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क़ब्रो पर निर्माण

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कब्रों पर निर्माण, से आशय कब्रों के ऊपर किसी भी प्रकार की इमारत या संरचना बनाना है, जैसे गुम्बद, मज़ार, रौज़ा या मस्जिद का निर्माण। अधिकांश मुस्लिम विद्वान क़ब्रों पर इस प्रकार के निर्माण को वैध और धार्मिक रूप से स्वीकार्य मानते हैं। इस संबंध में वे पैग़म्बर मुहम्मद (स), सहाबा और ताबेईन के आचरण को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसके विपरीत, वहाबी विचारधारा के विद्वान क़ब्रों पर निर्माण को बिदअत और शिर्क मानते हैं। उन्होंने क़ब्रों पर बने भवनों को गिराने के संबंध में फ़तवे भी दिए हैं।

इतिहास में विभिन्न अवसरों पर वहाबी समूहों ने शिया इमामों और अन्य धार्मिक हस्तियों की क़ब्रों पर बनी कई इमारतों को नष्ट किया। इनमें मदीना स्थित बक़ीअ के पवित्र मक़बरों की संरचनाएँ भी शामिल थीं। इसके अतिरिक्त, वर्ष 1216 हिजरी में उन्होंने कर्बला नगर पर आक्रमण किया, जहाँ इमाम हुसैन (अ) और हज़रत अब्बास (अ) की दरगाहो को नुक़सान पहुँचाया तथा वहाँ मौजूद संपत्ति, भंडार और मूल्यवान वस्तुओं को लूट लिया।

परिभाषा और धार्मिक स्थान

मदीना में पैग़म्बर (स) के मज़ार की तस्वीर

क़ब्रों पर निर्माण से आशय क़ब्रों के ऊपर किसी भी प्रकार का निर्माण करना है, जैसे गुम्बद, मज़ार, भवन, ज़रीह, मस्जिद आदि।[१] कब्रों, विशेषकर पैग़म्बरों, नेक लोगों और औलिया की क़ब्रों पर इस प्रकार की संरचनाओं का निर्माण एक ऐसा विषय है जिस पर वर्तमान समय में (पंद्रहवीं हिजरी शताब्दी में) वहाबी विद्वान विशेष आपत्ति व्यक्त करते हैं। वे इस कार्य के कारण अन्य मुसलमानों, विशेषकर शियों की आलोचना करते हैं और इसे अनुचित मानते हैं।[२] इसी कारण इस्लामी दृष्टिकोण से क़ब्रों पर निर्माण की वैधता और धार्मिक स्थिति का अध्ययन मुस्लिम शोधकर्ताओं और विद्वानों के बीच एक महत्वपूर्ण विषय रहा है।[३]

कब्रों पर निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कहा जाता है कि इस्लाम आने के बाद से ही क़ब्रों पर निर्माण करना मुस्लिम समाज की ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा रहा है और पैग़म्बर मुहम्मद (स), उनके सहाबा और ताबेईन की ओर से इस पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की गई।[४] उदाहरण के रूप में इतिहासकारों के अनुसार, पैग़म्बर (स) ने फ़ातिमा बिन्त असद को मस्जिद के एक हिस्से में दफ़न किया, जो बाद में इस्लामी इतिहास में क़ब्र-ए-फ़ातिमा के नाम से प्रसिद्ध हुई।[५] इसी प्रकार इस्लाम के प्रारंभिक काल में, हुदैबिया की संधि के समय के आसपास, अबू जुंदल ने अबू बसीर सहाबी की कब्र पर पहला निर्माण या मस्जिद बनाई। पैग़म्बर (स) को इस कार्य की जानकारी होने के बावजूद उन्होंने उसे रोकने का आदेश नहीं दिया।[६]

सलमान फ़ारसी का मक़बरा

पैग़म्बर मुहम्मद (स) का पवित्र शरीर भी उनके अपने घर में ही दफ़न किया गया। उनके स्वर्गवास के शुरुआती वर्षों से ही इस घर की देखभाल, संरक्षण और मरम्मत पर मुसलमानों और ख़लीफ़ाओं ने विशेष ध्यान दिया।[७] पैग़म्बर (स) के बाद भी, सहाबा और ताबेईन के काल में यह परंपरा जारी रही और क़ब्रों पर निर्माण करना मुसलमानों के बीच एक सामान्य प्रचलन था। उदाहरण के रूप में उल्लेख मिलता है कि अक़ील बिन अबी तालिब ने अपने घर में एक कुआँ खोदा। खुदाई के दौरान उन्हें एक पत्थर मिला, जिससे पता चला कि वहाँ सख़्र बिन हर्ब की पुत्री हबीबा की कब्र थी। इसके बाद उन्होंने उस कुएँ को मिट्टी से भर दिया और उस स्थान पर एक कमरा बनवा दिया।[८]

