प्रारूप:मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहना
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मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहना, या मृत मुज्तहिद की तक़लीद जारी रखना से आशय जामेउश्शराइत मुज्तहिद के निधन के बाद भी उसकी तक़लीद जारी रखने से है। न्यायविदों के मत के अनुसार, मुकल्लफ़ (जिस पर धार्मिक कर्तव्य लागू हों) उस मुज्तहिद के निधन के बाद भी उसकी तक़लीद जारी रख सकता है, जिसकी वह उसके जीवनकाल में तक़लीद करता था।
ओक़्ला की परंपरा और इस्तिस्हाब के मूल सिद्धांत को मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहने के जायज़ होने के प्रमाणों में गिना गया है। मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहने की शर्तों में से एक जीवित मुज्तहिद से अनुमति लेना है।
न्यायविदों का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति में मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहने की शर्तें मौजूद हों, लेकिन वह जीवित मुज्तहिद की ओर जाए, तो वह दोबारा मृत मुज्तहिद की तक़लीद नहीं कर सकता, सिवाय इसके कि मृत मुज्तहिद जीवित मुज्तहिद से आलम (सबसे अधिक ज्ञान रखने वाला मुज्तहिद) हो।
अवधारणा और स्थान
मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहना या मृत मुज्तहिद की तक़लीद जारी रखना, उस जामेउश्शराइत मुज्तहिद की तक़लीद जारी रखने को कहा जाता है, जिसका निधन हो चुका हो।[१]
यह विषय न्यायशास्त्र की पुस्तकों में इज्तिहाद और तक़लीद के अध्याय में प्रस्तुत किया गया है[२] और जाफ़र सुब्हानी के अनुसार, इसकी पृष्ठभूमि तेरहवीं हिजरी शताब्दी में, साहिबे फ़ुसूल और साहिबे जवाहिर के दौर तक पहुँचती है।[३]
मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहने के जायज़ और जायज़ न होने के प्रमाण
मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहना जायज़ है: इसके जायज़ होने के पक्षधर शाब्दिक प्रमाणों की व्यापकता का हवाला देते हैं, जैसे आय ए नफ़्र, आय ए अहलो ज़िक्र, आय ए कितमान और रिवायतें, जैसे ग़ैबत के दौर में न्यायविदों की ओर रुजू करने का तौक़ीअ।[४] ये मुज्तहिद के फ़तवे की हुज्जियत पर दलील देते हैं और मुज्तहिद के जीवित होने तक सीमित नहीं हैं।[५] इसके अलावा ओक़्ला की परंपरा, पिछले अहकाम का इस्तिस्हाब और मुतशर्रेआ की परंपरा भी इस समूह के अन्य प्रमाणों में शामिल हैं।[६]
मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहना जायज़ नहीं है: साहिबे किफ़ाया जैसे कुछ विद्वान मृत मुज्तहिद की तक़लीद को जायज़ नहीं मानते। इसका कारण यह है कि उर्फ़ (सामाजिक प्रचलन) के अनुसार फ़तवा मुज्तहिद के जीवित होने पर निर्भर है और उसके निधन के बाद उसकी मान्यता नहीं रहती।[७] इसी तरह शेख़ अंसारी के मत के अनुसार, मृत की प्रारंभिक तक़लीद के जायज़ न होने पर इज्मा में मृत की तक़लीद पर बाक़ी रहना भी शामिल है।[८]
मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहने के तरीके़ के बारे में न्यायविदों के मत
न्यायविदों के बीच इस बात को लेकर मतभेद है कि क्या मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहना इस बात पर निर्भर है कि मुक़ल्लिद (तक़लीद करने वाला) ने मुज्तहिद के जीवनकाल में उसके फ़तवे पर अमल किया हो या नहीं:
