रोहबा की घटना

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(रोहबा का दिन से अनुप्रेषित)

रोहबा की कहानी (अरबी: مُناشَدَه رُحْبَه) या मुनाशेद (अल्लाह की क़सम दिलाना) ए रोहबा, कई सहाबियों के इस बात की गवाही देने की तरफ़ इशारा है कि उन्होंने अल्लाह के नबी (स) से ग़दीर की हदीस सुनी है। यह घटना इमाम अली (अ) के अनुरोध पर हुई और गवाहों की संख्या 12 से 30 तक बयान की गई है। रहबा का वाक़ेया शिया और सुन्नी स्रोतों में ज़िक्र हुआ है।

घटना और नामकरण

अल्लामा अमीनी के अनुसार, चंद्र वर्ष के वर्ष 35 में, कुछ लोगों ने इमाम अली अलैहिस सलाम की दूसरे सारे सहाबा पर श्रेष्ठता के बारे में जो हदीसे पैग़ंबरे इस्लाम (स) के ज़िक्र हुई थीं, उनको लेकर उन पर आरोप लगाया और उनकी ख़िलाफ़त के बारे में विवाद किया। तब इमाम अली (अ) कूफ़े के रोहबा में जनता के सामने आये और अपने अधिकार की रक्षा के लिए और खिलाफ़त के मामले में उनके साथ विवाद करने वालों को हदीसे ग़दीर के ज़रिये अल्लाह की सौगंध दी।[१] इसलिए, रोहबा के दिन की कहानी को "मुनाशेद ए रोहबा" भी कहा गया है क्योंकि हज़रत अली (अ) ने अपने भाषण की शुरुआत में "अंशदल्लाह" शब्दों के साथ; मैं ईश्वर की क़सम खाता हूं" उन्होंने उपस्थित लोगों से ग़दीर की हदीस की गवाही देने के लिए कहा।[२] मुनाशेदा का अर्थ ईश्वर की शपथ दिलाना है।[३]

हज़रत अली (अलैहिस सलाम) के शब्दों के बाद, कुछ सहाबियों ने खड़े होकर गवाही दी कि उन्होंने पैगंबर (स) से ग़दीर की हदीस सुनी है। बेशक, कुछ स्रोतों में यह भी उल्लेख किया गया है कि ज़ैद बिन अरक़म जैसे लोगों ने गवाही देने से इनकार कर दिया और हज़रत अली (अ) ने उन्हें शाप दिया।[४] हालांकि सैय्यद मोहसिन अमीन आमोली लिखते हैं कि चूंकि बर्रा बिन आज़िब के बारे में भी ऐसा वर्णन है, ज़ाहिरी तौर पर ज़ैद के संबंध में जो गवाही न देने की बात ज़िक्र हुई है उसमें ग़लती हुई है और बर्रा की जगह ज़ैद का नाम आ गया है। इस लिये कि बहुत से रावियों (हदीस नक़्ल करने वालों) ने हदीसे ग़दीर को ज़ैद से नक़्ल किया है। इसके अलावा, ज़ैद उन लोगों में से थे जो अली (अ) को दूसरों से श्रेष्ठ मानते थे और उनके खास साथियों में से एक थे।[५]

गवाही देने वाले

स्रोतों में, रोहबा के दिन ग़दीर की हदीस सुनने की गवाही देने वालों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। इनकी संख्या कम से कम 12 और ज्यादा से ज्यादा 30 है। अल्लामा अमीनी ने सुन्नियों की किताबों में से 24 लोगों के गवाही देने का उल्लेख किया,[६] जबकि अहमद बिन हंबल के अनुसार उस दिन गवाही देने वालों की संख्या 30 थी।[७]

अबू अमरा अंसारी, अबूल हैसम बिन तिहान, अबू अय्यूब अंसारी, खुज़ैमा बिन साबित अंसारी (ज़ुश शहादतैन), सहल बिन हनीफ़, अबू सईद ख़ुदरी, सहल बिन साद अंसारी, अब्दुल्ला बिन साबित अंसारी (पैग़ंबर (स.अ.व.) के सेवक, उबैद बिन आज़िब अंसारी, अदी बिन हातम, नजिया बिन अम्र ख़ज़ाई, नोमान बिन अजलान अंसारी उनमें से सबसे प्रसिद्ध थे।[८]

