प्रारूप:ज़ियारतनामा
ज़ियारतनामा, वह दुआ का पाठ है, जिसे पैग़म्बर (स), इमामों (अ), इमामज़ादों और कुछ धार्मिक व्यक्तित्वों की ज़ियारत के समय पढ़ा जाता है। इन पाठों की शुरुआत सामान्यतः ज़ियारत किए जाने वाले व्यक्ति को सलाम और सम्मान प्रकट करने से होती है और इनमें उनके गुणों एवं धार्मिक स्थान का उल्लेख, धार्मिक मान्यताओं की अभिव्यक्ति तथा शफ़ाअत और अल्लाह से निकटता की प्रार्थना की जाती है।[१] ज़ियारतनामे, विशेष रूप से मासूमीन (अ) से मंसूब किए गए पाठ, इबादत के अलावा अल्लाह की पहचान, पैग़म्बर की पहचान और इमाम की पहचान से संबंधित शिक्षाएँ भी रखते हैं और शिया शिक्षाओं के बयान तथा हस्तांतरण के स्रोतों में गिने जाते हैं।[२]
मासूमीन (अ) से संबंध के आधार पर ज़ियारतनामों को दो भागों में बाँटा जाता है: मासूर और ग़ैर-मासूर। मासूर ज़ियारतनामा वह पाठ है जो स्रोतों में किसी मासूम (अ) से मंसूब हो और उनसे वर्णित किया गया हो; जैसे ज़ियारत अमीनुल्लाह, ज़ियारत जामेआ कबीरा, ज़ियारत वारिस और ज़ियारत अरबईन हैं।[३] इसके विपरीत, ग़ैर-मासूर ज़ियारतनामा वह पाठ है जिसका मासूमीन (अ) से संबंध प्रमाणित न हुआ हो।[४] कुछ ज़ियारतनामे मज़ार के पास पढ़ने के लिए और कुछ दूर से ज़ियारत के लिए भी आए हैं।[५] उदाहरण के लिए, पैग़म्बर (स) की विलादत के दिन उनकी ज़ियारत और ज़ियारत आशूरा दूर से भी पढ़ी जा सकती है।
ज़ियारतनामे समय और उपयोग के अनुसार भी एक जैसे नहीं होते। कुछ ज़ियारतनामे, जैसे ज़ियारते-अरबईन, किसी विशेष अवसर या निश्चित समय के लिए होते हैं;[६] जबकि कुछ अन्य, जैसे ज़ियारते-जामेअ कबीरा, अलग-अलग समय पर इमामों (अ) की ज़ियारत के लिए पढ़े जाते हैं।[७] इसी तरह, कुछ ज़ियारतनामे किसी विशेष व्यक्ति या किसी खास इमाम की ज़ियारत के लिए होते हैं, जबकि कुछ, जैसे ज़ियारते-जामेअ कबीरा, सभी इमामों (अ) की ज़ियारत के लिए पढ़े जाते हैं।[८]
ज़ियारतनामों की विषय-वस्तु केवल सलाम और श्रद्धा प्रकट करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनमें आस्थाओं के मूल सिद्धांत, पैग़म्बर (स) और अहले-बैत (अ) के गुण एवं धार्मिक स्थान तथा धार्मिक कर्तव्यों और मूल्यों का उल्लेख किया गया है। उदाहरण के तौर पर, ज़ियारते जामेअ कबीरा में नमाज़ क़ायम करने, ज़कात देने, नेकी का आदेश देने, बुराई से रोकने और अल्लाह की राह में जिहाद को अहले-बैत (अ) की विशेषताओं के रूप में बताया गया है।[९] इसी तरह, इस ज़ियारत में पैग़म्बर (स) की सुन्नत का पालन करने और अनिवार्य धार्मिक कर्तव्यों तथा अल्लाह के आदेशों का पालन करने पर ज़ोर दिया गया है।[१०] इसके विपरीत, अहले-बैत (अ) के दुश्मनों, उन पर अत्याचार करने वालों, उनके अधिकारों का इनकार करने वालों और उनके अधिकारों को हड़पने वालों से बराअत का भी ज़िक्र ज़ियारत के पाठ में किया गया है।[११]
प्रसिद्ध ज़ियारतनामों में से एक इमाम रज़ा (अ) पर विशेष सलवात है। इसका पाठ इस प्रकार है:
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَی عَلِی بْنِ مُوسَی الرِّضَا الْمُرْتَضَی الْإِمَامِ التَّقِی النَّقِی وَ حُجَّتِک عَلَی مَنْ فَوْقَ الْأَرْضِ وَ مَنْ تَحْتَ الثَّرَی الصِّدِّیقِ الشَّهِیدِ صَلَاةً کثِیرَةً نَامِیةً زَاکیةً مُتَوَاصِلَةً مُتَوَاتِرَةً مُتَرَادِفَةً کأَفْضَلِ مَا صَلَّیتَ عَلَی أَحَدٍ مِنْ أَوْلِیائِک.
