्द है। क़ुरआन में इसका प्रयोग संज्ञा और क्रिया, दोनों रूपों में बहुत अधिक हुआ है।[१] मुर्तज़ा मुतह्हरी के अनुसार, क़ुरआन में जिस प्रकार ईमान, नेक अमल, नमाज़ और ज़कात का उल्लेख हुआ है, लगभग उसी अनुपात में, बल्कि रोज़े के उल्लेख से भी अधिक, तक़वा का उल्लेख किया गया है।[२] कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार, क़ुरआन में स्वयं ‘तक़वा’ शब्द 17 बार आया है, जबकि इसके विभिन्न रूपों और समान मूल वाले शब्दों का प्रयोग 200 से अधिक बार हुआ है।[३] मासूमीन (अ) की रिवायतों में भी तक़वा शब्द का बहुत अधिक प्रयोग हुआ है।[४] मुहम्मद बिन याक़ूब कुलैनी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक अल-काफ़ी में ‘बाब अल तआ व अल तक़वा’ नाम से एक अध्याय निर्धारित करते हुए तक़वा से संबंधित हदीसों को संकलित किया है।[५]
नहजुल बलाग़ा में भी जिन शब्दों पर विशेष रूप से ज़ोर दिया गया है, उनमें ‘तक़वा’ प्रमुख है।[६] कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार, नहजुल बलाग़ा में तक़वा और इसके विभिन्न रूपों का प्रयोग लगभग 100 बार हुआ है और यह इमाम अली (अ) के कथनों में प्रयुक्त प्रमुख शब्दों में से एक है।[७] इस्लामी नैतिकता के विषय पर लिखी गई पुस्तकों में भी तक़वा और उसके प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की गई है।[८] इसी प्रकार सूफ़ियों और आरिफ़ों के कथनों में तक़वा को आध्यात्मिक साधना के एक महत्वपूर्ण स्थान के रूप में माना गया है। वहाँ इसका अर्थ और महत्व वरअ और दिल जैसी अवधारणाओं के साथ जुड़कर स्पष्ट होता है।[९]
न्यायविदों के कथनों में भी कुछ धार्मिक और शरीअती आदेशों के संदर्भ में तक़वा के स्थान और महत्व को स्पष्ट किया गया है।[१०] उदाहरण के लिए, न्यायविदों के फ़तवों के अनुसार, जुमा की नमाज़ के धर्मोउपदेश में इमामे जुमा के लिए लोगों को तक़वा की नसीहत करना अनिवार्य है।[११] इसी तरह कुछ न्यायविदों के अनुसार, यदि दो न्यायविद ज्ञान और विद्वत्ता की दृष्टि से समान हों, तो मुक़ल्लिद के लिए उस न्यायविद का अनुसरण (तक़लीद) करना अनिवार्य है, जो अधिक परहेज़गार और मुत्तक़ी हो।[१२]
परिभाषा
तक़वा व्यक्ति के भीतर पैदा होने वाली ऐसी अवस्था है, जो उसे आध्यात्मिक और नैतिक सुरक्षा प्रदान करती है। इसके कारण जब वह पाप के वातावरण में भी होता है, तब भी पाप करने से बचता है।[१३] शब्दकोश की दृष्टि से इसका अर्थ स्वयं को सुरक्षित रखना और अपने नफ़्स की सुरक्षा करना है।[१४]
क़ुरआन में तक़वा के अर्थ
तक़वा यह है कि यदि तुम्हारे कर्मों को एक खुली और पारदर्शी थाली में रखकर पूरी दुनिया में घुमाया जाए, ताकि लोग उन्हें देख सकें, तो उसमें ऐसी कोई चीज़ न हो जिससे तुम्हें शर्म या लज्जा महसूस हो।
