सय्यद अली हुसैनी ख़ामेनेई
| दूसरे इस्लामी गणराज्य ईरान के सर्वोच्च नेता | |
| पूरा नाम | सय्यद अली हुसैनी ख़ामेनेई |
|---|---|
| उपनाम | आयतुल्लाहिल उज़्मा |
| जन्म तिथि | 29 फ़रवरदीन वर्ष 1318 शम्सी 28 सफ़र वर्ष 1358 हिजरी 19 अप्रैल वर्ष 1939 ई |
| जन्म का शहर | मशहद |
| जन्म का देश | ईरान |
| शहादत की तिथि | 9 इस्फ़ंद वर्ष 1404 शम्सी 10 रमज़ान वर्ष 1447 हिजरी 28 फ़रवरी वर्ष 2026 ई |
| शहादत का शहर | तेहरान, सर्वोच्च नेता के आवासीय परिसर |
| कब्र | इमाम रज़ा (अ) का रौज़ा (मशहद) |
| जीवनसाथी का नाम | मंसूरा ख़ुजिस्ता बाक़िर ज़ादे |
| संतान | पुत्रः मुस्तफ़ा, मुज्तबा, मसऊद और मीसम पुत्रीः हुदा और बुशरा |
| पद | इस्लामी सलाहकार सभा के प्रतिनिधि तेहरान के इमामे जुमा राष्ट्रपति इस्लामी गणराज्य ईरान के सर्वोच्च नेता |
| बाद | इमाम ख़ुमैनी |
| गुरू | सय्यद जवाद हुसैन ख़ामेनेई मीर्ज़ा मुहम्मद मुदर्रिस यज़्दी हाशिम क़ज़्वीनी सय्यद मुहम्मद हादी मीलानी हाज आक़ा बुरूजर्दी इमाम ख़ुमैनी मुर्तज़ा हाएरी यज़्दी सय्यद मुहम्मद मोहक़्क़िक़ दामाद अल्लामा तबातबाई |
| रचनाएं | तरह ए कुल्ली अंदेशा ए इस्लामी दर क़ुरआन दो सौ पचास वर्षीय इंसान पेशवा ए सादिक़ अनुवादः सुल्ह इमाम हसन (अ) |
| आधिकारिक वेबसाइट | khamenei.ir leader.ir |
| हस्ताक्षर | |
सय्यद अली हुसैनी ख़ामेनेई (वर्ष 1939-वर्ष 2026 ई.) जो शहीद रहबर और इमाम ख़ामेनेई के नाम से प्रसिद्ध हैं, इस्लामी गणराज्य ईरान के दूसरे सर्वोच्च नेता और [[शिया मरजा-ए-तकलीद की सूची|शिया मुसलमानों के मरजा-ए-तकलीद]] थे। ईरान की इस्लामी क्रांति से पहले वे पहलवी शासन के खिलाफ संघर्ष में सक्रिय थे और क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उन्होंने कुछ समय जेल और निर्वासन में बिताया। क्रांति के बाद उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया, जिनमें दो कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति (1981-1989 ई.), इस्लामी सलाहकार सभा की सदस्यता और तेहरान के इमाम जुमा थे सन 1989 ई. में वे इस्लामी गणराज्य ईरान के सर्वोच्च नेता चुने गए और जीवन के अंतिम क्षण (मार्च 2026 ई. तक) इस पद पर बने रहे।
आयतुल्लाह ख़ामेनई के न्यायशास्त्रीय और राजनीतिक विचार हैं; जिनमें क़मा और ज़ंजीर के मातम का हराम होना, अहले-सुन्नत की पवित्र हस्तियों के अपमान का हराम होना, परमाणु हथियारों के उपयोग पर रोक, प्रतिरोधी मोर्चे का समर्थन, सांस्कृतिक आक्रमण का मुकाबला, प्रतिरोधी अर्थव्यवस्था पर बल, और फ़िलिस्तीन मुद्दे के समाधान के लिए जनमत संग्रह का प्रस्ताव शामिल है। वे जेहाद को केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं मानते, बल्कि जेहाद ए तब्यीन की आवश्यकता पर बल देते हैं।
वे समकालीन साहित्य और इतिहास में रुचि रखते थे और अमीन उपनाम से कविता लिखते थे। उनकी कृतियों में तरह ए कुल्ली अंदेशा ए इस्लामी दर क़ुरआन, दो सौ पचास वर्षीय इंसान, ग़िना और फ़िलिस्तीन शामिल हैं। उन्होंने धार्मिक शिक्षा बचपन से ही शुरू कर दी थी, मशहद, नजफ़ और क़ुम के धार्मिक शिक्षा केंद्रों में अध्ययन एवं शिक्षण किया, और इमाम खुमैनी तथा अल्लामा तबातबाई जैसे गुरूओ से शिक्षा प्राप्त की।
अपने नेतृत्व काल के दौरान, आयतुल्लाह ख़ामेनई ने हज के वार्षिक संदेश भेजे, मुसलमानों की एकता के समर्थन, प्रतिरोध की धुरी को मज़बूत बनाने, ईरान की विदेशी और सैन्य नीतियों के मार्गदर्शन, धार्मिक शोध एवं शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और समर्थन, तथा इस्लामी संस्कृति के प्रचार पर जोर दिया। उन्होंने शम्सी (सौर) वर्षों का नामकरण करना और भविष्य के लिए इस्लामी व्यवस्था का मार्गदर्शन करने हेतु क्रांति के दूसरे चरण का घोषणापत्र जारी किया।
ख़ामेनई 28 फ़रवरी 2026 ईस्वी / 10 रमज़ान 1447 हिजरी रविवार के दिन सुबह मे अमेरिका और इज़राइल के सर्वोच्च नेता के आवासीय परिसर पर मिसाइल हमलों के कारण शहीद हो गए।
स्थान
सय्यद अली ख़ामेनई शिया मुसलमानों के मरजा ए तक़लीद हैं और इस्लामी गणराज्य ईरान के दूसरे सर्वोच्च नेता हैं। ईरान की इस्लामी क्रांति से पहले वे पहलवी शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। इस्लामी गणराज्य ईरान की स्थापना के बाद उन्होंने विभिन्न जिम्मेदारियाँ निभाईं। उनके विचार और चिंतन उनके सर्वोच्च नेता के पद के कारण विशेष महत्व रखते हैं। ईरान में उन्हें 'शहीद रहबर', 'सय्यदुश्शोहदा ए इंक़ेलाब ए इस्लामी', 'शहीद इमाम' और 'इमाम ख़ामेनई' जैसे उपाधियों से पहचाना जाता है।
जीवन और परिवार
सय्यद अली खामेनेई का जन्म 19 अप्रैल 1939 ई / 28 सफ़र 1358 हिजरी को मशहद शहर में हुआ था।[१] उनके पिता सय्यद जावद हुसैनी ख़ामेनेई (मृत्यु वर्ष 1986 ई) मुज्तहिद और नजफ़ के धार्मिक शिक्षा केंद्र (हौज़ा-ए-इल्मिया) के स्नातक थे।[२] वे मशहद में धार्मिक शिक्षा देते और मशहद के बाज़ार मे स्थित सिद्दीक़ी मस्जिद (आज़रबाइजानियों की मस्जिद) में इमामत करते थे।[३] वे गोहरशाद मस्जिद के एक पेश-नमाज़ भी थे।[४]
आयतुल्लाह ख़ामेनई का वंश अफ़सती सादात और सुल्तान सय्यद अहमद तक पहुंचता है, जो पाँच पीढ़ी के माध्यम से इमाम सज्जाद (अ) के वंशज हैं।[५] तफ़रिश [नोट १] में दफ़न इमामज़ादा मुहम्मद, उनके पूर्वज हैं।[६]
सय्यद हुसैन ख़ामेनई (मृत्यु 1325 हिजरी) मशरूते ख़्वाह विद्वानों में से एक और मुहम्मद ख़याबानी के ससुर दादा हैं।[७] मशरूता समर्थक विद्वान और पैग़म्बर नाम से प्रसिद्ध सयद मुहम्मद ख़ामेनई (मृत्यू: 1353 हिजरी) उनके चाचा हैं।[८]
माता की ओर से आयतुल्लाह ख़ामनेई का वंश इमाम सादिक़ (अ) के पुत्र मुहम्मद दीबाज तक पहुँचता है।[९] उनकी माता, ख़दीजा मीरदामादी (मृत्यु: वर्ष 1989 ई) सय्यद हाशिम मीरदामादी (मृत्यु: 1380 हिजरी) की पुत्री थीं।[१०]
शहादत
