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ِअबू तालिब का ईमान

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यह लेख हज़रत अबू तालिब के धर्म के बारे में है। इसी नाम की किताब के बारे में जानने के लिए , ईमाने अबू तालिब (किताब) देखें।

हज़रत अबू तालिब का ईमान, शिया और सुन्नी के बीच एक विवादित मुद्दा है। यह बात कि अबू तालिब, पैग़म्बर (स) के चाचा और इमाम अली (अ) के पिता, एक मुसलमान थे, अहल अल-बैत (अ) और इमामिया शियों के नज़रिए से एक पक्का मामला है, और वे सभी इस मुद्दे पर सहमत हैं। कई ज़ैदी शिया और बड़ी संख्या में सुन्नी विद्वान भी अबू तालिब के ईमान को मानते हैं।इस दृष्टिकोण के विपरीत, अधिकांश सुन्नी मानते हैं कि अबू तालिब एक काफ़िर के तौर पर इस संसार से गये।

अबू तालिब के क़बीलाई और राजनीतिक हालात के बारे में बताते हुए, शिया स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने पैग़म्बर (अ) की रक्षा के लिए तक़य्या का पालन किया और इसी वजह से उन्होंने कभी मुस्लिम रस्में नहीं निभाईं। इस तरह, इस जानबूझकर छिपाने से उन्हें कुरैश के नेताओं के बीच अपना सम्मान और प्रभाव बनाए रखने और पैग़म्बर के लिए एक मध्यस्थ एवं सहायक के तौर पर काम करते रहने का मौका मिला। शिया मानते हैं कि किसी इंसान को मुसलमान या नास्तिक मानने के लिए, केवल लोगों की बातों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है; इसलिए, उन्होंने अबू तालिब के मुसलमान होने के लिए उनके ईमान के बारे में इमामों (अ.स.) की बहुत सी हदीसों, अबू तालिब द्वारा पैग़म्बर (स) के हर तरह से बचाव, उनकी कही हुई कविताओं, और फ़ातेमा पुत्री असद से उनकी शादी के बने रहने जैसी बातों का हवाला देकर उनके ईमान का तर्क दिया है।

सुन्नी विद्वान जो अबू तालिब के नास्तिक होने में विश्वास करते हैं, उन्होंने ज़हज़ाह की हदीस और कई भगवानों को मानने वालों के बारे में बताई गई आयतों से जुड़ी मतलब वाली हदीसों का हवाला दिया है। हालांकि कुछ शिया और सुन्नी विद्वानों ने इन हदीसों के असली होने पर सुन्नी उसूलों के हिसाब से भी शक जताया है, यह कहा गया है कि यह झगड़ा सिर्फ़ सुन्नियों के उस समुदाय के लिए काम का है जिनका सलफ़ी या पारंपरिक दृष्टिकोण नहीं है, लेकिन यह उन लोगों के लिए काफ़ी नहीं है जो सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम की सभी हदीसों को सही मानते हैं।

अबू तालिब के विश्वास के बारे में किताब लिखने के बारे में शुरुआती सदियों से ही शिया और सुन्नी विद्वानों में रूची रही है। अबू तालिब के विश्वास को साबित करने वाली शिया किताबों में अब्दुल्लाह बिन अली खुनैज़ी की लिखी किताब 'अबू तालिब मोमिने क़ुरैश' भी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इस किताब को लिखने पर सऊदी अरब में उन्हे मौत की सज़ा सुनाई गई थी। अहमद ज़ैनी दहलान की लिखी किताब 'असना अल-मतालिब फ़ी नेजात अबी तालिब' इस विषय पर लिखी गई सुन्नी किताबों किताबों में से एक है।

शिया और सुन्नी के धार्मिक झगड़ों के बीच अबू तालिब का विश्वास

अबू तालिब का ईमान, शिया और सुन्नी के बीच एक ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से विवादित मुद्दा है।[१] इमामिया शियों के अनुसार, पैग़म्बर (स) के चाचा और इमाम अली (अ) के पिता, अबू तालिब एक मुसलमान थे, और इस विषय पर इमामों और उनके अनुयायियों के बीच आम सहमति है।[२] ज़्यादातर ज़ैदी शिया भी इस मुद्दे पर इमामिया शियोंं से सहमत हैं।[३]

