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प्रारूप:क़यामत में गवाही

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यह लेख क़यामत में गवाही इन लेखो से संबंधित है।
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क़यामत में गवाही, क़यामत के विभिन्न पड़ावों में से एक है, जिसका अर्थ है पुनरुत्थान के दिन मनुष्य के कर्मों को पहले से देखे जाने और उनकी जानकारी के आधार पर उनके बारे में गवाही देना। इस विषय का उल्लेख क़ुरआन की आयतों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में हुआ है। क़यामत में कर्मों की गवाही देने वालों में अल्लाह, अम्बिया, अल्लाह के औलिया, फ़रिश्ते तथा शरीर के अंग और धरती जैसी चीज़ें शामिल हैं। गवाहों की बहुलता का उद्देश्य मनुष्य के भीतर आत्म-निगरानी की भावना को मज़बूत करना और कर्मों के हिसाब की सही प्रक्रिया सुनिश्चित करना बताया गया है।

इस प्रकार की गवाही के कुछ निश्चित चरण हैं। सबसे पहले कर्मों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जाएगा। इसके बाद, यदि व्यक्ति इनकार करेगा, तो फ़रिश्ते और शरीर के अंग गवाही देंगे। अंत में अल्लाह की गवाही होगी, जो अंतिम गवाह है। यह गवाही कर्मों के बाहरी और आंतरिक दोनों पहलुओं को शामिल करेगी, जिनमें नीयत और कर्मों में इख़्लास का स्तर भी शामिल है। गवाही देने का यह विशेष स्थान केवल अल्लाह के औलिया के लिए है।

क़यामत में धरती और शरीर के अंगों के बोलने के संबंध में व्याख्याकारों के अलग-अलग विचार हैं। कुछ इसे प्रतीकात्मक अर्थ में लेते हैं, जबकि कुछ उनके वास्तविक रूप से बोलने को स्वीकार करते हैं। इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) से वर्णित एक रिवायत के आधार पर कुछ स्रोतों में बताया गया है कि क़यामत के दिन क़ुरआन इंसानी रूप धारण करेगा और बोलने की शक्ति रखेगा। इसी प्रकार नमाज़ को भी बोलने वाले रूप में प्रस्तुत किया गया है। क़ुरआन के वर्णनों के अनुसार, अपराधी अपने शरीर के अंगों की गवाही से हैरान और क्रोधित होंगे तथा कामना करेंगे कि काश वे मिट्टी होते।

महत्त्व और स्थान

क़यामत में गवाही का अर्थ क़यामत के दिन मनुष्य के कर्मों के बारे में गवाही देना है।[१] इसे क़यामत के पड़ावों में से एक माना गया है।[२] इस प्रकार की गवाही के लिए गवाहों को दुनिया में ही गवाही देने की क्षमता प्राप्त होनी चाहिए;[३] अर्थात् उन्होंने उस कर्म को देखा हो और उसे करने वाले व्यक्ति को पहचाना हो।[४] इसके बाद वे क़यामत के दिन अल्लाह की अनुमति से[५] अपने ज्ञान के आधार पर[६] गवाही देंगे।[७]

क़ुरआन की 28 आयतों में[८] कर्मों की गवाही का उल्लेख किया गया है। इनमें सूरह हज की आयत 17, सूरह नहल की आयत 89 और सूरह फ़ुस्सिलत की आयत 20 शामिल हैं।[९] इस विषय पर आस्थागत पुस्तकों[१०] और नैतिकता से संबंधित पुस्तकों में भी ज़ोर दिया गया है, ताकि मनुष्य को अल्लाह की याद और आत्म-निगरानी का ध्यान रहे।[११]

शिया धर्मशास्त्रियों में से अली रज़ा आराफ़ी ने अपनी पुस्तक गवाहाने आमाल (कर्मों के गवाह) में गवाहों की उपस्थिति में विश्वास को आसमानी धर्मों की साझा मान्यताओं में से एक बताया है।[१२] अल्लामा तबातबाई के अनुसार, कर्मों की गवाही देने का स्थान सामान्य लोगों को प्राप्त नहीं होता, बल्कि यह पवित्र औलिया के लिए विशेष है।[१३] उन्होंने पैग़म्बरों और मासूम इमामों (अ) को इस स्थान के अधिकारी बताया है।[१४]

धार्मिक स्रोतों के अनुसार, गवाह मनुष्य के व्यवहार के बाहरी और आंतरिक पहलुओं के साथ-साथ उसके कर्मों में इख़्लास की गुणवत्ता और मात्रा की भी जानकारी देंगे।[१५] इसके अतिरिक्त, अल्लामा मजलिसी द्वारा पैग़म्बरे अकरम (स) से वर्णित एक रिवायत के अनुसार, उनकी गवाही में अच्छे और बुरे, दोनों प्रकार के कर्म शामिल होंगे।[१६]