आयतुल्लाह खामेनेई की 28 फ़रवरी 2026 ई को ईरान के सर्वोच्च नेता के आवासीय परिसर पर अमेरिका और इज़राइल के साझा मीसाइल हमले में शहीद कर दिया गया। इस हमले में आयतुल्लाह ख़ामेनई, उनके परिवार के कई सदस्य और उनके कार्यालय के कर्मचारी शहीद हो गए। उनके इस हत्या की नजफ़ और क़ुम के धार्मिक शिक्षा केंद्रों में शिया मराज ए तक़लीद ने व्यापक निंदा की, और आयतुल्लाह नूरी हमदानी और जवादी आमोली सहित कई शिया विद्वानों ने बयान जारी करके संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ जिहाद को धार्मिक रूप से अनिवार्य घोषित किया। इस घटना के बाद, नेतृत्व विशेषज्ञ परिषद् ने सय्यद मुज्तबा ख़ामेनई को व्यवस्था का तीसरा सर्वोच्च नेता चुना। उसी समय, ईरान के सशस्त्र बलों ने वादा-ए-सादिक़ 4 नामक एक अभियान के तहत अधिकृत क्षेत्रों के स्थानों के साथ-साथ संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरैन, कतर, जॉर्डन और सऊदी अरब में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। इस घटना के परिणामस्वरूप ईरान, इराक, पाकिस्तान, यमन और कई अन्य देशों के विभिन्न शहरों में व्यापक विरोध प्रदर्शन और जुलूस निकले।
सय्यद अली ख़ामनेई का पार्थिव शरीर का जनाज़ा और दफ़न समारोह 3 से 9 जुलाई 2026 ईस्वी तक तेहरान, क़ुम, नजफ़, कर्बला और मशहद शहरों में आयोजित किया गया। उनके पार्थिव शरीर को 10 जुलाई 2026 ईस्वी की सुबह इमाम रज़ा (अ.) के पवित्र मकबरे में दफ़नाया गया। रिपोर्टों के अनुसार, इन समारोहों में कुल 40 से 43 मिलियन लोगों ने भाग लिया। युद्ध की स्थिति और सुरक्षा चिंताओं के कारण, उनके जनाज़े और दफ़न समारोह में लगभग 125 दिन की देरी हुई, और यह जुलाई 2026 ईस्वी में आयोजित किया गया।
इससे पहले, डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू ने सन् 2025 ईस्वी में इज़राइल के ईरान के साथ बारह दिवसीय युद्ध के दौरान उन्हें हत्या की धमकी दी थी। इस धमकी के बाद, कुछ शिया मरजा-ए-तक़लीद ने ऐसा कोई भी शासन जो इस्लामी उम्मत या उसके नेतृत्व पर हमला करे, को 'मोहारिब' घोषित कर दिया।[११] नजफ़ और क़ुम के धार्मिक शिक्षा केंद्रों में रैलियाँ आयोजित हुईं[१२] और नजफ़ के हौज़ा के एक बयान में कहा गया कि ईरान के नेता पर कोई भी हमला, मुसलमानों के खिलाफ युद्ध की घोषणा और एकेश्वरवादी सभ्यता के मूल्यों के साथ विश्वासघात के समान होगा।[१३]
सन् 1989 ईस्वी में असफल हत्या का प्रयास
6 जुलाई 1989 ई को, तेहरान के अबूज़र मस्जिद में भाषण देते समय, उन पर जानलेवा हमला हुआ।[१४] उनके कंधे, सीना और दाहिना हाथ गंभीर रूप से घायल हो गए।[१५] शुरू में इस हत्या के प्रयास का ठीकरा 'फुरक़ान गुट' को दिया गया[१६] लेकिन कुछ सूत्र 'मुजाहिदीन-ए-खल्क़' संगठन को इसका ज़िम्मेदार मानते हैं।[१७]
ईरान की जनता अपने इस्लामी और शिया पाठों को अच्छी तरह जानती है; वह जानती है कि उसे क्या करना है। इमाम हुसैन (अ) ने कहा था: 'मिस्ली ला युबायेओ मिस्ला यज़ीद' (मेरे जैसा व्यक्ति यज़ीद जैसे व्यक्ति की बैअत नहीं करेगा)। ईरान की जनता वास्तव में कह रही है: 'हम जैसी जनता, इस संस्कृति, इस इतिहास, इन उच्च शिक्षाओं के साथ, आज अमेरिका की सत्ता में बैठे भ्रष्ट लोगों जैसे नेताओं की बैअत नहीं करेगी।'"
राजनीतिक और सामाजिक विचार
राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण जो आयतुल्लाह ख़ामेनई के भाषणों, संदेशों, फतवों और लिखित कृतियों में व्यक्त किए गए हैं।
राजनीतिक संघर्ष और जिहाद
आयतुल्लाह ख़ामेनई का मानना है कि शियो के इमामों का राजनीतिक जीवन, दिखाई देने वाले अंतरों के बावजूद निरंतर चलने वाला एक आंदोलन था जो लगभग 250 वर्षों तक जारी रहा, और उन सभी ने मानवता के विकास और उत्थान तथा इस्लामी समाज की स्थापना के लिए अलग-अलग तरीकों से अपने समय के शत्रुओं के खिलाफ संघर्ष किया।[१८] वे जिहाद को केवल सैन्य पहलू तक सीमित नहीं मानते, बल्कि इसमें राजनीतिक, सांस्कृतिक, मीडिया और आर्थिक क्षेत्रों में शत्रु का मुकाबला करना भी शामिल है।[१९] उन्होंने शत्रु के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए जिहाद ए तब्यीन का शब्द परिचित कराया है।[२०]
इस्लामी जगत में मुसलमानों की एकता का समर्थन
आयतुल्लाह ख़ामेनई, इस्लामी एकता का अर्थ मुसलमानों के बीच शत्रुता का निषेध करना मानते हैं और उनका मानना है कि इसका अर्थ अक़ीदो और मज़हबो को एक समान करना नहीं है।[२१] उन्होंने शिया और अहले-सुन्नत के बीच विभाजन पैदा करने वाली प्रवृत्तियों को क्रमशः 'अंग्रेज़ी शिया और अमेरिकी इस्लाम का नाम दिया है।[२२] सन् 2010 ई में, यासिर अल हबीब द्वारा पैग़म्बर (स) की पत्नी आयशा के खिलाफ की गई टिप्पणियों के बाद, उन्होंने एक फ़तवा जारी करके इस्लामी संप्रदायों की पवित्र हस्तियो का अपनमान करना हराम घोषित कर दिया।[२३] वे इस्लामी संप्रदायों के सामंजस्य की वैश्विक सभा और अहले बैत की विश्व सभा जैसे संस्थानों का समर्थन करके, अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक और संप्रदाय सम्मेलनों में भाग लेकर, और इस्लामी जगत के विद्वानों से मिलकर मुसलमानों की एकता की आवश्यकता पर बल देते हैं।[२४] वे बाहरी तत्वों, विशेष रूप से इंग्लैंड को, इस्लामी जगत में धार्मिक विभाजन भड़काने का ऐतिहासिक रिकॉर्ड रखने वाला मानते हैं और इस विभाजनकारी प्रवृत्ति के परिणामों के प्रति आगाह करते हैं।[२५]
सांस्कृतिक और क्षेत्रीय मुद्दे
आयतुल्लाह ख़ामेनई सांस्कृतिक आक्रमण को राष्ट्रों पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए एक सचेत हमला मानते हैं,[२७] जो रज़ा शाह के समय से शुरू हुआ और ईरान-इराक़ युद्ध के बाद जारी रहा।[२८] वे 'पश्चिम एशिया' शब्द को 'मध्य पूर्व' के स्थान पर प्रयोग करने योग्य मानते हैं और इस नामकरण को अधिक सही बताते हैं।[२९] उन्होंने 2010 ई के अरब देशों में हुई क्रांतिकारी हलचलों को, जिन्हें मीडिया में अरबी जागरूकता कहा जाता था,[३०] इस्लामी जागरूकता का नाम दिया है।[३१]
