अरबाईन वॉक
1970 में अरबाईन के जुलूस का एक चित्र 1970 में अरबाईन के जुलूस का एक चित्र | |
जानकारी | |
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समय | सफ़र के महीने से लेकर अरबाईन के दिन तक |
स्थान | कर्बला की ओर जाने वाली सड़कों में सबसे लोकप्रिय नजफ़ से कर्बला जाने वाली सड़क है। |
भौगोलिक सीमाएँ | इराक़ और उसके पड़ोसी देश |
प्रार्थना | ज़ियारते अरबईन |
अरबईन वॉक (अरबी:مسيرة الأربعين) या अरबईन पैदल मार्च, या अरबईन पद-यात्रा, शिया अनुष्ठानो मे से एक अनुष्ठान है जोकि इराक़ के विभिन्न राज्यो और शहरो से आरम्भ होकर इस्लामी कैलेंडर के दूसरे महीने सफ़र की 20 तारीख़ (अरबईने हुसैनी – इमाम हुसैन (अ) के चेहलुम) के दिन इमाम हुसैन (अ) की पवित्र दरगाह पर ज़ियारते अरबईन पढ़ने के साथ समाप्त होता है। अरबईन मार्च अधिकतर जनता इसको पैदल अंजाम देती है। इस यात्रा मे श्रद्धालुओ के स्वागत और विश्राम करने हेतु जगह जगह सड़क के किनारे कैम्प लगाए जाते है जिन्हे मौकिब कहा जाता है। अधिकांश श्रद्धालु इस पैदल यात्रा को नजफ़ से इमाम अली (अ) की पवित्र दरगाह से आरम्भ करके कर्बला ए मोअल्ला इमाम हुसैन (अ) की दरगाह पर पहुंचते है।
इराक़ मे सद्दाम के शासन काल मे अरबईन वॉक को सीमित करने के बहुत प्रयास हुए परंतु 2003 मे सद्दाम के शासन का पतन होने के साथ साथ अरबईन वॉक पहले की तुलना मे बहुत अधिक व्यवस्थित रूप से आयोजित हो रही है। हर वर्ष इराक के अलावा दुनिया के विभिन्न देशो विशेष रूप से ईरान इस पदयात्रा मे सम्मिलित होने के लिए लाखो की संख्या मे श्रद्धालु इराक़ की यात्रा करते है। प्राप्त जानकारी के अनुसार शिया समुदाय के अलावा सुन्नी, ईसाई, ईज़दी और दूसरे धर्मो के अनुयायी भी इस पदयात्रा मे भाग लेते है।
इन अंतिम वर्षो मे अरबईन पैदल यात्रा मे भाग लेने वालो की संख्या करोड़ो मे पहुंच गई है यहा तक कि यह समारोह दुनिया मे आयोजित होने वाला सबसे बड़ा धार्मिक समारोह मे परिवर्तित हो चुका है। एक अनुमान के अनुसार 2003 मे डेढ़ करोड़ और 2014 मे 2 करोड़ लोगो ने भाग लिया।
ज़ियारत ए अरबईन की सिफ़ारिश
- मुख़्य लेखः ज़ियारत ए अरबईन
- 51 रकअत नमाज़ पढ़ना, (17 रकअत वाज़िब (प्रतिदिन की अनिवार्य नमाज़ें) 34 रकअत मुसतहब नाफ़ला नमाज़ें)
- अरबाईन की ज़ियारत पढ़ना।
- दाहिने हाथ में अंगूठी पहनना।
- सजदे में माथा जम़ीन (मिट्टी) पर रखना।
- बुलन्द आवाज़ से "बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम" कहना।
