प्रारूप:नेअमत

नेअमत, भौतिक और आध्यात्मिक वे उपहार, जो अल्लाह ने इंसान को प्रदान किए हैं। धार्मिक ग्रंथों में नेअमतों की अधिकता और उनका न गिना जा सकना, साथ ही इंसान की ओर से उनका शुक्र अदा करने में असमर्थता पर ज़ोर दिया गया है।
क़ुरआन मोमिनों को अल्लाह की नेअमतों को याद करने और उनकी नाशुक्री से बचने का आह्वान करता है। नेअमत की नाशुक्री, जो दिल, ज़बान और अमल के रूप में प्रकट हो सकती है, के परिणामस्वरूप नेअमतों का छिन जाना, आख़िरत का अज़ाब और दुआओं का क़बूल न होना जैसी चीज़ें सामने आती हैं।
नेअमतें दो प्रकार की होती हैं: दुनियावी और आख़िरत की नेअमतें। सृष्टि की रचना, हिदायत, चेहरे की सुंदरता और सुरक्षा इन नेअमतों के उदाहरण हैं। इनमें अहले-बैत (अ) की विलायत को अल्लाह की सबसे बड़ी नेअमत माना गया है। दुनियावी नेअमतें अल्लाह की परीक्षा का साधन हो सकती हैं। यदि इनके साथ शुक्रगुज़ारी और सही उपयोग न हो, तो ये अल्लाह की नाराज़गी का संकेत और इंसान की ग़फ़लत का कारण बन सकती हैं।
अवधारणा की व्याख्या
नेअमत का अर्थ रोज़ी, माल और दूसरी चीज़ें हैं, जो अल्लाह ने इंसान को दी हैं।[१] इब्ने-मंज़ूर के अनुसार, लिसानुल-अरब में अल्लाह की नेअमत उस उपहार को कहा गया है, जो विशेष रूप से अल्लाह की ओर से प्रदान किया जाता है; जैसे आँख और कान, जिन्हें देने की क्षमता किसी भी मख़्लूक़ में नहीं है।[२]
कुछ आयतों[नोट १] और रिवायतों में नेअमतों के न गिने जा सकने[३] और इंसान की ओर से उनका शुक्र अदा करने में असमर्थता का उल्लेख किया गया है।[४] इमाम अली (अ) ने नहजुल-बलाग़ा के पहले ख़ुत्बे के आरंभ में कहा है: «الحَمدُ للّه ِ الذي لا يَبلُغُ مِدحَتَهُ القائلونَ ، و لا يُحصِي نَعماءَهُ العادُّونَ» (अल्हम्दो लिल्लाहिल्लज़ी ला यबलुग़ो मिद्हतहुल क़ाइलून, वला युह्सी नअमाअहुल आद्दून), (अनुवाद: सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसकी प्रशंसा तक वक्ता नहीं पहुँच सकते और जिसके उपहारों को गिनने वाले गिन नहीं सकते।”[५]
उदाहरण और प्रकार
अल्लामा तबातबाई ने सूर ए नहल की आयत 18 के आधार पर पूरी सृष्टि को अल्लाह की नेअमतों का एक समूह माना है, जिनकी पूरी गिनती करना इंसान के लिए संभव नहीं है।[६] शेख़ तूसी ने अमाली में इमाम अली (अ) से एक रिवायत वर्णित की है जिसमें अल्लाह की नेअमतों का उल्लेख किया है, जिनमें जीवन, चेहरे की सुंदरता, शरीर का संतुलित होना, समझने की शक्ति, हिदायत और आसमानों तथा ज़मीन को इंसान के अधीन करना शामिल हैं।[७]
भौतिक और आध्यात्मिक नेअमतें
ख़ुदा की क़सम! हम ही अल्लाह की वे नेअमत हैं, जिन्हें अल्लाह ने अपने बंदों को प्रदान किया है। और जो भी कामयाब हुआ है, वह हमारी पैरवी करने के कारण कामयाब हुआ है।
- भौतिक नेअमतें: सृष्टि की रचना, परिवार और सुरक्षा।
- आध्यात्मिक नेअमतें: जैसे विलायत और एकता।[८] शिया रिवायतों के अनुसार, अहले-बैत (अ) की विलायत अल्लाह की सबसे बड़ी नेअमत है।[९]
दुनियावी और आख़िरत की नेअमतें
- दुनियावी नेअमतें: जैसे इंसान की रचना, पेड़-पौधे, ज़मीन और आसमान।
- आख़िरत की नेअमतें: जैसे जन्नत में बाग़, चश्मे, फल और सुंदर तथा वफ़ादार जीवनसाथी।[१०]
नेअमत का शुक्र और नाशुक्री