फ़िलिस्तीन का मुद्दा
उनके अनुसार फ़िलिस्तीन के मुद्दे का समाधान एक जनमत संग्रह आयोजित करना है, जिसमें सभी फ़िलिस्तीनी - चाहे मुसलमान हों, ईसाई हों या यहूदी - भाग लें।[३२] आयतुल्लाह ख़ामेनई का मानना है कि फ़िलिस्तीन की मुक्ति का मार्ग, प्रतिरोध है[३३] और वे फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर बातचीत को एक गलती मानते हैं जो फ़िलिस्तीनियों के लिए नुकसान के अलावा कुछ नहीं लाती और फ़िलिस्तीन की मुक्ति में देरी करती है।[३४]
अर्थव्यवस्था और आंतरिक प्रबंधन
आयतुल्लाह ख़ामेनई ने प्रतिरोधी अर्थव्यवस्था को प्रतिबंधों का मुकाबला करने और ईरान की आंतरिक क्षमता का उपयोग करने के लिए एक उपाय के रूप में पेश किया है।[३५] उनके आग्रह के परिणामस्वरूप प्रतिरोधी अर्थव्यवस्था शब्द ईरान के राजनीतिक शब्दकोश में शामिल हो गया।[३६] उन्होंने सन 1999 ई से लोगों का ध्यान सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक मुद्दों की ओर आकर्षित करने के उद्देश्य से शम्सी वर्षों का नामकरण करना शुरू किया।[३७] फ़रवरी 2019 ई में, इस्लामी क्रांति की चालीसवीं वर्षगांठ के अवसर पर, उन्होंने क्रांति का दूसरा चरण नामक एक घोषणापत्र जारी किया, जिसने क्रांति के अगले 40 वर्षों का रोडमैप तैयार किया।[३८]

हौज़ा-ए-इल्मिया और इस्लामी सभ्यता
"बेशक मैं इस बात पर ज़ोर देता हूँ कि इस क्षेत्र को 'पश्चिम एशिया' कहा जाए, न कि मध्य पूर्व। दूर पूर्व, निकट पूर्व और मध्य पूर्व की संज्ञाएँ सही नहीं हैं। दूर कहाँ से? यूरोप से। निकट किसके? यूरोप के। यानी यूरोप; दुनिया का केंद्र है; जो भी स्थान यूरोप से अधिक दूर है, उसका नाम दूर पूर्' है; जो निकट है, वह निकट पूर्व है; और जो बीच में है, वह मध्य पूर्व है! यह वह परिभाषा है जो स्वयं यूरोपीय लोगों ने बनाई है; नहीं, हम इसे स्वीकार नहीं करते। एशिया एक महाद्वीप है; इसका पूर्व है, पश्चिम है, मध्य है; हम पश्चिम एशिया में स्थित हैं; इसलिए हमारे क्षेत्र का नाम पश्चिम एशिया क्षेत्र है, न कि 'मध्य पूर्व क्षेत्र'।"
"मैं आयतुल्लाह खामेनेई को अच्छी तरह जानता हूँ और मैं जानता हूँ कि उनके और उनके रिश्तेदारों के पूरे आर्थिक कार्यकाल में कोई काला धब्बा तो दूर, रत्ती भर भी धब्बा नहीं पाया जा सकता।"
आयतुल्लाह ख़ामेनई ने क़ुम के धार्मिक शिक्षा केंद्र के पुन:स्थापना की शताब्दी के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन को भेजे एक संदेश में, धार्मिक शिक्षा केंद्रों को नवाचार, दैनिक मुद्दों का जवाब देने, आत्म-शुद्धि, क्रांतिकारी भावना और सामाजिक प्रणालियों के डिजाइन में सक्षम होने के लिए बाध्य मानते हैं, और नवीन इस्लामी सभ्यता को बढ़ावा देना धार्मिक शिक्षा केंद्रों का सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य बताया है।[३९]
थोपी गई शांति से असहमति
आयतुल्लाह ख़ामेनेई प्रतिरोध की लागत को साज़िश की लागत से कम मानते हैं[४०] और ईरान के परमाणु अधिकारों से समर्पण या पीछे हटने का विरोध किया है। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि ईरान न तो थोपे गए युद्ध को स्वीकार करेगा और न ही थोपी गई शांति को।[४१]
न्यायशास्त्रीय दृष्टिकोण
आयतुल्लाह ख़ामेनई, न्यायशास्त्र और धर्म के क्षेत्र में, क़मा और ज़ंजीर से मातम करने को बिदअत और हराम मानते हैं।[४२] वे एतेकाफ़ को जामा मस्जिद के अलावा अन्य स्थानों मे अल्लाह की प्रसन्नता की आशा में जायज़ मानते हैं।[४३] गायन और संगीत के अध्याय में, वे हर उस गायन को जो बातिल और भ्रामक मनोरंजन से युक्त हो[४४] और हर उस संगीत को जो धर्म और धार्मिक कर्तव्यों के प्रति उदासीनता पैदा करता हो, हराम मानते हैं।[४५] उन्होंने परमाणु हथियारों और सामूहिक विनाश के अन्य हथियारों के निर्माण और उपयोग को भी हराम घोषित किया है[४६] और इस्लामी संप्रदायों की पवित्र हस्तियो के अपमान को जायज़ नहीं मानते हैं।[४७] उनके अनुसार, पत्नी को अपने पति की सभी संपत्तियों में से, जिसमें अचल संपत्तियाँ भी शामिल हैं, विरासत मिलती है।[४८] यह विचार उन न्यायविदो के विचार के विपरीत है जो यह मानते हैं कि पत्नी केवल पति की चल संपत्तियों में से ही विरासत पाती है।[४९]
व्यवहारिक विशेषताएँ
आयतुल्लाह ख़ामनेई के व्यवहारिक गुण सादगी, त्याग और पवित्रता के लिए जाने जाते थे, और उनके सरल जीवनशैली के बारे में कई रिपोर्टें प्रकाशित हुई हैं। संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव ख़ावीर पेरेज़ डी कुएलर के हवाले से कहा गया है: “मैंने अपने कार्यकाल के दौरान दुनिया के कई देशों के राजनेताओं, राष्ट्रपतियों और नेताओं से मुलाक़ात की है, लेकिन आयतुल्लाह ख़ामनेई जैसा कुशल राजनीतिज्ञ और बुद्धिमान व्यक्तित्व मैंने कभी नहीं देखा।” रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के हवाले से भी कहा गया है: “मैंने मसीह को नहीं देखा है, लेकिन मैंने बाइबल में उनके बारे में सुना और पढ़ा है, मैंने मसीह को ईरान के नेता (रहबर) में देखा।” सैय्यद मुज्तबा ख़ामनेई ने उनके बारे में कहा है:
“हमारे शहीद नेता (या: मार्गदर्शक) एक कालज्ञ और दूरदर्शी फकीह थे, एक अथक संघर्षकर्ता और पहाड़ की तरह मजबूत और स्थिर, एक कर्मठ और पवित्र विद्वान, जप, रात्रि जागरण और ईश्वर की दरगाह में विनती करने वाले तथा पवित्र मासूमों (अलैहिमुस्सलाम) से मध्यस्थता करने वाले, और गहरे दिल से ईश्वर के वादों पर आस्था रखने वाले थे। उनकी अन्य विशेषताओं में ईरान-प्रेम और प्रिय ईरान की अधिकतम स्वतंत्रता के लिए निरंतर प्रयास था, साथ ही वे एकता और राष्ट्रीय एकजुटता पर जोर देते थे....”[५०]
पुस्तक-पठन