- अमल करने की शर्त: मुक़ल्लिद को मृत मुज्तहिद के जीवनकाल में उसके फ़तवे पर अमल किया हुआ होना चाहिए, चाहे केवल एक मसले में ही क्यों न हो, ताकि वह उसकी तक़लीद जारी रख सके। इमाम ख़ुमैनी,[९] आयतुल्लाह ख़ामेनेई[१०] और नूरी हमदानी[११] इसी मत के पक्षधर हैं।
- केवल उन मसलों में जिनमें अमल किया हो: मुक़ल्लिद केवल उन्हीं मसलों में मुज्तहिद के निधन के बाद उसकी तक़लीद जारी रख सकता है, जिनमें उसने उसके फ़तवे पर अमल किया हो; जबकि दूसरे मसलों में उसे जीवित मुज्तहिद की ओर जाना होगा।[१२] काशिफ़ुल-ग़िता, आयतुल्लाह बुरूजर्दी,[१३] मुहम्मद तक़ी बहजत (निधन: 2009 ईस्वी)[१४] और मकारिम शीराज़ी[१५] ने इस मत को स्वीकार किया है।
- अमल की कोई शर्त नहीं: मुज्तहिद के जीवनकाल में मुक़ल्लिद का अमल करना मृत की तक़लीद पर बाक़ी रहने के जायज़ होने की शर्त नहीं है और वह सभी मसलों में तक़लीद जारी रख सकता है।[१६] आयतुल्लाह ख़ूई,[१७] वहीद ख़ुरासानी[१८] और सीस्तानी[१९] इस मत के पक्षधर हैं।
मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहने की शर्तें
जीवित मुज्तहिद की अनुमति: मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहने के लिए मुक़ल्लिद को ऐसे जीवित मुज्तहिद के फ़तवे या अनुमति की आवश्यकता होती है, जो मृत की तक़लीद पर बाक़ी रहने को जायज़ मानता हो।[२०]
मृत मुज्तहिद का आलम (अधिक ज्ञानी) होना: यदि मृत मुज्तहिद, जीवित मुज्तहिद से आलम (अधिक ज्ञानी) हो, तो मुक़ल्लिद के लिए मृत मुज्तहिद की तक़लीद करना अनिवार्य है।[२१] इमाम ख़ुमैनी के अनुसार, एहतियाते वाजिब यह है कि यदि जीवित मुज्तहिद आलम (अधिक ज्ञानी) हो, तो मृत मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहना जायज़ नहीं है।[२२]
मुज्तहिद के फ़तवों को याद रखना: आयतुल्लाह ख़ूई (निधन: 1992 ईस्वी) के अनुसार, मुक़ल्लिद को मृत मुज्तहिद के फ़तवे याद होने चाहिए। यदि मुज्तहिद का फ़तवा भूल गया हो या उसे सीखा ही न हो, तो उसे जीवित मुज्तहिद की ओर जाना होगा।[२३]
जीवित मुज्तहिद की ओर जाने के बाद मृत मुज्तहिद की ओर वापसी
तबातबाई यज़्दी का मानना है कि यदि मुक़ल्लिद मुज्तहिद के निधन के बाद किसी जीवित मुज्तहिद की ओर जाए, तो वह दोबारा मृत मुज्तहिद की तक़लीद की ओर वापस नहीं लौट सकता।[२४] लेकिन आक़ा ज़िया इराक़ी का मानना है कि यदि मृत मुज्तहिद, जीवित मुज्तहिद से आलम (अधिक ज्ञानी) हो, तो मृत मुज्तहिद की तक़लीद की ओर वापस लौटना जायज़ है।[२५]
फ़ुटनोट
- ↑ इस्लामी फ़िक़्ह विश्वकोश संस्थान, फ़रहंगे फ़िक़्ह, खंड 2, पृष्ठ 121।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस़्का (अल-मुहश्शा), खंड 1, पृष्ठ 17।
- ↑ सुब्हानी तबरीज़ी, अर-रसाइलुल-अरबा, खंड 3, पृष्ठ 183।
- ↑ शेख़ सदूक़, कमालुद्दीन व तमामुन नेअमत, खंड 2, पृष्ठ 484।
- ↑ फ़ाज़िल लंकरानी, ईज़ाहुल-किफ़ाया, खंड 6, पृष्ठ 428।
- ↑ फ़ाज़िल लंकरानी, ईज़ाहुल-किफ़ाया, खंड 6, पृष्ठ 428।
- ↑ आख़ूंद ख़ुरासानी, किफ़ायतुल-उसूल, पृष्ठ 477।
- ↑ शेख़ अंसारी, मजमूए रसाइल, पृष्ठ 58।
- ↑ इमाम ख़ुमैनी, तहरीरुल-वसीला, खंड 1, पृष्ठ 9।