नैतिकता से संबंधित पुस्तकों में इस विषय का अध्ययन अल्लाह की याद दिलाने और आत्मा की निगरानी करने वाले कारक के रूप में किया गया है।[१७] यह विषय मुनाजाते शाबानिया और दुआ-ए-कुमैल जैसी दुआओं में भी आया है।[१८] इसके अलावा, इसे आख़िरत से संबंधित आयतों और रिवायतों की व्याख्या तथा हया जैसे विषयों पर चर्चा के दौरान भी प्रस्तुत किया गया है।[१९] इस विषय पर अब्दुल्लाह जवादी आमुली,[२०] जाफ़र सुब्हानी,[२१] नासिर मकारिम शीराज़ी और सय्यद मुहम्मद हुसैन तेहरानी की पुस्तक मआद शनासी में भी चर्चा की गई है।[२२]

कर्मों के गवाह

मकारिम शीराज़ी ने क़ुरआन की आयतों का वर्गीकरण करते हुए अल्लाह, पैग़म्बरों, फ़रिश्तों, शरीर के अंगों (हाथ, पैर, कान, आँख और त्वचा) तथा धरती को क़यामत के गवाहों के रूप में उल्लेख किया है।[२३] कुछ व्याख्याकारों ने कर्मों की किताब[२४] और कर्मों के मूर्त रूप धारण करने[२५] को भी गवाहों में शामिल किया है।[२६]

गवाहों की बहुलता का दर्शन

गवाहों की बहुलता मनुष्य को आत्म-निरीक्षण करने और पाप से बचने में दृढ़ रहने में सहायता करती है।[२७] क़यामत में गवाही को तर्क पूरा करने और कर्मों की वास्तविकताओं को साबित करने के उद्देश्य से निर्धारित किया गया है। यह गवाही केवल कर्मों के बाहरी रूप पर नहीं, बल्कि उनके पूर्ण अवलोकन पर आधारित होनी चाहिए, ताकि कर्मों का हिसाब सही ढंग से किया जा सके।[२८] शिया मुहद्दिस तबरसी ने इमाम सादिक़ (अ.) से रिवायत की है कि यद्यपि अल्लाह को छिपी हुई चीज़ों का ज्ञान है, फिर भी मनुष्य के गवाह के रूप में फ़रिश्तों को नियुक्त किया गया है, ताकि अल्लाह की आज्ञा का पालन करने की भावना मज़बूत हो और लोग पाप से दूर रहें।[२९]

गवाहों के बीच अंतर

कर्मों के गवाह अलग-अलग प्रकार के होते हैं। कुछ मनुष्य के भीतर होते हैं, जैसे उसके शरीर के अंग, जबकि कुछ बाहरी होते हैं, जैसे अल्लाह और अम्बिया।[३०] फ़रिश्तों का कार्य मनुष्य के कर्मों को लिखना और दर्ज करना है, जबकि पैग़म्बरों और इमामों (अ) के कर्तव्यों में यह कार्य शामिल नहीं है। वे अपने आध्यात्मिक स्थान के कारण कर्मों की गवाही देने के स्थान तक पहुँचे हैं।[३१] शरीर के अंगों, धरती और समय की गवाही को उनके कर्मों के प्रभावों के स्वाभाविक प्रतिबिंब और अभिलेखन के रूप में माना जाता है।[३२]

गवाही के चरण

रिवायतों के आधार पर, गवाहों द्वारा गवाही देने की प्रक्रिया एक विशेष क्रम में पूरी होगी। पैग़म्बरों और इमामों की गवाही के चरणों के बारे में कोई विवरण नहीं मिलता।[३३] लेकिन तफ़सीर अल-क़ुम्मी में गवाही का क्रम इस प्रकार बताया गया है: कर्मों की किताब प्रस्तुत किए जाने के बाद, यदि व्यक्ति उसे नकारता है, तो फ़रिश्तों को गवाही देने के लिए बुलाया जाएगा। यदि व्यक्ति फ़रिश्तों की गवाही को भी नकार दे और क़सम खाकर कहे कि उसने वे कर्म नहीं किए हैं, तो उसके मुँह पर मुहर लगा दी जाएगी और उसके शरीर के अंग उसके कर्मों के गवाह बनकर गवाही देंगे। इसके बाद उसकी ज़बान खोल दी जाएगी और वह अपने शरीर की त्वचा को उसकी गवाही देने के कारण फटकारेगा।[३४] कुछ स्रोतों में अल्लाह को क़यामत का अंतिम गवाह बताया गया है, जिसके बाद कोई अन्य गवाह नहीं होगा।[३५]