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, सय्यद अली ख़ामेनेई को किशोरावस्था से ही अध्ययन और पुस्तक-पठन में गहरी रुचि थी तथा वे अपने समय का एक भाग नियमित रूप से पुस्तकों के अध्ययन में व्यतीत करते थे। पाठ्यपुस्तकों और ऐतिहासिक ग्रंथों के अतिरिक्त उन्हें उपन्यास और कथा-साहित्य में भी विशेष रुचि थी। पुस्तकें प्राप्त करने के लिए वे आस्तान-ए-क़ुद्स-ए-रज़वी के पुस्तकालय तथा किराये पर पुस्तकें उपलब्ध कराने वाली पुस्तक बिक्री केंद्रो का उपयोग करते थे। इन रिपोर्टों में यह भी उल्लेख मिलता है कि उन्होंने लियो टॉल्स्टॉय, विक्टर ह्यूगो, रोमैँ रोलाँ, अलेक्ज़ांद्र ड्यूमा, मिखाइल शोलोखोफ़ और दांते आलीगीरी जैसे लेखकों की कृतियों का अध्ययन किया। साथ ही, पुस्तकों के हाशियों पर टिप्पणियाँ लिखने तथा दूसरों को पुस्तकें पढ़ने की अनुशंसा करने का भी उल्लेख मिलता है।[५१] अपनी आत्मकथात्मक स्मृतियों में उन्होंने यह संभावना व्यक्त की है कि वर्ष 1958–59 ई. में क़ुम प्रवास से पहले वे एक हज़ार से अधिक उपन्यास पढ़ चुके थे।[५२]
इसके अतिरिक्त, विभिन्न भाषणों और मुलाक़ातों में उन्होंने विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के बीच पुस्तक-पठन की संस्कृति को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया है तथा अध्ययन को जन-जागरूकता बढ़ाने और समाज के सांस्कृतिक विकास का महत्वपूर्ण साधन बताया है।[५३] कुछ रिपोर्टों में पुस्तक मेलों और सांस्कृतिक केंद्रों के उनके दौरों तथा प्रकाशन जगत के प्रति उनकी रुचि का भी उल्लेख किया गया है।[५४] इसके अलावा, उन्होंने 18,000 से अधिक हस्तलिखित पांडुलिपियाँ और लिथोग्राफ़ (पत्थर-छाप) संस्करण आस्तान-ए-क़ुद्स-ए-रज़वी पुस्तकालय को दान किए हैं और इस पुस्तकालय के सबसे बड़े वक़्फ़कर्ता के रूप में जाने जाते हैं।[५५]
शैक्षणिक जीवनी
शिक्षा
सय्यद अली ख़ामेनई ने चार वर्ष की आयु में पारंपरिक इस्लामी विद्यालय में शिक्षा प्रारंभ की और प्राथमिक विद्यालय के साथ-साथ, क़िराअत और क़ुरआन की तजवीद सीखी।[५६] उन्होंने अपनी धार्मिक शिक्षा मशहद में शुरू की और सुलेमान ख़ान तथा नव्वाब मदरसों में प्रारंभिक और मध्यवर्ती स्तर की पढ़ाई पूरी की। धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ, उन्होंने माध्यमिक विद्यालय की दसवीं कक्षा तक पढ़ाई जारी रखी।[५७]
वर्ष 1955 ई में, उन्होंने सय्यद मुहम्मद हादी मीलानी के न्यायशास्त्र की उच्च स्तरीय कक्षा में भाग लिया। वर्ष 1957 ई में, परिवार सहित नजफ़ चले गए और नजफ़ के धार्मिक शिक्षा केंद्र की कक्षाओं में शिरकत की, लेकिन पिता की नजफ़ में रहने की इच्छा न होने के कारण मशहद लौट आए[५८] और आयतुल्लाह मीलानी की कक्षा में उपस्थित हुए और वर्ष 1958 ई में क़ुम के धार्मिक शिक्षा केंद्र के लिए रवाना हो गए।[५९]
वर्ष 1964 ई में, पिता की सहायता के लिए, क़ुम से मशहद लौट आए और आयतुल्लाह मीलानी की कक्षाओं में शामिल होते रहे, जो सन 1970 ई तक जारी रहा।
शिक्षक
सय्यद जलील हुसैनी सिस्तानी, सय्यद जावद ख़ामेनई, मिर्ज़ा मुहम्मद मुदर्रिस यज़्दी, हाशिम क़ज़्वीनी, सय्यद मुहम्मद हादी मीलानी, सय्यद हुसैन तबातबाई बुरूजर्दी, इमाम खुमैनी, मुर्तज़ा हाएरी यज़्दी, सय्यद मुहम्मद मोहक़्क़िक़ दामाद और अल्लामा तबातबाई आयतुल्लाह ख़ामेनई के शिक्षकों में से रहे हैं।[६०] यह भी कहा जाता है कि उन्होंने मुजतबा क़ज़्वीनी की दर्शनशास्त्र की कक्षा में भी संक्षिप्त रूप से भाग लिया था।[६१]
सय्यद अली ख़ामेनई ने ईरान के इस्लामी गणराज्य की आवाज़ के विशेष समूह और इस्लामी मआरिफ़ समूह के सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा: "इस्लामी मआरिफ़ के संबंध में,... मैं इस कार्य का विशेषज्ञ हूँ; अर्थात यदि आप लोग किसी व्यक्ति से इस्लामी मआरिफ़ के बारे में किसी विशेषज्ञ के रूप में बात करना चाहते हैं, तो आपको मुझसे बात करनी चाहिए। मैं एक धार्मिक छात्र हूँ जिसका जीवन इस्लामी शिक्षाओं के प्रचार में बीता है - न कि केवल उन्हें जानने में। यदि अतिशयोक्ति न हो, तो मैंने वर्षों में शायद उतना समय, जितना आप में से कुछ लोगों के जीवन के दिनों के बराबर होगा, विभिन्न प्रकार के जटिल सत्रों में बिताया है, जिनमें आम आदमी भी रहा है, विद्वान, शिक्षक और वैज्ञानिक व्यक्तित्व भी रहे हैं; और मैं सभी वर्गों से रूबरू हुआ हूँ। मैं जानता हूँ कि इस्लामी मआरिफ़ क्या हैं, शिक्षाओं का व्याख्यान, उनका प्रचार और उन्हें प्रस्तुत करना किसे कहते हैं और यह कितना महत्वपूर्ण है।"[६२]
शिक्षण

सय्यद अली ख़ामेनई ने मशहद में आगमन के प्रारंभ से ही, न्यायशास्त्र और न्यायशास्त्र के सिद्धांत के उच्च स्तरों को पढ़ाना शुरू किया और आम जनता के लिए क़ुरआन की व्याख्या के सत्र भी आयोजित किए। वर्ष 1968 ई से, उन्होंने धार्मिक छात्रों के लिए विशेष तफ़सीर पढ़ाना शुरू किया, जो वर्ष 1977 ई मे उनकी गिरफ्तारी और ईरानशहर में निर्वासन से पहले तक जारी रहा।[६४] यह सिलसिला बाद के वर्षों में, जिसमें उनका राष्ट्रपति काल भी शामिल है, जारी रहा। सर्वोच्च नेता चुने जाने के बाद, वर्ष 1990 ई से, उन्होंने इमाम खुमैनी के इमामबाड़े में न्यायशास्त्र की उच्च स्तरीय कक्षा मे पढ़ाना शुरू किया, और उन्होंने जिहाद, प्रतिशोध, निषिद्ध व्यापार और नमाज़-ए-मुसाफ़िर के अध्यायो को पढ़ाया।[६५]
मरजेईयत

वर्ष 1994 ई में, मुहम्मद अली अराकी के स्वर्गवास के बाद, क़ुम के धार्मिक शिक्षा केंद्र के शिक्षकों की समीती और मिलिटेंट क्लर्जी की समीती ने आयतुल्लाह ख़ामेनई को मरजा ए तक़लीद के रूप में पेश किया। उन्होंने घोषणा की कि ईरान मे उनकी मरजेईय की आवश्यकता नहीं है और वे केवल ईरान के बाहर के शियो के अनुरोधों को स्वीकार करेंगे।[६६] उनका पहला प्रकाशित फतवा-संबंधी कार्य अज्वबतुल इस्तिफ्तेआत पुस्तक है, जिसमें शियो के प्रश्नों के उनके उत्तर सम्मिलित हैं।
