क़ुरआन का लेखन
- यह लेख क़ुरआन लेखन से संबंधित है। क़ुरआन की आयतों के संकलन, व्यवस्थित करने और क्रम निर्धारण की प्रक्रिया को समझने के लिए "क़ुरआन का संकलन" शीर्षक लेख देखा जा सकता है।
क़ुरआन लेखन का अर्थ क़ुरआन को लिखने की प्रक्रिया है। क़ुरआन को लिखकर सुरक्षित रखना, जो उसे विकृति से बचाने का एक माध्यम बना, पैग़म्बर (स) द्वारा विशेष रूप से प्रोत्साहित किया गया था। उन्होंने कुछ सहाबा, जैसे इमाम अली (अ) और ज़ैद बिन साबित, को क़ुरआन लेखन की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। प्रारंभिक चरण में क़ुरआन के संकलन का कार्य अली बिन अबी तालिब, ज़ैद बिन साबित, अब्दुल्लाह बिन मसऊद और उबैय बिन कअब जैसे व्यक्तियों के माध्यम से हुआ। लेकिन क़ुरआन की विभिन्न प्रतियों की अधिकता और उनमें पाए जाने वाले अंतर के कारण लोगों के बीच मतभेद उत्पन्न हुए। इसी कारण उस्मान बिन अफ़्फ़ान ने क़ुरआन के पाठ को एकरूप करने के लिए एक समिति गठित की, ताकि क़ुरआन की एक मानक प्रति तैयार की जा सके। इस प्रक्रिया में कुछ कमियों और समस्याओं के बावजूद, क़ुरआन को एकरूप रूप में प्रस्तुत करने के मूल प्रयास को इमाम अली (अ) की स्वीकृति प्राप्त थी।
इस्लाम के प्रारंभिक काल में क़ुरआन को एक ऐसी प्रारंभिक लिपि में लिखा जाता था जिसमें न तो बिंदु होते थे और न ही स्वर-चिह्न। इसके कारण लोगों को क़ुरआन के पाठ में कठिनाई और कभी-कभी त्रुटि का सामना करना पड़ता था। इसी वजह से अबुल असवद दुअली, नस्र बिन आसिम और ख़लील बिन अहमद फ़राहीदी ने क़ुरआन में बिंदु और स्वर-चिह्न लगाने का कार्य किया तथा उसके पाठ को सरल बनाने के लिए विभिन्न संकेतों का प्रयोग शुरू किया।
क़ुरआन लेखन ने इस्लामी कला के अनेक क्षेत्रों जैसे सुलेख, स्वर्ण एवं अलंकरण कला, पृष्ठ सज्जा और जिल्दसाज़ी—में अपनी विशेष पहचान बनाई है। मुसलमानों ने क़ुरआन लेखन को सुंदर बनाने वाली हर कला और तकनीक का उपयोग करने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य से उन्होंने कई प्रकार की लिपियों का विकास किया, जिनमें सुल्स, नस्ख़, रैहान और नस्तअलीक़ प्रमुख हैं। स्पष्टता और सुगमता के कारण नस्ख़ लिपि को क़ुरआन लेखन के लिए विशेष महत्व प्राप्त हुआ और इसे क़ुरआन लेखन के लिए उपयुक्त लिपि माना गया।
महत्व
क़ुरआन लेखन क़ुरआनी विज्ञान के विषयों में से एक है।[१] इसमें क़ुरआन को लिखे जाने के इतिहास, उसकी लेखन-पद्धति और उसके संकलन की प्रक्रिया पर चर्चा की जाती है।[२] क़ुरआन लेखन को उसे विकृति और परिवर्तन से सुरक्षित रखने वाले साधनों में से एक माना गया है, इसी कारण पैग़म्बर (स) ने इस पर विशेष बल दिया था।[३] इसके अलावा, क़ुरआन लेखन की शैली को आयतों के अर्थ को समझने में प्रभाव डालने वाला माना गया है। इसी संदर्भ में कहा गया है कि कुछ आयतों की व्याख्या में विभिन्न संभावनाओं के उत्पन्न होने का एक कारण प्रारंभिक इस्लामी काल की लेखन-पद्धति और लिपि संबंधी नियमों की कुछ सीमाएँ थीं।[४]
