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प्रारूप:इंशाअल्लाह

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क़ुरआन की सूरह यूसुफ़, आयत 99 के एक हिस्से की सुलेख कला, जिसे मुहम्मद बदवी अल-दैरानी ने 1353 हिजरी में ख़त्त-ए-सुलुस शैली में लिखा था। इसमें «इंशाअल्लाह» का अंश भी है।

इंशाअल्लाह, जिसका अर्थ है «यदि अल्लाह ने चाहा», एक ऐसा वाक्यांश है जिसका उपयोग मुसलमान अपनी रोज़मर्रा की बातचीत में भविष्य में किए जाने वाले किसी काम के बारे में करते हैं। इसका उपयोग दुआ की क़बूलियत की आशा व्यक्त करने के लिए भी किया जाता है।[१]

क़ुरआन और मासूमीन (अ) ने मुसलमानों को सलाह दी है कि जब वे भविष्य में कोई काम करने की बात करें, तो «इंशाअल्लाह» कहें। इसी कारण यह वाक्यांश धार्मिक लोगों की भाषा का हिस्सा बन गया है और उनके रोज़मर्रा के जीवन में अल्लाह पर भरोसा रखने की निशानी के रूप में इस्तेमाल होता है।[२]

सूरह कहफ़ की आयत 23 और 24 में अल्लाह पैग़म्बर (स) से कहता है कि किसी भी काम के बारे में यह न कहें कि मैं इसे कल करूँगा, सिवाय इसके कि आप कहें, “यदि अल्लाह ने चाहा।”[३] इमाम सादिक़ (अ) से वर्णित एक रिवायत में इन आयतों के शाने-नुज़ूल के बारे में बताया गया है कि यहूदियों का एक समूह पैग़म्बर (स) के पास उनसे कुछ सवाल पूछने आया। पैग़म्बर (स) ने उनसे कहा कि वे अगले दिन आएँ, ताकि वे उनके सवालों के जवाब दे सकें, लेकिन उन्होंने «इंशाअल्लाह» नहीं कहा। इसके बाद जिब्रईल (अ) चालीस दिनों तक उनके पास वही लेकर नहीं आए। अंततः इस अवधि के बाद ये आयतें उन पर नाज़िल हुईं।[४]

इन्हीं आयतों के अंतर्गत एक दूसरी रिवायत में «इंशाअल्लाह» कहने के महत्व के बारे में बताया गया है कि यदि कोई व्यक्ति «इंशाअल्लाह» कहना भूल जाए, तो जब भी उसे याद आए, वह यह वाक्य कह दे।[५] इसी तरह, कुलैनी द्वारा वर्णित एक रिवायत के अनुसार, इमाम सादिक़ (अ) ने एक पत्र लिखने का आदेश दिया। जब पत्र लिख लिया गया और उन्होंने उसे «इंशाअल्लाह» के बिना पाया, तो उन्होंने कहा कि तुम्हें कैसे आशा थी कि यह पत्र «इंशाअल्लाह» के बिना पूरा हो जाएगा? इसके बाद उन्होंने उसमें «इंशाअल्लाह» जोड़ने का आदेश दिया।[६]

बंदे के ईमान के पूर्ण होने की निशानी यह है कि वह हर काम में «इंशाअल्लाह» कहे।

मुत्तक़ी हिंदी, कंज़ुल उम्माल, खंड 3, पृष्ठ 55।

शिया मरजा-ए-तक़लीद और मुफ़स्सिर नासिर मकारिम शीराज़ी के अनुसार, तफ़सीरे नमूना में भविष्य से संबंधित अपने इरादों को व्यक्त करते समय «इंशाअल्लाह» कहना अल्लाह की बारगाह में अदब का एक तरीक़ा और तौहीदे अफ़आली (कर्मों में एकेश्वरवाद) को दर्शाता है। इसका अर्थ यह है कि इंसान के पास स्वतंत्र इच्छा और इच्छा की स्वतंत्रता होने के बावजूद, हर चीज़ के अस्तित्व और हर काम के होने को अल्लाह की मशीयत (इच्छा) पर निर्भर माना जाता है।[७] तफ़सीर अल-मीज़ान के लेखक सय्यद मुहम्मद हुसैन तबातबाई का भी मानना है कि जो व्यक्ति किसी काम को करने के लिए «इंशाअल्लाह» कहता है, उसका आशय यह होता है कि वह काम तभी होगा, जब वह अल्लाह की तकवीनी इच्छा ((अल्लाह की वह इच्छा जिसके अनुसार संसार और उसकी चीज़ों का अस्तित्व में आना निर्धारित होता है)) के अनुरूप होगा।[८]

