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अम्र बिल मारूफ व नही अनिल मुनकर

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(नही अनिल मुनकर से अनुप्रेषित)

अम्र बिल मारूफ व नही अनिल मुनकर का अर्थ है अच्छे और पसंदीदा काम करने के लिए प्रेरित करना और बुरे कामों से रोकना यह इस्लाम के महत्वपूर्ण अनिवार्य कर्तव्यों में से एक है और कुरआन तथा हदीसों में भी इस पर विशेष जोर दिया गया है। शिया न्यायविदो के अनुसार अम्र बिल मारूफ व नही अनिल मुनकर वाजिबे केफ़ाई है, अर्थात यदि लोगों में से एक समूह इस ज़िम्मेदारी को पूरा कर दे तो दूसरे लोगों से इसका दायित्व समाप्त हो जाता है। इमामिया शिया न्यायशास्त्र में अम्र बे मारूफ व नहीं अज़ मुनकर को फुरूअ ए दीन में शामिल किया जाता है, जबकि कुछ अन्य इस्लामी संप्रदायों, जैसे मोअतज़ेला और ज़ैदिया, के अनुसार इसे आस्था के मूल सिद्धांतों में शामिल किया गया है।

न्यायविदों ने अम्र बिल मारूफ व नही अनिल मुनकर के वाजिब होने के लिए चार शर्तें बताई हैं। अच्छे और पसंदीदा काम की ओर प्रेरित करने वाले और बुराई से रोकने वाले व्यक्ति को संबंधित नेक काम या बुरे काम के शरई हुक्म का ज्ञान होना। जिस व्यक्ति को नेक काम करने का आदेश दिया जा रहा है या बुराई से रोका जा रहा है, उस पर इसके प्रभावी होने की संभावना होना। व्यक्ति द्वारा मुनकर को दोबारा करने के इरादे का विश्वास होना और जान का कोई नुकसान न होना। अम्र बिल मारूफ व नहीं अज़ मुनकर करने वाले व्यक्ति या दूसरे मोमिनों को जान, माल या इज्ज़त और प्रतिष्ठा का नुक़सान होने का खतरा न हो।

अम्र बिल मारूफ व नही अनिल मुनकर पर अमल करने के लिए तीन चरण बताए गए हैं। पहले चरण में दिल से बुराई को नापसंद करना और अपने गैर-मौखिक व्यवहार के माध्यम से उससे नाराज़गी व्यक्त करना है। यदि इसका कोई प्रभाव न हो तो दूसरे चरण में ज़ुबान से नेक काम करने का आदेश दिया जाए और बुराई से रोका जाए। यदि ये दोनों तरीक़े भी प्रभावी न हों तो तीसरे चरण में व्यावहारिक क़दम उठाया जा सकता है। हालांकि, व्यावहारिक क़दम भी धीरे-धीरे और परिस्थिति के अनुसार उठाया जाना चाहिए तथा इसके लिए इमाम या उनके नायब (प्रतिनिधि) की अनुमति आवश्यक है।

महत्व

अम्र बिल मारूफ व नही अनिल मुनकर को इस्लाम के सबसे महत्वपूर्ण और बड़े धार्मिक कर्तव्यों में से एक माना गया है।[] मासूम इमामों (अ) की रिवायतों में भी इसके महत्व पर विशेष ज़ोर दिया गया है।[] न्यायशास्त्र की पुस्तकों में अम्र बिल मारूफ व नही अनिल मुनकर के लिए अलग से एक अध्याय निर्धारित किया गया है।[] किताब अल-लुमआ अल-दमिश्किया में भी इसे किताब अल जिहाद के विषयों के अंतर्गत एक स्वतंत्र अध्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है।[] इसी तरह अल-काफ़ी जैसी हदीस की पुस्तकों में भी अमर बिल मारूफ और नहीं अनिल मुनकर से संबंधित रिवायतों के लिए अलग अध्याय प्रस्तुत किया गया है।[] शिया मुहद्दिस शेख़ हुर्रे आमेली ने अपनी प्रसिद्ध हदीस की पुस्तक वसाइल अल शिया में भी इस विषय के लिए एक अलग भाग निर्धारित किया है। उन्होंने 41 अध्यायों के अंतर्गत अम्र बिल मारूफ व नही अनिल मुनकर के अहकाम, नियमों और शर्तों से संबंधित विभिन्न रिवायतों को एकत्र किया है।[] धर्म शास्त्र की पुस्तकों में भी अम्र बे मारूफ व नहीं अज़ मुनकर को क़ायदा-ए-लुत्फ़ के उदाहरणों में शामिल किया गया है[] और इस बात पर भी चर्चा की गई है कि यह कार्य अक़्ल की दृष्टि से अनिवार्य है या शरीअत की दृष्टि से।[]