क़ुरआन लेखन, क़ुरआन के इतिहास और क़ुरआनी विज्ञान के अध्ययनों में विशेष महत्व रखने वाले विषयों में से है। इसके विभिन्न पहलुओं, जैसे क़ुरआन के लेखन का इतिहास, लिपि का विकास, लेखन और क़िराअत का संबंध तथा मुस्हफ़ों के विकास-क्रम आदि पर अनेक शोध किए गए हैं और कई ग्रंथ भी लिखे गए हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस्लामी जगत में लिखावट और लेखन-कला का आरंभ क़ुरआन लेखन से हुआ। क़ुरआन लेखन के साथ लिपि के गहरे संबंध के कारण इस्लामी समाज में सुलेख और लेखन-कला को विशेष महत्व प्राप्त हुआ।[५] इस्लाम के उदय और क़ुरआन के अवतरण के साथ ही लिपि और लेखन पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा, क्योंकि क़ुरआन पैग़म्बर (स) का चमत्कार था और उसका पाठ करना तथा उसे लिखना एक पवित्र कार्य माना जाता था।[६]
क़ुरआन के लेखन का इतिहास

इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (स) के जीवनकाल में, जब क़ुरआन का अवतरण हो रहा था, उस समय अनेक लोग उसे कंठस्थ करते थे और कुछ लोग उसे लिखकर भी सुरक्षित रखते थे। फिर भी, प्रचलित मत के अनुसार पैग़म्बर के स्वर्गवास तक क़ुरआन को एक ही सुव्यवस्थित और संपूर्ण मुस्हफ़ के रूप में संकलित नहीं किया गया था। उस समय क़ुरआन की आयतें विभिन्न सामग्री जैसे पेड़ों की टहनियों, हड्डियों और संसाधित चमड़े आदि पर अलग-अलग रूप में लिखी हुई थीं।[७]
पैग़म्बर (स) के स्वर्गवास के बाद, विभिन्न ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इमाम अली (अ) सबसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने क़ुरआन को संकलित करने और एक स्वतंत्र मुस्हफ़ तैयार करने का कार्य किया।[८] इसके अलावा, कई अन्य सहाबा, जिनमें ज़ैद बिन साबित, अब्दुल्लाह बिन मसऊद और उबैय बिन कअब शामिल हैं, ने भी अपने-अपने स्वतंत्र मुस्हफ़ तैयार किए।[९] इन मुस्हफ़ों के बीच कुछ अंतर पाए जाते थे, और कुछ रिपोर्टों में इन्हीं अंतरों को मुसलमानों के बीच मतभेद का एक कारण बताया गया है।[१०] इसी कारण, उस्मान बिन अफ़्फ़ान के शासनकाल में ज़ैद बिन साबित, अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर और कुछ अन्य लोगों पर आधारित एक समिति गठित की गई, जिसे क़ुरआन की एक मानक प्रति तैयार करने का दायित्व सौंपा गया। स्रोतों के अनुसार, इन उस्मानी मुस्हफ़ों में भी कुछ लिखित भिन्नताएँ और लिपिकीय त्रुटियाँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थीं।