- ↑ ख़ामेनेई, अजविबतुल-इस्तिफ़्ता'आत, खंड 1, पृष्ठ 6।
- ↑ नूरी हमदानी, तौज़ीहुल-मसाइल, पृष्ठ 14।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस़्का (अल-मुहश्शा), खंड 1, पृष्ठ 18।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस़्का (अल-मुहश्शा), खंड 1, पृष्ठ 18।
- ↑ बहजत, तौज़ीहुल-मसाइल, पृष्ठ 11।
- ↑ मकारिम शीराज़ी, रिसालतुत-तौज़ीहिल-मसाइल, पृष्ठ 9।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस़्का (अल-मुहश्शा), खंड 1, पृष्ठ 17।
- ↑ ख़ूई, अत-तन्क़ीह, खंड 1, पृष्ठ 87–88।
- ↑ वहीद ख़ुरासानी, तौज़ीहुल-मसाइल, पृष्ठ 194।
- ↑ सीस्तानी, तौज़ीहुल-मसाइल, पृष्ठ 8।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस़्का (अल-मुहश्शा), खंड 1, पृष्ठ 42; इमाम ख़ुमैनी, तहरीरुल-वसीला, खंड 1, पृष्ठ 9।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस़्का (अल-मुहश्शा), खंड 1, पृष्ठ 17।
- ↑ इमाम ख़ुमैनी, तहरीरुल-वसीला, खंड 1, पृष्ठ 9।
- ↑ ख़ूई, तौज़ीहुल-मसाइल, पृष्ठ 3।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस़्का (अल-मुहश्शा), खंड 1, पृष्ठ 18।
- ↑ तबातबाई यज़्दी, अल-उर्वतुल-वुस़्का (अल-मुहश्शा), खंड 1, पृष्ठ 18।
स्रोत
- आख़ूंद ख़ुरासानी, मुहम्मद काज़िम, किफ़ायतुल-उसूल, क़ुम, आले अल-बैत (अ) संस्थान, 1409 हिजरी।
- इमाम ख़ुमैनी, सय्यद रूहुल्लाह, तहरीरुल-वसीला, तेहरान, इमाम ख़ुमैनी (रह) के कार्यों के संरक्षण एवं प्रकाशन संस्थान, 1392 शम्सी।
- इस्लामी फ़िक़्ह विश्वकोश संस्थान, फ़रहंगे फ़िक़्ह, अहले-बैत (अ) के मत के अनुसार, क़ुम, इस्लामी विश्वकोश संस्थान, प्रथम संस्करण, 1387 शम्सी।
- ख़ामेनेई, सय्यद अली, अजविबतुल-इस्तिफ़्ता'आत, बेरूत, दारुल इस्लामी प्रकाशन, 1420 हिजरी।
- ख़ूई, सय्यद अबुल-क़ासिम, अत-तन्क़ीह फ़ी शरहिल-उर्वतिल-वुस़्का, संशोधन: अली ग़र्वी तबरीज़ी, क़ुम, लुत्फ़ी प्रकाशन, 1407 हिजरी।
- ख़ूई, सय्यद अबुल-क़ासिम, तौज़ीहुल-मसाइल, क़ुम, इमाम ख़ूई के कार्यों के पुनर्जीवन संस्थान, 1422 हिजरी।
- तबातबाई यज़्दी, सय्यद मुहम्मद काज़िम, अल-उर्वतुल-वुस़्का फ़ीमा तअम्मु बिहिल-बलवा (अल-मुहश्शा), संशोधन: अहमद मोहसिनी सब्ज़वारी, क़ुम, इस्लामी प्रकाशन कार्यालय, 1419 हिजरी।
- फ़ाज़िल लंकरानी, मुहम्मद, ईज़ाहुल-किफ़ाया, क़ुम, नूह प्रकाशन, 1385 शम्सी।
- बहजत, मुहम्मद तक़ी, तौज़ीहुल-मसाइल, क़ुम, शफ़क़ प्रकाशन, 1378 शम्सी।
- मकारिम शीराज़ी, नासिर, रिसालतुत-तौज़ीहुल-मसाइल, क़ुम, इमाम अली बिन अबी तालिब (अ) मदरसा, 1424 हिजरी।
- वहीद ख़ुरासानी, हुसैन, तौज़ीहुल-मसाइल, क़ुम, बाक़िरुल-उलूम (अ) मदरसा, 1421 हिजरी।
- शेख़ अंसारी, मुर्तज़ा, मजमूए रसाइल फ़िक़्हिया व उसूलिया, शोध: अब्बास हाजियानी दश्ती, क़ुम, अल-मुफ़ीद पुस्तकालय, 1404 हिजरी।
- शेख़ सदूक़, मुहम्मद बिन अली, कमालुद्दीन व तमामुन नेअमत, संशोधन: अली अकबर ग़फ़्फ़ारी, तेहरान, इस्लामिया प्रकाशन, 1395 हिजरी।
- सीस्तानी, सय्यद अली, तौज़ीहुल-मसाइल, क़ुम, मेहर प्रकाशन, 1415 हिजरी।
- सुब्हानी तबरीज़ी, जाफ़र, अर-रसाइलुल-अरबा क़वाइद उसूलिया व फ़िक़्हिया, प्रतिवेदन: मोहसिन हैदरी, क़ुम, इमाम सादिक़ (अ) संस्थान, 1415 हिजरी।