क़ुरआन की कई आयतों में अम्र बे मारूफ़ व नहीं अज़ मुनकर का उल्लेख मिलता है।[] कुछ आयतों में इसे पैग़म्बर (स) की उम्मत के लिए विशेष ज़िम्मेदारी के रूप में बताया गया है और इसे अल्लाह पर ईमान तथा मआद पर जैसे विश्वासों या नमाज़ और ज़कात जैसे कार्यों के साथ इसका भी उल्लेख हुआ है।[१०] हज़रत अली (अ) से एक रिवायत में मिलता है कि सभी अच्छे काम, यहां तक कि अल्लाह की राह में जिहाद भी, अम्र बिल मारूफ व नही अनिल मुनकर की तुलना में ऐसे हैं जैसे एक विशाल समुद्र के सामने मुंह में मौजूद थोड़े से पानी की मात्रा।[११] इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से वर्णित एक हदीस में अम्र बिल मारूफ व नही अनिल मुनकर के महत्व के बारे में बताया गया है कि दूसरे सभी धार्मिक कर्तव्य इसके माध्यम से स्थापित किए जाते हैं। इसके कारण रास्ते सुरक्षित होते हैं, लोगों का कारोबार हलाल और पवित्र रहता है, लोगों के अधिकार उन्हें मिलते हैं, जमीनें आबाद होती हैं और दुश्मनों से मुक़ाबला किया जाता है।[१२]

अम्र बिल मारूफ व नही अनिल मुनकर मुसलमानों की साझा शिक्षा

अम्र बिल मारूफ़ व नही अनिल मुनकर को विभिन्न इस्लामी संप्रदायों की साझा धार्मिक शिक्षाओं में शामिल माना जाता है। मोअतज़ेला इसे अपने पांच मूल आस्थागत सिद्धांतों में पांचवां सिद्धांत मानते हैं।[१३] उनका मानना है कि मुसलमान को काफ़िर और फ़ासिक़ व्यक्ति के संबंध में भी अम्र बिल मारूफ व नही अनिल मुनकर का दायित्व निभाना चाहिए।[१४] कहा जाता है कि ज़ैदिया भी अम्र बे मारूफ व नहीं अज़ मुनकर को अपने आस्थागत सिद्धांतों में पांचवां सिद्धांत मानते हैं।[१५] इस संप्रदाय के पहले प्रमुख ज़ैद बिन अली ने भी अपने आंदोलन की नींव इसी सिद्धांत पर रखी थी।[१६] इसके विपरीत, इमामिया अम्र बिल मारूफ व नही अनिल मुनकर को फुरू ए दीन में शामिल मानते हैं।[१७]

न्यायशास्त्रीय परिभाषा

अम्र बिल मारूफ का अर्थ लोगों को किसी पसंदीदा और शरीअत के अनुसार उचित कार्य करने के लिए प्रेरित करना है, जबकि नहीं अनिल मुनकर का अर्थ किसी बुरे और पापपूर्ण कार्य से रोकना है।[१८] अम्र यानी आदेश देना या किसी कार्य के लिए प्रेरित करना और नहीं यानी रोकना, दोनों केवल मौखिक रूप तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गैर-मौखिक रूप से भी किए जा सकते हैं और किसी व्यावहारिक कार्य के माध्यम से भी इसका पालन किया जा सकता है।[१९]