अल्लाहुम्मा सल्ले अला अली इब्ने मूसा अर-रज़ा अल-मुर्तज़ा, अल-इमामित-तक़िय्यिन-नक़िय्यि, व हुज्जतिक अला मन फ़ौक़ल-अर्ज़ि व मन तहतस्सरा, अस्सिद्दीक़िश्शहीद। सलातन कसीरतन नामियतन ज़ाकियतन मुतवासिलतन मुतवातिरतन मुतरादिफ़तन, क-अफ़्ज़लि मा सल्लैता अला अहदिम-मिन औलियाइक।[१२]
हे अल्लाह! अली बिन मूसा रज़ा, जो पसंदीदा हैं, पवित्र और परहेज़गार इमाम हैं और धरती के ऊपर रहने वाले तथा मिट्टी के नीचे रहने वाले हर व्यक्ति पर तेरी हुज्जत हैं, उस सच्चे और शहीद पर दरूद और रहमत भेज। ऐसा बहुत अधिक, पूर्ण, बरकत वाला, निरंतर, लगातार और एक के बाद एक आने वाला दरूद और रहमत, जैसी सबसे उत्तम रहमत तूने अपने किसी वली पर भेजी है।[१३]
| किताब | लेखक | रचना की शताब्दी | विवरण |
|---|---|---|---|
| कामिलुज़-ज़ियारात | इब्ने क़ुलवैयह क़ुम्मी | चौथी | ज़ियारत, उसके गुणों और शिष्टाचार के बारे में शिया धर्म के सबसे पुराने स्रोतों में से एक। |
| अल-मज़ार | शेख़ मुफ़ीद | पाँचवीं | ज़ियारत, उसके शिष्टाचार और ज़ियारत के पाठों से संबंधित रचनाओं में से एक। |
| मिस्बाहुल-मुतहज्जिद | शेख़ तूसी | पाँचवीं | इबादती कार्यों, दुआओं और ज़ियारतनामों पर आधारित। |
| अल-मज़ारुल-कबीर | इब्ने मशहदी | सातवीं | ज़ियारतों और ज़ियारत के पाठों के महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक। |
| मिस्बाहुज़-ज़ाइर | सय्यद इब्ने ताऊस | सातवीं | ज़ियारत के कार्यों और ज़ियारतनामों से संबंधित स्रोतों में से एक। |
| अल-बलदुल-अमीन | इब्राहीम कफ़अमी | नौवीं | दुआओं, अज़कार और कुछ ज़ियारत के पाठों पर आधारित। |
| तुहफ़तुल-ज़ाइर | अल्लामा मजलिसी | ग्यारहवीं | दुआओं और ज़ियारतनामों पर आधारित। |
| बिहारुल-अनवार, खंड 101, “किताबुल-मज़ार” | अल्लामा मजलिसी | ग्यारहवीं | मासूमीन (अ) से वर्णित किए गए ज़ियारतनामों के लिए विशेष रूप से समर्पित। |
| ज़ादुल-मआद | अल्लामा मजलिसी | ग्यारहवीं | इसमें 14 अध्याय हैं, जिनमें ग्यारहवाँ अध्याय पैग़म्बरे अकरम (स) और शिया इमामों की ज़ियारत के लिए विशेष है। |