शोधकर्ताओं ने क़ुरआन की आयतों के आधार पर तक़वा के चार अर्थ बताए हैं।[१५]
- सुरक्षा प्रदान करने वाली चीज़ः तक़वा अर्थात वह चीज़, जिसे व्यक्ति अपने और उस चीज़ के बीच रुकावट के रूप में रखता है, जिससे उसे भय होता है, ताकि वह उसके नुकसान से सुरक्षित रह सके।[१६] क़ुरआन की आयत وَجَعَلَ لَکُمْ سَرَابِیلَ تَقِیکُمُ الْحَرَّ (व जअला लकुम सराबीला तक़ीकुमुल हर्रा) अर्थात “और उसने तुम्हारे लिए ऐसे वस्त्र बनाए, जो तुम्हें गर्मी से बचाते हैं”,[१७] में तक़वा इसी अर्थ में प्रयोग हुआ है।[१८] इज़ुत्सु Toshihiko Izutsu के अनुसार इस्लाम से पहले भी अरबों के बीच यह शब्द इसी अर्थ मे प्रचलित था।[१९]
- अल्लाह के प्रकोप और आख़िरत के अज़ाब का भयः[२०] क़ुरआन की आयत وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ شَدِیدُ الْعِقَابِ (वत्तक़ुल्लाहा अन्नल्लाहा शदीदुल एक़ाब) अर्थात “अल्लाह से डरो, निश्चय ही अल्लाह की सज़ा बहुत कठोर है”,[२१] में तक़वा इसी अर्थ में आया है।[२२]
- आज्ञापालन करना और गुनाह से बचनाः[२३] क़ुरआन की आयत یَا أَیُّهَا الَّذِینَ آمَنُوا اتَّقُوا اللهَ وَلْتَنْظُرْ نَفْسٌ مَا قَدَّمَتْ لِغَدٍ (या अय्योहल लज़ीना आमनू इत्तक़ुल्लाहा वलतंज़ुर नफ़्सुन मा क़द्दमत ले ग़दिन) अर्थात “ऐ ईमान वालों! अल्लाह से डरो और हर व्यक्ति यह देखे कि उसने कल के लिए क्या आगे भेजा है”,[२४] में तक़वा इसी अर्थ में प्रयोग हुआ है।[२५]
- तक़वा का एक अन्य अर्थ दिल की एक ऐसी अवस्था और आत्मिक गुण है, जो मनुष्य को आज्ञापालन और पाप के प्रति गहरी समझ प्रदान करता है। इस अर्थ की प्राप्ति अल्लाह के आदेशों और निषेधों का पालन करने तथा उन्हें निरंतर व्यवहार में लाने पर निर्भर है।[२६]
कहा जाता है कि तक़वा के ये चारों अर्थ आपस में जुड़े हुए हैं और मिलकर तक़वा की पूरी अवधारणा को स्पष्ट करते हैं। इसका अर्थ यह है कि अल्लाह के अज़ाब का भय, यानी आख़िरत में अल्लाह के प्रकोप और दंड का डर, इंसान को अल्लाह के आदेशों का पालन करने और उसकी मनाही की गई चीज़ों से बचने के लिए प्रेरित करता है।(तीसरा अर्थ) इस तरह व्यक्ति अपने और अल्लाह के प्रकोप तथा अज़ाब के बीच एक सुरक्षा का साधन बना लेता है।(पहला अर्थ) इसके बाद अल्लाह के आदेशों और निषेधों का लगातार पालन करते रहने से धीरे-धीरे तक़वा एक स्थायी आध्यात्मिक गुण के रूप में मोमिन के दिल में बस जाता है (चौथा अर्थ)।[२७]
तक़वा और वरअ का संबंध
अल्लाह का तक़वा तुम्हारे दिलों की बीमारियों की दवा है, दिलों की दृष्टि को प्रकाश देने वाला है, शारीरिक रोगों के लिए उपचार है, आत्माओं के विकारों को सुधारने वाला है, रूहों की अशुद्धियों से पवित्र करने वाला है, आँखों की अंधता को दूर करने वाला है, बेचैनी और व्याकुलता से सुरक्षा प्रदान करने वाला है तथा तुम्हारी अंधकारमय स्थितियों को प्रकाश से भर देने वाला है।