दूसरी ओर, ज़्यादातर सुन्नी अबू तालिब को काफ़िर मानते हैं।[४] हालाँकि, इस बात पर सभी सुन्नियों की आम सहमति नहीं है।[५] कुछ शोधों में चार सुन्नी विचारधाराओं के 35 विद्वानों के नाम बताए गए हैं जिनका जीवनकाल दूसरी से पंद्रहवीं सदी हिजरी के बीच है, वह सभी अबू तालिब के विश्वास को स्वीकार करते थे।[६] मोतज़ेली सुन्नी संप्रदाय के विद्वान अबू अल-क़ासिम बल्ख़ी और अबू जाफ़र-इस्काफ़ी,[७] मुहम्मद इब्न अब्द अल-रसूल बरज़ंजी और अहमद ज़ैनी दहलान, शाफ़ेई सुन्नी संप्रदाय के विद्वान भी, शियों की तरह, अबू तालिब के ईमान पर ज़ोर देते हैं।[८]

शिया धार्मिक सबूतों और उनकी वैध हदीसों के आधार पर, न सिर्फ़ अबू तालिब का ईमान पक्का है, बल्कि वह ईमान के ऊँचे दर्जे पर थे कि उन्होंने अपना पूरा जीवन और अस्तित्व पैग़म्बर (स) की रक्षा में लगा दिया।[९] बिहार अल-अनवार के लेखक अल्लामा मजलिसी के मुताबिक, अबू तालिब कभी मूर्तिपूजक नहीं थे, बल्कि वे पैग़म्बर इब्राहीम (अ) के उत्तराधिकारियों में से एक थे।[१०]

ऐसा कहा जाता है कि अबू तालिब को काफ़िर घोषित करना एक राजनीतिक मुद्दा था। इस बुनियाद पर, यह दावा किया गया है कि अबू तालिब के कुफ़्र से जुड़ी हदीसें अब्बासियों, खासकर मंसूर-दवानेक़ी की ओर से गढ़ी गई थीं; क्योंकि अब्बासी, जो अब्बास इब्न अब्दुल मुत्तलिब के वंशज थे, अबू तालिब के परिवार के साथ राजनीतिक मामलों में खुलेआम झगड़ा करते थे और उन्हें राजनीति से बाहर करने के लिए उन्होने इस तरह की हदीसें गढ़ी थीं।[११] कुछ सुन्नी विद्वान यह भी मानते हैं कि अबू तालिब के कुफ़्र से जुड़ी हदीसें बनी उमय्या ने मुआविया इब्न अबी सुफ़यान के समय में इमाम अली (अ.स.) को बदनाम करने के लिए गढ़ीं थीं।[१२]

यह कहा गया है कि अबू तालिब के ईमान या कुफ़्र के मुद्दे पर राजनीतिक दृष्टिकोण इतना बड़ा है कि सहाबा के कुछ सुन्नी इतिहासकारों ने, सहाबा में से कुछ निश्चित काफ़िरों (जैसे उमय्या) के नाम सहाबा में शामिल करने के बावजूद,[१३] अबू तालिब का नाम सहाबा में शामिल करने से परहेज़ किया है।[१४]

अबू तालिब का तक़य्या

शिया विद्वानों का मानना ​​है कि हज़रत अबू तालिब ने तक़य्या की वजह से अपने ईमान का खुलासा नहीं किया।[१५] शिया इतिहासकार सय्यद जाफ़र मुर्तज़ा आमिली ने अबू तालिब के तक़य्या को साबित करने के लिए जो सबूत दिए, उनमें अबू तालिब की वसीयत भी शामिल है।[१६] कुछ सुन्नी स्रोतों में, जिन्होंने अबू तालिब की वसीयत का उल्लेख किया है, उनसे यह बात उल्लेख की है: "पैग़म्बर (स) की नबूवत ऐसी चीज़ है जिसे दिल मानता है, लेकिन ज़बान इनकार करती है।"[१७]

शिया हदीसों में भी अबू तालिब के तक़य्या की बात दिखाई देती है; उनमें से एक यह है कि पैग़म्बर (स) ने स्वर्ग जाते समय (मेराज में) चार रौशनियाँ देखी थीं, जिनमें से एक अबू तालिब की रौशनी थी, और भगवान ने उनके उस स्थिति तक पहुँचने का कारण उनके तक़य्या को बताया हैं।[१८]

इमाम सादिक (अ.स.) ने अबू तालिब के ईमान के बारे में कहा:إِنَّ مَثَلَ أَبِي طَالِبٍ‏ مَثَلُ أَصْحَابِ الْكَهْفِ أَسَرُّوا الْإِيمَانَ‏ وَ أَظْهَرُوا الشِّرْكَ فَآتَاهُمُ اللَّهُ‏ أَجْرَهُمْ مَرَّتَيْنِ‏ इन्ना मसला अबी तालिब मसलो असहाबिल कहफ़ असर्रुल ईमान व अज़हरु अल-शिर्क फ़आताहुमुल्लाहो अजरहुम मर्रतैन।[१९]

