दूमतुल जंदल

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दूमतुल जंदल (अरबीःدُومة الجندل) वर्ष 5 हिजरी मे दूमतुल जंदल लड़ाई का स्थान था। इस्लाम की शुरुआत में यह शहर सीरिया का हिस्सा था। लोगों को इस्लाम में आमंत्रित करने के लिए वर्ष 6 हिजरी मे सरया अब्दुर रहमान बिन औफ और वर्ष 9 हिजरी मे सरया ख़ालिद बिन वलीद इसी स्थान पर हुआ जिसके कारण दूमतुल जंदल के शासक अकिदर बिन अब्दुल मलिक की सहमति पैग़म्बरे इस्लाम (स) और जजिया देने के निर्णय के साथ हुआ। इस शहर में जो अन्य घटनाएँ घटीं, वे लगातार घटित हो रही हैं। कुछ ऐतिहासिक स्रोतों ने दूमतुल जंदल को वह स्थान माना है जहां सिफ़्फ़ीन की लड़ाई में मध्यस्थता हुई थी।

आज दूमतुल जंदल सऊदी अरब के उत्तर-पश्चिम में स्थित है और जॉर्डन की सीमा से एक सौ किलोमीटर दूर है। इस शहर के संस्थापक हज़रत इस्माइल (अ) के बेटे दूमा का परिचय दिया गया है, जिन्होंने शुरू में इस शहर के स्थान पर एक पत्थर का किला बनवाया था।

भौगोलिक स्थिति

इस्लाम के प्रारम्भिक दौर मे दूमतुल जंदल तबूक के पास[१] और मदीना और दमिश्क के बीच की दूरी पर एक शहर था[२] और सीरिया का एक हिस्सा था।[३] आज, यह शहर सऊदी अरब के उत्तर-पश्चिम में जॉर्डन की सीमा से एक सौ किलोमीटर दूर है।[४]

नामकरण एवं इतिहास

दूमतुल जंदल के ऐतिहासिक स्मारको मे से एक मार्द किला

मोजम अल-बुलदान के अनुसार दूमा हज़रत इस्माईल (अ) के बेटे "दूमा" के नाम से लिया गया है, जिन्होने पत्थर से इस शहर में एक महल बनाया था।[५] जंदल का अर्थ है ईंट और पत्थर, इस प्रकार दूमतुल जंदल का मतलब एक महल हुआ जिसे दूमा ने पत्थर से बनाया था।[६] याक़ूत हमवी ने दूमतुल जंदल मे मार्द किला का उल्लेख किया है[७] जो इस शहर के ऐतिहासिक स्मारकों में से एक है।[८]

ऐसा कहा जाता है कि दूमतुल-हीरा के साथ भ्रमित न होने के लिए इस क्षेत्र को दूमतुल-जंदल कहा जाता था। वहां का शासक अकिदर बिन अब्दुल-मलिक दूमतुल हीरा का निवासी था, एक दिन शिकार के दौरान उसकी नज़र एक शहर के खंडहरों पर पड़ी जो पत्थर से बना था, उसने इसे फिर से बनाया और इसे दूमतुल जंदल कहा।[९]

दूमतुल जंदल को जौफ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है निचली भूमि, या जौफ़ ए आले-अम्र भी कहा जाता है। आले अम्र जो बनी अम्र से संबंधित है तय जनजाति से उसका संबंध है जो चौथी चंद्र शताब्दी में वहां रहते थे।[१०]

ऐतिहासिक घटनाऐँ

इस्लाम के आगमन के दौरान दूमतुल जंदल और इसके आसपास के क्षेत्र मे कल्ब जनजाति से संबंध रखने वाले बनु कनाना का निवास स्थान था[११] क्षेत्र का शासक, एकिदर बिन अब्दुल मलिक किंदी, एक ईसाई था[१२] और रोम के बादशाह के अधीन था।[१३] इसी प्रकार अरबो का प्रसिद्ध मूर्ति "वड" इस क्षेत्र मे था।[१४]

दूमतुल जंदल के क्षेत्र में ऐसी घटनाएं घटी हैं जिनके कारण इस्लामिक इतिहास के स्रोतों में इसका बहुत अधिक उल्लेख किया गया है। इनमें से कुछ घटनाएं इस प्रकार हैं:

जंदल की दूसरी लड़ाई

वर्ष 5 हिजरी मे रबी अल-अव्वल की 25 तारीख़ को, पैग़म्बर (स) एक हज़ार मुसलमानों के साथ दूमतुल जंदल के क्षेत्र की ओर निकल पड़े,[१५] क्योंकि उन्हें ख़बर मिली थी कि दूमतुल जंदल के लोग व्यापारियों के मार्ग में छिपकर बैठे है और मदीना से आने वाले व्यापारियों के लिए बाधा पैदा कर रहे है, और ये लोग मदीना पर भी हमला करने का इरादा रखते है।[१६] जब इस्लाम की सेना दूमतुल-जंदल के क्षेत्र में पहुंची, तो वे उपस्थिति के बारे में जानने के बाद तितर-बितर हो गए। पैग़म्बर (स) ने कुछ लोगों को इस क्षेत्र के चारों ओर भेजा, लेकिन कोई नही मिला मुहम्मद बिन मुस्लिम एक व्यक्ति को पैग़म्बर (स) के पास लाए और उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया। इस्लामी सेना 20 रबी अल-सानी को बिना किसी लड़ाई के मदीना लौट आए।[१७]