मिस्र के शाफ़ेई विद्वान सम्हूदी (मृत्यु 911 हिजरी) ने उल्लेख किया है कि हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब के मज़ार पर एक सुंदर और मज़बूत गुम्बद बना हुआ था, जिसमें लोहे का दरवाज़ा था। यह निर्माण अब्बासी ख़लीफ़ा अल-नासिर लेदीनिल्लाह के शासनकाल में कराया गया था।[९]

इसी प्रकार इस बात का भी वर्णन मिलता है कि सुन्नी इस्लामी न्यायशास्त्र के प्रमुख इमामों की क़ब्रों पर भी गुम्बद और इमारतें बनी हुई थीं। इतिहासकारों के अनुसार, हनफ़ी मत के संस्थापक इमाम अबू हनीफ़ा (मृत्यु 150 हिजरी) की बग़दाद स्थित कब्र पर एक गुम्बद और मज़ार बनी हुई थी, जिसका निर्माण चौथी या पाँचवीं हिजरी शताब्दी में हुआ था।[१०] इसी तरह बक़ीअ में मालिक बिन अनस (मृत्यु 179 हिजरी), जो मालिकी मत के प्रमुख इमाम थे;[११] मिस्र में मुहम्मद बिन इदरीस शाफ़ेई (मृत्यु 150 हिजरी), जो शाफ़ेई मत के संस्थापक थे;[१२] और बग़दाद में अहमद बिन हंबल (मृत्यु 241 हिजरी), जो हंबली मत के प्रमुख इमाम थे—इन सभी की कब्रों पर भी गुम्बद बनाए जाने का उल्लेख मिलता है।[१३]

जाफ़र सुब्हानी[१४] के अनुसार, इन ऐतिहासिक उदाहरणों के बावजूद, इस्लामी इतिहास में पहली बार इब्ने तैमिया और उनके शिष्य इब्न क़य्यिम अल-जौज़िया ने कब्रों पर निर्माण का विरोध किया। उन्होंने इसे हराम मानते हुए ऐसी संरचनाओं को ध्वस्त करने की आवश्यकता के संबंध में फ़तवे जारी किए।[१५]

मुस्लिम विद्वानों का दृष्टिकोण

वहाबियों द्वारा ध्वस्त किए जाने से पहले बक़ीअ के इमामों के मज़ार

वहाबी विद्वानों को छोड़कर अधिकांश मुस्लिम विद्वान कब्रों पर निर्माण को वैध और धार्मिक रूप से स्वीकार्य मानते हैं। इसके समर्थन में उन्होंने विभिन्न तर्क और प्रमाण प्रस्तुत किए हैं—