[११] कुछ शोधकर्ताओं का मत है कि उपलब्ध विवरणों के आधार पर इमाम अली (अ) मुस्हफ़ों के एक मानक पाठ तैयार करने के सिद्धांत से सहमत थे। साथ ही, उस्मानी मुस्हफ़ों में बताई गई कुछ कमियों के बावजूद, वे मुसलमानों को उन्हीं का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करते थे, ताकि क़ुरआन में परिवर्तन करने के बहाने उसके मूल स्वरूप में किसी प्रकार की विकृति न आने पाए।[१२]
सफ़वी और उस्मानी काल में क़ुरआन लेखन का प्रचलन
सफ़वी काल में ईरान और उस्मानी काल में तुर्की के भीतर क़ुरआन की हस्तलिखित प्रतियाँ तैयार करने की परंपरा व्यापक रूप से प्रचलित हुई।[१३] इस दौर में क़ुरआन कभी पूर्ण रूप से एक ही ग्रंथ के रूप में, तो कभी चार, पंद्रह, तीस और साठ जिल्दों में लिखा जाता था। हालांकि, धीरे-धीरे क़ुरआन को एक ही पूर्ण जिल्द में लिखने की परंपरा अधिक प्रचलित हो गई।[१४] बाद में मुद्रण तकनीक के विकास के साथ क़ुरआन की छपी हुई प्रतियों का उपयोग बढ़ने लगा और हाथ से क़ुरआन लेखन की परंपरा में धीरे-धीरे कमी आने लगी।[१५]
क़ुरआन की विशेष लेखन शैली
रस्मुल मुस्हफ़ से अर्थ उस विशेष लेखन शैली से है, जिसका प्रयोग उस्मानी मुस्हफ़ में किया गया था। इस मुस्हफ़ में क़ुरआन के कुछ शब्द सामान्य लेखन नियमों के विपरीत लिखे गए हैं।[१६] उदाहरण के रूप में, "الصلوٰة"[१७] को "الصلاة" के स्थान पर और "ابرٰهــٖم"[१८] को "ابراهیم" के स्थान पर लिखा गया है।[१९] विशेष लेखन शैली के संबंध में छह प्रमुख नियमों किसी अक्षर को हटाना, अतिरिक्त अक्षर जोड़ना, हम्ज़ा, एक अक्षर के स्थान पर दूसरे अक्षर का प्रयोग, जोड़ना और अलग करना का उल्लेख किया गया है। इनमें से कोई भी नियम सामान्य लेखन पद्धति के अनुरूप नहीं है।[२०] कुछ क़ुरआन विशेषज्ञों के अनुसार, उस्मानी लेखन शैली को इतना महत्व प्राप्त हो गया है कि यदि कोई क़िराअत इससे भिन्न हो, तो उसे संशोधित किया जाना चाहिए।[२१] शोधकर्ताओं के मतानुसार, ईश्वरीय संदेश लिखने वाले लेखकों से हुई त्रुटियाँ, इस्लाम के प्रारंभिक काल में लेखन-पद्धति का सरल और अविकसित होना, तथा क़ुरआन की विभिन्न क़िराअतों का लेखन शैली पर प्रभाव ये सभी वे कारण थे जिनकी वजह से रस्मुल मुस्हफ़ सामान्य लेखन नियमों के अनुरूप नहीं रहा।[२२] इसके विपरीत, कुछ सुन्नी विद्वान क़ुरआन की लेखन शैली को ईश्वरीय निर्देश पर आधारित मानते हैं। अर्थात उनका विश्वास है कि शब्दों को किस प्रकार लिखा जाए, इसका तरीका पैग़म्बर (स) ने ईश्वरीय संदेश के माध्यम से क़ुरआन के लेखकों को सिखाया था।[२३]
- क़ुरआन की लेखन शैली को बदला जा सकता है या नहीं, इस विषय में विद्वानों के बीच निम्नलिखित मत पाए जाते हैं:
- क़ुरआन की लेखन शैली को ईश्वरीय निर्देश पर आधारित मानने के आधार पर, क़ुरआन को किसी अन्य लेखन शैली में लिखना जायज़ नहीं है।[२४]
- यद्यपि क़ुरआन की लेखन शैली को ईश्वरीय निर्देश पर आधारित नहीं माना जाता, फिर भी क़ुरआन में अन्य प्रकार के हस्तक्षेप या परिवर्तन को रोकने के लिए क़ुरआन की लेखन शैली को उसी रूप में बनाए रखना चाहिए।[२५]
- क़ुरआन की लेखन शैली का पालन अनिवार्य नहीं है और क़ुरआन को किसी अन्य प्रचलित लेखन शैली में लिखा जा सकता है।[२६]
- वर्तमान समय के लोगों के लिए क़ुरआन की लेखन शैली से अपरिचित होने और उनके द्वारा क़ुरआन को गलत पढ़ने की संभावना को देखते हुए, क़ुरआन को इस प्रकार लिखा जाना चाहिए कि उसका सही पाठ आसानी से किया जा सके। इसलिए क़ुरआन को केवल क़ुरआन की लेखन शैली के आधार पर लिखना आवश्यक नहीं है।[२७] तफ़सीर नमूना के लेखक नासिर मकारिम शिराज़ी ने क़ुरआन की लेखन शैली में परिवर्तन को एक आवश्यक कार्य माना है।[२८]
क़ुरआन की लिपि का विकास

पैग़म्बर (स) के जीवनकाल में क़ुरआन हिजाज़ी लिपि में लिखा जाता था, जो पाँचवीं शताब्दी की नस्ख़ लिपि से मिलती-जुलती थी।[२९] वर्ष 17 हिजरी में कूफ़ा नगर की स्थापना और कूफ़ी लिपि के प्रचलन के बाद क़ुरआन की प्रतियाँ जिनमें वे मूल प्रतियाँ भी शामिल थीं जिन्हें उस्मान के काल में तैयार किया गया था और जिनके आधार पर अन्य प्रतियाँ लिखी जाती थीं कूफ़ी लिपि में लिखी जाने लगीं।[३०] प्रारंभिक काल में लिखी गई क़ुरआन की प्रतियों में न तो बिंदुओं का प्रयोग होता था और न ही स्वर-चिह्न लगाए जाते थे। इसके कारण पाठ करने में त्रुटियों की संभावना उत्पन्न होती थी।[३१]
अबुल असवद दुअली (मृत्यु: 69 हिजरी) ने इमाम अली (अ) के मार्गदर्शन में क़ुरआन में स्वर चिह्न लगाने का कार्य किया। हालांकि, उन्होंने इसके लिए आज प्रचलित मात्राओ का प्रयोग नहीं किया, बल्कि बिंदुओं का सहारा लिया।[३२] इस पद्धति में ज़बर (फ़त्ह) के लिए अक्षर के ऊपर एक बिंदु, ज़ेर (कसरा) के लिए अक्षर के नीचे एक बिंदु और पेश (ज़म्मा) के लिए अक्षर के आगे एक बिंदु लगाया जाता था। ये बिंदु क़ुरआन की मूल लिखावट से अलग रंग में होते थे।[३३] अबुल असवद के बाद उनके शिष्य नस्र बिन आसिम (मृत्यु: 89 हिजरी) ने उन अक्षरों को एक-दूसरे से अलग पहचानने के लिए बिंदुओं का प्रयोग शुरू किया, जो बिना बिंदु के एक जैसे दिखाई देते थे। जो मूल रूप से एक ही आकार के होते हैं। उन्होंने इन बिंदुओं को अपने गुरु द्वारा लगाए गए स्वर-चिह्नों से अलग रखने के लिए अक्षरों के मूल रंग में ही लिखा।