इमाम हसन अस्करी (अ) से वर्णित एक हदीस के अनुसार, ज़ियारते अरबईन को मोमिन की पहचानों में से एक बताया गया है।[२] कुछ विद्वानों ने इस हदीस को अरबईन की अहमियत और इसे मनाने का कारण माना है।[३] अल्लामा मजलिसी ने अरबईन के मुस्तहब होने के कारण के बारे में कहा है कि हालांकि प्रसिद्ध यह है कि इसका कारण यह है कि कर्बला के क़ैदी इमाम सज्जाद (अ) की सरपरस्ती में कर्बला वापस लौटे और शहीदों के सरों को उनके शरीरों से मिलाया गया; लेकिन यह बात कि क़ैदी पहले अरबईन पर कर्बला लौटे थे, दूर की बात लगती है। इसलिए यह संभव है कि ज़ियारते अरबईन के मुस्तहब होने का कारण, जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी की ज़ियारत हो जो कि इमाम हुसैन (अ) की क़ब्र के पहले ज़ाएर (ज़ियारत करने वाले) थे या यह दिन वह दिन हो जब कर्बला के क़ैदियों को आज़ादी मिली थी।[४]
इसी प्रकार इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से भी इस दिन की विशेष ज़ियारत मनक़ूल है।[५] शिया विद्वान शेख़ तूसी ने तहज़ीब उल अहकाम[६] और मिस्बाहुल मुतहज्जद[७] में, शेख़ अब्बास क़ुमी ने इस ज़ियारत को अपनी प्रसिद्ध किताब मफ़ातिहुल जिनान के तीसरे अध्याय मे ग़ैर मारूफ़ ज़ियारते आशूरा के बाद ज़ियारते अरबईन नामक शीर्षक से उल्लेख किया है।[८]
इतिहास
कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार, अरबईन के दिन पैदल चलकर ज़ियारत करना इमामों (अ) के समय से ही शियों के बीच प्रचलित रहा है। सय्यद मुहम्मद अली क़ाज़ी तबातबाई ने अपनी किताब "तहक़ीक़ दरबारे औल अरबईन सैय्यदुश्शुहदा" में इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत को अरबईन के दिन एक सुन्नत और इमामों के ज़माने से लगातार चलता आ रहा शिया कार्य बताया है, जिसे बनी उमय्या और बनी अब्बास के दौर में भी शियों ने निभाया।[९]
कहा जाता है कि यह पैदल चलने की परंपरा शेख़ अंसारी (१२१४–१२८१ हिजरी) के दौर में आम थी और बहुत से आलिम कर्बला पैदल जाया करते थे; लेकिन यह परंपरा मिर्ज़ा हुसैन नूरी के ज़माने में कुछ हद तक भुला दी गई थी, और उन्होंने इसे दोबारा जीवित किया। मुहद्दिस नूरी ने अपने शागिर्दों और साथियों के साथ नजफ़ से कर्बला तक का रास्ता तीन दिनों में तय किया करते थे।[१०] अदब अल-तफ़ नामक किताब के लेखक ने कर्बला में आयोजित अरबईन की रस्म का विवरण देते हुए इस सभा की तुलना मक्का में मुसलमानों की भीड़ से की है और उल्लेख किया है कि इस अवसर पर विभिन्न मातमी जुलूस उपस्थित होते हैं, जिनमें से कुछ तुर्की, अरबी, फ़ारसी और उर्दू में मर्सिये (शोकगीत) पढ़ते हैं। अदब अल-तफ़ किताब १३८८ हिजरी / १९६७ ई. में प्रकाशित हुई थी और इसके लेखक ने अरबईन में भाग लेने वाले ज़ायरीनों की संख्या दस लाख से अधिक आँकी है।[११]
सद्दाम काल मे पैदल मार्च पर प्रतिबंध
चौदहवी चंद्र शताब्दी के अंत मे इराक़ की बअसी सरकार ने अरबईन पैदल मार्च पर प्रतिबंध लगाते हुए कभी कभी तीर्थयात्रीयो के साथ हिंसक व्यवहार करते थे। इसी कारण वंश उनके शासन काल मे अरबईन पैदल मार्च मे कुछ कमी आई इसके विपरीत आयतुल्लाह सय्यद मुहम्मद सद्र ने कर्बला की यात्रा करने को वाजिब घोषित कर दिया।[१२]
अरबईन इंतेफाज़ा
