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प्रारूप:सूरह बक़रा आयत 219

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सूरह बक़रा की आयत 157
सूरह में उपस्थितसूर ए बक़रा
आयत की संख़्या219
पारा2
शाने नुज़ूलकुछ सहाबा द्वारा शराब और जुए के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में...
नुज़ूल का स्थानमदीना
विषयशराब और जुए का हराम होना; इंफ़ाक़ करने की मात्रा
सम्बंधित आयातआयत 90 और 91 सूरह मायदा; सूरह निसा की आयत 43


सूरह बक़रा की आयत 219, दो प्रश्नों के उत्तर में अवतरित (नाज़िल) हुई है। इनमें से एक प्रश्न शराब और जुए के बारे में था और दूसरा खर्च करने (इन्फ़ाक़) के बारे में। आयत में शराब और जुए के कुछ लाभों की ओर संकेत करते हुए उनके पाप को उनके लाभ से बहुत बड़ा बताया गया है। इसी प्रकार, यह भी बताया गया है कि क्या चीज़ खर्च की जा सकती है और इसके लिए «अफ़्व» को मापदंड बताया गया है। तफ़सीरों में «अफ़्व» का अर्थ संतुलन या आवश्यकता से अधिक माल को खर्च करना बताया गया है।

शिया न्यायविदों ने इस आयत के आधार पर शराब और जुए के हराम होने का फ़तवा दिया है और «ख़म्र» को हर नशीले तरल पदार्थ के लिए व्यापक माना है। कुछ टीकाकारों ने क़ुरआन में शराब के हराम होने को क्रमिक रूप से लागू होने वाला आदेश माना है और शराब के हराम होने से संबंधित आयतों में इस आयत को भी शामिल किया है। आयत 219 का हवाला शराब के नुक़सानों, लाभ और हानि के बीच टकराव तथा खर्च करने की सीमा जैसे विषयों में भी दिया गया है।

आयत का संक्षिप्त परिचय और इस्लामी विषयों में इसका महत्व

सूरह बक़रा की आयत 219 कुछ सहाबा द्वारा पैग़म्बर (स.) से शराब और जुए तथा खर्च करने (इंफ़ाक़) के मापदंड के बारे में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में अवतरित (नाज़िल) हुई है।[१] इस आयत में शराब और जुए के भौतिक लाभों की तुलना में उनके नुक़सानों को प्राथमिकता दी गई है और बताया गया है कि उनका पाप उनके लाभ से बड़ा है।[२] अल्लामा तबातबाई, अल-मीज़ान के लेखक, के अनुसार क़ुरआन में «इस्मुन कबीर» अर्थात “बड़ा पाप” की अभिव्यक्ति केवल शराब और जुए के संबंध में प्रयुक्त हुई है।[३] जवादी आमोली ने तफ़्सीर-ए तस्नीम में रिवायतों के आधार पर शराब पीने के सांसारिक और परलोकी प्रभावों तथा परिणामों, मजबूरी की स्थिति में शराब पीने के हुक्म और जानवरों को शराब पिलाने की कराहत का उल्लेख किया है।[४]

आयत के अंतिम भाग में कुछ सहाबा के इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है कि कितना इन्फ़ाक़ किया जाए और मोमिनों को चिंतन करने के लिए आमंत्रित किया गया है।[५] कुछ रिपोर्टों के अनुसार, मुसलमानों का एक समूह इन्फ़ाक़ करने में इतनी अधिकता करता था कि स्वयं ज़रूरतमंद हो जाता था।[६] इसलिए इस आयत के अवतरित होने के बाद उन्हें खर्च करने में संतुलन अपनाने का आह्वान किया गया।[७] तफ़्सीरी रिवायतों में «अफ़्व» का अर्थ बिना इसराफ़ (फ़िज़ूलख़र्ची) के संतुलित रूप से खर्च करना तथा वर्षभर के खर्च से बचा हुआ माल बताया गया है।[८] हालांकि कुछ टीकाकारों ने «अफ़्व» का अर्थ दूसरों की गलतियों को क्षमा करना बताया है और दूसरों को क्षमा करना सबसे अच्छा इन्फ़ाक़ माना है।[९]

يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْخَمْرِ وَالْمَيْسِرِ قُلْ فِيهِمَا إِثْمٌ كَبِيرٌ وَمَنَافِعُ لِلنَّاسِ وَإِثْمُهُمَا أَكْبَرُ مِنْ نَفْعِهِمَا وَيَسْأَلُونَكَ مَاذَا يُنْفِقُونَ قُلِ الْعَفْوَ كَذَلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ

यस्-अलूनका अनिल-ख़म्रि वल-मैसिरे, क़ुल फ़ीहिमा इस्मुन कबीरुन व मनाफ़िउ लिन्नासे, व इस्मूहुमा अक्बरो मिन नफ़्इहिमा, व यस-अलूनका माज़ा युनफ़िक़ूना, क़ुलिल-अफ़्व, कज़ालिका युबय्यिनुल्लाहो लकुमुल-आयाते लअल्लकुम ततफ़क्करून।


सूर ए बक़रा आयत 219


अनुवाद: वे तुमसे शराब और जुए के बारे में पूछते हैं। कह दो: उन दोनों में बड़ा पाप है और लोगों के लिए कुछ लाभ भी हैं, लेकिन उनका पाप उनके लाभ से बड़ा है। और वे तुमसे पूछते हैं कि क्या खर्च करें। कह दो: जो आवश्यकता से अधिक हो। इसी प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है, ताकि तुम चिंतन करो।

सूरह बक़रा की आयत 219 का विभिन्न विषयों में भी हवाला दिया गया है; जैसे चिकित्सा के क्षेत्र में शराब से होने वाले शारीरिक नुक़सानों,[१०] तर्कशास्त्र में तर्क करने की पद्धति और उत्तम वाद-विवाद,[११] अर्थशास्त्र में भौतिक लाभ और परलोकी लाभों के बीच टकराव,[१२] नैतिकता में व्यवहार संबंधी परिणाम[१३] और नागरिक क़ानून में जुए की हराम होने के विषय में।[१४]

शराब के हराम होने पर आयत की दलील

अल-काफ़ी में कुछ सहाबा के हवाले से सूरह बक़रा की आयत 219 को शराब के हराम होने से संबंधित पहली आयत बताया गया है। कुलैनी द्वारा वर्णित एक रिवायत के आधार पर इमाम काज़िम (अ) ने इस आयत तथा शराब से संबंधित अन्य आयतों के आधार पर तत्कालीन अब्बासी ख़लीफ़ा महदी अब्बासी के सामने शराब के हराम होने को स्पष्ट किया।[१५]

शिया न्यायविदों में से फ़ाज़िल मिक़दाद ने इस आयत के आधार पर ख़म्र और हर नशीले तरल पदार्थ के हराम होने पर दलील प्रस्तुत की है और इस हुक्म को इज्माई ((सर्वसम्मत)) माना है।[१६] शिया टीकाकारों ने भी इस आयत में प्रयुक्त शब्द «ख़म्र» को हर नशीले तरल पदार्थ के लिए व्यापक माना है, जिसमें अंगूर, खजूर और किशमिश से बने नशीले पदार्थ भी शामिल हैं।[१७]

शराब के हराम होने में क़ुरआन की क्रमिक पद्धति

जाहिलियत के दौर में शराब और जुए की आर्थिक स्थिति तथा इस्लाम द्वारा इनके विरुद्ध किए गए संघर्ष के कारण इन दोनों के बारे में लगातार प्रश्न किए जाते थे।[१८] शिया टीकाकार अल्लामा तबातबाई के अनुसार, सूरह बक़रा की आयत 219 शराब के हराम होने पर दलील देती है, लेकिन इसमें इसका उल्लेख स्पष्ट रूप से नहीं हुआ है। उनके अनुसार, क़ुरआन की कई आयतों में शराब पीने के हराम होने का आदेश क्रमिक रूप से और बढ़ती हुई स्पष्टता के साथ बयान हुआ है। इनमें यही आयत, सूरह आराफ़ की आयत 33, सूरह निसा की आयत 43 और सूरह मायदा की आयत 90 शामिल हैं।[१९] अब्दुल्लाह जवादी आमोली ने भी हराम होने के स्पष्ट आदेश के बयान में देरी को इस्लाम के आरंभिक दौर के समाज की सांस्कृतिक परिस्थितियों से संबंधित माना है।[२०]

इसके विपरीत, मुहम्मद अब्दुह जैसे कुछ सुन्नी टीकाकार तफ़्सीर अल-मनार में मानते हैं कि यह आयत शराब के हराम होने की ओर संकेत नहीं करती। उनके अनुसार «इस्म» का अर्थ हानि है और इस आधार पर ऐसी चीज़ जिसमें लाभ और हानि दोनों हों, उस चरण में हराम नहीं की गई थी; शराब के हराम होने का आदेश बाद की आयतों में आया है।[२१] जवादी आमोली ने इस दृष्टिकोण के उत्तर में सूरह मायदा की आयत 90 का हवाला दिया है, जिसमें शराब और जुए को पूर्ण रूप से अपवित्र तथा शैतान का काम बताया गया है।[२२] उन्होंने कहा है कि आयत 219 में लाभों का उल्लेख लोगों की दृष्टि में उनके लाभदायक होने की धारणा की ओर संकेत करता है।[२३]