प्रसिद्ध न्यायविद सय्यद अली हुसैनी सीस्तानी का कहना है कि ‘मारूफ’ का अर्थ ऐसा नेक और अच्छा कार्य है, जिसकी अच्छाई को बुद्धि समझती है या शारेअ ने हमें उसके अच्छा होने का मार्गदर्शन दिया है। इसी प्रकार ‘मुनकर’ का अर्थ ऐसा बुरा और नापसंद कार्य है, जिसकी बुराई को बुद्धि समझती है या शारअ ने मनुष्य को उसके नापसंद और बुरा होने से अवगत कराया है।[२०]

मोहक्किक हिल्ली और अल्लामा हिल्ली जैसे न्यायविदो ने इस परिभाषा में एक शर्त की वृद्धि करते हुए कहा कि ‘मारूफ’ वह हर नेक काम है जो अच्छा होने के साथ-साथ उसे करने वाला व्यक्ति भी उसे अच्छा और नेक काम समझता हो। इसी तरह ‘मुनकर’ वह हर बुरा काम है जो बुरा होने के साथ-साथ उसे करने वाला व्यक्ति भी उसे बुरा और गलत समझता हो।[२१]

न्यायशास्त्रीय नियम

मुहम्मद हसन नजफ़ी, साहिबे-जवाहिर के नाम से प्रसिद्ध:

अम्र बिल मारूफ़ व नही अनिल मुनकर के सबसे महान, श्रेष्ठ और प्रभाव की दृष्टि से सबसे सुदृढ़ तरीक़ों में से एक यह है कि, विशेष रूप से धर्म के अगुवे (नेता) लोग, अच्छाइयों का वस्त्र पहनें चाहे वे अच्छाइयाँ वाजिब हों या मुस्तहब और बुराइयों का वस्त्र उतार दें चाहे वे हराम हों या मकरूह। वे स्वयं को उत्तम नैतिक गुणों से पूर्ण करें और बुरे नैतिक गुणों से अपने आपको पवित्र करें। ऐसा आचरण लोगों को अच्छाइयों को अपनाने और हराम कार्यों से बचने की ओर प्रेरित करता है। विशेष रूप से जब इसे ऐसी अच्छी नसीहतों के साथ पूरा किया जाए, जो लोगों को प्रोत्साहित भी करें और उन्हें बुरे परिणामों से सचेत भी करें। क्योंकि हर परिस्थिति के लिए एक विशेष प्रकार की बात होती है और हर बीमारी के लिए एक उपयुक्त दवा। आत्माओं और बुद्धियों का उपचार, शरीरों के उपचार की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण और कठिन है।

नजफ़ी, जवाहिर अल कलाम, खंड 21, पृष्ठ 382–383।

शिया न्यायविदों के अनुसार अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर वाजिब है।[२२] कुछ न्यायविदों ने इसकी अनिवार्यता को दीन की आवश्यक शिक्षाओं में से माना है और कहा है कि यदि कोई व्यक्ति जान-बूझकर इसके वाजिब होने का इनकार करे तो वह काफ़िर हो जाता है।[२३] इसी तरह न्यायविदों का मत है कि यदि कोई नेक काम मुस्तहब हो और कोई बुरा काम मकरूह हो, तो ऐसे मामले में अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर करना मुस्तहब है।[२४]

वाजिब-ए-केफ़ाई या वाजिब-ए-ऐनी?