अरबईन की पदयात्रा के दौरान सन २०१४ ईस्वी में नजफ़ से कर्बला के रास्ते में ३० किलोमीटर लंबी एक नमाज़े जमाअत अदा की गई, जिसमें हजारों ज़ायरीन ने हिस्सा लिया।[१३]
- मुख़्य लेखः अरबईन इंतेफाज़ा
इराक की बअसी सरकार ने हर प्रकार के धार्मिक समारोहो को सीमित किया और कर्बला की ओर पद-यात्रा करने और मौकिब लगाने पर प्रतिबंध लगा दिया।[१४] लेकिन इसके बावजूद नजफ़ वासियो ने इस्लामी कैलेंडर के दूसरे महीने सफ़र की 15 तारीख 1397 हिजरी अर्थात 1977 ई. को अरबईन पद-यात्रा करने के लिए तैयार हो गए।[१५] तीस हज़ार लोगो पर आधारित एक कारवान ने कर्बला की ओर हरकत की। बअसी सरकार ने इस कारवान को रोकने के लिए प्रारम्भ से ही प्रयास करते हुए विरोधी कार्रवाई की जिसके परिणाम स्वरूप कई लोगो ने अपने प्राणो की आहूती दी नजफ से कर्बला जाने वाले मार्ग पर फौज ने तीर्थयात्रीयो पर हमला करते हुए हज़ारो तीर्थयात्रीयो को गिरफ्तार किया।[१६] इन हमलो मे कुछ लोग अपने प्राणो की बाजी हारते हुए शहीद हो गए और कुछ को फांसी के फंदे पर चढ़ाया गया और कुछ को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई। उनमे से एक मुहम्मद बाक़िर हकीम है जिन्हे आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई।[१७]
तीर्थयात्रियो की संख्या मे वृद्धि
"इन हालिया वर्षों में एक अनोखी और अभूतपूर्व घटना सामने आई है, और वह है कर्बला तक की पदयात्रा। यह एक ऐसा आंदोलन है जो इश्क़ (प्रेम) और ईमान (आस्था) से भरा हुआ है। हम भी दूर से इस आंदोलन को देखते हैं और उन लोगों के हाल पर रशक (ईर्ष्या नहीं, बल्कि सकारात्मक भाव से हसरत) करते हैं जिन्हें यह तौफ़ीक़ (सौभाग्य) मिला कि उन्होंने यह यात्रा पूरी की।"[१८]
2003 ई. मे सद्दाम की सरकार के पतन पश्चात इराक़ मे अरबईन पद-यात्रा मे एक बार फिर रौनक़ आ गई और हर साल इस जमावड़े मे सम्मिलित होने वालो की संख्या मे बीते साल की तुलना मे वृद्धि होना आरम्भ हो गई।[१९] प्रारम्भिक वर्षो मे इस जमावड़े मे सम्मिलित होने वाली की संख्या 20 से 30 लाख होती थी परंतु बाद के वर्षो मे यह संख्या बढ़कर एक करोड़ से पार हो गई।[२०] अब इस जमावड़े को दुनिया का सबसे बड़ा धामिक जमावड़ा बताया जाता है।[२१]
इराक़ी सरकार की घोषणा के अनुसार सन् 2014 ई. मे एक करोड़ तीन लाख हुसैनी जाएरीन इराक़ पहुंचे है और उन्होने कर्बला की ओर अपनी पद-यात्रा आरम्भ की ताकि इमाम हुसैन (अ) के चेहलुम मे अपनी सम्मिलिती यक़ीनी बनाकर इमाम हुसैन (अ) के रौज़े में पहुंचे।[२२]
हज़रत अब्बास (अ) के रौज़े की प्रबंधक कमैटी ने 2016 मे घोषणा की चेहलुम से 13 दिन पहले अर्थात इस्लामी कैलेंडर मे दूसरे महीने सफर की 7 से लेकर 20 तारीख तक 11 मिलियन 2 लाख से अधिक श्रद्धालु कर्बला मे प्रवेश कर चुके है।[२३] इस प्रकार सन् 2018 मे इमाम हुसैन (अ) के हरम प्रबंधक कमेटी ने घोषणा की अरबईन से 10 दिन पहले अर्थात 10 से 20 सफर तक 11 मिलियन 8 लाख से अधिक श्रद्धालु कर्बला के असली मार्गो से प्रवेश कर चुके है। जो लोग गली कूचो से कर्बला मे दाखि हुए थे या जो कर्बला के केंद्र अर्थात 3 किमी. की दूरी पर पहुंचे बिना वापस चले गए हो उनकी संख्या इस गणना मे नही है जो घोषित की गई है।[२४]