| मफ़ातिहुल-जिनान | शेख़ अब्बास क़ुम्मी | चौदहवीं | शिया धर्म की दुआओं की पुस्तकों में से एक है। इसका एक भाग मासूमीन, इमामज़ादों और शिया धर्म के कुछ महान व्यक्तित्वों की ज़ियारत और ज़ियारतनामों के लिए विशेष है। इसमें हमज़ा, सलमान फ़ारसी, हज़रत मासूमा (स), मुस्लिम बिन अक़ील और हानी बिन उर्वा के लिए भी ज़ियारतनामे वर्णित किए गए हैं।[१४] |
फ़ुटनोट
- ↑ तूसी, तहज़ीब, खंड 6, पृष्ठ 113।
- ↑ तूसी, तहज़ीब, खंड 6, पृष्ठ 113।
- ↑ तूसी, तहज़ीब, खंड 6, पृष्ठ 113।
- ↑ मजलिसी, ज़ादुल-मआद, खंड 1, पृष्ठ 260।
- ↑ शम्सुद्दीन, अंसारुल-हुसैन, पृष्ठ 155।
- ↑ क़ुम्मी, मफ़ातिहुल-जिनान, पृष्ठ 642।
- ↑ क़ुम्मी, मफ़ातिहुल-जिनान, पृष्ठ 487।
- ↑ क़ुम्मी, मफ़ातिहुल-जिनान, पृष्ठ 487।
- ↑ शेख़ सदूक़, मन ला यहज़रोहुल फ़क़ीह, खंड 2, पृष्ठ 370
- ↑ मजलिसी, बिहारुल अनवार, खंड 99, पृष्ठ 127-128।
- ↑ शेख़ सदूक़, मन ला यहज़रोहुल फ़क़ीह, खंड 2, पृष्ठ 370; मजलिसी, बिहारुल अनवार, खंड 99, पृष्ठ 127-128।
- ↑ इब्ने क़ुलवैयह, कामिलुज़-ज़ियारात, पृष्ठ 309।
- ↑ क़ुम्मी, मफ़ातिहुल-जिनान, अनुवाद: इलाही क़ुम्शेई, पृष्ठ 824।
- ↑ क़ुम्मी, मफ़ातिहुल-जिनान, पृष्ठ 420–777।
स्रोत
- इब्ने क़ुलवैयह, जाफ़र, कामिलुज़-ज़ियारात, नजफ़, दारुल-मुर्तज़विया प्रकाशन, 1356 शम्सी।
- कफ़अमी, इब्राहीम बिन अली, अल-बलदुल-अमीन, बेरूत, अल-अलमी प्रकाशन संस्थान, 1403 हिजरी।
- क़ुम्मी, अब्बास, मफ़ातिहुल-जिनान, क़ुम, मशअर प्रकाशन, 1387 शम्सी।
- तूसी, मुहम्मद बिन हसन, तहज़ीबुल-अहकाम, संपादक: हसन मूसवी ख़ुरासान, दारुल-कुतुबिल-इस्लामिया प्रकाशन, तेहरान, 1407 हिजरी।
- मजलिसी, मुहम्मद बाक़िर, ज़ादुल-मआद — मिफ़्ताहुल-जिनान, अरबीकरण एवं टिप्पणी: अलाउद्दीन अल-अलमी, अल-अलमी प्रकाशन संस्थान, बेरूत, 1423 हिजरी।
- शम्सुद्दीन, मुहम्मद महदी, अंसारुल-हुसैन: दिरासतन अन शुहदाइ सौरतिल-हुसैन, अर-रिजाल वद-दलालात, बेअसत संस्थान, तेहरान, 1407 हिजरी।
- मजलिसी, मुहम्मद बाक़िर, बिहारुल अनवारिल जामेअतुल लिदुररि अख़बारिल आइम्मतिल अतहार, बेरूत, दारु इहयाइत-तुरासिल-अरबी प्रकाशन, दूसरा संस्करण, 1403 हिजरी।
- शेख़ सदूक़, मुहम्मद बिन अली, मन ला यहज़ुरोहुल फ़क़ीह, शोध एवं सुधारक: अली अकबर ग़फ़्फ़ारी, क़ुम, क़ुम के हौज़ा-ए-इल्मिया के मदर्रिसीन सोसाइटी से संबद्ध इस्लामी प्रकाशन कार्यालय, दूसरा संस्करण, 1413 हिजरी।