[३४] कुछ अन्य ऐतिहासिक विवरणों में बिंदु लगाने की इस प्रक्रिया का श्रेय अबुल असवद दुअली के शिष्य यह्या बिन यअमुर[३५] अथवा स्वयं अबुल असवद दुअली या इब्न सीरीन को भी दिया गया है।[३६] कुछ समय बाद ख़लील बिन अहमद फ़राहीदी (मृत्यु: 175 हिजरी) ने अबुल असवद द्वारा स्वर चिह्नों के लिए प्रयोग किए गए बिंदुओं को वर्तमान हरकतो ज़बर, ज़ेर, पेश के रूप में परिवर्तित किया और क़ुरआन के पाठ को सरल बनाने के लिए तश्दीद, हम्ज़ा आदि के चिह्नों का भी प्रयोग शुरू किया।[३७] क़ुरआन के पाठ को आसान बनाने के उद्देश्य से चिह्नों के विकास की यह प्रक्रिया आगे भी जारी रही। यहाँ तक कि तीसरी शताब्दी हिजरी के अंतिम चरण तक तश्दीद के लिए "तीन दाँतों वाले चिह्न", का प्रयोग किया जाने लगा।[३८]
मुसलमानों ने पहली हिजरी शताब्दी में क़ुरआन के लेखन पर विशेष ध्यान दिया और लेखन-पद्धति को बेहतर बनाने के प्रयास किए।[३९] चौथी हिजरी शताब्दी तक क़ुरआन लिखने की शैलियाँ बहुत अधिक विविध हो गईं और इस्लामी जगत में लिखावट की बीस से अधिक शैलियाँ प्रचलित हो गईं।[४०] इन विभिन्न शैलियों के कारण लेखकों और पाठकों के लिए कई कठिनाइयाँ उत्पन्न होने लगीं।[४१] इसी कारण इब्न मुक़ला (मृत्यु: 328 हिजरी) ने इन लेखन शैलियों में सुधार का प्रयास किया।[४२] उन्होंने उन छह प्रमुख लिपि-शैलियों के लिए, जिनमें क़ुरआन लिखा जाता था—(1) सुल्स, (2) मुहक़्क़क़, (3) रैहान, (4) नस्ख़, (5) तौक़ीअ और (6) रुक़ाअ—कुछ निश्चित नियम और मानदंड निर्धारित किए।[४३]
क़ुरआन की कला और लेखन

इस्लामी काल में क़ुरआन लेखन केवल लिपि और सुलेख तक सीमित नहीं रही, बल्कि अलंकरण कला, पृष्ठ-सज्जा और जिल्दसाज़ी जैसी अन्य कलाओं में भी इसका प्रभाव दिखाई देता है।[४४] मुसलमानों ने केवल सुलेख ही नहीं, बल्कि क़ुरआन की लिखावट को सुंदर बनाने वाली हर कला और साधन जैसे अलंकरण कला और सजावटी कार्य का उपयोग किया।[४५] शोधकर्ताओं के अनुसार, लेखन की कला इसलिए विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह ईश्वरीय वाणी को पाठकों के सामने प्रस्तुत करती है और इसमें धार्मिक भावनाएँ एवं आध्यात्मिक अर्थ निहित होते हैं।[४६] क़ुरआन लेखन इलख़ानी काल (सातवीं हिजरी शताब्दी) में अपने चर्म पर पहुँची। इस काल में लिखी गई क़ुरआन की प्रतियाँ लिपि, अलंकरण कला और पांडुलिपि विज्ञान की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण और उच्च कलात्मक मूल्य रखती हैं।[४७]
सुलेख