श्रद्धालु की संख्या मे इसके अलावा भी विभिन्न साइटो और न्यूज़ चैनलो से प्रसारित हुई है इनमे से कुछ रिपोर्टो मे इस जमावड़े मे 15 मिलियन श्रद्धालुओ की सम्मिलिती की सूचना दी गई है।[२५] जबकि कुछ दूसरी रिपोर्टो मे संख्या 20 मिलियन अर्थात 2 करोड़ बताई गई है।[२६]
तसनीम न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 2019 मे दस हजार से अधिक मौकिब लगाए गए यह संख्या आधिकारिक तौर पर इमाम हुसैन (अ) और हज़रत अब्बास (अ) के रौज़ो पर रजिस्ट्रड है। हालांकि, इराकी अधिकारी मोकिबो की वास्तविक संख्या का खुलासा करने से हिचक रहे हैं, क्योंकि ये कर्बला की ओर जाने वाली इराक की सड़कों पर सैकड़ों किलोमीटर तक फैले हुए होते हैं। और कुछ का कहना है कि मोकिबो की कुल संख्या एक लाख से अधिक हो सकती है। अनौपचारिक आंकड़ों के अनुसार, इस साल इस समारोहों में 2 करोड़ दस लाख लोगों ने भाग लिया, जिनमें से 1 करोड़ 70 लाख लोग स्वयं इराकी थे। इराक के बाहर से आए गैर इराकियों की संख्या लगभग 40 लाख थी जो दुनिया के सत्तर देशों से आए थे।
विदेशी लोगी की अरबईन वॉक मे भागीदारी
कहा जाता है कि अरबईन यात्रा में दुनिया के सत्तर देशों जैसे ऑस्ट्रिया, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन, अमेरिका, ब्रिटेन, अर्जेंटीना और रूस से तीर्थयात्री शामिल होते हैं।[२७] इराक़ के गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, साल 2013 में कम से कम 13 लाख विदेशी तीर्थयात्री इराक़ आए और अरबईन यात्रा में भाग लिया।[२८] इराक़ सरकार के 2018 के आंकड़ों के अनुसार, यह संख्या बढ़कर 18 लाख से अधिक हो गई थी।[२९] साल 2022 में विदेशी तीर्थयात्रियों की संख्या 50 लाख बताई गई,[३०] जिनमें से 35 लाख ईरानी थे।[३१]
वर्ष | कुल तीर्थयात्रियों की संख्या (व्यक्तियों में) | ईरानी तीर्थयात्रियों की संख्या |
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2024 ई | 21,480,525[३२] | 36,58,889 (ईरान की सीमाओं से गुजरने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या)[३३] |
2023 ई | 22,019,146[३४] | 4,050,000[३५] - 4,150,000 (500,000 विदेशी नागरिक थे जो ईरानी सीमा पार कर इराक़ में आये थे।)[३६] |
2022 ई | 21,198,640[३७] | 3,500,000[३८] |
2021 ई | 16,327,542[३९] | 60,000 लोग (कोरोना के कारण प्रतिबंध)[४०] |
2020 ई | 14,553,308[४१] | कोरोना के कारण अनुपस्थिति |
2019 ई | 15,229,955[४२] | 3,500,000[४३] |
2018 ई | 15,322,949[४४] | 2,000,000[४५] |
2017 ई | 13,874,818[४६] | 2,320,000[४७] - 2,350,000[४८] |