इस बात में कि अम्र बिल मारूफ़ और नही अनिल मुनकर वाजिब-ए-केफ़ाई है या वाजिब-ए-ऐनी है न्यायविदों के बीच मतभेद पाया जाता है।[२५] अधिकांश न्यायविद इसे वाजिब-ए-केफ़ाई मानते हैं। इस स्थिति में कि यदि कुछ लोग इसे करने की ज़िम्मेदारी ले लें, तो दूसरे लोगों से यह ज़िम्मेदारी समाप्त हो जाती है।[२६] शहीद सानी के अनुसार, अम्र बिल मारूफ़ और नही और अनिल मुनकर का शरीअत में उद्देश्य यह है कि नेकी का काम किया जाए और बुराई के काम से बचा जाए। इसलिए यह ज़िम्मेदारी किसी विशेष व्यक्ति पर नहीं है, बल्कि सभी व्यस्क लोगों पर है। यदि उनमें से कोई समूह इस कार्य को करने के लिए आगे बढ़ जाए, तो अन्य लोगों से यह ज़िम्मेदारी समाप्त हो जाती है।[२७]

शेख़ तूसी ने अपनी किताब अल-निहाया में,[२८] इब्ने हम्ज़ा ने अल-वसीला में[२९] और मोहक़्क़िक़ कर्की जैसे शिया न्यायविदों ने[३०] इसे वाजिब-ए-ऐनी माना है।

वाजिब-ए-अक़्ली या वाजिब-ए-शरई?

अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर, वाजिब-ए-शरई (शरीअत की ओर से अनिवार्य) या वाजिब-ए-अक़्ली (अक्ल की दृष्टि से अनिवार्य) है, इस विषय में शिया न्यायविदों के बीच मतभेद पाया जाता है।[३१] अधिकांश शिया न्यायविद और धर्मशास्त्री इसे शरीअत की ओर से वाजिब मानते हैं। इसके प्रमाण के लिए वे क़ुरआन की आयतों, मासूम इमामों (अ) से वर्णित मुतवातिर रिवायतों और इज्मा जैसे शरई प्रमाणों का सहारा लेते हैं।[३२]

कुछ इसे वाजिब-ए-अक़्ली (अक़्ल की दृष्टि से अनिवार्य) मानते हैं और इसके लिए निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं:

  • क़ायदा-ए-लुत्फ़ के आधार पर: अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर इंसान को अल्लाह की आज्ञाकारिता के क़रीब लाता है, इसलिए यह लुत्फ़ है। लुत्फ़ का सिद्धांत अक्ल की दृष्टि से अल्लाह के लिए आवश्यक है। इसलिए अम्र बिल मारूफ और नहीं अनिल मुनकर के वाजिब होने का हुक्म निर्धारित करना भी उसकी ओर से आवश्यक है।[३३]
  • अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर को छोड़ देने से सांसारिक और आख़िरत के नुक़सान की संभावना पैदा होती है। संभावित नुक़सान को दूर करना भी अक्ल की दृष्टि से आवश्यक है। इसलिए अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर को छोड़ने से होने वाले नुक़सान को दूर करना भी वाजिब है।[३४]

अम्र बिल मारूफ और नहीं अनिल मुनकर की शर्तें

न्यायविदों के फ़तवों के अनुसार अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर के लिए कुछ शर्तें हैं। इन शर्तों के पाए जाने पर ही यह दायित्व वाजिब होता है।[३५]

  • अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर करने वाले व्यक्ति को इस्लामी शरीअत की दृष्टि से मारूफ़ और मुनकर का ज्ञान होना चाहिए।
  • उसे यह संभावना होनी चाहिए कि उसके अम्र और नहीं का उस व्यक्ति पर प्रभाव पड़ेगा।
  • उसे यह मालूम हो कि जिस व्यक्ति से कोई मुनकर यानी बुरा काम हुआ है, वह उसे दोबारा करने का इरादा रखता है। लेकिन यदि उसे मालूम हो कि वह व्यक्ति अपने किए हुए बुरे काम पर पछता चुका है और उसे दोबारा करने पर अड़ा हुआ नहीं है, तो उसे अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर करना वाजिब नहीं है।
  • अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर करने से स्वयं उसे या दूसरे मोमिनों को जान, माल या इज्ज़त का नुक़सान नहीं पहुंचना चाहिए। यदि नुक़सान होने की आशंका हो तो अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर का वुजूब समाप्त हो जाता है।[३६]