अनुवाद: अबू तालिब की मिसाल गुफा के लोगों (असहाबे कहफ़) जैसी है। उन्होंने अपने ईमान को छिपाया और कई भगवानों के मानने (शिर्क) को ज़ाहिर किया, इसलिए भगवान ने उन्हें उनका दोगुना इनाम दिया।



शियों के अनुसार, इस्लाम के नए धर्म को कुछ क़ुरैश नेताओं के समर्थन की ज़रूरत थी जो बिना किसी भेदभाव के दिखें, और उन हालात में, अगर अबू तालिब ने अपने ईमान का खुलासा किया होता, तो वह कुरैश के कई भगवानों को माननों वालो के बीच अपनी इज़्ज़त और सम्मान खो देते, और वह क़बीले के मुखिया के तौर पर मध्यस्थ एवं सहायक नहीं बन पाते और इस्लाम का समर्थन करने के लिए अपनी बड़ी हैसियत का इस्तेमाल नहीं कर पाते।[२०] हदीस के एक शिया विद्वान सय्यद मुहम्मद काज़िम तबातबाई के अनुसार, इस्लाम से पहले की सभ्यता में क़बीले की स्थिति को देखते हुए अबू तालिब का अपने ईमान को ज़ाहिर न करने को सही ठहराया जा सकता है। क्योंकि पूर्व-इस्लामी काल की संस्कृति के अनुसार, जनजाति उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण थी, और चूंकि अबू तालिब कुरैश जनजाति में सबसे बड़े थे, इसलिए वह इस स्थान पर भरोसा करते हुए पैग़म्बर का समर्थन कर सकते थे।[२१] तदनुसार, यदि अबू तालिब ने खुद को पैग़म्बर के अनुयायी और एक मुसलमान के रूप में पेश किया होता, तो वह इस स्थिति को खो देते और पैग़म्बर का समर्थन नहीं कर सकते थे।[२२] शिया विद्वान, तबातबाई, इस विश्लेषण पर भरोसा करते हुए यह समझाने की कोशिश करते हैं कि यह कैसे संभव है कि यहाँ तक कि शिया स्रोतों के अनुसार अबू तालिब ने शहादतैन भी नहीं पढ़ी या नमाज़ जैसे कोई धार्मिक अनुष्ठान भी नहीं किए।[२३]

अबू तालिब के ईमान का समर्थन करने वालों के तर्क

"शेख़ मुफ़ीद द्वारा रचित पुस्तक "ईमान-ए-अबी तालिब", जो अबू तालिब (अ) के ईमान (विश्वास) को सिद्ध करने के लिए लिखी गई है।"

शिया इतिहासकार सय्यद जाफ़र मुर्तज़ा आमिली के अनुसार, किसी व्यक्ति के विश्वास की समझ सिर्फ उसके बोलने से साबित नहीं होती, बल्कि उसके व्यवहारिक कार्यो, पैग़म्बर (स) और अहले-बैत (अ) के उसके बारे में दृष्टिकोण, और उनके बारे में जानने वालों की हदीसों से इसे समझा और साबित किया जा सकता है।[२४] सय्यद काज़िम तबातबाई अबू तालिब के ईमान के तर्कों को पारंपरिक सुन्नी समुदाय के लिए काफी नहीं मानते हैं और उनका मानना ​​है कि ये तर्क सुन्नी समुदाय में सिर्फ उन लोगों के लिए काम के हैं जिन्होने पास ज्ञान प्राप्ती के लिए सलफी या पारंपरिक तरीका नहीं अपनाया है, लेकिन ये तर्क उन लोगों के लिए काम के नहीं हैं जो सहीह मुस्लिम और सहीह बुखारी की सभी हदीसों को असली और भरोसेमंद मानते हैं, और इस समूह के विश्वास को बदलना संभव नहीं है।[२५]