रचनाएँ
आयतुल्लाह ख़ामेनई ने रिजाल (हदीस प्रसारकों के जीवन-वृत्त), क़ुरआन की तफ़सीर, न्यायशास्त्र, धर्मशास्त्र और इस्लामी इतिहास के क्षेत्रों में कृतियों की रचना या अनुवाद किया है। उनकी लिखित रचनाओ में से चहार किताब-ए-असली-ए-इल्म-ए-रिजाल, अज़ ज़रफ़ा-ए-नमाज़, गुफ़्तारी दर बाब-ए-सब्र और रूह-ए-तौहीद का उल्लेख किया जा सकता है। उन्होंने कई कृतियों का अनुवाद भी किया है, जिनमें सय्यद क़ुतुब की कुछ कृतियाँ शामिल हैं।
उनके भाषणों से संकलित कुछ पुस्तकों में 'तरह-ए-कुल्ली-ए-अंदेशा-ए-इस्लामी दर क़ुरआन', 'फ़िलिस्तीन अज़ मंज़र-ए-आयतुल्लाह ख़ामेनेई', 'ग़िना', 'इंसान-ए-दविस्तो पंचा साले, 'शोआई अज़ नय्यर-ए-आज़म' और 'आफ़ताब दर मुसाफ़' शामिल हैं। ये कृतियाँ क़ुरआन, पैग़म्बर (स) और शियो के इमामों (अ), राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों, तथा इस्लामी दर्शन के बारे में उनके विचारों को दर्शाती हैं। इसके अलावा, मूसा (अ) के फ़िरऔन और जादूगरों से सामना के बारे में उनकी एक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है, जिसका उल्लेख 2024 ई के ऑपरेशन 'वादा-ए-सादिक़' के दौरान किया गया था।[६७]
पहलवी शासन के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष
आयतुल्लाह ख़ामेनेई पहलवी शासन के खिलाफ संघर्ष करने वालों और ईरान की इस्लामी क्रांति के कार्यकर्ताओं में से थे। उनकी राजनीतिक गतिविधि की शुरुआत मशहद में सय्यद मुजतबा नव्वाब सफ़वी से मुलाकात के लिए जिम्मेदार ठहराई जाती है। आलोचनात्मक भाषण देने के कारण उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया[६८] और नमाज़-ए-जमात (सामूहिक प्रार्थना) का नेतृत्व करने, भाषण देने और शिक्षण जैसी गतिविधियों से रोक दिया गया।[६९] फिर भी, वे अपनी गतिविधियाँ गुप्त रूप से जारी रखते थे।[७०] उनके तफ़सीर (व्याख्या) सत्र पहले मदरसा-ए-इल्मिया-ए-मिर्ज़ा जाफ़र, मस्जिद-ए-इमाम हसन, मस्जिद-ए-क़िबला और उनके घर पर आयोजित होते थे, और दिसंबर 1973 ई से उन्हें मस्जिद-ए-करामत में स्थानांतरित कर दिया गया।[७१]
वे सय्यद महमूद तालेक़ानी, महदी बाज़रगान और यदुल्लाह सहाबी जो इमाम खुमैनी का समर्थन करने के कारण जेल में थे के संपर्क में थे[७२] और कभी-कभी राजनीतिक कैदियों से मिलने जाते थे।[७३] ख़ामेनई, कई धार्मिक विद्वानों जैसे अब्दुर्रहीम रब्बानी शिराज़ी, सय्यद मुहम्मद हुसैनी बहश्ती, अकबर हाशमी रफ़संजानी और मुहम्मद तक़ी मिस्बाह यज़्दी के साथ,[७४] एक ग्यारह-सदस्यीय समूह के सदस्य थे, जो क़ुम के धार्मिक शिक्षा केंद्र को मजबूत करने और पहलवी शासन के खिलाफ संघर्ष का समर्थन करने के लिए गठित किया गया था।[७५] इमाम खुमैनी के मरजेईयत के पद को मजबूत करने का प्रयास भी उनकी अन्य राजनीतिक गतिविधियों में से एक था।[७६]
ईरानशहर और जीरफ़्त में निर्वासन
ख़ामेनई को दिसंबर 1977 ई में राजनीतिक गतिविधि के कारण ईरानशहर निर्वासित कर दिया गया।[७७] पहलवी शासन की खुफिया एजेंसी सावाक ने अगस्त 1978 ई में उनके निर्वासन स्थल को बदलकर जीरफ़्त कर दिया[७८] और वे लगभग ढाई महीने तक वहाँ रहे। मशहद की मस्जिद-ए-मुल्ला हाशिम में इमाम खुमैनी के पुत्र सय्यद मुस्तफ़ा खुमैनी का शोक समारोह आयोजित होने के बाद निर्वासन का आदेश जारी किया गया था।[७९] निर्वासन के दौरान भी उन्होंने राजनीतिक गतिविधियाँ जारी रखीं।
आक़ा-ए-ईरानशहर[८०] और बर-तबईद[८१] नामक पुस्तकों ने उनके 258 दिनों के निर्वासन की रिवायते प्रस्तुत की हैं।
ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद
क्रांति परिषद में सदस्यता
आयतुल्लाह ख़ामेनेई क्रांति परिषद की स्थापना के प्रारंभ से ही जनवरी 1979 ई में इसकी बैठकों में भाग लेते थे[८२] और जुलाई 1980 ई में इसकी गतिविधि समाप्त होने तक वे इसके सदस्य बने रहे।[८३] क्रांति परिषद संघर्ष के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए जिम्मेदार थी, जिसमें पहलवी शासन के अधिकारियों और विदेशी देशों के साथ वार्ता, इमाम खुमैनी के स्वागत के लिए समिति का गठन[८४] और महदी बाज़रगान को अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में पेश करना शामिल था।[८५]
रक्षा और सैन्य संगठनों में उपस्थिति
जुलाई वर्ष 1979 ई में ख़ामेनेई को रक्षा मंत्रालय में क्रांति मामलों का उप प्रमुख नियुक्त किया गया और वे सुरक्षा मंत्रियों के आयोग के सदस्य बन गए।[८६] वे दस्तावेज़ केंद्र के प्रभारी और आईआरजीसी के पर्यवेक्षक भी थे।[८७] हालाँकि, फरवरी 1980 ई में पहले इस्लामी सलाहकार सभा के चुनावों में उम्मीदवारी के कारण उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया।[८८] इमाम खुमैनी के आदेश से 10 मई 1980 ई को वे सर्वोच्च रक्षा परिषद में इमाम ख़ुमैनी के प्रतिनिधि और परिषद के प्रवक्ता बने, और अपने राष्ट्रपति काल के दौरान वे युद्ध समर्थन की सर्वोच्च परिषद के प्रमुख भी थे।[८९]
इस्लामिक रिपब्लिक पार्टी की स्थापना में भूमिका
ख़ामेनई ने सय्यद मुहम्मद हुसैनी बहिश्ती, मुहम्मद जवाद बाहुनर, अकबर हाशमी रफ़संजानी और अन्य के साथ मिलकर क्रांति के दिनों में एक क्रांतिकारी संगठन बनाने के लिए गतिविधि की,[९०] जिसका नाम इस्लामिक रिपब्लिक पार्टी रखा गया और यह 18 फरवरी 1979 ई को गठित हुई।[९१] पार्टी के घोषणापत्र के प्रारूपण और उसके प्रचार में उनकी भूमिका थी।[९२] सितंबर 1981 ई में वे पार्टी के तीसरे महासचिव चुने गए[९३] और सन 1983 ई में भी वे फिर से महासचिव और केंद्रीय समिति के सदस्य चुने गए।[९४]
तेहरान के इमाम जुमा
"बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्राहीम