अम्र बिल मारूफ और नहीं अनिल मुनकर के चरण

शिया न्यायविदों ने अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर को लागू करने के लिए कुछ चरण निर्धारित किए हैं। उनका मानना है कि इन चरणों को निर्धारित शर्तों का पालन करते हुए क्रमबद्ध और धीरे-धीरे पूरा किया जाना चाहिए।[३७]

दिल से नापसंद करना

पहला चरण दिल से बुराई को नापसंद करना है।[३८] इस चरण में व्यक्ति बुरे काम के प्रति अपनी नाराज़गी और असहमति का व्यवहार के माध्यम से प्रदर्शन करता है। इसके लिए वह चेहरे पर नाराज़गी दिखा सकता है, आंखें बंद कर सकता है, त्योरियां चढ़ा सकता है, मुंह फेर सकता है, उस व्यक्ति से दूरी बना सकता है या उससे संबंध समाप्त कर सकता है।[३९]

ज़बान से अम्र और नही

दूसरा चरण ज़बान से अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर करना है।[४०] यदि दिल से बुराई को नापसंद करने का कोई प्रभाव न हो तो व्यक्ति को अपनी बात के माध्यम से पहले नर्म अंदाज में समझाते और नसीहत करते हुए अम्र और नहीं करना चाहिए।[४१] यदि इसी स्तर पर प्रभाव पड़ने की संभावना हो तो इससे आगे बढ़ना जायज़ नहीं है।[४२]

व्यावहारिक क़दम

तीसरा चरण व्यावहारिक कार्रवाई और रोकने वाली शक्ति का प्रयोग करना है।[४३] यह चरण तभी जायज़ माना गया है जब पहले दोनों चरण प्रभावी न रहे हों। इस चरण में भी कार्रवाई धीरे-धीरे कम कठोर उपायों से अधिक कठोर उपायों की ओर बढ़ते हुए की जानी चाहिए।[४४] व्यावहारिक कार्रवाई में मारना, किसी व्यक्ति की गतिविधियों को सीमित करना या उसे हिरासत में लेना जैसे क़दम शामिल हो सकते हैं, लेकिन यह कार्रवाई ऐसी सीमा तक नहीं पहुंचनी चाहिए जिससे चोट लगे, किसी अंग को नुक़सान पहुंचे या दीयत और क़िसास की स्थिति पैदा हो।[४५]

घायल करने और हत्या करने का आदेश

शिया न्यायविदों की प्रसिद्ध राय के अनुसार अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर के अंतर्गत किसी व्यक्ति को घायल करना या उसकी हत्या करना केवल इमाम या उनके प्रतिनिधि की अनुमति से जायज़ है।[४६] कुछ न्यायविदों का कहना है कि इमाम (अ) की ग़ैबत के दौर में उनके प्रतिनिधि से आशय जामेअ अल शराअत फ़क़ीह (ऐसे न्यायविद जो सभी आवश्यक शर्तों को पूरा करता हो) है।[४७] तेरहवीं शताब्दी हिजरी के न्यायविद साहिब जवाहिर भी इस सीमा को जरूरी मानते हैं, ताकि अराजकता और भ्रष्टाचार को रोका जा सके।[४८]

अम्र बिल मारूफ और नहीं अनिल मुनकर तथा अज्ञानी का मार्गदर्शन में अंतर

अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर तथा अज्ञानी के मार्गदर्शन के बीच अंतर यह है कि अज्ञानी का मार्गदर्शन उस स्थिति में होता है जब किसी व्यक्ति को किसी धार्मिक नियम या उसके विषय का ज्ञान न हो, या दोनों का ज्ञान न हो। इसके विपरीत अम्र बिल मारूफ और नहीं अनिल मुनकर में वह व्यक्ति अपने किए जाने वाले काम के धार्मिक नियम से पहले से परिचित होता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को यह ज्ञात नहीं है कि शराब पीना हराम है, या उसे यह तो ज्ञत है कि शराब पीना हराम है लेकिन वह यह नहीं जानता कि जो तरल पदार्थ वह पीने जा रहा है वह शराब है, तो ऐसे व्यक्ति को जानकारी देना और उसे रोकना अज्ञानी के मार्गदर्शन के अंतर्गत आएगा। लेकिन यदि उसे यह भी मालूम है कि शराब पीना हराम है और यह भी पता है कि जो तरल पदार्थ वह पीने जा रहा है वह शराब ही है तो उसे रोकना, नहीं अनिल मुनकर के अंतर्गत माना जाएगा।[४९]