गवाहों के बोलने का तरीक़ा

क़यामत में धरती, समय, क़ुरआन और शरीर के अंगों के बोलने के तरीक़े के बारे में विभिन्न विचार प्रस्तुत किए गए हैं।[३६]

कुछ व्याख्याकारों ने धरती के बोलने का अर्थ यह बताया है कि उस पर मनुष्य के कर्मों के निशान और प्रभाव प्रकट हो जाएँगे।[३७] कुछ अन्य व्याख्याकार शरीर के अंगों के बोलने को वास्तविक मानते हैं। उनका मानना है कि दुनिया और आख़िरत की व्यवस्थाओं में अंतर होने के कारण मनुष्य इस बोलने के तरीक़े को पूरी तरह नहीं समझ सकता।[३८] एक अन्य व्याख्या के अनुसार, हाथ के बोलने का अर्थ उस कर्म को करके दिखाना है, जिसे उसने दुनिया में अंजाम दिया था। अर्थात् स्वयं मनुष्य के हाथ वही कर्म करने लगेंगे, जो उन्होंने दुनिया में किए थे।[३९]

चौदहवीं हिजरी शताब्दी के विद्वान और सूफ़ी सय्यद मुहम्मद हुसैन तेहरानी ने अपनी पुस्तक मआद शनासी में इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.) से वर्णित एक रिवायत के आधार पर[४०] यह विचार प्रस्तुत किया है कि क़यामत में गवाही देते समय क़ुरआन एक सुंदर इंसानी रूप में प्रकट होगा और बोलेगा।[४१] उसी रिवायत में नमाज़ के लिए भी ऐसा रूप बताए जाने का उल्लेख है, जो बोलने तथा आदेश देने और रोकने की क्षमता रखता होगा।[४२]

शरीर के अंगों की गवाही पर मनुष्य की प्रतिक्रिया

अपराधी जब अपने विरुद्ध शरीर के अंगों की गवाही सुनेंगे, तो वे आश्चर्य और भयभीत हो जाएँगे।[४३] वे विरोध करते हुए अपनी त्वचा को उसकी गवाही देने के कारण फटकारेंगे।[४४] गवाही के बाद वे कामना करेंगे कि काश वे मिट्टी होते, ताकि उनकी बदनामी न होती।[४५]