सय्यदुल-आलाम हुज्जतुल-इस्लाम आक़ा ए हाज सय्यद अली ख़ामेनई, चूँकि हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन आक़ा ए मुन्तज़िरी की उपस्थिति पवित्र शहर क़ुम के धार्मिक शिक्षा केंद्र में आवश्यक थी और उन्होंने तेहरान के इमाम जुमा से अपनी असहमति घोषित कर दी, इसलिए आप, जो अल्हम्दुलिल्लाह अच्छे इतिहास के लिए जाने जाते हैं और ज्ञान एवं कर्म में योग्य हैं, तेहरान का इमाम जुमा नियुक्त किया जाता हैं। मैं अल्लाह तआला से आपकी लोगों के मार्गदर्शन और हिदायत में सफलता की कामना करता हूँ।"
इमाम खुमैनी ने 15 जनवरी 1980 ई को आयतुल्लाह ख़ामेनई को तेहरान का इमाम जुमा नियुक्त किया।[९५] इस पद पर उनके कार्यों में आइम्मा ए जुमा के नेटवर्क को एकजुट करने के लिए उनके सम्मेलन आयोजित करने का प्रस्ताव देना[९६] और दूसरे फ़ारसी के बाद अरबी में ख़ुत्बा देना शामिल था।
इस्लामी सलाहकार सभा में प्रतिनिधित्व
आयतुल्लाह ख़ामेनई, मार्च 1980 ई में पहले कार्यकाल के इस्लामी सलाहकार सभा के चुनावों में, मिलिटेंट क्लर्जी की सोसायटी और इस्लामिक रिपब्लिक पार्टी के समर्थन से,[९७] तेहरान निर्वाचन क्षेत्र से सभा में प्रवेश किया और रक्षा मामलों की समिति के सदस्य और अध्यक्ष रहे।
इस्लामी गणराज्य ईरान के राष्ट्रपति का कार्यकाल
आयतुल्लाह ख़ामेनई 2 अक्टूबर वर्ष 1981 ई को, 95.11 प्रतिशत वोट प्राप्त करके, इस्लामी गणराज्य ईरान के तीसरे राष्ट्रपति चुने गए।[९८] यह चुनाव मुहम्मद अली रजाई की शहादत के बाद हुआ था। इस चुनाव में, इस्लामिक रिपब्लिक पार्टी की केंद्रीय समिति और क़ुम के धार्मिक शिक्षा केंद्र के शिक्षकों की समीति ने राष्ट्रपति चुनाव में उनकी उम्मीदवारी का समर्थन किया। इमाम खुमैनी- जो उस समय तक धार्मिक विद्वानों के राष्ट्रपति पद संभालने के पक्ष में नहीं थे- ने उम्मीदवारी से सहमती सताई।[९९] वे 16 अगस्त वर्ष 1985 ई को भी, कुल 1,42,38,587 मतों में से 1,22,05,012 (85 प्रतिशत) वोट प्राप्त करके, दूसरी बार ईरान के राष्ट्रपति चुने गए और अगस्त 1989 ई तक इस पद पर रहे।
इमाम खुमैनी ने आयतुल्लाह ख़ामेनई के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान, विभिन्न विधेयकों के पारित होने में इस्लामी सलाहकार सभा और संरक्षक परिषद के बीच विवादों को हल करने के लिए, व्यवस्था के हितों का निर्धारण करने वाली परिषद के गठन पर सहमति व्यक्त की,[१००] और आयतुल्लाह ख़ामेनई उसके पहले अध्यक्ष बने,[१०१] और अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के अंत तक इस पद पर बने रहे।[१०२]
विदेश यात्राएँ
आयतुल्लाह ख़ामेनई ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान सीरिया, लीबिया, अल्जीरिया, पाकिस्तान, तंजानिया, ज़िम्बाब्वे, अंगोला, मोज़ाम्बिक, यूगोस्लाविया, रोमानिया, चीन और उत्तर कोरिया की यात्राएँ कीं।[१०३] राष्ट्रपति बनने से पहले, उन्होंने 11 फरवरी से 26 फरवरी 1981 ई तक भारत की एक प्रचार यात्रा भी की थी।[१०४]
आयतुल्लाह ख़ामेनई ने 22 सितंबर 1987 ई को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 42वें सत्र में भाषण दिया। यह इस्लामी गणराज्य ईरान के किसी राष्ट्रपति की महासभा में पहली उपस्थिति थी।[१०५][नोट २] उन्होंने ज़िम्बाब्वे की राजधानी हरारे में गुटनिरपेक्ष देशों के आठवें शिखर सम्मेलन में भी भाषण दिया।[१०६]
मुस्लिम सेनानियों का समर्थन
लेबनान, फ़िलिस्तीन, इराक और अफ़गानिस्तान में इस्लामी सेनानियों के लिए ईरान का समर्थन बढ़ा, और ईरान के समर्थन ने उन समूहों की क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्थिति को मजबूत किया।[१०७] अफ़गानिस्तान के आठ दलों से इस्लामी एकता पार्टी और इराक की इस्लामी क्रांति की सर्वोच्च परिषद का गठन इस दृष्टिकोण के परिणामों में से माना जाता है।
इस्लामिक एनसाइक्लोपीडिया फ़ाउंडेशन की स्थापना
इस्लामिक एनसाइक्लोपीडिया फ़ाउंडेशन की स्थापना सन 1983 ई में दानिशनामा-ए-जहान-ए-इस्लाम को संकलित करने के उद्देश्य से, आयतुल्लाह ख़ामेनेई की निगरानी और मार्गदर्शन के तहत की गई थी। इस फ़ाउंडेशन के संस्थापकों का मानना है कि इस्लामी दुनिया के बारे में पश्चिमी विश्वकोश अक्सर पश्चिमी दृष्टिकोण से प्रभावित होकर लिखे गए हैं।[१०८] 'दानिशनामा-ए-जहान-ए-इस्लाम' 60 खंडो पर आधारित हैं, और मई 2024 ई तक, इसके 33 खंड प्रकाशित हो चुके हैं।[१०९]
इस्लामी गणराज्य ईरान का नेतृत्व काल
इमाम खुमैनी के 4 जून 1989 ई के निधन के साथ, नेतृत्व विशेषज्ञ परिषद ने उसी दिन बैठक आयोजित कर आयतुल्लाह ख़ामेनेई को इस्लामी गणराज्य ईरान का नेता चुन लिया।[११०] संविधान में संशोधन और जनमत संग्रह के आयोजन के बाद, नेतृत्व विशेषज्ञ परिषद ने नए संविधान के अनुसार फिर से मतदान किया और उनके नेतृत्व की पुष्टि की। विशेषज्ञों की सभा की वार्ताओं से प्रकाशित ऑडियो दस्तावेजों के अनुसार, इस सत्र के दौरान, अकबर हाशमी रफसंजानी ने इमाम खुमैनी के उन कथनों को उद्धृत किया जिसमें आयतुल्लाह ख़ामेनेई को नेतृत्व के लिए योग्य बताया गया था।[१११]
इस चुनाव के परिणामस्वरूप, व्यवस्था के अधिकारियों, इमाम खुमैनी के परिवार, मराजे-ए-तकलीद और जनता के विभिन्न वर्गों ने उनसे बैअत की।[११२] सय्यद अहमद खुमैनी ने उनके नेतृत्व पर बधाई दी और वली ए फ़क़ीह के आदेशों का पालन करना आवश्यक बताया।[११३] ये बैअतें देश के विभिन्न हिस्सों में सार्वजनिक समारोहों और रैलियों के रूप में की गईं।[११४]
हाजीयो के नाम वार्षिक संदेश
हज के दिनों के अवसर पर हाजीयो को संबोधित एक संदेश जारी करना, नेतृत्व काल में आयतुल्लाह ख़ामेनई की वार्षिक गतिविधियों में से एक है।[११५] इन संदेशों में वे इस्लामी जगत के मुद्दों, मुसलमानों की एकता और इस्लामी उम्मत के कर्तव्यों पर जोर देते हैं।[११६] उनका पहला संदेश वर्ष 1990 ई में जारी किया गया था, जिसमें हज के राजनीतिक इबादत के पहलू को पुनर्जीवित करने और मूर्तिपूजको से बराअत के सिद्धांत पर जोर दिया गया था, और खूनी हज की घटना का संदर्भ देते हुए ईरानियों को हज से वंचित करने को इसी ढांचे में समझाया गया था।[११७] उनका सबसे हालिया संदेश हज वर्ष 1446 हिजरी जून 2025 ई के अवसर पर पढ़ा गया।[११८]