  • सूर ए कहफ़ की आयत 21 के आधार पर कुछ मुस्लिम विद्वानों ने तर्क दिया है कि जब लोगों को असहाबे कहफ़ की स्थिति का पता चला और उन्होंने गुफ़ा में उनके शवों को देखा, तो मुशरिको के एक समूह ने सुझाव दिया कि गुफ़ा को बंद कर दिया जाए, ताकि यह घटना—जो पुनरुत्थान के प्रमाणों में से एक थी—भुला दी जाए। लेकिन मोमेनीन के एक समूह को इस बात का पता चला तो उन्होने इस बात पर बल दिया कि उनकी कब्रों के ऊपर एक मस्जिद बनाई जाए, ताकि उनकी स्मृति बनी रहे और वह स्थान लोगों के आने-जाने तथा इबादत का केंद्र बन सके।[१६] कुछ विद्वानों ने इस आयत को कब्रों पर निर्माण की वैधता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया है।[१७]
  • पैग़म्बरों और औलिया की कब्रों पर निर्माण करना तथा उन्हें नष्ट होने से सुरक्षित रखना, कुछ विद्वानों के अनुसार ईश्वर के प्रतीकों के सम्मान में शामिल है। वे इसके समर्थन में क़ुरआन की इस आयत का उल्लेख करते हैं "وَمَنْ يُعَظِّمْ شَعَائِرَ اللَّهِ فَإِنَّهَا مِنْ تَقْوَى الْقُلُوبِ (व मन योअज़्ज़िम शआएरल्लाहे फ़इन्नहा मिन तक़वल क़ुलूब) और जो कोई अल्लाह की निशानियों का सम्मान करता है, तो निश्चय ही यह दिलों के तक़वा से है।"[१८]
  • पैग़म्बर मुहम्मद (स) के काल से लेकर इस्लाम के प्रारंभिक दौर और उसके बाद के मुस्लिम समाज के व्यवहार को भी क़ब्रों पर निर्माण की वैधता और अनुमति का प्रमाण माना गया है।[१९] हाकिम नैशापुरी ने अपनी पुस्तक अल-मुस्तद्रक अला अस-सहीहैन में उन हदीसों के संदर्भ में, जिनमें कब्रों पर निर्माण से रोका गया है, लिखा है कि इन रिवायतो पर अमल नहीं किया जाता; क्योंकि कब्रों पर निर्माण ऐसा कार्य है जिसे मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने अपनाया और बाद के लोगों ने भी उनका अनुसरण किया।[२०]
  • कुछ विद्वानों ने कब्रों पर निर्माण की वैधता को मुस्लिम विद्वानों की सर्वसम्मति का विषय भी माना है।[२१]
  • शिया हदीस साहित्य में भी ऐसी कई रिवायतें मिलती हैं जो क़ब्रों, विशेषकर पैग़म्बरों और औलिया की क़ब्रों पर निर्माण की वैधता को दर्शाती हैं। उदाहरण स्वरूप एक रिवायत में वर्णित है कि इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) ने सफ़वान जम्माल नाम के अपने सहाबी को इमाम अली (अ) की क़ब्र की मरम्मत कराने के लिए कुछ धन दिया।[२२]

वहाबियों का दृष्टिकोण

बक़ीअ में इमामों (अ) के ध्वस्त किए गए मज़ार

वहाबी विद्वान, इब्ने तैमिया[२३] के विचारों का अनुसरण करते हुए, क़ब्रों पर निर्माण के विरोधियों में शामिल हैं। वे इस कार्य को बिदअत और शिर्क मानते हैं।[२४] अपने इस मत के समर्थन में वे उन हदीसों का हवाला देते हैं जिनके अनुसार पैग़म्बर मुहम्मद (स) ने कब्रों पर मस्जिद बनाने से मना किया था।[२५] इस दृष्टिकोण के उत्तर में अन्य मुस्लिम विद्वानों ने कहा है कि इन हदीसों से इस कार्य के हराम या बिदअत होने का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। अधिकतम इतना ही सिद्ध होता है कि ऐसा करना मकरूह हो सकता है।[२६] इसी कारण विभिन्न इस्लामी फ़िक़्ही मतों के विद्वानों ने भी इसे केवल मकरूह माना है। हालांकि उन्हीं विद्वानों ने पैग़म्बरों, औलिया और औसिया की क़ब्रों पर निर्माण को इस निषेध के दायरे से अलग रखा है।[२७] कुछ ने तो धार्मिक विद्वानों की कब्रों पर निर्माण को भी मकरूह नहीं माना है।[२८]

वहाबियों द्वारा कब्रों पर बने भवनों का विनाश

सलफ़ी उग्रवादी समूहों द्वारा मज़ार को नष्ट करने के हमले के बाद अस्करीयैन का मज़ार, जिसके परिणामस्वरूप गुंबद का विनाश हुआ।

वहाबी न्यायशास्त्र के विद्वानों ने न केवल क़ब्रों पर निर्माण को हराम और बिदअत घोषित किया, बल्कि ऐसी इमारतों को नष्ट करने के संबंध में फ़तवे भी जारी किए और कई अवसरों पर उन्हें लागू भी किया। उन्होंने एक बार वर्ष 1220 हिजरी[२९] में और दूसरी बार 8 शव्वाल 1344 हिजरी को मदीना स्थित बक़ीअ क़ब्रिस्तान को नष्ट किया। इन दोनों घटनाओं में बक़ीअ की ऐतिहासिक संरचनाएँ, जिनमें हज़रत फ़ातिमा (स) से संबंधित मानी जाने वाली गुम्बद जिसे बैतुल-अहज़ान कहा जाता था और अन्य मज़ारें शामिल थीं, ध्वस्त कर दी गईं। इसके अतिरिक्त, हरम-ए-नबवी को भी क्षति पहुँची।[३०]