इब्न मुक़ला (मृत्यु: 328 हिजरी) ने सुल्स, मुहक़्क़क़, रैहान, नस्ख़, तौक़ीअ और रुक़ाअ जैसी लिपि शैलियों का विकास किया।[४८] उन्होंने अक्षरों की रचना ज्यामिति के नियमों के आधार पर की और उनके आकार को सतह (लंबे खिंचे हुए अक्षर, जैसे अलिफ़ और बा) तथा दौर (घुमावदार अक्षर, जैसे जीम और नून) के सिद्धांतों के अनुसार व्यवस्थित किया।[४९] इब्न मुक़ला के बाद पाँचवीं हिजरी शताब्दी में इब्न अल-बव्वाब और फिर सातवीं हिजरी शताब्दी में याक़ूत मुस्तअसिमी ने नस्ख़ लिपि को अपने उत्कर्ष तक पहुँचाया। इसके बाद नस्ख़ को क़ुरआन के लेखन के लिए सबसे उपयुक्त लिपि के रूप में मान्यता मिली।[५०] नस्ख़ लिपि आगे चलकर कई शैलियों में विकसित हुई, जिनमें सबसे प्रमुख अरबी, तुर्की और ईरानी शैलियाँ हैं।[५१] तैमूरी काल में सुलेख कला में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।[५२] इसी दौर में रुक़ाअ और तौक़ीअ इन दो लिपियों के संयोजन से तअलीक़ लिपि अस्तित्व में आई और बाद में नस्ख़ तथा तअलीक़ के मेल से नस्तअलीक़ लिपि का विकास हुआ।[५३] भारत में मुसलमान क़ुरआन को बिहारी लिपि में लिखते थे, जबकि चीन में इसे सिनी लिपि (नस्ख़ की एक विशेष शैली) में लिखा जाता था।[५४]
नस्ख़ लिपि अपनी स्पष्टता और सुगमता के कारण क़ुरआन के लेखन में विशेष महत्व रखती है।[५५] मुस्तअसिमी द्वारा लिखा गया एक क़ुरआन आज भी उपलब्ध है, जिसे उन्होंने 669 हिजरी में सुल्स, नस्ख़ और रैहान इन तीनों लिपियों में लिखा था।[५६] अहमद नीरीज़ी की लिखे हुए क़ुरआन की प्रति ईरानी नस्ख़ लिपि में लिखे गए सबसे प्रसिद्ध क़ुरआनों में से एक मानी जाती है।[५७] नस्तअलीक़ लिपि का प्रयोग साहित्यिक ग्रंथों में व्यापक रूप से किया जाता है; लेकिन इसमें मात्राएँ लगाना कठिन होने के कारण पूरे क़ुरआन को इस लिपि में लिखना बहुत कम प्रचलित है।[५८] मीर इमाद हसनी क़ज़वीनी ने सूर ए फ़ातिहा को नस्तअलीक़ लिपि में लिखा, जो अपनी कलात्मक सुंदरता के कारण अत्यंत प्रसिद्ध हुआ।[५९] सफ़वी काल में क़ुरआन के फ़ारसी अनुवाद को आयतों के नीचे एक पतली पट्टी के रूप में नस्तअलीक़ लिपि में लिखा जाता था।[६०]
अलंकरण कला

अलंकरण कला उस कला को कहा जाता है जिसमें पुस्तक के पन्नों या उसके आवरण को सोने और अन्य रंगों से सजाया जाता है।[६१] क़ुरआन की प्रतियों में अलंकरण कला का प्रयोग सामान्यतः सूरहों और पारों की पहचान के लिए किया जाता था।[६२] यह कला सुलेख के साथ-साथ विकसित हुई। धीरे-धीरे स्थिति यह हो गई कि क़ुरआन लिखने वाले सुलेखक स्वयं उसकी अलंकरण कला का कार्य भी करने लगे।[६३] वर्तमान में उपलब्ध क़ुरआन की चित्रकारी और अलंकरण से संबंधित सबसे पुराने नमूने तीसरी हिजरी शताब्दी और उसके बाद के काल से संबंधित हैं।[६४] इन क़ुरआनी प्रतियों को प्रायः उस समय के शासकों के आदेश पर तैयार किया जाता था।[६५] छठी हिजरी शताब्दी के अंत और सातवीं हिजरी शताब्दी के आरंभ में तबरेज़ शहर अलंकरण कला के महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक बन गया और इसी काल में अलंकरण कला की तबरेज़ शैली का विकास हुआ।[६६] तैमूरी काल में अलंकरण कला को बहुत अधिक प्रोत्साहन और विस्तार मिला, क्योंकि उस दौर के शासक कला और कलात्मक कार्यों में विशेष रुचि रखते थे।[६७]