कुछ हदीसों में तक़वा और वरअ का उल्लेख एक साथ किया गया है।[२८] मुहम्मद महदी नराक़ी ने इन दोनों को समान अर्थ वाला माना है।[२९] उन्होंने वरअ के दो अर्थ बताए हैं, जो तक़वा पर भी लागू होते हैं। पहला अर्थ यह है कि वरअ का मतलब हराम माल से अपने आपको बचाना है। नराक़ी के अनुसार, कुछ हदीसों में तक़वा का अर्थ भी यही बताया गया है। दूसरा अर्थ यह है कि अल्लाह के क्रोध के भय और उसकी प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए इंसान सभी पापो से अपने आपको बचाए।[३०]
चौदहवीं शताब्दी हिजरी के सीरिया के हनफ़ी विद्वान अब्दुल क़ादिर मुल्ला हुवैश आले ग़ाज़ी जैसे विद्वानो ने इसके विपरीत वरअ को तक़वा से अलग और उससे ऊंचा दर्जा माना है।[३१] उनके अनुसार, तक़वा का अर्थ हराम कामों से बचना और अल्लाह के अनिवार्य आदेशों को पूरा करना है, जबकि वरअ इससे ऊंचा दर्जा है। इसका अर्थ उन संदिग्ध कामों से बचना और उन हलाल कामों को भी छोड़ देना है, जिनसे आगे चलकर पापों मे लिप्त होने की संभावना हो।[३२]
तक़वा के बारे में क़ुरआन, हदीस और विद्वानों के कुछ कथन
सूर ए हुजरात की आयत 13 में इंसान की श्रेष्ठता और मूल्य का आधार अल्लाह के तक़वा को अपनाना।[३३] सूर ए बक़रा की आयत 197 के अनुसार, आख़िरत के लिए सबसे अच्छा आध्यात्मिक सामान तक़वा[३४] तथा सूर ए आराफ़ की आयत 26 में शरीर के कपड़ों का उल्लेख करने के बाद तक़वा को आत्मा का वस्त्र और सबसे बेहतर तथा आवश्यक वस्त्र बताया गया है।[३५]
नहजुल बलाग़ा के उपदेश संख्या 114 में इमाम अली (अ) से वर्णित है कि अल्लाह का तक़वा उसके दोस्तों को अपनी सुरक्षा में रखता है, उन्हें अल्लाह की हराम की हुई सीमाओं का उल्लंघन करने से रोकता है और उनके दिलों में अल्लाह का भय बनाए रखता है।[३६] उपदेश संख्या 16 में इमाम अली (अ) ने तक़वा की तुलना ऐसे आज्ञाकारी और तेज़ चलने वाले घोड़ों से की है, जिनकी लगाम उनके सवारों के हाथ में होती है और जो उन्हें स्वर्ग तक पहुंचाते हैं।[३७] उपदेश संख्या 189 में इमाम अली (अ) ने फ़रमाया है कि इस दुनिया में तक़वा इंसान के लिए एक मज़बूत किले और सुरक्षा की ढाल है, जबकि आख़िरत में यही स्वर्ग तक पहुंचने का रास्ता है।[३८] उपदेश संख्या 228 में तक़वा को सत्य और सही मार्ग की कुंजी, क़यामत के दिन के लिए संचित पूंजी, ग़ुलामी की ज़ंजीरों से मुक्ति और हर प्रकार की बदबख़्ती से छुटकारे का साधन बताया गया है।[३९] इमाम सज्जाद (अ) ने तक़वा को इंसानी सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करने का कारण बताया है।[४०] सहीफ़ा-ए-सज्जादिया की कुछ दुआओं में उन्होंने अल्लाह की बारगाह से तक़वा प्राप्त होने का आग्रह किया है।[४१]