प्रतिरोध मोर्चे को मजबूत करना और समर्थन देना

आयतुल्लाह ख़ामेनई प्रतिरोध की धुरी के मुख्य समर्थकों में से एक रहे हैं।[११९] कुछ शोधों की रिपोर्ट के अनुसार, उनके समर्थन से प्रतिरोधी समूहों की क्षमता, विशेष रूप से फिलिस्तीन में, मजबूत हुई है और क्षेत्र में प्रतिरोध का संतुलन बदल गया है।[१२०]
"चाहे यह पाठ स्वीकृत हो जाए या न हो, हम क्षेत्र में अपने दोस्तों का समर्थन करना नहीं छोड़ेंगे: मज़लूम फ़िलिस्तीनी राष्ट्र से, मज़लूम यमनी राष्ट्र से, सीरियाई राष्ट्र और सरकार से, इराकी राष्ट्र और सरकार से, बहरीन के मज़लूम लोगों से, लेबनान और फ़िलिस्तीन में प्रतिरोध के सच्चे सेनानी; हमेशा हमारे समर्थन के पात्र रहेंगे।"[१२१]
ईरान का इज़राइल और अमेरिका के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का आदेश
14 अप्रैल 2024 ई को, सीरिया की राजधानी दमिश्क़ में ईरानी वाणिज्य दूतावास पर इज़राइली हमले की प्रतिक्रिया में, इस्लामिक क्रांति के पासदारान ने ईरानी धरती से मिसाइलों और ड्रोनों को दागते हुए, अधिकृत क्षेत्रों में सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया।[१२२] इस कार्रवाई को ईरान और इज़राइल के बीच पहला प्रत्यक्ष सैन्य टकराव माना गया है।[१२३] इस ऑपरेशन से पहले, आयतुल्लाह ख़ामेनई ने इज़राइल को दंडित करने और उसे पछतावे वाला जवाब देने की बात कही थी।[१२४] इसके अलावा, 13 जून 2025 ई को, ईरान पर इज़राइली हमले और सिपाह के कई कमांडरों तथा परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या के बाद, उन्होंने घोषणा की कि ईरान के सशस्त्र बल इज़राइल को भारी झटके देंगे।[१२५] उनके शब्दों के प्रकाशन के साथ ही, इस्लामी गणराज्य के सशस्त्र बलों ने अधिकृत क्षेत्रों में सैन्य और सुरक्षा ठिकानों को निशाना बनाया।
इसी प्रकार उनके आदेश अनुसार सिपाह पासदारान ने वर्ष 2020 ई और वर्ष 2025 ई मे क़ासिम सुलैमानी की हत्या और अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर हमले की प्रतिक्रिया मे इराक और कतर मे अमेरीकी एयरबेस ऐनुल असद और अल अदीद को निशाना बनाया।
पश्चिमी युवाओं से बिना मध्यस्थता के इस्लाम को जानने का आह्वान
वर्ष 2014 में, फ्रांस में मुसलमानों के एक समूह द्वारा एक आतंकवादी घटना के घटित होने के बाद, आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने यूरोप और उत्तरी अमेरिका के युवाओं को एक संदेश जारी किया और उनसे इस्लाम को जानने के लिए क़ुरआन और पैग़म्बर (स) के जीवन की ओर रुख करने का आग्रह किया।[१२६] यह संदेश 'नामा-ई-बराए तो' शीर्षक से विभिन्न भाषाओं में और सोशल नेटवर्क्स पर प्रकाशित किया गया।[१२७] 29 नवंबर 2015 ई को भी, पेरिस में पीले जैकिट के विद्रोह के बाद, उन्होंने पश्चिमी युवाओं को एक और पत्र लिखा।[१२८]
अमेरिका में फ़िलिस्तीनी लोगों का समर्थन करने वाले छात्रों के साथ एकजुटता व्यक्त करना
आयतुल्लाह खामेनेई ने 25 मई 2024 ई को, अमेरिकी विश्वविद्यालयों में फ़िलिस्तीनी लोगों का समर्थन करने वाले छात्रों को एक पत्र में उनके साथ सहानुभूति और एकजुटता व्यक्त की। इस पत्र में, उन्होंने इन छात्रों को प्रतिरोध मोर्चे का एक हिस्सा और अमेरिका को इज़राइल का सबसे बड़ा समर्थक बताया, तथा फ़िलिस्तीनियों के आत्मरक्षा के अधिकार पर जोर दिया। उन्होंने सही रास्ते पर डटे रहना उन सीखो में से गिनाया जो क़ुरआन ने मनुष्यों को सिखाई है, और उन्हें क़ुरआन से परिचित होने की सलाह दी।[१२९]
आयतुल्लाह खामेनेई के समर्थन से स्थापित संस्थान
- मजमा-ए-जहानी-ए-अहले-बैत (स्थापना: 1989 ई): इस्लाम का परिचय कराने, क़ुरआन और अहले-बैत (अ) की शिक्षाओं के प्रसार और दुनिया में अहले-बैत के अनुयायियों का समर्थन करने के लिए।[१३०]
- मजमा-ए-जहानी-ए-तक़रीब-ए-मज़ाहिब-ए-इस्लामी (स्थापना: 1989 ई): इस्लामी दुनिया के धार्मिक विद्वानों के एक समूह से मिलकर बना संगठन, जो इस्लामी संप्रदायों के बीच सामंजस्य के लिए है।
- मरकज़-ए-तहक़ीक़ात-ए-काम्प्यूटरी-ए-उलूम-ए-इस्लामी (स्थापना: 1989 ई): सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करके, इस्लामी विज्ञानों के स्रोतों और ग्रंथों तक आसान पहुँच के लिए।[१३१]
- मुआस्सेसा-ए-दाएरतुल-मआरिफ़-ए-फ़िक़्ह-ए-इस्लामी बर मज़हब-ए-अहले-बैत (स्थापना: 1990 ई): क़ुम में न्यायशास्त्र, न्यायशास्त्र के सिद्धांत और धर्मशास्त्र के क्षेत्र में एक शोध और शैक्षिक संस्थान।
- जामेअत-अल-मुस्तफ़ा अल-आलमिया (स्थापना: 2007 ई): इस्लामी विज्ञानों के विस्तार और गैर-ईरानी धार्मिक छात्रों को प्रशिक्षित करने के लिए एक धार्मिक शिक्षा संस्थान।[१३२]
- मरकज़-ए-ख़िदमात-ए-हौज़ा-हाए-इल्मिया (धार्मिक शिक्षा केंद्रों की सेवा केंद्र) (स्थापना: 1991 ई): गैर-कार्यरत धार्मिक छात्रों और धार्मिक विद्वानों का आजीविका, आवास आदि के क्षेत्रों में समर्थन करने के लिए।[१३३]
- सिताद-ए-एक़ामा-ए-नमाज़ (प्रार्थना स्थापना मुख्यालय): नमाज़ के एक़ामा के विकास और प्रचार के लिए विशेष संस्था।[१३४]
धार्मिक नेताओं की सहस्राब्दी बैठक के लिए संदेश
आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने सितंबर 2000 ई जो अगस्त 2000 ई. के अनुरूप है, संयुक्त राष्ट्र में वैश्विक शांति लिए धार्मिक नेताओं की सहस्राब्दी बैठक के लिए एक संदेश भेजा और याद दिलाया कि कई सत्ता-लोलुप धर्म का दुरुपयोग करते हैं, और इस्लामी गणराज्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती दुनिया के बड़े सत्ता-लोलुपों द्वारा उस पर थोपी जाने वाली समस्याओं को बेअसर करना है।[१३५] यह संदेश आयतुल्लाह जवादी आमोली द्वारा इस बैठक में ईरानी प्रतिनिधि के रूप में पढ़ा गया था।[१३६]
फ़ुटनोट
- ↑ «تاریخ تولد دقیق رهبر انقلاب به روایت خودشان خبر آنلاین», ख़बर ऑनलाइन।