क़ुरआनी शिलालेख

शिलालेख उन क़ुरआनी आयतों और सूरहों को कहा जाता है जिन्हें विभिन्न रूपों में पवित्र स्थलों, जैसे मस्जिदों के मेहराब और गुम्बद, इमामों के रौज़ों, ज़रीह तथा धार्मिक स्थलों की दीवारों पर लिखा जाता है।[६८] ये शिलालेख कूफ़ी, सुल्स, नस्ख़, नस्तअलीक़ और मोअल्ला जैसी लिपियों में लिखे जाते थे तथा इन्हें टाइल-कला, ईंटों की सजावट या प्लास्टर पर उकेरने की शैली में भी तैयार किया जाता था।[६९] शिलालेख का प्रचलन तैमूरी काल में था और सफ़वी काल में यह कला अपने उत्कर्ष पर पहुँची।[७०]
जिल्दसाज़ी
मुसलमानों ने क़ुरआन को क्षति से सुरक्षित रखने के लिए जिल्दसाज़ी की कला का उपयोग किया।[७१] सुलेख की तरह जिल्दसाज़ी की कला का भी मुसलमानों के बीच क़ुरआन की पवित्रता और सम्मान के कारण बहुत विकास हुआ।[७२] प्रारंभिक जिल्दें बहुत साधारण होती थीं, लेकिन चौथी हिजरी शताब्दी से जिल्दों के मध्य भाग में वृत्ताकार और अंडाकार ज्यामितीय आकृतियों का प्रयोग किया जाने लगा।[७३] कुछ समय बाद जिल्दों को सोने की नक्काशी और अलंकरण कला से सजाया जाने लगा।[७४] ईरान के तैमूरी काल और मिस्र के मुमालीक काल में चमड़े की जिल्दों की सजावट को विशेष महत्व प्राप्त था।[७५] तैमूरी काल में जिल्दसाज़ी की कला अपने चरम विकास तक पहुँची।[७६]
क़ुरआन का पहला मुद्रण
क़ुरआन पहली बार वर्ष 950 हिजरी में बुंदुक़ुय्या शहर में छापा गया, लेकिन चर्च के अधिकारियों के आदेश पर उस प्रति को नष्ट कर दिया गया।[७७] इसके बाद सन् 1104 हिजरी में जर्मन इस्लामविद आब्राहाम हिंकिलमान ने जर्मनी के हैम्बर्ग नगर में क़ुरआन का मुद्रण किया।[७८] क़ुरआन का पहला इस्लामी मुद्रण सन् 1200 हिजरी में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग शहर में मौला उस्मान नामक व्यक्ति द्वारा किया गया।[७९] ईरान पहला इस्लामी राज्य था जिसने क़ुरआन को लिथोग्राफ़ी के माध्यम से दो बार पहली बार 1243 हिजरी में तेहरान में और दूसरी बार 1248 हिजरी में तबरेज़ में प्रकाशित किया।[८०] ईरान के बाद, उस्मानी शासन ने सन् 1294 हिजरी में क़ुरआन के विभिन्न मुद्रित संस्करण प्रकाशित किए।[८१] मिस्र सरकार ने 1342 हिजरी में और इराक़ सरकार ने 1370 हिजरी में क़ुरआन की उत्कृष्ट और सुंदर मुद्रित प्रतियाँ प्रकाशित कीं।[८२]
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फ़ुटनोट
- ↑ रुकनी, आशनाई बा उलूम-ए-क़ुरआनी, पृष्ठ 4।