वहाबियों ने इसी प्रकार 1216 हिजरी में, ईद-ए-ग़दीर के दिन, कर्बला शहर पर भी आक्रमण किया।[३१] इस हमले के दौरान उन्होंने इमाम हुसैन (अ) और हज़रत अब्बास (अ) के हरम को क्षति पहुँचाई तथा वहाँ मौजूद संपत्ति, भंडार और मूल्यवान वस्तुओं को लूट लिया।[३२]

वर्ष 2005 और 2007 ई में भी उसी वहाबी विचारधारा से प्रभावित तकफ़ीरी आतंकवादियों ने अस्करीयैन का रौज़ा पर हमले और विस्फोट किए। इन घटनाओं के परिणामस्वरूप वहाँ के गुम्बद की ईंटों और स्वर्ण सजावट, दीवारों की काशीकारी तथा मीनारों को भारी नुकसान पहुँचा और वे नष्ट हो गए।[३३]

फ़ुटनोट

  1. ↑ शरबीनी, मुग़्नी अल-मुह्ताज, खंड 1, पृष्ठ 364।
  2. ↑ सुब्हानी, आयीन-ए-वहाबियत, पृष्ठ 38।
  3. ↑ सुब्हानी, आयीन-ए-वहाबियत, पृष्ठ 92-93।
  4. ↑ रिज़वानी, वहाबियत व मसअला-ए-क़ुबूर, पृष्ठ 32।
  5. ↑ समहूदी, वफ़ा-उल-वफ़ा, खंड 3, पृष्ठ 3।
  6. ↑ आमिली, अस-सहीह मिन सीरत-अल-नबी-अल-आज़म, खंड 16, पृष्ठ 182; ग़मारी हसनी, एह्या-उल-मक़्बूर मिन अदिल्ला-ए-जवाज़-ए-बिना-ए-मसाजिद अला-ल-क़ुबूर, पृष्ठ 69।
  7. ↑ समहूदी, वफ़ा-उल-वफ़ा, खंड 2, पृष्ठ 109-110; अमीन, कश्फ-उल-इर्तियाब, पृष्ठ 315-316।
  8. ↑ नुमैरी बसरी, तारीख-उल-मदीना, खंड 1, पृष्ठ 120।
  9. ↑ समहूदी, वफ़ा-उल-वफ़ा, खंड 3, पृष्ठ 104।
  10. ↑ इब्ने जौज़ी, अल-मुन्तज़म फ़ी तारीख-इल-उमम वल-मुलूक, खंड 16, पृष्ठ 100; इब्ने बतूता, तुहफ़त-उन-नुज़्ज़ार फ़ी ग़राइब-इल-अमसार व अजाइब-इल-अस्फ़ार: रेहला इब्ने बतूता, खंड 1, पृष्ठ 172।
  11. ↑ इब्ने जुबैर, अर-रेहला, पृष्ठ 173; इब्ने बतूता, तुहफ़त-उन-नुज़्ज़ार फ़ी ग़राइब-इल-अमसार व अजाइब-इल-अस्फ़ार: रेहला इब्ने बतूता, खंड 1, पृष्ठ 65।
  12. ↑ इब्ने बतूता, तुहफ़त-उन-नुज़्ज़ार फ़ी ग़राइब-इल-अमसार व अजाइब-इल-अस्फ़ार: रेहला इब्ने बतूता, खंड 1, पृष्ठ 25।
  13. ↑ इब्ने बतूता, तुहफ़त-उन-नुज़्ज़ार फ़ी ग़राइब-इल-अमसार व अजाइब-इल-अस्फ़ार: रेहला इब्ने बतूता, खंड 1, पृष्ठ 173।
  14. ↑ सुब्हानी, आयीन-ए-वहाबियत, पृष्ठ38।
  15. ↑ इब्ने तैमिया, मिन्हाज-उस-सुन्ना, खंड 1, पृष्ठ 478; इब्ने तैमिया, मजमूआ-उर-रसाइल वल-मसाइल, खंड 1, पृष्ठ 59-60; इब्ने क़य्यिम जौज़ी, ज़ाद-उल-मआद, खंड 3, पृष्ठ 443।