पैग़म्बर (स) से वर्णित एक हदीस में तक़वा को सभी भलाइयों का संग्रह बताया गया है।[४२] इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) से वर्णित है कि अल्लाह के सबसे प्रिय बंदे वे हैं, जो सबसे अधिक परहेज़गार हैं।[४३] एक अन्य हदीस में उन्होंने वास्तविक शियों की पहचान यह बताई है कि वे अल्लाह का तक़वा अपनाते हैं।[४४] इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से वर्णित एक हदीस के अनुसार, तक़वा के साथ किया गया थोड़ा-सा अमल उस बहुत अधिक अमल से बेहतर है, जिसमें तक़वा न हो।[४५] दुआ-ए-नुदबा के एक अंश में लोगों को अल्लाह और उसके तक़वा के आधार पर एकजुट करना इमाम महदी (अ) की हुकूमत की विशेषताओं में से एक बताया गया है।[४६] भाषाविद् राग़िब इस्फ़हानी (मृत्यु 396 हिजरी) ने अपनी पुस्तक अल-ज़रीआ इला मकारिम अल शरीआ में तक़वा और आत्मशुद्धि को इंसान के ख़लीफ़तुल्लाही बनने की मूल शर्त बताया है।[४७] उद्दा अल दाई में तक़वा के महत्व को बताते हुए इब्ने फ़हद हिल्ली ने कहा है कि यदि संसार में इंसान के लिए तक़वा से बढ़कर कोई बेहतर, अधिक लाभदायक और उच्च दर्जे वाली विशेषता होती, तो अल्लाह वही के माध्यम से अपने बंदों को अवश्य बता देता।[४८] जामेअ अल सादात मे मुहम्मद महदी नराक़ी ने तक़वा को इंसान का सबसे बड़ा रक्षक और सआदत तथा ऊंचे आध्यात्मिक दर्जों तक पहुंचने के सबसे महत्वपूर्ण साधनों में से एक बताया है।[४९] शरहे चहल हदीस में इमाम ख़ुमैनी ने कहा है कि तक़वा के बिना इंसान के लिए उच्च आध्यात्मिक दर्जे और महान मानवीय गुणों को प्राप्त करना संभव नहीं है।[५०]
तक़वा के स्तर
अल्लाह की क़सम! हमारा शिया वह नहीं है, सिवाय उसके जो अल्लाह का तक़वा अपनाए और उसकी आज्ञा का पालन करे... अल्लाह का तक़वा अपनाओ और अल्लाह के लिए अमल करो। अल्लाह और उसके किसी बंदे के बीच कोई रिश्तेदारी नहीं है। बल्कि अल्लाह के निकट सबसे प्रिय और सम्मानित बंदे वही हैं जो सबसे अधिक परहेज़गार हैं और उसकी आज्ञा का सबसे अधिक पालन करने वाले हैं।
कुछ व्याख्याकारों ने क़ुरआन की उन आयतों को ध्यान में रखते हुए, जैसे आयत اِنَّ اَکرَمَکُم عِندَ اللّهِ اَتقـکُم (इन्ना अकरमकुम इंदल्लाहे अत्क़ाकुम) अर्थात “निश्चय ही अल्लाह के निकट तुममें सबसे अधिक सम्मानित वही है, जो सबसे अधिक परहेज़गार है”,[५१] कहा है कि तक़वा के अलग-अलग स्तर होते हैं।[५२] इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से वर्णित एक हदीस में तक़वा के तीन स्तर बताए गए हैं:
- सार्वजनिक तक़वा: इसमें इंसान नर्क के अज़ाब के डर से हराम कामों को छोड़ देता है।
- विशेष तक़वा: इसमें इंसान केवल हराम कामों से ही नहीं, बल्कि उन संदिग्ध कामों से भी बचता है, जिनके हराम होने की संभावना हो।
- ख़ासुल-ख़ास (अति-विशिष्ट) तक़वा: इस दर्जे में इंसान संदिग्ध कामों के साथ-साथ कुछ हलाल कामों को भी छोड़ देता है।[५३]
सातवीं और आठवीं शताब्दी हिजरी के क़ुरआन के व्याख्याकार और शाफ़ेई न्यायविद बैज़ावी ने भी तक़वा के तीन स्तरों का वर्णन करते हुए लिखा है कि सबसे निचला स्तर शिर्क से बचना है। इसके बाद का स्तर पापों से बचना है। सर्वोच्च चरण अल्लाह के सामने पूरी तरह समर्पित हो जाना और हर उस चीज़ से दूर रहना है, जो इंसान को सत्य के मार्ग से रोकती है।[५४] अल्लामा मजलिसी ने भी अपनी पुस्तक बिहार उल अनवार में तक़वा के तीन चरण बताए हैं। पहला चरण सही विश्वास और सही धार्मिक मान्यताओं को अपनाकर अपने आपको हमेशा के अज़ाब से बचाना है। दूसरा चरण हर प्रकार के गुनाह से बचना है, जिसमें किसी वाजिब काम को छोड़ना और किसी पाप को करना दोनों शामिल हैं। तथा सबसे ऊंचा चरण यह है कि इंसान अपने दिल को हर उस चीज़ में उलझने से बचाए, जो उसे अल्लाह से दूर कर देती है।[५५]
आदाब अल सलामत में इमाम ख़ुमैनी ने तक़वा के चार स्तर बताए हैं:
- बाहरी तक़वा: अपने आपको खुले तौर पर किए जाने वाले गुनाहों से बचाना। यह आम लोगों का तक़वा है।
- आंतरिक तक़वा: नैतिक गुणों और आत्मिक इच्छाओं में अति, कमी और संतुलन की सीमा से आगे बढ़ने से बचना। यह विशेष लोगों का तक़वा है।
- बौद्धिक तक़वा: अपनी बुद्धि को गैर-ईश्वरीय ज्ञान में उलझने से बचाना और उसे शुद्ध रखना। यह विशेष लोगों में भी सबसे विशेष लोगों का तक़वा है।
- दिल का तक़वा: अपने दिल को अल्लाह के अलावा किसी और की ओर ध्यान लगाने और किसी अन्य के बारे में मनन करने से बचाना। यह अल्लाह के ख़ास बंदों और औलिया का तक़वा है।[५६]
शरीर और दिल का तक़वा
नैतिकता के विद्वानों ने नैतिकता से संबंधित वर्णित रिवायतों को ध्यान में रखते हुए शरीर के प्रत्येक उस अंग के लिए, जो पाप में पड़ने की संभावना रखता है, उस अंग के अनुरूप तक़वा का एक रूप बताया है। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
- ज़बान का तक़वा: इसमें सच्ची बात कहना,[५७] ज़बान पर अल्लाह का ज़िक्र जारी रखना,[५८] नर्मी और शालीनता के साथ बात करना,[५९] अच्छी बात कहना, ज़बान को गाली-गलौज से रोकना और ऐसी बेकार बातें छोड़ देना जिनमें कोई भलाई न हो, शामिल हैं।[६०]
- आँखों का तक़वा: हर उस चीज़ से अपनी निगाहें नीची रखना जिसे अल्लाह ने हराम किया है।[६१]