चूँकि दूमतुल जंदल रोम के शासन के अधीन था, इसलिए दूमतुल जंदल के अभियान को मुसलमानों और रोमनों के बीच पहली मुठभेड़ माना जाता है[१८] उन्होंने इस अभियान के उद्देश्यों के बारे में भी बताया जो पैग़म्बर (स) का सीरिया की सीमाओं पर जाने का इरादा था, क्योंकि आपका सीरिया की सीमाओं पर जाने से कैसर रोम के डर का कारण बन सकता था।[१९]

सरया अब्दुर रहमान बिन औफ़

इस्लाम के पैग़म्बर (स) ने वर्ष 6 हिजरी के शाबान में अब्दुर रहमान बिन औफ़ को दूमतुल जंदल भेजा[२०] यह घटना इस क्षेत्र के सरदार असबग़ बिन अम्र कल्बी के इस्लाम लाने और अब्दुर रहमान बिन औफ़ का उसकी बेटी से शादी पर समापन हुआ।[२१]

सरया खालिद बिन वलीद

वर्ष 9 हिजरी मे पैग़म्बर मुहम्मद (स) ने खालिद बिन वलीद को तबूक से दूमतुल जंदल भेजा[२२] और खालिद ने दूमतुल जंदल के शासक अकीदार बिन अब्दुल मलिक को गिरफ्तार करके मदीना ले आया।[२३] ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, पैग़म्बर (स) ने उनके साथ एक अनुबंध लिखा और उनके लिए जिज़्या निर्धारित किया।[२४] हालांकि कुछ स्रोतों ने उनके इस्लाम में रूपांतरण के बारे में जानकारी दी है,[२५] लेकिन अन्य स्रोतों ने इस कथन को सही नहीं पाया है।[२६] स्रोतों के दोनों समूहों का मानना है कि पैग़म्बर (स) के स्वर्गवास के बाद उन्होंने ज़कात या जिज़्या देने से इनकार कर दिया इस आधार पर वर्ष 12 हिजरी को अबू बक्र बिन अबी क़ोहफ़ा ने खालिद को उन्हें दबाने के लिए भेजा और उन्हें मार डाला।[२७]

सिफ़्फ़ीन की लड़ाई में मध्यस्थता

कुछ ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार,सिफ़्फ़ीन की लड़ाई में मध्यस्थता की कहानी, जिसमें इमाम अली (अ) की ओर से अबू मूसा अशरी और मुआविया बिन अबि सुफ़ियान की ओर से अम्र बिन आस बातचीत के बाद दोनो मे से किसी एक के पक्ष मे दुमतुल जंदल क्षेत्र मे फ़ैसला देने पर निर्धारित किए गए।[२८]