फ़ुटनोट

  1. ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 12, पृष्ठ 321।
  2. ↑ नूरी, «گواهان روز قیامت», पृष्ठ 18।
  3. ↑ आराफ़ी, गवाहाने आमाल, पृष्ठ 72।
  4. ↑ जवादी आमुली, मआद दर क़ुरआन, पृष्ठ 418।
  5. ↑ हुसैनी तेहरानी, मआद शनासी, खंड 7, पृष्ठ 97।
  6. ↑ हुसैनी तेहरानी, मआद शनासी, खंड 7, पृष्ठ 99।
  7. ↑ आराफ़ी, गवाहाने आमाल, पृष्ठ 72।
  8. ↑ सुब्हानी, मंशूर-ए जावेद, खंड 5, पृष्ठ 473–476।
  9. ↑ साबूनी, सफ़वतुत-तफ़ासीर, खंड 2, पृष्ठ 260; मकारिम शीराज़ी, तफ़सीर-ए नमूना, खंड 11, पृष्ठ 359 और खंड 3, पृष्ठ 392; तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 17, पृष्ठ 378।
  10. ↑ रज़ाई, «منازل آخرت», पृष्ठ 36।
  11. ↑ तबरसी, मकारिमुल-अख़लाक़, पृष्ठ 457।
  12. ↑ आराफ़ी, गवाहाने आमाल, पृष्ठ 15।
  13. ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 1, पृष्ठ 321।
  14. ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 1, पृष्ठ 321।
  15. ↑ आराफ़ी, गवाहाने आमाल, पृष्ठ 76।
  16. ↑ अल्लामा मजलिसी, बिहारुल-अनवार, खंड 7, पृष्ठ 315।
  17. ↑ तबरसी, मकारिमुल-अख़लाक़, पृष्ठ 457।
  18. ↑ कफ़अमी, अल-मिस्बाह लिल-कफ़अमी, पृष्ठ 559; इब्ने ताऊस, अल-इक़बाल बिल-आमालिल-हसना, खंड 3, पृष्ठ 297।
  19. ↑ आराफ़ी, गवाहाने आमाल, पृष्ठ 16।
  20. ↑ जवादी आमुली, मआद दर क़ुरआन, पृष्ठ 411–421।
  21. ↑ सुब्हानी, मंशूर-ए जावेद, खंड 5, पृष्ठ 472–498।
  22. ↑ आराफ़ी, गवाहाने आमाल, पृष्ठ 16।
  23. ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़सीर-ए नमूना, खंड 20, पृष्ठ 256।
  24. ↑ सुब्हानी, मंशूर-ए जावेद, खंड 5, पृष्ठ 492।
  25. ↑ हुसैनी तेहरानी, मआद शनासी, पृष्ठ 155।
  26. ↑ तबरसी, मजमा-उल-बयान, खंड 6, पृष्ठ 584; जवादी आमुली, मआद दर क़ुरआन, पृष्ठ 416।
  27. ↑ आराफ़ी, गवाहाने आमाल, पृष्ठ 65।
  28. ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 12, पृष्ठ 322 और 323।
  29. ↑ तबरसी, अल-इहतिजाज, खंड 2, पृष्ठ 348।
  30. ↑ आराफ़ी, गवाहाने आमाल, पृष्ठ 63।
  31. ↑ आराफ़ी, गवाहाने आमाल, पृष्ठ 66 और 67।
  32. ↑ आराफ़ी, गवाहाने आमाल, पृष्ठ 66 और 67।
  33. ↑ आराफ़ी, गवाहाने आमाल, पृष्ठ 70।
  34. ↑ क़ुम्मी, तफ़सीर अल-क़ुम्मी, खंड 2, पृष्ठ 264।
  35. ↑ सालेही हाजी आबादी, इंसान व शाहेदान-ए सादिक़, पृष्ठ 29।
  36. ↑ सालेही हाजी आबादी, इंसान व शाहेदान-ए सादिक़, पृष्ठ 116–117।
  37. ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़सीर-ए नमूना, खंड 27, पृष्ठ 225; हुसैनी तेहरानी, मआद शनासी, खंड 7, पृष्ठ 267 और 268।
  38. ↑ जाफ़री, तफ़सीर-ए कौसर, खंड 10, पृष्ठ 118।
  39. ↑ हुसैनी तेहरानी, मआद शनासी, खंड 7, पृष्ठ 187–192।
  40. ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 2, पृष्ठ 596।
  41. ↑ हुसैनी तेहरानी, मआद शनासी, खंड 7, पृष्ठ 275।
  42. ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 2, पृष्ठ 598।
  43. ↑ मकारिम शीराज़ी, तफ़सीर-ए नमूना, खंड 18, पृष्ठ 431।
  44. ↑ तबातबाई, अल-मीज़ान, खंड 17, पृष्ठ 379।
  45. ↑ रज़ाई इस्फ़हानी, तफ़सीर-ए क़ुरआन मेहर, खंड 4, पृष्ठ 138।

स्रोत

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  • इब्ने ताऊस, अली बिन मूसा, अल-इक़बाल बिल-आमालिल-हसना, शोधकर्ता: जवाद क़य्यूमी इस्फ़हानी, क़ुम, इस्लामी प्रचार कार्यालय, प्रथम संस्करण, 1376 शम्सी।
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  • नूरी, हुसैन, «گواهان روز قیامت», पासदाराने इस्लाम पत्रिका, अंक 111, इस्फ़ंद 1369 शम्सी।
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  • मजलिसी, मुहम्मद बाक़िर, बिहारुल-अनवार अल-जामिआ लि-दुररि अख़बारिल-अइम्मतिल-अतहार, बेरूत, दारु इहयाइत-तुरासिल-अरबी प्रकाशन, दूसरा संस्करण, 1403 हिजरी।
  • रज़ाई इस्फ़हानी, मुहम्मद अली, तफ़सीर-ए क़ुरआन मेहर, क़ुम, क़ुरआन की तफ़सीर एवं क़ुरआनी विज्ञान अनुसंधान संस्थान, प्रथम संस्करण, 1387 शम्सी।
  • रज़ाई, ग़ुलाम रज़ा, मनाज़िल-ए आख़िरत दर दानिशनामा-ए कलाम-ए इस्लामी, खंड 1, क़ुम, इमाम सादिक़ (अ) संस्थान, 1387 शम्सी।
  • साबूनी, मुहम्मद अली, सफ़्वतुत-तफ़ासीर, बेरूत, दारुल फ़िक्र प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1421 हिजरी।
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  • सुब्हानी तबरीज़ी, जाफ़र, मंशूर-ए जावेद, क़ुम, इमाम सादिक़ (अ) संस्थान, 1390 शम्सी।
  • हुसैनी तेहरानी, मुहम्मद हुसैन, मआद शनासी, मशहद, नूर मलाकूत-ए क़ुरआन प्रकाशन, 1427 हिजरी।