क़ुरआन में «فَاذْكُرُوا آلَاءَ اللَّهِ» "फ़ज़्कुरू आलाअल्लाहि।" (अल्लाह की नेअमतों को याद करो) और «يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اذْكُرُوا نِعْمَةَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ» "या अय्युहल्लज़ीना आमनू, उज़्कुरू निअमतल्लाहि अलैकुम।" (ऐ ईमान वालो! अपने ऊपर अल्लाह की नेअमत को याद करो) जैसे वाक्यों के ज़रिए मोमिनों से कहा गया है कि वे अल्लाह की नेअमतों को याद करें।[११] क़ुरआन की आयतों में नेअमत की नाशुक्री की निंदा की गई है और इसके विपरीत, नेअमत का शुक्र अदा करने पर ज़ोर दिया गया है।[१२]
शिया टीकाकार नासिर मकारिम शीराज़ी के अनुसार, नेअमत की नाशुक्री तीन रूपों में होती है: दिल में नेअमत को महत्वहीन समझना, ज़बान से उसका महत्व स्वीकार न करना और नेअमत का ग़लत कामों में इस्तेमाल करना।[१३] धार्मिक ग्रंथों में नेअमत की नाशुक्री के कई परिणाम बताए गए हैं। इनमें अल्लाह की पहचान से वंचित रहना, नेअमत का छिन जाना, हलाकत और विनाश, आख़िरत का अज़ाब, इस्तिदराज़ (धीरे-धीरे अज़ाब की ओर बढ़ना), ईर्ष्या पैदा होना,[१४] भलाई के रास्ते बंद हो जाना,[१५] दुनिया में जल्दी सज़ा मिलना,[१६] दुआ का क़बूल न होना[१७] और क़ब्र का दबाव शामिल हैं।[१८]
नेअमतों की अधिकता के ज़रिए अल्लाह की परीक्षा
सूर ए फ़ज्र की आयत 15 के अनुसार, नेअमतों की अधिकता का अर्थ यह नहीं है कि बंदा अल्लाह के निकट है, बल्कि यह उसकी परीक्षा का साधन भी हो सकती है।[१९] अल्लामा मजलिसी ने इमाम सादिक़ (अ) की एक रिवायत के आधार पर स्पष्ट किया है कि धर्म और ईमान की प्राप्ति अल्लाह की कृपा और प्रेम का संकेत है, लेकिन केवल धन और पद को अल्लाह की प्रसन्नता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।[२०] यह भी कहा गया है कि क़ुरआन की कुछ आयतों के अनुसार, पापियों को बहुत अधिक नेअमतें मिलना उनके लिए एक प्रकार का धीरे-धीरे मिलने वाला अज़ाब (इस्तिदराज) हो सकता है।[२१] छठे इमाम से वर्णित एक रिवायत के अनुसार, नेअमतों की अधिकता उन्हें इस्तिग़फ़ार (अल्लाह से माफ़ी माँगने) से ग़ाफ़िल कर सकती है।[२२] मुर्तज़ा मुतह्हरी के अनुसार, यदि नेअमतों की अधिकता के साथ शुक्रगुज़ारी और उनका सही उपयोग भी हो, तो यह अल्लाह की रहमत का संकेत हो सकती है, न कि इस्तिदराज के अज़ाब का।[२३]
फ़ुटनोट
- ↑ इब्ने फ़ारिस, मोजम मक़ाईस अल-लुग़ह, खंड 5, पृष्ठ 446।
- ↑ इब्ने मंज़ूर, लिसान अल-अरब, खंड 12, पृष्ठ 580।
- ↑ तूसी, अल-अमाली, पृष्ठ 492।
- ↑ मिस्बाह, सज्जादेहाए सुलूक, खंड 1, पृष्ठ 412–435।
- ↑ सुब्ही सालेही, नहजुल बलाग़ा, ख़ुत्बा 1, पृष्ठ 39।
- ↑ तबातबाई, तफ़्सीर अल-मीज़ान, खंड 12, पृष्ठ 60।
- ↑ तूसी, अल-अमाली, पृष्ठ 492।
- ↑ मुस्तफ़वी ज़ादेह, बर्रसी वाजेह नेअमत अज़ मंज़रे तावील दर क़ुरआन व रिवायाते मासूमीन, पृष्ठ 25।
- ↑ मजलिसी, बिहारुल अनवार, खंड 24, पृष्ठ 48; मकारिम शीराज़ी, पयामे क़ुरआन, खंड 6, पृष्ठ 387।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीरे नमूना, खंड 23, पृष्ठ 91।
- ↑ सूर ए आराफ़, आयत 74; सूर ए अहज़ाब, आयत 9।
- ↑ सूर ए बक़रा, आयत 152; सूर ए इब्राहीम, आयत 7; सूर ए नम्ल, आयत 40; सूर ए लुक़मान, आयत 12; सूर ए सबा, आयत 15–17; सूर ए नहल, आयत 112 देखें।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, अख़लाक़ दर क़ुरआन, पृष्ठ 60।