  16. ↑ तबरसी, मजमा-उल-बयान, खंड 6, पृष्ठ 328; तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 13, पृष्ठ 265-267; मक़ारिम शिराज़ी, तफ़सीर-ए-नमूना, खंड 12, पृष्ठ 382।
  17. ↑ ग़मारी, एह्या-उल-मक़्बूर मिन अदिल्ला-ए-बिना-ए-मसाजिद अला-ल-क़ुबूर, पृष्ठ 21-22; सुब्हानी, आयीन-ए-वहाबियत, पृष्ठ45।
  18. ↑ सुब्हानी, अल-वहाबियाह फ़ी-ल-मीज़ान, पृष्ठ 33-37; सुब्हानी, आयीन-ए-वहाबियत, पृष्ठ 43-44।
  19. ↑ हाकिम नैशापुरी, अल-मुस्तदरक अला-स-सहीहैन, खंड 1, पृष्ठ 525; इब्ने हजर हैतमी, अल-फ़तावा-उल-फ़िक़्हिया-उल-कुबरा, खंड 2, पृष्ठ 16; ताहेरी ख़ुर्रमाबादी, अल-बिना अला-ल-क़ुबूर; शरअन अम ख़ुराफ़तुन?, पृष्ठ 61।
  20. ↑ हाकिम नैशापुरी, अल-मुस्तदरक अला सहीहैन, खंड 1, पृष्ठ 525।
  21. ↑ हाकिम नैशापुरी, अल-मुस्तदरक अला सहीहैन, खंड 1, पृष्ठ 525; अमीन, कश्फ-उल-इर्तियाब, पृष्ठ 288।
  22. ↑ अल्लामा मजलिसी, बिहार-उल-अनवार, खंड 100, पृष्ठ 280।
  23. ↑ अमीन, कश्फ-उल-इर्तियाब, पृष्ठ 286।
  24. ↑ इब्ने बाज़, मजमू-ए-फ़तावा, खंड 13, पृष्ठ 237; क़फ़्फ़ारी, उसूल-ए-मज़हब-इश-शिया-इल-इमामिया-इल-इस्ना अशरिया (अर्ज़ व नक़्द), खंड 2, पृष्ठ 481।
  25. ↑ मुस्लिम, सहीह मुस्लिम, खंड 2, पृष्ठ 666-667; बुखारी, सहीह बुखारी, खंड 1, पृष्ठ291।
  26. ↑ ताहेरी ख़ुर्रमाबादी, अल-बिना अला-ल-क़ुबूर; शरअन अम ख़ुराफ़तुन?, पृष्ठ 43-45; लेखकों का समूह, अल-मूसुआ-उल-फ़िक़्हिया-उल-कुवैतिया, खंड 32, पृष्ठ 250।
  27. ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वा-उल-वुस्क़ा, खंड 2, पृष्ठ 127-128; ताहेरी ख़ुर्रमाबादी, अल-बिना अला-ल-क़ुबूर; शरअन अम ख़ुराफ़तुन?, 1430 पृष्ठ 43-45; लेखकों का समूह, अल-मौसुआ-उल-फ़िक़्हिया-उल-कुवैतिया, खंड 32, पृष्ठ 250।
  28. ↑ हैतमी, अल-फ़तावा-उल-फ़िक़्हिया-उल-कुबरा, खंड 2, पृष्ठ17।
  29. ↑ जबरती, अजाइब-उल-आसार, खंड 3, पृष्ठ 91।
  30. ↑ जबरती, अजाइब-उल-आसार, खंड 3, पृष्ठ 91; माजरा, अल-बक़ीअ क़िस्सत-उत-तदमीर, पृष्ठ 113-139; अमीनी, बक़ीअ-उल-ग़रक़द, पृष्ठ49।
  31. ↑ तोमा, तोरास-ए-कर्बला, पृष्ठ116।
  32. ↑ तोअमा, सलमान हादी, तारीख़-ए-मरक़द-अल-हुसैन वल-अब्बास, पृष्ठ 263।
  33. ↑ सहती सरदरूदी, गुज़ीदा-ए-सीमा-ए-सामर्रा, पृष्ठ 68; ख़ामेयार, तख़रीब-ए-ज़ियारतगाहहा-ए-इस्लामी दर केश्वरहा-ए-अरबी, पृष्ठ 29-30।

स्रोत

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