फ़ुटनोट

  1. आमोली, अल सहीह मिन सीरत अल नबी अल आज़म, दार अल हदीस, भाग 10, पेज 105
  2. याक़ूत हमवी, मोजम अल बुलदान, 1995 ई, भाग 2, पेज 487
  3. अस्करि, यकसद व पंजाह सहाबी साखतगी, 1387 शम्सी, पेज 281
  4. लाहूती, जौफ़, भाग 11, पेज 373
  5. याक़ूत हमवी, मोजम अल बुलदान, 1995 ई, भाग 2, पेज 487
  6. याक़ूत हमवी, मोजम अल बुलदान, 1995 ई, भाग 2, पेज 488
  7. याक़ूत हमवी, मोजम अल बुलदान, 1995 ई, भाग 2, पेज 488
  8. किला मार्द
  9. याक़ूत हमवी, मोजम अल बुलदान, 1995 ई, भाग 2, पेज 487
  10. लाहूती, जौफ़, भाग 11, पेज 373
  11. याक़ूत हमवी, मोजम अल बुलदान, 1995 ई, भाग 2, पेज 487
  12. इब्न असीर, असद अल ग़ाबा, 1409 हिजरी, भाग 1, पेज 135
  13. मसऊदी, अल तंबीह व अल अशराफ़, दार अल सावी, पेज 215
  14. आलूसी, बुलूग़ अल अरब, दार अल कुतुब अल इल्मीया, भाग 2, पेज 213-214
  15. वाक़ेदी, अल मग़ाज़ी, 1409 हिजरी, भाग 1, पेज 403; मकरीज़ी, इम्ताअ अल अस्माअ, 1420 हिजरी, भाग 8, पेज 367
  16. वाक़ेदी, अल मग़ाज़ी, 1409 हिजरी, भाग 1, पेज 403; मुकद्देसी, अलतब्दा वल तारीख, काहिरा, भाग 4, पेज 92
  17. वाक़ेदी, अल मग़ाज़ी, 1409 हिजरी, भाग 1, पेज 402
  18. मुकद्देसी, अलतब्दा वल तारीख, काहिरा, भाग 4, पेज 214; मसऊदी, अल तंबीह व अल अशराफ़, दार अल सावी, पेज 214
  19. वाक़ेदी, अल मग़ाज़ी, 1409 हिजरी, भाग 1, पेज 403
  20. वाक़ेदी, अल मग़ाज़ी, 1409 हिजरी, भाग 1, पेज 560-562; बलाजुरी, अंसाब अल अशराफ़, 1959 ई, भाग 1, पेज 378
  21. वाक़ेदी, अल मग़ाज़ी, 1409 हिजरी, भाग 1, पेज 560-562; बलाजुरी, अंसाब अल अशराफ़, 1959 ई, भाग 1, पेज 378
  22. बलाजुरी, अंसाब अल अशराफ़, 1959 ई, भाग 1, पेज 382
  23. बलाजुरी, अंसाब अल अशराफ़, 1959 ई, भाग 1, पेज 382
  24. इब्न अब्दुल बिर्र, अल इस्तिआब, 1412 हिजरी, भाग 2, पेज 428; इब्न असीर, असद अल ग़ाबा, 1409 हिजरी, भाग 1, पेज 135
  25. देखेः इब्न असीर, असद अल ग़ाबा, 1409 हिजरी, भाग 1, पेज 135
  26. इब्न हजर, अल इसाबा, 1415 हिजरी, भाग 1, पेज 381; इब्न असीर, असद अल ग़ाबा, 1409 हिजरी, भाग 1, पेज 135
  27. इब्न असीर, असद अल ग़ाबा, 1409 हिजरी, भाग 1, पेज 135; मक़रीज़ी, इम्ताअ अल अस्माअ, 1420 हिजरी, भाग 2, पेज 13
  28. दैनूरी, अखबार अल तुवाल, 1371 शम्सी, पेज 242; याक़ूत हमवी, मोजम अल बुलदान, 1995 ई, भाग 2, पेज 489; मसऊदी, अल तंबीह व अल अशराफ़, काहिरा, पेज 256

स्रोत

  • आलूसी, महमूद, बुलूग अल अरब फ़ी मारफ़त अहवाल अल अरब, संशोधन मुहम्मद बहज असरी, बैरूत, दार अल कुतुब अल इल्मीया
  • इब्न असीर, अली बिन मुहम्मद, असद अल ग़ाबा फ़ी मारफ़त अल सहाबा, बैरूत, दार अल फ़िकर, 1409 हिजरी
  • इब्ने हजर असक़लानी, अहमद बिन अली, अल इसाबा फ़ी तमईज़ अल सहाबा, शोध आदिल अहमद अब्द अल मौजूद व अली मुहम्मद मोअव्विज़, बैरूत, दार अल कुतुब अल इल्मीया, 1415 हिजरी
  • इब्न अब्दुर बिर्र, युसूफ़ बिन अब्दुल्लाह, अल इस्तिआब फ़ी मारफ़त अल असहाब, शोध अली मुहम्मद बजावी, बैरूत, दार अल जील, 1992 ईस्वी
  • बलाजुरी, अहमद बिन याह्या, अंसाब अल अशराफ़, शोध मुहम्मद हमीदुल्लाह, मिस्र, दार अल मारफ़त, 1959 ईस्वी
  • दैनूरी, अहमद बिन दाऊद, अखबार अल तुवाल, अनुवाद महमूद महदवी दामग़ानी, तेहरान, नशर नै, चौदहवां संस्करण, 1371 शम्सी
  • आमोली, जाफ़र मुर्तज़ा, अल सहीह मिन सिरत अल नबी अल आज़म, क़ुम, मोअस्सेसा फ़रहंगी दार अल हदीस
  • अस्करि, सय्यद मुर्तज़ा, यकसद व पंजाह सहाबी साखतगी, अनुवाद अता मुहम्मद सरदार निया, क़ुम, दानिशकदा उसूल दीन, 1378 शम्सी
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  • लाहूती, बहज़ाद, जौफ़, दर दानिशनामा जहान इस्लाम, भाग 11
  • मसऊदी, अली बिन हुसैन, अल तंबीह व अल अशराफ़, संशोधन अब्दुल्लाह इस्माईल सावी, काहिरा, दार अल सावी
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  • वाक़ेदी, मुहम्मद बिन उमर, अल मग़ाज़ी, शोध मारसदन जोनिस, बैरूत, मोअस्सेसा अल आलमी, 1409 हिजरी
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