- ↑ मिस्बाहुश शरीया, पृष्ठ 104।
- ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 47, पृष्ठ 33।
- ↑ मुफ़ीद, अल-अमाली, पृष्ठ 237; तूसी, अल-अमाली, पृष्ठ 450।
- ↑ लैसी वास्ती, उयूनुल हिकम, पृष्ठ 524।
- ↑ सदूक़, इललुश शराए, खंड 1, पृष्ठ 309।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़्सीरे नमूना, खंड 26, पृष्ठ 461।
- ↑ मजलिसी, बिहारुल अनवार, खंड 65, पृष्ठ 202।
- ↑ मामूरी, «سنت استدراج در قرآن و میراث تفسیری», पृष्ठ 105।
- ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 2, पृष्ठ 452।
- ↑ मुतह्हरी, मजमूआ-ए आसार, खंड 27, पृष्ठ 626।
नोट
- ↑ व इन् तउद्दू निअमतल्लाहि ला तुह्सूहा, इन्नल्लाहा लग़फ़ूरुर्रहीम। (और अगर तुम अल्लाह की नेअमतों को गिनना चाहो, तो उन्हें कभी गिन नहीं सकते। बेशक, अल्लाह बहुत क्षमा करने वाला और अत्यंत दयालु है।)
स्रोत
- मिस्बाहुश शरीया, इमाम सादिक़ (अ) की ओर मंसूब, बेरूत, आलमी प्रकाशन संस्थान, 1400 हिजरी।
- इब्ने फ़ारिस, अहमद बिन फ़ारिस, मोअजम मक़ाईस अल-लुग़ह, शोध एवं संपादन: अब्दुस्सलाम मुहम्मद हारून, एअलामे इस्लामी प्रकाशन, 1404 हिजरी।
- इब्ने मंज़ूर, मुहम्मद बिन मुकर्रम, लिसान अल-अरब, क़ुम, अदब अल-हौज़ा प्रकाशन, 1405 हिजरी।
- तबातबाई, सय्यद मुहम्मद हुसैन, अल-मीज़ान फ़ी तफ़्सीर अल-क़ुरआन, क़ुम, अल-इस्लामी प्रकाशन केंद्र, पाँचवाँ संस्करण, 1417 हिजरी।
- तूसी, मुहम्मद बिन हसन, अल-अमाली, क़ुम, दार अस-सक़ाफ़ा, 1414 हिजरी।
- मकारिम शीराज़ी, नासिर, अख़लाक़ दर क़ुरआन, क़ुम, इमाम अली बिन अबी तालिब प्रकाशन, 1378 शम्सी।
- मकारिम शीराज़ी, नासिर, तफ़्सीरे नमूना, तैयारी एवं संकलन: विद्वानों का एक समूह, तेहरान, दार अल-कुतुब अल-इस्लामिय्या प्रकाशन, बत्तीसवाँ संस्करण, 1374 शम्सी।
- मकारिम शीराज़ी, नासिर, पयामे क़ुरआन, तेहरान, दार अल-कुतुब अल-इस्लामिय्या प्रकाशन, 1381 शम्सी।
- मजलिसी, मुहम्मद बाक़िर, बिहारुल अनवार अल-जामिआ लि-दुरर अख़बार अल-आइम्मत अल-अतहार, बेरूत, अल-वफ़ा संस्थान, दूसरा संस्करण, 1404 हिजरी।
- मामूरी, अली, «بررسی سنت استدراج در قرآن و میراث تفسیری», (क़ुरआन और तफ़्सीरी विरासत में इस्तिदराज़ की परंपरा का अध्ययन), क़ुरआन एवं हदीस अध्ययन पत्रिका, बहमन 1386 शम्सी, अंक 1।
- मिस्बाह यज़्दी, मुहम्मद तक़ी, सज्जादेहाए सुलूक शरहे मुनाजातहाए इमाम सज्जाद (अ), क़ुम, इमाम ख़ुमैनी (रह) शैक्षिक एवं शोध संस्थान का प्रकाशन, 1390 शम्सी।
- मुतह्हरी, मुर्तज़ा, मजमूआ-ए आसार, तेहरान, सद्रा प्रकाशन, चौदहवाँ संस्करण, 1390 शम्सी।
- मुफ़ीद, मुहम्मद बिन मुहम्मद, अल-अमाली, संपादन: हुसैन उस्ताद वली और अली अकबर ग़फ़्फ़ारी, क़ुम, शेख़ मुफ़ीद सम्मेलन का प्रकाशन, 1413 हिजरी।
- मुस्तफ़वी ज़ादेह, सय्यद मोहसिन, बर्रसी वाजेह नेअमत अज़ मंज़रे तावील दर क़ुरआन व रिवायाते मासूमीन (अ), क़ुरआन एवं हदीस विज्ञान में स्नातकोत्तर शोध-प्रबंध, तेहरान, इस्लामी आज़ाद विश्वविद्यालय, 1392 शम्सी।
- लैसी वास्ती, अली बिन मुहम्मद, उयूनुल हिकम वल-मवाइज़, संपादन: हुसैन हुसनी बिरजंदी, क़ुम, दार अल-हदीस प्रकाशन, 1376 शम्सी।
- सदूक़, मुहम्मद बिन अली, इललुश शराए, क़ुम, पुस्तक विक्रेता दावरी, 1385 शम्सी।