2016 ई | 11,210,367[४९] | 2,200,000[५०] - 2,500,000[५१] |
2015 ई | 22,000,000[५२] | 1,700,000[५३] |
2014 ई | 22,000,000[५४] | 1,200,000[५५] |
2013 ई | - | 802,000[५६] |
2012 ई | - | 480,000[५७] |
2011 ई | - | 80,000[५८] |
2010 ई | 16,000,000[५९] | 40,000[६०] |
पैदल दूरी

दो इराक़ी शहरों से तीर्थयात्री कर्बला की ओर चलते हैं; लेकिन अधिकांश ईरानी तीर्थयात्री और पाकिस्तान[६१] जैसे देशों के तीर्थयात्री जो ईरान के रास्ते इराक़ जाते हैं, वे नजफ़ से कर्बला तक का रास्ता पैदल यात्रा के लिए चुनते हैं। मुख्य मार्ग पर पैदल यात्रा की दूरी लगभग 80 किलोमीटर है, जिसे आमतौर पर दो से तीन दिनों में पूरा किया जाता है। नजफ़ से कर्बला के रास्ते में 1452 स्तंभ हैं।[६२]
इसके अलावा, नजफ़ से कर्बला के लिए एक और रास्ता है, जिसे "तरीक़-उल-उलेमा" या "तरीक़-उल-फ़ोरात" के नाम से जाना जाता है, और कुछ अरबईन तीर्थयात्री इस मार्ग से कर्बला पहुँचते हैं। तरीक़-उल-उलेमा फ़ोरात नदी के किनारे खजूर के बाग़ों से होकर गुज़रता है और इसकी दूरी 89 किलोमीटर है। पहले नजफ़ के विद्वान अर्बाइन की पैदल यात्रा के लिए इसी मार्ग का उपयोग करते थे।[६३]
बग़दाद (काज़मैन) - मुसैयब - कर्बला का मार्ग और हिल्ला - तुवैरिज - कर्बला का मार्ग भी अर्बाइन की पैदल यात्रा के अन्य मार्ग हैं; हालाँकि, अधिकांश इराकी इन दो मार्गों का उपयोग करते हैं। अधिकांश मौकिब (सेवा शिविर) भी इराक़ियों के होते हैं।[६४]
अनुष्ठान और शिष्टाचार
हौसा ख़ानीः हौसा दक्षिणी इराक के विशेष अरबी क़सीदो को कहा जाता है इस क़सीदे की पक्तिया वीरता और बहादुरी को बयान करती है जिन्हे अत्यधिक कठिन कार्यो को करने के लिए मनुष्यो मे ऊर्जा पैदा करने के लिए पढ़ा जाता है। उपस्थित व्यक्तियो मे से एक व्यक्ति के एक पक्ति पढ़ने के बाद सभी उपस्थित व्यक्ति उसको दोहराते हुए आगे बढ़ते जाते है। हौसा ख़ानी एक प्रचलित सुन्नत है जिसे अरबईन के दिनो मे इराकी श्रृद्धालु कर्बला जाते हुए पढ़ते है।[६५]
अरबईन के धार्मिक अनुष्ठानों का आरम्भः अरबईन के पारंपारिक और प्राचीन अनुष्ठान इमाम हुसैन (अ) के चेहलुम अर्थात 20 सफ़र से 5 दिन पहले इमाम हुसैन की अज़ादारी के विशेष रीति रिवाज अदा करने वाले काफ़िलो के कर्बला पहुंचने से आरम्भ हो जाते है। उसके बाद मातम और ज़ंजीर ज़नी करते हुए श्रृद्धालु कर्बला पहुंचते है और अरबईन की अस्ली अज़ादारी नमाजे ज़ोहर के दो घंटे बाद आरम्भ होती है। सभी श्रृद्धालु हरम ए इमाम हुसैन (अ) के प्रवेश द्वार के पास खड़े होकर सीनो पर मातम करते है, मरसिया पढ़ने वाला मरसिया पढ़ता है और बाकी लोग उसको दोहराते है और अंम मे अज़ादाराने इमाम हुसैन (अ.) हाथ उठाकर अपने मौला की सेवा मे सलाम करते है।[६६]