- कानों का तक़वा: ऐसी हर चीज़ सुनने से अपने कानों को रोकना जिसे अल्लाह ने हराम किया है,[६२] और साथ ही लाभदायक ज्ञान,[६३] धर्म से संबंधित उपयोगी ज्ञान और लाभकारी तथा मुक्ति दिलाने वाली नसीहतों को ध्यान से सुनना।[६४]
- हृदय का तक़वा: सूर ए हज की आयत 32 और सूर ए हुजरात की आयत 3 में, तथा मासूम इमामों (अ) से वर्णित रिवायतों में, इंसान के हृदय को तक़वा का स्थान बताया गया है।[६५] इसी कारण कुछ विद्वानों ने कहा है कि तक़वा एक आध्यात्मिक और आंतरिक गुण है, जिसका संबंध इंसान की आत्मा और उसके नफ़्स से है।[६६] साथ ही कुछ विद्वानों का मत है कि हृदय का तक़वा का अर्थ यह है कि इंसान का हृदय संदेह, शिर्क, कुफ़्र और पाखंड से खाली हो।[६७] कुछ विद्वानों ने दिल के तक़वा को तक़वा का सर्वोच्च दर्जा माना है।[६८]
तक़वा के प्रभाव
मुस्लिम विद्वानों ने क़ुरआन की आयतों और मासूम इमामों (अ) से वर्णित रिवायतों को ध्यान में रखते हुए तक़वा के कई प्रभाव बताए हैं। उनमें से कुछ प्रभाव इस प्रकार हैं:
- सही और गलत के बीच पहचान करने की क्षमता प्राप्त होना।[६९]
- अल्लाह के पास कर्मों का स्वीकार होना।[७०]
- अल्लाह की शिक्षाओं से लाभ उठाना।[७१]
- कठिनाइयों से मुक्ति मिलना।[७२]
- क़ुरआन के मार्गदर्शन से लाभ उठाना।[७३]
- पापों की क्षमा होना।[७४]
- सफलता और मुक्ति प्राप्त करना।[७५]
- ऊँचा और सम्मानित स्थान प्राप्त करना।[७६]
- हृदय का सुधार होना।[७७]
- शंकाओं और संदेहों में पड़ने से बचना।[७८]
- पाप की गंदगी से पवित्र होना।[७९]
- हलाल रोज़ी और आजीविका प्राप्त होना।[८०]
- स्वर्ग में हमेशा के लिए रहना।[८१]
ख़ुत्बा-ए-मुत्तक़ीन
ख़ुत्बा-ए-मुत्तक़ीन नहजुल बलाग़ा के प्रसिद्ध ख़ुत्बों में से एक है, जिसमें परहेज़गार लोगों के गुणों का वर्णन किया गया है।[८२] इमाम अली (अ) ने हम्माम नामक अपने एक शिया की विनती पर यह ख़ुत्बा बयान किया। इसमें उन्होंने तक़वा रखने वाले लोगों के सौ से अधिक आध्यात्मिक, वैचारिक, नैतिक और व्यावहारिक गुणों का वर्णन किया है।[८३] अच्छी बातें करना, संतुलित जीवन अपनाना, लाभदायक ज्ञान को ध्यान से सुनना, कठिनाइयों के सामने धैर्य रखना, ज़बान पर नियंत्रण रखना, हर स्थिति में अल्लाह को याद करना तथा तहज्जुद और रात में जागकर इबादत करना उन गुणों में शामिल हैं, जिन्हें इस ख़ुत्बे में मुत्तक़ीन लोगों की विशेषताओं के रूप में बताया गया है।[८४]
फ़ुटनोट
- ↑ मुतह्हरी, दह गुफ़्तार, पृष्ठ 16।
- ↑ मुतह्हरी, दह गुफ़्तार, पृष्ठ 16।
- ↑ अब्बासी, «تقوا», पृष्ठ 797।
- ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 2, पृष्ठ 73; अल्लामा मजलिसी, बिहार अल अनवार, खंड 70, पृष्ठ 295; नूरी, मुस्तदरक अल वसाइल, खंड 11, पृष्ठ 266।
- ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 2, पृष्ठ 73।