- ↑ जाफ़री, «مقدمه, रस्म-उल-ख़त-ए-मुस्हफ़ मेंं, पृष्ठ 5।
- ↑ ताहेरी, दर्सहा-ई अज़ उलूम-ए-क़ुरआनी, खंड 1, पृष्ठ 329।
- ↑ मतलब, «تأثیر کتابت در پیامرسانی قرآن», पृष्ठ 69-72।
- ↑ शिराज़ी, व सहरागर्द, «سیر تحول خطوط قرآنی در جهان اسلام», पृष्ठ 55।
- ↑ हाज सय्यद जवादी, «سیر کتابت قرآن», पृष्ठ 22।
- ↑ मारेफ़त, अत-तम्हीद फ़ी उलूम-अल-क़ुरआन, खंड 1, पृष्ठ 285; तबातबाई, अल-मीज़ान फ़ी तफ़सीर-अल-क़ुरआन, खंड 12, पृष्ठ 124।
- ↑ मारेफ़त, अत-तम्हीद फ़ी उलूम-अल-क़ुरआन, खंड 1, पृष्ठ 292-298।
- ↑ मारेफ़त, अत-तम्हीद फ़ी उलूम-अल-क़ुरआन, खंड 1, पृष्ठ 292-308।
- ↑ मारेफ़त, अत-तम्हीद फ़ी उलूम-अल-क़ुरआन, खंड 1, पृष्ठ 331-332।
- ↑ अल-सियूती, अल-इत्क़ान, खंड 1, पृष्ठ 209; इब्ने अबी दाऊद, अल-मसाहिफ़, खंड 1, पृष्ठ 88 और 93; मारेफ़त, अत-तम्हीद फ़ी उलूम-अल-क़ुरआन, खंड 1, पृष्ठ 336, 337, 342-345; इब्ने असीर, अल-कामिल फ़ी अत-तारीख़, खंड 3, पृष्ठ 112।
- ↑ मारेफ़त, अत-तम्हीद फ़ी उलूम-अल-क़ुरआन, खंड 1, पृष्ठ 337-339।
- ↑ शिराज़ी, व सहरागर्द, «سیر تحول خطوط قرآنی در جهان اسلام», पृष्ठ 65।
- ↑ शिराज़ी, व सहरागर्द, «سیر تحول خطوط قرآنی در جهان اسلام», पृष्ठ 64।
- ↑ शिराज़ी, व सहरागर्द, «سیر تحول خطوط قرآنی در جهان اسلام», पृष्ठ 66।
- ↑ सरशार, «رسم المصحف», पृष्ठ 793।
- ↑ सूर ए बक़रा, आयत 164।
- ↑ सूर ए बक़रा, आयत 125।
- ↑ मारेफ़त, उलूम-ए-क़ुरआनी, पृष्ठ 166-169।
- ↑ सरशार, «رسم المصحف», पृष्ठ 793।
- ↑ सरशार, «رسم المصحف», पृष्ठ 795।
- ↑ रजबी, «रस्म-उल-मुस्हफ़; विज़ेगीहा व दीदगाहहा», पृष्ठ 22-31।
- ↑ मआरिफ़, दरआमदी बर तारीख़-ए-क़ुरआन, पृष्ठ 187।
- ↑ मआरिफ़, दरआमदी बर तारीख़-ए-क़ुरआन, पृष्ठ 187।
- ↑ खुमैनी, तफ़सीर-अल-क़ुरआन-इल-करीम, खंड 1, पृष्ठ 224।
- ↑ सुब्ही सालेह, मबाहिस फ़ी उलूम-अल-क़ुरआन, पृष्ठ 278-279।
- ↑ सुब्ही सालेह, मबाहिस फ़ी उलूम-अल-क़ुरआन, पृष्ठ 280।
- ↑ मक़ारिम शिराज़ी, इस्तिफ़ताआत, खंड 4, पृष्ठ 490।
- ↑ हाज सय्यद जवादी, «سیر کتابت قرآن», पृष्ठ 23।
- ↑ हाज सय्यद जवादी, «سیر کتابت قرآن», पृष्ठ 23।
- ↑ मीर मुहम्मदी-ज़ारंदी, तारीख़ व उलूम-ए-क़ुरआन, पृष्ठ 160।
- ↑ मीर मुहम्मदी-ज़ारंदी, तारीख़ व उलूम-ए-क़ुरआन, पृष्ठ 161-163।
- ↑ रामयार, तारीख़-ए-क़ुरआन, पृष्ठ 534।
- ↑ मीर मुहम्मदी-ज़ारंदी, तारीख़ व उलूम-ए-क़ुरआन, पृष्ठ 163-165।
- ↑ मारेफ़त, अत-तम्हीद, खंड 1, पृष्ठ 356-357; ज़रक़ानी, मनाहिल-अल-इरफ़ान, खंड 1, पृष्ठ 399-400।
- ↑ ज़रक़ानी, मनाहिल-उल-इरफ़ान, खंड 1, पृष्ठ 400।
- ↑ मीर मुहम्मदी-ज़ारंदी, तारीख़ व उलूम-ए-क़ुरआन, पृष्ठ 165।
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