स्थान और समय

रोहबा का अर्थ कूफ़ा मस्जिद के प्रांगण के बीच में एक जगह है जहाँ इमाम अली (अलैहिस सलाम) आमतौर पर न्याय करने या उपदेश देने के लिए बैठते हैं।[९] जैसा कि कहा गया है, ज़ियाद बिन अबीह के समय में, हदीस के विद्वान (मुहद्देसीन) डर के मारे इमाम अली (अ) के नाम के बजाय "साहेब अल-रोहबा" कहते थे।[१०] हालांकि संभव है कि रोहबा इसके अलावा दूसरी जगहों को भी कहा जाता हो।[११] रोहबा की घटना 35 चंद्र वर्ष[१२] में और इमाम अली (अ) की खिलाफ़त की शुरुआत में हुई है। उस हदीस में जो यअली बिन मर्रा द्वारा नक़्ल हुई है उसमें, यह कहा गया है कि: जब अमीरुल मोमिनीन (अ) ने कुफा में प्रवेश किया, तो उन्होने ऐसा किया।[१३]

हदीस के रावी

अल्लामा अमीनी ने मुनाशेद ए रोहबा के रावियों, जिन्होने अपने बाद की श्रेणियों के लिये इसे नक़्ल किया है, की संख्या 18 उल्लेख की है। जिनमें से 4 सहाबी और 14 ताबेईन (जिन्होने सहाबा को देखा है) हैं[१४]। उनके नाम निम्न लिखित हैं:

सहाबी:
ताबेईन:
  1. अबू सुलेमान मुवज़्जिन
  2. असबग़ बिन नबाता
  3. ज़ाज़ान अबू अम्र
  4. ज़ुर बिन हुबैश
  5. ज़ियाद बिन अबी ज़ियाद
  6. ज़ैद बिन यसीअ हमदानी
  7. सईद बिन अबी हदान
  8. सईद बिन वहब हमदानी
  9. अबू अमारा अब्दे ख़ैर बिन यज़ीद हमदानी
  10. अब्दुर रहमान बिन अबी लैला
  11. अम्र ज़ी मर्रा
  12. उमैरा बिन सअद हमदानी
  13. हानी बिन हानी हमदानी
  14. हारेसा बिन नस्र[१५]

फ़ुटनोट

  1. अमिनी, अल-ग़दीर, 1416 हिजरी, खंड 1, पृष्ठ 339।
  2. इब्ने अबी अल-हदीद, नहज अल-बलाग़ह पर टिप्पणी, 1404 हिजरी, खंड 4, पृ.74।
  3. देहख़ोदा, शब्दकोश, "मनाशेदा" के अंतर्गत
  4. हलबी, सिरेह हलाबियेह, 1353 हिजरी, खंड 3, पृष्ठ 308।
  5. अल-अमीन, आयान अल-शिया, खंड 7, पृष्ठ 88।
  6. अमिनी, अल-ग़दीर, 1416 हिजरी, खंड 1, पीपी. 376-377.
  7. अमिनी, अल-ग़दीर, 1416 हिजरी, खंड 1, पृ.377।
  8. अमिनी, अल-ग़दीर, 1416 हिजरी, खंड 1, पीपी. 376-377
  9. मतरज़ी, अल मग़रेब, खंड 1, पी. 324।
  10. मदनी, अल-तराज़ अल-अव्वल, 2004, खंड 2, पृष्ठ 61।
  11. हुसैनी तेहरानी, इमान शिनासी, 1427 हिजरी, खंड 9, पृ.41।
  12. अमिनी, अल-ग़दीर, 1416 हिजरी, खंड 1, पृ.377।
  13. हुसैनी तेहरानी, इमाम शिनासी, 1427 हिजरी, खंड 9, पृ.41।
  14. अमिनी, अल-ग़दीर, 1416 हिजरी, खंड 1, पृष्ठ 339।
  15. अमिनी, अल-ग़दीर, 1416 हिजरी, खंड 1, पीपी. 339-376।

स्रोत

  • इब्ने अबिल हदीद, अब्दुल हमीद बिन हेबतुल्लाह, शरहे नहजुल बलाग़ा, क़ुम, नशरे मकतब ए आयतुल्लाहिल उज़मा मरअशी नजफ़ी, 1404 हिजरी।
  • अमीनी, अब्दुल हुसैन, अल ग़दीर, क़ुम, मकरज़ अल ग़दीर, 1416 हिजरी।
  • हुसैनी तेहरानी, सैयद मोहम्मद हुसैन, इमाम शिनासी, मशहद, अल्लामा तबताबाई प्रकाशन, 1427 हिजरी।
  • हलबी शाफे'ई, अली बिन बुरहान अल-दीन, सीरए हलबिय्या, मिस्र, 1353 हिजरी।
  • मदनी, अली खान बिन अहमद, पहला संस्करण, मशहद, आलुल-बैत ले एहयाईत तुरास फाउंडेशन, 2004।
  • मुतरज़ी, नासिर बिन अब्द अल-सैयद, मग़रिब, महमूद फ़ाखौरी और अब्द अल-हामिद मुख्तार द्वारा संपादित, हलब, मकतबा ओसामा बिन जायद, 1979।