फ़ुटनोट

  1. नूरी हमदानी, अम्र बे मारूफ़ व नहीं अज़ मुनकर, पृष्ठ 21।
  2. हुर्रे आमेली, वसाइल अल शिया, खंड 16, पृष्ठ 119।
  3. मोहक़्क़िक़ हिल्ली, शराए अल इस्लाम, खंड 1, पृष्ठ 310; शहीदे सानी, अल रौज़तुल बहिय्या फ़ी शरहिल लुम्आ अल दमिश्क़िय्या, खंड 2, पृष्ठ 409; ख़ुमैनी, तहरीर अल वसीला, खंड 1, पृष्ठ 439।
  4. शहीद सानी, अल रौज़तुल बहिय्या फ़ी शरहिल लुम्आ अल दमिश्क़िय्या, खंड 2, पृष्ठ 409।
  5. कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 5, पृष्ठ 55-60।
  6. हुर्रे आमेली, वसाइल अल शिया, खंड 16, पृष्ठ 115-281।
  7. फ़ाज़िल मिक़दाद, इरशाद अल तालेबीन इला नहजिल मुस्तरशिदीन, पृष्ठ 380।
  8. अल्लामा हिल्ली, कश्फ़ उल मुराद, पृष्ठ 578।
  9. सूर ए आले इमरान, आयत 104 और 110; सूर ए हज, आय ए 41।
  10. सूर ए आले इमरान, आयत 104 और 110; सूर ए हज, आय ए 41।
  11. नहजुल बलाग़ा, संशोधन सुब्ही सालेह , हिकमत 374, पृष्ठ 542।
  12. हुर्रे आमेली, वसाइल अल शिया, खंड 16, पृष्ठ 119।
  13. मश्कूर, फ़रहंगे फ़रक़े इस्लामी, पृष्ठ 417-418।
  14. मश्कूर, फ़रहंगे फ़रक़े इस्लामी, पृष्ठ 417-418।
  15. आग़ाजानी क़न्नाद, «درآمدی بر بررسی تطبیقی امر به معروف و نهی از منکر از دیدگاه معتزله و دیگر فرق اسلامی (۱)», पृष्ठ 38।
  16. आग़ाजानी क़न्नाद, «درآمدی بر بررسی تطبیقی امر به معروف و نهی از منکر از دیدگاه معتزله و دیگر فرق اسلامی (۱)», पृष्ठ 42।
  17. मुतह्हरी, मजमूअ ए आसार, खंड 26, पृष्ठ 257।
  18. अल्लामा हिल्ली, कश्फ़ उल मुराद, पृष्ठ 578; सज्जादी, फ़रहंगे मआरिफ़े इस्लामी, खंड 1, पृष्ठ 297-298।
  19. फ़ाज़िल मिक़दाद, इरशाद अल तालेबीन इला नहजिल मुस्तरशिदीन, पृष्ठ 380।
  20. हुसैनी सीस्तानी, «معنای معروف و منکر», सय्यद अली हुसैनी सीस्तानी के कार्यालय की आधिकारिक वेबसाइट।
  21. मोहक़्क़िक़ हिल्ली, शराए उल इस्लाम, खंड 1, पृष्ठ 310; अल्लामा हिल्ली, तज़किरा अल फ़ोक़हा, खंड 9, पृष्ठ 437।
  22. शहीद सानी, अल रौज़तुल बहिय्या फ़ी शरहिल लुम्आ अल दमिश्क़िय्या, खंड 2, पृष्ठ 413; नजफ़ी, जवाहिर अल कलाम, खंड 21, पृष्ठ 363; इमाम ख़ुमैनी, तहरीर अल वसीला, खंड 1, पृष्ठ 439।
  23. इमाम ख़ुमैनी, तहरीर अल वसीला, खंड 1, पृष्ठ 439।
  24. नजफ़ी, जवाहिर अल कलाम, खंड 21, पृष्ठ 363-365; इमाम ख़ुमैनी, तहरीर अल वसीला, खंड 1, पृष्ठ 440।
  25. अल्लामा हिल्ली, तज़किरा अल फ़ोक़हा, खंड 9, पृष्ठ 442।
  26. मोहक़्क़िक़ हिल्ली, शराए अल इस्लाम, खंड 1, पृष्ठ 310; शहीदे सानी, मसालिक अल अफ़्हाम, खंड 3, पृष्ठ 101; शहीदे सानी, अल रौज़तुल बहिय्या फ़ी शरहिल लुम्आ अल दमिश्क़िय्या, खंड 2, पृष्ठ 413; इमाम ख़ुमैनी, तहरीर अल वसीला, खंड 1, पृष्ठ 439।
  27. शहीद सानी, मसालिक अल अफ़्हाम, खंड 3, पृष्ठ 101।