- ↑ मुतह्हरी, दह गुफ़्तार, पृष्ठ 23।
- ↑ अहमदियान, सईदावी, «تحلیل معنایی درجات تقوا در نهج البلاغه», पृष्ठ 69।
- ↑ नराक़ी, जामेअ अल सआदात, खंड 2, पृष्ठ 180; इमाम ख़ुमैनी, शरहे चेहल हदीस, पृष्ठ 206 व 325।
- ↑ इब्ने अरबी, फुतूहाते मक्किय्या, खंड 2, पृष्ठ 157; अब्बासी, «تقوا در تصوف و عرفان», , पृष्ठ 803।
- ↑ नजफ़ी, जवाहिर अल कलाम, खंड 11, पृष्ठ 211; यज़्दी तबातबाई, अल उर्वतुल वुस्क़ा, खंड 1, पृष्ठ 19।
- ↑ नजफ़ी, जवाहिर अल कलाम, खंड 11, पृष्ठ 211।
- ↑ यज़्दी तबातबाई, अल उर्वतुल वुस्क़ा, खंड 1, पृष्ठ 19।
- ↑ मुतह्हरी, दह गुफ़्तार, पृष्ठ 20-21।
- ↑ राग़िब इस्फ़हानी, अल-मुफ़रदात फ़ी ग़रीब अल क़ुरआन, «वक़ेया» शब्द के तहत।
- ↑ इज़ुत्सू, ख़ुदा व इंसान दर क़ुरआन, अनुवाद: अहमद आराम, पृष्ठ 304-305; जलीली, तक़वा, सक़्क़ू-ए परवाज़, पृष्ठ 17।
- ↑ इज़ुत्सू, ख़ुदा व इंसान दर क़ुरआन, अनुवाद: अहमद आराम, पृष्ठ 305।
- ↑ सूर ए नहल, आयए 81।
- ↑ जलीली, तक़वा, सक़्क़ू-ए परवाज़, पृष्ठ 17।
- ↑ इज़ुत्सू, ख़ुदा व इंसान दर क़ुरआन, अनुवाद: अहमद आराम, पृष्ठ 304-305।
- ↑ इज़ुत्सू, ख़ुदा व इंसान दर क़ुरआन, अनुवाद: अहमद आराम, पृष्ठ 304।
- ↑ सूर ए मायदा, आयत 2।
- ↑ तबरी, तफ़्सीर ए तबरी, खंड 9, पृष्ठ 491; तबरसी, मजमा उल बयान, खंड 3, पृष्ठ 267।
- ↑ जलीली, तक़वा, सक़्क़ू-ए परवाज़, पृष्ठ 17।
- ↑ सूर ए हश्र, आयत 18।
- ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान फ़ी तफ़्सीर अल क़ुरआन, खंड 19, पृष्ठ 217-218।
- ↑ अब्बासी, «تقوا», खंड 7, पृष्ठ 798।
- ↑ अब्बासी, «تقوا», पृष्ठ 799।
- ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 2, पृष्ठ 76 व 78।
- ↑ नराक़ी, जामेअ अल सआदात, खंड 2, पृष्ठ 180।
- ↑ नराक़ी, जामेअ अल सआदात, खंड 2, पृष्ठ 180।
- ↑ मुल्ला हुवैश आले ग़ाज़ी, बयान अल मआनी, खंड 3, पृष्ठ 55।
- ↑ मुल्ला हुवैश आले ग़ाज़ी, बयान अल मआनी, खंड 3, पृष्ठ 55।
- ↑ सूर ए हुजरात, आयत 13; मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर नमूना, खंड 22, पृष्ठ 210।
- ↑ सूर ए बक़रा, आयत 197; मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर नमूना, खंड 15, पृष्ठ 299।
- ↑ सूर ए आराफ़, आयत 26; मुतह्हरी, दह गुफ़्तार, पृष्ठ 27।
- ↑ नहजुल बलाग़ा, संशोधन: सुब्ही सालेह, ख़ुत्बा 114, पृष्ठ 169; मुतह्हरी, दह गुफ़्तार, पृष्ठ 23।
- ↑ नहजुल बलाग़ा, संशोधन: सुब्ही सालेह, ख़ुत्बा 16, पृष्ठ 57; मुतह्हरी, दह गुफ़्तार, पृष्ठ 24।
- ↑ नहजुल बलाग़ा, संशोधन: सुब्ही सालेह, ख़ुत्बा 191, पृष्ठ 284।
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स्रोत
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