मेहमानों का आतिथ्य: नहरे फ़ुरात के किनारे बसने वाले क़बीले इमाम हुसैन (अ) के अरबईन के दिनो मे पैदल चलने वालो के रास्ते मे चादरो के बड़े बड़े टैंट लगाते है जिन्हे मौकिब या मुज़ीफ़ कहा जाता है। इन टैंटो मे मेहमानो का आतिथ्य और विश्राम का प्रबंध होता है।[६७] क़बीलो और संप्रदायिक जमावड़े मे बहुत अधिक टैंट लगाए जाते है। यह सभी मौकिब किसी प्रकार के सरकारी सहायता के बिना पूर्ण रूप से मनुष्यो की अपनी मदद से लगाए जाते है। इनमे श्रृद्धालुओ को हर प्रकार की सुविधा जैसे भोजन, विश्राम स्थल आदि का प्रबंध होता है।[६८] ईरान सहित दूसरे देशो से लाखो लोग इसी उद्देश्य से कर्बला पहुंचते है।
अरबईन से वंचित रह गए लोगों की पैदल यात्रा
- मुख्य लेख: अरबईन से वंचित रह गए लोग (रस्म)
हर साल अर्बाइन के दिनों में, ईरान के विभिन्न शहरों में "जामांदगान-ए-अर्बाइन" (अर्बाइन से वंचित रह गए लोगों) नामक एक समारोह आयोजित किया जाता है।[६९] इस समारोह में, वे लोग जो उस साल इराक में अर्बाइन की पैदल यात्रा में शामिल नहीं हो पाए होते हैं, एक निर्धारित मार्ग पर पैदल चलते हैं।[७०] यह अनुष्ठान इराक़,[७१] पाकिस्तान[७२] और अफ़गानिस्तान[७३] जैसे देशों में भी आयोजित किया जाता है।
मोनोग्राफ़ी
अर्बईन की पैदल यात्रा और इससे जुड़े विषयों पर कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:
"सर-आग़ाज़" (6-खंडीय संग्रह) – यह पुस्तक ईरान के सर्वोच्च नेता सैयद अली ख़ामेनेई के भाषणों पर आधारित है, जिसमें वैश्विक अर्बईन पैदल यात्रा के पाँच मुख्य उद्देश्यों पर प्रकाश डाला गया है। ये पाँच उद्देश्य हैं: एकता (वहदत), कर्बला की घटना को पुनर्जीवित करना, सत्य बनाम असत्य का संघर्ष, अरबईन पैदल यात्रा की घटना, आदर्श निर्माण इन विषयों पर सैयद मुहम्मद सादेक़ी आरमान द्वारा संकलित छह खंडों में यह पुस्तक शहीद काज़मी प्रकाशन द्वारा 2019 में प्रकाशित की गई। पहला खंड इसका प्रस्तावना है।[७४]
"बे सहरा शुदम, इश्क़ बारीदे बूद..." यह अरबईन यात्रा का एक विवरणात्मक विवरण है, जिसे ग़ुलाम अली हदाद आदिल ने लिखा है। यह तेहरान, दफ़्तर-ए नशर-ए फ़रहंग-ए इस्लामी द्वारा 2018 तीसरा संस्करण, में प्रकाशित किया गया।[७५]
"अरबईन: बिस्तर-ए ज़ुहूर" (अर्बईन: प्रकटीकरण का आधार) – यह पुस्तक फ़ारसी भाषा में है और इस्लामी क्रांति के अनुसंधान एवं विचार फाउंडेशन द्वारा 2020 में प्रकाशित की गई। इसमें एक भूमिका और नौ भाग हैं, जो इमाम हुसैन (अ.स.) के आंदोलन में सरकार के गठन और ईरान की इस्लामी क्रांति के साथ इसके संबंध पर केंद्रित हैं।[७६]
"अरबईन और इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़ियारत में पैदल यात्रा का महत्व एवं इसके अद्भुत प्रभाव" – यह पुस्तक जाबिर रिज़वानी द्वारा लिखी गई है और क़ुम, बनी-अज़-ज़हरा प्रकाशन द्वारा 2019 (प्रथम संस्करण, 1398 श.) में प्रकाशित की गई।
फ़ुटनोट
- ↑ शेख़ तूसी, तहज़ीबुल अहकाम, 1407 हिजरी, खंड 6, पृष्ठ 52.