ईरान और अन्य मुस्लिम देशों के धार्मिक लोगों के बीच «इंशाअल्लाह» का इस्तेमाल «ख़ुदा की मर्ज़ी से», «ख़ुदा से उम्मीद है» और «इशाअल्लाह» जैसे दूसरे शब्दों और वाक्यांशों के साथ भी किया जाता है।[९]

फ़ुटनोट

  1. ↑ मूसवी आमुली, «ان‌شاء‌الله در فرهنگ عامیانه», जामेअ उलूमे इंसानी वेबसाइट।
  2. ↑ मूसवी आमुली, «ان‌شاء‌الله در فرهنگ عامیانه», जामेअ उलूमे इंसानी वेबसाइट।
  3. ↑ सूरह कहफ़, आयत 23 और 24; तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 20, पृष्ठ 143।
  4. ↑ शेख़ सदूक़, मन ला यहज़रोहुल फ़क़ीह, खंड 3, पृष्ठ 362–363; हुवैज़ी, तफ़सीर नूरुस सक़लैन, खंड 3, पृष्ठ 255।
  5. ↑ अय्याशी, तफ़सीर अल-अय्याशी, खंड 2, पृष्ठ 325।
  6. ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 2, पृष्ठ 673।
  7. ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़सीर नमूना, खंड 12, पृष्ठ 389।
  8. ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 13, पृष्ठ 271।
  9. ↑ मूसवी आमुली, «ان‌شاء‌الله در فرهنگ عامیانه», जामेअ उलूमे इंसानी वेबसाइट।

स्रोत

  • क़ुरआन करीम।
  • अय्याशी, मुहम्मद बिन मसऊद, तफ़सीर अल-अय्याशी, शोध एवं संपादन: सय्यद हाशिम रसूली महल्लाती, तेहरान, अल-इल्मिय्या मुद्रणालय, 1380 हिजरी।
  • कुलैनी, मुहम्मद बिन याक़ूब, अल-काफ़ी, सुधार एवं संपादन: अली अकबर ग़फ़्फ़ारी और मुहम्मद आख़ूंदी, तेहरान, दारुल कुतुब अल-इस्लामिय्या प्रकाशन, 1407 हिजरी।
  • तबातबाई, सय्यद मुहम्मद हुसैन, अल-मीज़ान फ़ी तफ़सीरिल क़ुरआन, बेरूत, अल-आलमी प्रकाशन संस्थान, 1393 हिजरी।
  • मकारिम शीराज़ी, नासिर, तफ़सीर नमूना, तेहरान, दारुल कुतुब अल-इस्लामिय्या प्रकाशन, 1374 शम्सी।
  • मुत्तक़ी हिंदी, अली बिन हुसामुद्दीन, कंज़ुल उम्माल, प्रकाशन स्थान अज्ञात, अर-रिसाला संस्थान, 1401 हिजरी।
  • मूसवी आमुली, सय्यद मोहसिन, «ان‌شاء‌الله در فرهنگ عامیانه» (आम बोलचाल की संस्कृति में इंशाअल्लाह), जामेअ उलूमे इंसानी वेबसाइट, देखने की तारीख: 13 अक्टूबर 2026 ईस्वी।
  • शेख़ सदूक़, मुहम्मद बिन अली, मन ला यहज़रोहुल फ़क़ीह, क़ुम, क़ुम के हौज़ा इल्मिया के मुदर्रिसीन की जमाअत से संबद्ध इस्लामी प्रकाशन कार्यालय, दूसरा संस्करण, 1413 हिजरी।
  • हुवैज़ी, अब्दुल अली बिन जुमा, तफ़सीर नूरुस सक़लैन, सुधार एवं संपादन: सय्यद हाशिम रसूली महल्लाती, क़ुम, इस्माईलियान प्रकाशन, 1415 हिजरी।