शिया हदीसें

शिया हदीसों में अबू तालिब के ईमान को एक साबित हो चुका कार्य माना जाता है, और इमामों की बहुत सी हदीसें इस बात पर इशारा करती हैं; उदाहरण के लिए, इमाम अली (अ.स.) की एक रिवायत में, न केवल अबू तालिब के जन्नत में होने का उल्लेख है, बल्कि उन्हें सिफ़ारिश (शफ़ाअत) का दर्जा भी दिया गया है, और कहा गया है कि क़यामत के दिन, उनकी रौशनी सभी रौशनियों (चौदह मासूमीन (अ) की रौशनी को छोड़कर) पर हावी होगी।[२६] इमाम बाक़िर (अ.स.) की एक रिवायत में, कर्मों के पैमाने पर अबू तालिब के ईमान का वज़न सभी प्राणियों के ईमान के वज़न से ज़्यादा माना गया है।[२७] साथ ही, इमाम सादिक (अ.स.) से सुनाई गई रिवायतों के अनुसार, अल्लाह ने अबू तालिब पर आग हराम कर दी है[२८] और उन्हें जन्नत में नबियों, सच्चे लोगों (सिद्दिक़ीन), शहीदों और नेक लोगों (सालेहीन) के साथ में रखा है।[२९] इसके अलावा, इमाम रज़ा (अ.स.) के एक वर्णन में कहा गया है कि जो कोई भी अबू तालिब के विश्वास को स्वीकार नहीं करता है, वह नर्क की आग की ओर जाता है।[३०] अल्लामा अमीनी ने अपनी पुस्तक अल-ग़दीर[३१] में और मुहम्मद रज़ा मरूजी नजफ़ी ने अपनी पुस्तक मुनियत अल-राग़़िब[३२] में अबू तालिब के ईमान के बारे में अचूक लोगों (चौदह मासूमीन (अ)) से वर्णित हदीसों को एकत्रित किया है।

स्थिति और दृष्टिकोण

हज़रत अबू तालिब के बहुत से व्यावहारिक कार्यों को न केवल उनके विश्वास[३३] बल्कि उनके उच्च स्तर के विश्वास के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।[३४] उदाहरण के लिए, जब क़ुरैश ने पैग़म्बर (स) को मारना चाहा, तो अबू तालिब ने उनके फैसले को रोक दिया[३५] और जब बहुदेववादी पैग़म्बर (स) को परेशान करते थे, तो वह पैग़म्बर की रक्षा के लिए खड़े हो जाते थे।[३६] मक्का के बहुदेववादियों के विपरीत, उन्होंने लोगों को मुसलमान बनने से नहीं रोका; उदाहरण के लिए, कुछ स्रोतों में कहा गया है कि उन्होंने अपनी पत्नी फ़ातेमा पुत्री असद को पैग़म्बर का अनुसरण करने के लिए आमंत्रित किया,[३७] या जब उन्होंने अपने बेटे, अली को नमाज़ में पैग़म्बर (स) का अनुसरण करते देखा, तो उन्होंने उन्हे हमेशा पैग़म्बर के साथ जाने का आदेश दिया;[३८] क्योंकि वह केवल अच्छे कर्मों के लिये बुलाते है।[३९] इसी तरह से अबू तालिब ने अपने दूसरे बेटे जाफ़र को भी ईश्वर के दूत (स) के साथ प्रार्थना करने का आदेश दिया।[४०]

अबू तालिब की कविताएँ

पैग़म्बर (स) की नबूवत के समर्थन में हज़रत अबू तालिब की कविताएँ उनके ईमान का एक और सबूत मानी जाती हैं।[४१] जैसा कि किताब काफ़ी में बताई गई हदीस में है, इमाम बाक़िर (अ) ने अबू तालिब के ईमान को साबित करने के लिए उनकी यह कविता प्रमाण के रूप में पेश की है:

أَلَمْ تَعْلَمُوا أَنَّا وَجَدْنَا مُحَمَّدًا
نَبِیًّا کَمُوسَی خُطَّ فِی أَوَّلِ الْکُتُبِ
[४२]नबीयन कमूसा ख़ुत्ता फ़ी अव्वलिल कुतुब
अलम तालमू अन्ना वजदना मोहम्मदन


अनुवाद: क्या तुम नहीं जानते कि हम मुहम्मद को मूसा की तरह एक पैग़म्बर के रूप में मानते हैं, जिनका ज़िक्र पहले की किताबों में किया गया है?

उनकी सबसे मशहूर कविता, जिसे लामिया कविता कहा जाता है, इस पंक्ति से शुरू होती है:

خَليلَيَّ ما أُذني لِأَوَّلِ عاذِلِ
بِصَغواءَ في حَقٍّ وَلا عِندَ باطِلِ
[४३]बेसग़वाआ फ़ी हक़्क़िन वला इन्दा बातिल
ख़लीलय्या मा ओज़ोनी ले अव्वले आज़िल


अनुवाद: मेरे दोस्त, मैंने कभी इल्ज़ाम लगाने वालों की बातें नहीं सुनीं, और न ही मैं कभी ज़रा भी कुफ़्र और बगावत की ओर गया।

उनकी कुछ और कविताएँ जो उनके ईमान को दिखाती हैं, वे इस तरह हैं:

لَقَد أَكرَمَ اللَهُ النَبِيَّ مُحَمَّداً
فَأَكرَمُ خَلقِ اللَهِ في الناسِ أَحمَدُ
फ़अकरमो ख़लक़िल्लाहे फ़िन्नासे अहमदो
लक़द अकरमल्लाहो अल नबीया मोहम्मदन
وَشَقَّ لَهُ مِن إِسمِهِ لِيُجِلَّهُ
فَذو العَرشِ مَحمودٌ وَهَذا مُحَمَّدُ
[४४]फ़ज़ुल अर्शे महमूदुन व हाज़ा मोहम्मदो
व शक़्क़ा लहु मिन इस्मेही लेयोजिल्लहु


अनुवाद: निसंदेह भगवान ने पैग़म्बर मुहम्मद को सम्मान दिया है, इसलिए लोगों के बीच अल्लाह की रचनाओं में सबसे सम्मानित अहमद हैं।

और उसने उनका नाम अपने नामों में से चुना है, वह सिंहासन का स्वामी महमूद है और ये मुहम्मद हैं।

يا شاهِدَ اللَهِ عَلَيَّ فَاِشهَدِ
أَنّي عَلى دينِ النَبِيِّ أَحمَدِ
[४५]अन्नी अला दीने अल नबीए अहमद
या शाहेदल्लाहे अलय्या फ़इशहद


अनुवाद: ऐ अल्लाह के गवाह, गवाह रहना कि मैं अल्लाह के पैग़म्बर अहमद के धर्म पर दृढ़ हूं।

अल्लामा अमीनी, अबू तालिब से उद्धृत कविताओं पर विचार करते हुए मानते हैं कि यदि उनकी कविताओं में इन विभिन्न अभिव्यक्तियों को अल्लाह के रसूल (स) की नबूवत का प्रमाण और स्वीकारोक्ति नहीं माना जाता है, तो फिर नबूवत का स्वीकारोक्ति और गवाही को और कैसे माना जायेगा?![४६] अल-ग़दीर किताब में, उन्होंने अबू तालिब की उन कविताओं को एकत्रित किया है जो सुन्नी स्रोतों में उद्धृत हैं और उनके विश्वास को इंगित करती हैं।[४७]

फ़ातेमा बिन्त असद का इस्लाम स्वीकार करना

इमाम सज्जाद (अ.स.) से उल्लेख की गई एक हदीस में, अबू तालिब और उनकी पत्नी फ़ातेमा बिन्त असद की शादी के रद्द (अमान्य) न होने को उनके ईमान के सबूत के तौर पर बयान किया गया है।[४८] इब्न अबी अल-हदीद, एक मोअतज़ेली सुन्नी विद्वान, ने फ़ातिमा बिन्त असद को पैग़म्बर (स.अ.व.) पर विश्वास करने वाले ग्यारहवें व्यक्ति के रूप में उल्लेख किया है।[४९] इसलिए, उनके धर्म बदलने की तारीख़ को पैग़म्बर के मिशन (बेअसत) के पहले या दूसरे साल माना गया है।[५०] यह इस तथ्य के बावजूद है कि मुस्लिम न्यायशास्त्र के अनुसार, यदि कोई ग़ैर-मुस्लिम महिला इस्लाम धर्म को स्वीकार करती है लेकिन उसका पति अपना धर्म नहीं बदलता है, तो उनकी शादी अमान्य हो जाती है और महिला को पुरुष से तलाक़ दे दिया जाता है;[५१] जैसा कि सुन्नी न्यायविद इस शरई आदेश को एकमत से मानते है।[५२] इसलिए, यह तथ्य कि फ़ातिमा बिन्त असद ने इस्लाम धर्म अपनाने के बाद अपने पति अबू तालिब को तलाक़ नहीं दिया, यह संकेत माना जाता है कि अबू तालिब अविश्वासी नहीं थे।[५३] हालाँकि, अन्य स्रोतों में यह भी आया हैं कि उन्होंने अपने पति की मृत्यु के बाद इस्लाम धर्म अपनाया था।[५४]

अबू तालिब के कुफ्र पर कुछ सुन्नियों की दलीलें

सुन्नी विद्वानों ने अबू तालिब के कुफ्र के लिए जो वजहें बताईं है, उनमें ये हैं:

ज़हज़ाह की हदीस

जो सुन्नी अबू तालिब के कुफ्र को मानते हैं, उन्होंने ज़हज़ाह की हदीस को दलील बनाया है। इस हदीस के अनुसार, जिसका ज़िक्र भरोसेमंद सुन्नी स्रोतों (जैसे सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम) में किया गया है, पैग़म्बर (स) के प्रति उनकी सेवाओं के लिए कृतज्ञता के बदले में, अबू तालिब को उनके हस्तक्षेप (शिफ़ाअत) के माध्यम से नर्क की गहराइयों से ज़हज़ाह नामक स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया, और उनकी सजा की गंभीरता कम कर दी गई।[५५] ज़हज़ाह की हदीस को उन लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सबूत माना जाता है जो अबू तालिब के ईमान को नकारते हैं।[५६]