- ↑ शेख़ मुफ़ीद, अल मज़ार- मनासिक अल मज़ार, 1413 हिजरी, पृष्ठ 53; शेख़ तूसी, तहज़ीब उल-अहकाम, भाग 6, पेज 52
- ↑ जाफ़रयान, दलील ए बुज़ुर्ग दाश्तन ए अरबईन चीस्त? पृष्ठ 40।
- ↑ मजलिसी, बिहार उल अनवार, 1403 हिजरी, भाग 98, पेज 334।
- ↑ शेख़ तूसी, तहज़ीब उल-अहकाम, भाग 6, पेज 13
- ↑ शेख़ तूसी, तहज़ीब उल अहकाम, 1407 हिजरी, भाग 6, पेज 113 और 114।
- ↑ शेख़ तूसी, तहज़ीब उल अहकाम, 1407 हिजरी, भाग 6, पेज 788 और 790।
- ↑ मफ़ातीह उल-जनान, ज़ियारत ए अरबईन, बाबे ज़ियारात, पेज 642
- ↑ क़ाज़ी तबातबाई, तहक़ीक़ दर बारा ए अव्वल ए अरबईन सय्यद उश-शोहदा, पेज 2
- ↑ ज़िन्दगी नामे मिर्ज़ा हुसैन नूरी, बलाग़ साइट
- ↑ शब्बर, अदब अल तफ़ व शोअरा अल हुसैन (अ), 1401 हिजरी, भाग 1, पृष्ठ 41।
- ↑ मज़ाहिरी, फ़रहंग ए सोगे शीई, पेज 102
- ↑ "कर्बला-ए-मोअल्ला और नजफ़-ए-अशरफ़ के बीच 30 किलोमीटर लंबी सबसे बड़ी नमाज़-ए-जमाअत का आयोजन" – तस्नीम न्यूज़ एजेंसी। "नजफ़ से कर्बला की सड़क पर 30 किलोमीटर लंबी नमाज़-ए-जमाअत अदा की गई + वीडियो" – अल-आलम नेटवर्क।
- ↑ अल-मोमिन, सनवात उल-जम्र, पेज 165
- ↑ अल-असादी, मोजिज़ तारीख उल-इराक़ अल-सियासी उल-हदीस, पेज 101
- ↑ वैली, नहज़त ए इस्लामी शिआयान ए इराक़, पेज 81
- ↑ अल-असादी, मोजिज़ तारीख़ उल-इराक़ अल-सियासी उल-हदीस, पेज 103
- ↑ "अरबईन की पदयात्रा: दुनिया का सबसे बड़ा समागम" आयतुल्लाह ख़ामेनेई की आधिकारिक वेबसाइट।
- ↑ मज़ाहेरी, फ़रहंग ए सोग ए शीई, पेज 102
- ↑ अरबईन, शुकूह बैअती मुजद्दद बा इमाम हुसैन, तसनीम एजेंसी पर प्रकाशित, 29 आज़र 1392
- ↑ ग़ुज़ारिश रोज़नामा फ़रांसवि लूमूंद अज़ मरासिम ए अरबईन दर कर्बला, साइट रोज़नामा लूमूंद
- ↑ एदाद उज़ ज़ाएरीन अल-मुशात नहारन फ़ी अरबईनीयतिल इमाम अल-हुसैन (अ), आधिकारिक साइट रौज़ा ए जनाबे अब्बास
- ↑ अल-कश्फ़ो अनिल एहसाइयतिल औलियते ले एदाद इज़ ज़ाएरीन बेहस्बे मा रसदतहू कामिरातिल अतबातिल हुसैनियते, इमाम हुसैन (अ) के रोज़े की अधिकारिक साइट
- ↑ 15 मिलयन शिया दर हाले रसीदन बे कर्बला, साइट खबर फ़र्दा
- ↑ इज्तेमाअ 20 मिलयुनी अरबईने हुसैनी दुनिया रा मुताहव्विल खाहद कर, ख़बर गुज़ारी ईलना
- ↑ तेअदादे ज़ाइर ए ग़ैर ए इराक़ी दर अरबईन, साइट खबरे फर्दा
- ↑ "अरबईन पैदल यात्रा के 7 विश्व रिकॉर्ड", फार्स न्यूज़ एजेंसी।
- ↑ "अरबईन में गैर-इराकी तीर्थयात्रियों की संख्या", साती खबरी फर्दा।
- ↑ "19 सफर अल-खैर तक 18 लाख से अधिक अरब और विदेशी तीर्थयात्रियों का प्रवेश", कर्बला अध्ययन और शोध केंद्र।
- ↑ "इराक की आधिकारिक रिपोर्ट: इस साल अरबईन के तीर्थयात्रियों की संख्या 2 करोड़ से अधिक हो गई", हज और ज़ियारत के मामलों में वली फकीह का प्रतिनिधि कार्यालय।