- ↑ शरीफ़ राज़ी, गंजीना ए दानिशमंदान, भाग 7, पेज 128।
- ↑ शरीफ़ राज़ी, गंजीना ए दानिशमंदान, भाग 7, पेज 128।
- ↑ ज़ंगनेह, मशाहीर मदफ़ून दर हरम रज़वी, भाग 1, पेज 77।
- ↑ «نگاهی گذرا به زندگینامهی حضرت آیتاللهالعظمی سید علی حسینی خامنهای», हज़रत आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण एवं प्रकाशन कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ «آستان امامزاده محمد(ع) - تفرش», ईस्ना।
- ↑ «سایت نگاهی گذرا به زندگینامهی حضرت آیتاللهالعظمی سید علی حسینی خامنهای», हज़रत आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण एवं प्रकाशन कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ «سایت نگاهی گذرا به زندگینامهی حضرت آیتاللهالعظمی سید علی حسینی خامنهای»,हज़रत आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण एवं प्रकाशन कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ ज़ंगनेह, मशाहीर मदफ़ून दर हरम रज़वी, भाग 1, पेज 458।
- ↑ «سایت نگاهی گذرا به زندگینامهی حضرت آیتاللهالعظمی سید علی حسینی خامنهای», हज़रत आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण एवं प्रकाशन कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ «آیتالله مکارم شیرازی: تهدیدکننده رهبری و مرجعیت حکم «محارب» دارد», जुम्हूरी इस्लामी समाचार एजेंसी; «پاسخ استفتا از مرجع عالیقدر حضرت آیت الله العظمی نوری همدانی «مدظله العالی» در پی تهدید آمریکا و رژیم صهیونیستی نسبت به مقام معظم رهبری «دامت برکاته»,हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा नूरी हमदानी का कार्यालय।
- ↑ «واکنش قاطع مراجع تقلید و علما نسبت به گستاخی ترامپ به رهبر انقلاب», रसा न्यूज़ एजेंसी।
- ↑ «حوزه علمیه نجف بر علیه تهدید گستاخانه «ترامپ جنایتکار» مبنی بر ترور امام خامنهای واکنش شدید نشان داد», दानिशजू न्यूज़ एजेंसी।
- ↑ हाशमी, इंक़ेलाब दर..., पेज 176।
- ↑ क़बादी, «گزارشی از ماجرای ترور ۶ تیر ۱۳۶۰»।
- ↑ «بازخوانی 24 ترور پس از پیروزی انقلاب اسلامی», असनाद इंक़ेलाब इस्लामी केंद्र।
- ↑ «ترور نافرجام آیت الله خامنهای», तिब्यान।
- ↑ ख़ामेनई, हमरज़मान हुसैन, पेज 6।
- ↑ «بیانات آیتالله خامنهای در دیدار تولیدکنندگان و فعالان اقتصادی», आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण और प्रकाशन के कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ «بیانات آیتالله خامنهای در دیدار مداحان اهلبیت(ع)», आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण और प्रकाशन के कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ सुखंरानी, 19 मेहेर 1368।
- ↑ «بیانات آیتالله خامنهای در دیدار اقشار مختلف مردم به مناسبت عید غدیر», आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण और प्रकाशन के कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ «آیتالله خامنهای: توهین به عایشه و هر یک از نمادهای اهل سنت حرام است»,ऑनलाइन समाचार की वेबसाइट।
- ↑ «[१]»
- ↑ «مجسمه سردار انگلیسی در هند», आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण और प्रकाशन के कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ «بیانات آیتالله خامنهای در دیدار جمعی از کارگزاران فرهنگی», आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण और प्रकाशन के कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ देखेः दग़दग़ेहा ए फ़रहंगी इंतेशारात सहबा।
- ↑ «بیانات آیتالله خامنهای در دیدار جمعی از کارگزاران فرهنگی», आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण और प्रकाशन के कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ «بیانات آیتالله خامنهای در دیدار اساتید دانشگاهها ۲۲ مرداد ۱۳۹۱ش», आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण और प्रकाशन के कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ तक़वी, रीशेहा ए बहार ए अरबी व दोमीनूई फ़ुरूपाशी रजीम हाए अरब, पेज 4।
- ↑ «خطبههای ۱۵ بهمن ۱۳۸۹», आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण और प्रकाशन के कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ सुल्ह मिर्ज़ाई, फ़िलिस्तीन अज़ मंज़र आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई, पेज 599।
- ↑ सुल्ह मिर्ज़ाई, फ़िलिस्तीन अज़ मंज़र आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई, पेज 487-490।
- ↑ सुल्ह मिर्ज़ाई, फ़िलिस्तीन अज़ मंज़र आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई, पेज 499-500।
- ↑ यूसुफ़ी, निज़ाम इक़्तेसादी मुक़ावेमती, पेज 32।
- ↑ «اقتصاد-مقاومتی-چیست», जवान पत्रकार समूह।
- ↑ «مروری بر نامگذاری سالها توسط رهبر انقلاب از ۱۳۷۸ تا امروز», ईमना समाचार एजेंसी। «بررسی علت نامگذاری سالها در گفتوگو با مشاور عالی رهبر انقلاب», आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण और प्रकाशन के कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ «بیانیه «گام دوم انقلاب» آیتالله خامنهای خطاب به ملت ایران», आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण और प्रकाशन के कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ «حوزه پیشرو و سرآمد», आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण और प्रकाशन के कार्यालय की वेबसाइट।
- ↑ «منطق مقاومت | سه. بیشتر بودن هزینه سازش از هزینه مقاومت», आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामनेई के कार्यों के संरक्षण और प्रकाशन के कार्यालय की वेबसाइट।
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नोट
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