दूसरी तरफ, शिया विद्वान इस हदीस को सुन्नी उसूलों के हिसाब से भी भरोसेमंद नहीं मानते हैं;[५७] क्योंकि इसके शब्द कुरआन की अलग-अलग आयतों[५८] और सुन्नी स्रोतों में उल्लेख की गई अलग-अलग हदीसों[५९] से मेल नहीं खाता, जिनमें काफ़िरों के लिये किसी भी तरह की सिफ़ारिश या छूट से इनकार किया गया है।[६०] अपनी किताब ईमाने अबू तालिब में, फ़ख़र इब्न मआद-मूसवी ने इमाम बाक़िर (अ), इमाम सादिक़ (अ), और इमाम रज़ा (अ) की हदीसें पेश की हैं, जिन्होंने ज़हज़ह की रिवायत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है और उन्होंने ऐसी रिवायत को अल्लाह के दुश्मनों के झूठ का नतीजा माना है।[६१]

सूरह तौबा की आयत 113 और सूरह क़सस की आयत 56 के बारे में उल्लेखित हदीसें

शौकानी, एक सुन्नी विद्वान, ने सूर ए क़सस की आयत 56 और सूर ए तौबा की आयत 113 के बारे में पेश की गई हदीसों का हवाला देते हुए अबू तालिब को एक बहुदेववादी बताया है।[६२] सुन्नी स्रोतों ने सूर ए क़सस की आयत 56 के तहत ऐसी हदीसें उल्लेख की हैं जिनके अनुसार पैग़म्बर (स) ने अबू तालिब से उनके जीवन के आखिरी समय में शहादतैन (कलमा) ज़बान पर जारी करने और मुसलमान बनने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया और एक बहुदेववादी के रूप में ही इस दुनिया से गये।[६३] साथ ही, सूरह तौबा की आयत 113 के तहत उल्लेख की गई हदीसों में, पैग़म्बर (स) को अबू तालिब के लिए माफी मांगने (इस्तिग़फ़ार करने) से मना किया गया था, जिनकी मौत एक बहुदेववादी के रूप में हुई थी।[६४]

दूसरी ओर, इन हदीसों की कुछ सुन्नी विद्वानों ने भी आलोचना की है, जिन्होंने इस तरह की बातों को ग़लत माना है।[६५] अल्लामा अमीनी के अनुसार, इस बात को बयान करने वाले कुछ लोग इमाम अली (अ) के दुश्मनों में से थे, और ऐसे लोगों के शब्दों पर, जो इमाम अली (अ) को बदनाम करने के उद्देश्य से कहे गए थे, उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है।[६६] साथ ही, अल्लामा अमीनी के अनुसार, ये रिपोर्ट सुन्नी स्रोतों में वर्णित रहस्योद्घाटन के कारण की अन्य हदीसों के साथ संघर्ष करती हैं;[६७] क्योंकि, इब्न हनबल और तिर्मिज़ी (हदीस के दो प्रमुख सुन्नी विद्वान) द्वारा सुनाई गई एक हदीस के अनुसार, और सुन्नी विद्वानों ने भी उन हदीसों को प्रामाणिक माना है, यह आयत एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताई गई थी जो अपने पिता के लिए क्षमा मांग रहा था।[६८]