  28. शेख़ तूसी, अन-निहाया, पृष्ठ 299।
  29. इब्ने-हमज़ा, अल-वसीला, पृष्ठ 207।
  30. मोहक़्क़िक़ कर्की, जामेअ उल मक़ासिद, खंड 3, पृष्ठ 485।
  31. अल्लामा हिल्ली, कश्फ़ अल मुराद, पृष्ठ 578; अल्लामा हिल्ली, तज़किरा अल फ़ोक़हा, खंड 9, पृष्ठ 441।
  32. शेख़ तूसी, अल-इक़्तिसाद, पृष्ठ 146; हिल्ली, अल सराइर, खंड 2, पृष्ठ 21-22।
  33. फ़ाज़िल मिक़दाद, इरशार अल तालेबीन इला नहजिल मुस्तरशिदीन, पृष्ठ 380।
  34. शेख़ तूसी, अल-इक़्तिसाद, पृष्ठ 147।
  35. अल्लामा हिल्ली, तज़किरा अल फ़ोक़हा, खंड 9, पृष्ठ 442-443।
  36. हिल्ली, अल सराइर, खंड 2, पृष्ठ 23; तज़किरा अल फ़ोक़हा, खंड 9, पृष्ठ 443; शहीद सानी, अल रौज़तुल बहिय्या फ़ी शरहिल लुम्आ अल दमिश्क़िय्या, खंड 2, पृष्ठ 414-415; मोहक़्क़िक़ कर्की, जामेअ उल मक़ासिद, खंड 3, पृष्ठ 486; इमाम ख़ुमैनी, तहरीर अल वसीला, खंड 1, पृष्ठ 442-448।
  37. इमाम ख़ुमैनी, तहरीर अल वसीला, खंड 1, पृष्ठ 453; नूरी हमदानी, अम्र बे मारूफ़ व नहीं अज़ मुनकर, पृष्ठ 281।
  38. अल्लामा हिल्ली, तज़किरा अल फ़ोक़हा, खंड 9, पृष्ठ 443; शहीद सानी, अल रौज़तुल बहिय्या फ़ी शरहिल लुम्आ अल दमिश्क़िय्या, खंड 2, पृष्ठ 416; नजफ़ी, जवाहिर अल कलाम, खंड 21, पृष्ठ 374।
  39. इमाम ख़ुमैनी, तहरीरुल वसीला, खंड 1, पृष्ठ 453।
  40. अल्लामा हिल्ली, तज़किरा अल फ़ोक़हा, खंड 9, पृष्ठ 444; शहीद सानी, अल रौज़तुल बहिय्या फ़ी शरहिल लुम्आ अल दमिश्क़िय्या, खंड 2, पृष्ठ 416; नजफ़ी, जवाहिर अल कलाम, खंड 21, पृष्ठ 374; इमाम ख़ुमैनी, तहरीर अल वसीला, खंड 1, पृष्ठ 454।
  41. अल्लामा हिल्ली, तज़किरा अल फ़ोक़हा, खंड 9, पृष्ठ 444।
  42. अल्लामा हिल्ली, तज़किरा अल फ़ोक़हा, खंड 9, पृष्ठ 444; इमाम ख़ुमैनी, तहरीर अल वसीला, खंड 1, पृष्ठ 454।
  43. अल्लामा हिल्ली, तज़किरा अल फ़ोक़हा, खंड 9, पृष्ठ 443; शहीद सानी, अल रौज़तुल बहिय्या फ़ी शरहिल लुम्आ अल दमिश्क़िय्या, खंड 2, पृष्ठ 416; नजफ़ी, जवाहिर अल कलाम, खंड 21, पृष्ठ 374; इमाम ख़ुमैनी, तहरीर अल वसीला, खंड 1, पृष्ठ 456।
  44. अल्लामा हिल्ली, तज़किरा अल फ़ोक़हा, खंड 9, पृष्ठ 443; शहीद सानी, अल रौज़तुल बहिय्या फ़ी शरहिल लुम्आ अल दमिश्क़िय्या, खंड 2, पृष्ठ 416; नजफ़ी, जवाहिर अल कलाम, खंड 21, पृष्ठ 374; इमाम ख़ुमैनी, तहरीर अल वसीला, खंड 1, पृष्ठ 456।
  45. हुसैनी सीस्तानी, «امر به معروف و نهی از منکر», सय्यद अली हुसैनी सीस्तानी के कार्यालय की आधिकारिक वेबसाइट।
  46. शहीदे सानी, मसालिक अल अफ़्हाम, खंड 3, पृष्ठ 105; नजफ़ी, जवाहिर अल कलाम, खंड 21, पृष्ठ 383।
  47. शहीद सानी, मसालिक अल अफ़्हाम, खंड 3, पृष्ठ 105; इमाम ख़ुमैनी, तहरीर अल वसीला, खंड 1, पृष्ठ 458।
  48. नजफ़ी, जवाहिर अल कलाम, खंड 21, पृष्ठ 383।
  49. ख़ूई, मौसूआ अल इमाम अल ख़ूई, खंड 4, पृष्ठ 343।