जुआ और उसका न्यायशास्त्रीय हुक्म

सूरह बक़रा की आयत 219 में «मैसिर» शब्द की व्याख्या जुआ के रूप में की गई है।[२४] न्यायविदों ने इस आयत के आधार पर जुए के हराम होने का फ़तवा दिया है।[२५] जवादी आमोली के अनुसार, इस आयत और अन्य आयतों में जुए को अपवित्र, शैतानी कार्य, बड़ा पाप और फ़ितने का कारण जैसी अभिव्यक्तियों के साथ वर्णित किया गया है।[२६] शिया टीकाकार अय्याशी ने दो रिवायतें बयान की हैं, जिनमें नर्द (बैकगैमोन), शतरंज और अखरोट से खेलने को जुए के उदाहरणों में शामिल किया गया है।[२७]

फ़ुटनोट

  1. ↑ तबरसी, मजमा उल-बयान, खंड 2, पृष्ठ 557।
  2. ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर-ए नमूना, खंड 2, पृष्ठ 118।
  3. ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 2, पृष्ठ 195।
  4. ↑ जवादी आमोली, तफ़्सीर-ए तस्नीम, खंड 11, पृष्ठ 97–124।
  5. ↑ रज़ाई इस्फ़हानी, तफ़्सीर-ए मेहर, खंड 2, पृष्ठ 185।
  6. ↑ सियूती, अद-दुर्रुल-मंसूर, खंड 1, पृष्ठ 253।
  7. ↑ जवादी आमोली, तफ़्सीर-ए तस्नीम, खंड 11, पृष्ठ 91–92।
  8. ↑ अय्याशी, तफ़्सीर-ए अय्याशी, खंड 1, पृष्ठ 106; तबरसी, मजमा उल-बयान, खंड 2, पृष्ठ 558।
  9. ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर-ए नमूना, खंड 2, पृष्ठ 121।
  10. ↑ सादिक़ अब्दुर्रज़ा, अली, किताबुल-क़ुरआन वत-तिब्बुल-हदीस, पृष्ठ 86।
  11. ↑ शरीअती सब्ज़वारी, मुनाज़रा व तब्लीग़, पृष्ठ 129।
  12. ↑ हर्दान, अल-इक़्तिसादुल-इस्लामी, पृष्ठ 49 और 123।
  13. ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 2, पृष्ठ 192।
  14. ↑ ताहेरी, हुक़ूक़-ए मदनी, खंड 4, पृष्ठ 382।
  15. ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 6, पृष्ठ 406।
  16. ↑ हिल्ली, कन्ज़ुल-इरफ़ान फ़ी फ़िक़्हिल-क़ुरआन, खंड 2, पृष्ठ 304।
  17. ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर-ए नमूना, खंड 2, पृष्ठ 118; आमिली, तफ़्सीर-ए आमिली, खंड 1, पृष्ठ 402।
  18. ↑ जवादी आमोली, तफ़्सीर-ए तस्नीम, खंड 11, पृष्ठ 57।
  19. ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 2, पृष्ठ 192।
  20. ↑ जवादी आमोली, तफ़्सीर-ए तस्नीम, खंड 11, पृष्ठ 92।
  21. ↑ रज़ा, तफ़्सीर अल-मनार, खंड 2, पृष्ठ 322।
  22. ↑ जवादी आमोली, तफ़्सीर-ए तस्नीम, खंड 11, पृष्ठ 60।
  23. ↑ जवादी आमोली, तफ़्सीर-ए तस्नीम, खंड 11, पृष्ठ 84।
  24. ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीर-ए नमूना, खंड 2, पृष्ठ 118।
  25. ↑ सुब्हानी, अल-मवाहिब, पृष्ठ 663; मकारिम शीराज़ी, दाइरतुल-मआरिफ़-ए फ़िक़्ह-ए मुक़ारिन, पृष्ठ 409।
  26. ↑ जवादी आमोली, तफ़्सीर-ए तस्नीम, खंड 11, पृष्ठ 87।
  27. ↑ अय्याशी, तफ़्सीर-ए अय्याशी, खंड 1, पृष्ठ 106।

स्रोत

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