सम्बंधित लेख

फ़ुटनोट

  1. ↑ तबातबाई, «بایسته پژوهشی در مورد حضرت ابوطالب(ع)», पृष्ठ 101।
  2. ↑ शेख़ तूसी, अल-तिब्यान, दार एहया अल-तोरास अल-अरबी, खंड 8, पृष्ठ 164; तबातबाई, अल-मीज़ान फी तफ़्सीर अल-क़ुरआन, खंड 9, पृष्ठ 405-406।
  3. ↑ तबसी नजफ़ी, मुन्यत अल-राग़िब, पृष्ठ 161।
  4. ↑ इब्ने अबी अल-हदीद, शरहे नहजुल-बलाग़ा, खंड 14, पृष्ठ 65-66।
  5. ↑ मुरूजी तबसी, «اثبات ایمان ابوطالب(ع) در سخنان عالمان اهل‌سنت از سده دوم تا پانزدهم», पृष्ठ 119-120।
  6. ↑ मुरूजी तबसी, «اثبات ایمان ابوطالب(ع) در سخنان عالمان اهل‌سنت از سده دوم تا پانزدهم»
  7. ↑ इब्ने अबी अल-हदीद, शरहे नहजुल-बलाग़ा, खंड 14, पृष्ठ 66।
  8. ↑ ज़ैनी दहलान, अस्ना अल-मतालिब, पृष्ठ 31।
  9. ↑ तबातबाई, «بایسته پژوهشی در مورد حضرت ابوطالب(ع)», पृष्ठ 101।
  10. ↑ मजलिसी, मिरआत अल-उक़ूल, खंड 5, पृष्ठ 235।
  11. ↑ कुरैशी, तफ़्सीर अहसन अल-हदीस, खंड 3, पृष्ठ 203; मुर्तज़वी, «بررسی روایات ضحضاح», पृष्ठ 166-171।
  12. ↑ सक़्क़ाफ़, «मुक़द्दमा», पृष्ठ 17।
  13. ↑ इब्ने हजर अस्क़लानी, अल-इसाबा फी तमईज़ अल-सहाबा, खंड 1, पृष्ठ 384।
  14. ↑ हिदायत-पनाह, «نقدی بر رویکرد صحابه‌نگاران به حضرت ابوطالب(ع) با تکیه بر ابن‌حجر و کتاب الاصابة», पृष्ठ 90-91।
  15. ↑ आमिली, अल-सहीह मिन सीरत अल-नबी अल-आज़म (स), खंड 4, पृष्ठ 24।
  16. ↑ आमिली, अल-सहीह मिन सीरत अल-नबी अल-आज़म (स), खंड 4, पृष्ठ 24।
  17. ↑ इब्ने अल-हुज्जा अल-हमवी, समरात अल-अवराक, अल-जम्हूरिया अल-अरबिया प्रकाशन, खंड 2, पृष्ठ 14; दियारबकरी, तारीख अल-खमीस, दार सादिर, खंड 1, पृष्ठ 300; हलबी, अल-सीरा अल-हल्बिय्या, खंड 1, पृष्ठ 497।
  18. ↑ फत्ताल नैशापुरी, रौज़त अल-वाइज़ीन, खंड 1, पृष्ठ 81।
  19. ↑ कुलैनी, अल-काफी, खंड 1, पृष्ठ 448।
  20. ↑ इब्ने अबी अल-हदीद, शरहे नहजुल-बलाग़ा, खंड 14, पृष्ठ 81-82।
  21. ↑ तबातबाई, «بایسته پژوهشی در مورد حضرت ابوطالب(ع)», पृष्ठ 102।
  22. ↑ तबातबाई, «बायिस्ते पज़ोहिशी दर मोरीदे हज़रत अबू तालिब (अ)», पृष्ठ 102।
  23. ↑ तबातबाई, «بایسته پژوهشی در مورد حضرت ابوطالب(ع)», पृष्ठ 103।
  24. ↑ आमिली, अल-सहीह मिन सीरत अल-नबी अल-आज़म (स), खंड 4, पृष्ठ 17।
  25. ↑ तबातबाई, «بایسته پژوهشی در مورد حضرت ابوطالب(ع)», पृष्ठ 102-103।
  26. ↑ शेख़ू तूसी, अल-अमाली, पृष्ठ 305।
  27. ↑ अल्लामा मजलिसी, बिहार अल-अनवार, खंड 35, पृष्ठ 156-157।
  28. ↑ कुलैनी, अल-काफी, खंड 1, पृष्ठ 446।
  29. ↑ कराजकी, कंज़ अल-फ़वाइद, खंड 1, पृष्ठ 183।
  30. ↑ कराजकी, कंज़ अल-फ़वाइद, खंड 1, पृष्ठ 182-183।
  31. ↑ अल्लामा अमीनी, अल-ग़दीर, खंड 7, पृष्ठ 518-538।
  32. ↑ तबसी नजफ़ी, मुन्यत अल-राग़िब, पृष्ठ 29-38।
  33. ↑ आमिली, अल-सहीह मिन सीरत अल-नबी अल-आज़म (स), खंड 4, पृष्ठ 10।
  34. ↑ तबातबाई, «بایسته پژوهشی در مورد حضرت ابوطالب(ع)», पृष्ठ 101।