स्रोत

  • नहजुल बलाग़ा, संशोधन: सुब्ही सालेह, क़ुम, इस्लामी अनुसंधान केंद्र, 1374 शम्सी।
  • «درباره ما», अम्र बे मारूफ़ व नहीं अज़ मुनकर मुख्यालय की वेबसाइट, देखने की तारीख़: 26 अप्रैल 2025 ईस्वी।
  • अल्लामा हिल्ली, हसन बिन यूसुफ़, कश्फ़ अल मुराद, क़ुम, इस्लामी प्रकाशन संस्थान, 1437 हिजरी।
  • अल्लामा हिल्ली, हसन बिन यूसुफ़, तज़किरा अल फ़ोक़हा, क़ुम, आले बैत संस्थान, 1414 हिजरी।
  • आग़ाजानी क़न्नाद, «درآمدی بر بررسی تطبیقی امر به معروف و نهی از منکر از دیدگاه معتزله و دیگر فرق اسلامی (۱)», अम्र बे मारूफ़ अनुसंधान संस्थान, देखने की तारीख़: 16 अगस्त 2026 ईस्वी।
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  • हुसैनी सीस्तानी, सय्यद अली, «معنای معروف و منکر», सय्यद अली हुसैनी सीस्तानी के कार्यालय की आधिकारिक वेबसाइट, देखने की तारीख़: 9 अप्रैल 2025 ईस्वी।
  • हुसैनी सीस्तानी, सय्यद अली, «امر به معروف و نهی از منکر», सय्यद अली हुसैनी सीस्तानी के कार्यालय की आधिकारिक वेबसाइट, देखने की तारीख़: 9 अप्रैल 2025 ईस्वी।