  35. ↑ इब्ने हिशाम, अल-सीरा अल-नबविया, दार अल-मआरिफ़ा, खंड 1, पृष्ठ 266-267।
  36. ↑ कुलैनी, अल-काफी, खंड 1, पृष्ठ 449।
  37. ↑ इब्ने अबी अल-हदीद, शरहे नहजुल-बलाग़ा, खंड 13, पृष्ठ 272।
  38. ↑ इब्ने हिशाम, अल-सीरा अल-नबविया, दार अल-मआरिफ़ा, खंड 1, पृष्ठ 247; इब्ने हजर अस्क़लानी, अल-इसाबा फी तमईज़ अल-सहाबा, खंड 7, पृष्ठ 198।
  39. ↑ इब्ने हिशाम, अल-सीरा अल-नबविया, दार अल-मआरिफ़ा, खंड 1, पृष्ठ 247।
  40. ↑ इब्ने असीर, असद अल-ग़ाबा, खंड 1, पृष्ठ 341; इब्ने हजर अस्क़लानी, अल-इसाबा फी तमईज़ अल-सहाबा, खंड 7, पृष्ठ 198।
  41. ↑ आमिली, अल-सहीह मिन सीरत अल-नबी अल-आज़म (स), खंड 4, पृष्ठ 11।
  42. ↑ कुलैनी, अल-काफी, खंड 1, पृष्ठ 448-449।
  43. ↑ शेख़ मुफ़ीद, ईमान अबी तालिब, पृष्ठ 18।
  44. ↑ इब्ने अबी अल-हदीद, शरहे नहजुल-बलाग़ा, खंड 14, पृष्ठ 78।
  45. ↑ कराजकी, कंज़ अल-फवाइद, खंड 1, पृष्ठ 182।
  46. ↑ अल्लामा अमीनी, अल-ग़दीर, खंड 7, पृष्ठ 460।
  47. ↑ अल्लामा अमीनी, अल-ग़दीर, खंड 7, पृष्ठ 446-460।
  48. ↑ अल्लामा मजलिसी, बिहार अल-अनवार, खंड 35, पृष्ठ 157।
  49. ↑ इब्ने अबी अल-हदीद, शरहे नहजुल-बलाग़ा, खंड 1, पृष्ठ 14।
  50. ↑ मुर्तज़वी, «بررسی روایات ضحضاح»», पृष्ठ 160।
  51. ↑ साबिक़, फ़िक्ह अल-सुन्ना, खंड 2, पृष्ठ 239।
  52. ↑ इब्ने मुन्ज़र, अल-अशराफ़ अला मज़ाहिब अल-उलमा, खंड 5, पृष्ठ 252।
  53. ↑ मुर्तज़वी, «بررسی روایات ضحضاح», पृष्ठ 160।
  54. ↑ बलाज़ोरी, अंसाब अल-अशराफ, खंड 2, पृष्ठ 35।
  55. ↑ बुखारी, सहीह अल-बुखारी, खंड 5, पृष्ठ 52; खंड 8, पृष्ठ 46 और 116; मुस्लिम, सहीह मुस्लिम, दार एह्या अल-तोराथ अल-अरबी, खंड 1, पृष्ठ 194-195।
  56. ↑ फ़ाकर मैबदी, «کنکاشی در حدیث ضحضاح از نگاه فریقین», पृष्ठ 395।
  57. ↑ अल्लामा अमीनी, अल-ग़दीर, खंड 8, पृष्ठ 38; खुनैज़ी, अबू तालिब मोमिन कुरैश, पृष्ठ 378-387।
  58. ↑ सूरह बक़रा आयत 162; सूरह आले-इमरान आयत 88; सूरह नहल आयत 85।
  59. ↑ इब्ने हंबल, अल-मुस्नद, खंड 6, पृष्ठ 483; इब्ने हिब्बान, अल-सहीह, खंड 1, पृष्ठ 442।
  60. ↑ अल्लामा अमीनी, अल-ग़दीर, खंड 8, पृष्ठ 38-42।
  61. ↑ मूसवी, अल-हुज्जा अला अल-ज़ाहिब, पृष्ठ 82-85।
  62. ↑ शौकानी, फ़त्ह अल-क़दीर, खंड 4, पृष्ठ 206।
  63. ↑ इब्ने अतिय्या, अल-मुहर्रर अल-वजीज़, खंड 4, पृष्ठ 292-293।
  64. ↑ वाहिदी, अल-वजीज़, खंड 1, पृष्ठ 483-484।
  65. ↑ ज़मख्शरी, अल-कश्शाफ़, खंड 2, पृष्ठ 315; इब्ने आशूर, अल-तहरीर वा अल-तनवीर, अल-तारीख़ संस्थान, खंड 10, पृष्ठ 214-215।
  66. ↑ अल्लामा अमीनी, अल-ग़दीर, खंड 8, पृष्ठ 19।
  67. ↑ अल्लामा अमीनी, अल-ग़दीर, खंड 8, पृष्ठ 23-24।
  68. ↑ इब्ने हंबल, अल-मुस्नद, खंड 1, पृष्ठ 499; तिर्मिज़ी, सुनन अल-तिर्मिज़ी, खंड 5, पृष्ठ 281।

स्रोत

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