- ↑ "इराक की आधिकारिक रिपोर्ट: इस वर्ष अरबईन यात्रा में 2 करोड़ से अधिक तीर्थयात्रियों ने भाग लिया", हज एवं ज़ियारत विभाग में वली-ए-फकीह का प्रतिनिधि कार्यालय।
- ↑ "अरबईन की ज़ियारत में भाग लेने वाले ज़ायरीन की संख्या की घोषणा", अल-क़फ़ील नेटवर्क – अज़ीज़ अब्बासी दरगाह की आधिकारिक वेबसाइट।
- ↑ "अरबईन हुसैनी (अ.) के केंद्रीय मुख्यालय का नोटिस संख्या १९", गृह मंत्रालय की वेबसाइट।
- ↑ "अरबईन की ज़ियारत में भाग लेने वाले ज़ायरीन की संख्या की घोषणा", अल-क़फ़ील नेटवर्क – अज़ीज़ अब्बासी दरगाह की आधिकारिक वेबसाइट।
- ↑ "इस साल अरबईन में भाग लेने वाले ईरानियों की संख्या ४० लाख ५० हज़ार तक पहुँची", जवन ऑनलाइन वेबसाइट।
- ↑ "इस साल अरबईन में सीमा के दोनों ओर की अनकही बातें – गृह मंत्रालय के उपमंत्री की ज़ुबानी", गृह मंत्रालय की वेबसाइट।
- ↑ "अज़ीज़ अब्बासी दरगाह: इमाम हुसैन (अ.) की अरबईन ज़ियारत में ज़ायरीन की संख्या २१ मिलियन से अधिक", अल-क़फ़ील नेटवर्क – अज़ीज़ अब्बासी दरगाह की आधिकारिक वेबसाइट।
- ↑ "अरबईन के अवसर पर लगभग ३००० ईरानी मोक़िबों की सेवा समाप्त", अत्तबात आलेयात के पुनर्निर्माण मुख्यालय।
- ↑ "अज़ीज़ अब्बासी दरगाह: इमाम हुसैन (अ.) की अरबईन ज़ियारत में ज़ायरीन की संख्या २१ मिलियन से अधिक", अल-क़फ़ील नेटवर्क – अज़ीज़ अब्बासी दरगाह की आधिकारिक वेबसाइट।
- ↑ "मेहरान बॉर्डर बंद है, ज़ायरीन वहाँ न जाएँ", गृह मंत्रालय की वेबसाइट।
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- ↑ "गृह मंत्री: ईरान के ३.५ मिलियन ज़ायरीन ने अरबईन की पदयात्रा में भाग लिया", तस्नीम न्यूज़ एजेंसी।
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- ↑ "अरबईन ९७ के ज़ायरीन की अंतिम संख्या", अल-आलम न्यूज़ एजेंसी।
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- ↑ "इन्फोग्राफिक: साल ९० से ९६ तक ईरानी ज़ायरीन की अरबईन ज़ियारत में भागीदारी के आँकड़े", अबना न्यूज़ एजेंसी; "साल ९० से ९६ तक ईरानी ज़ायरीन की संख्या + इन्फोग्राफिक", यंग जर्नलिस्ट क्लब।
- ↑ "अरबईन ९७ के ज़ायरीन की अंतिम संख्या", अल-आलम न्यूज़ एजेंसी।
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- ↑ "साल ८९ से ९५ के बीच कर्बला में ईरानी ज़ायरीन की संख्या में ५५ गुना वृद्धि", मशरिक़ न्यूज़ एजेंसी; "५५ गुना वृद्धि", दनियाए इक़्तेसाद वेबसाइट।
- ↑ "इस साल ३ मिलियन ज़ायरीन ने अरबईन पदयात्रा में भाग लिया", मेहर न्यूज़ एजेंसी।
- ↑ "अज़ीज़ अब्बासी दरगाह: इस साल की अरबईन ज़ियारत में २२ मिलियन से अधिक ज़ायरीन ने भाग लिया", अल-क़फ़ील नेटवर्क – अज़ीज़ अब्बासी दरगाह की आधिकारिक वेबसाइट।
- ↑ "साल ८९ से ९५ के बीच कर्बला में ईरानी ज़ायरीन की संख्या में ५५ गुना वृद्धि", मशरिक़ न्यूज़ एजेंसी; "५५ गुना वृद्धि", दनियाए इक़्तेसाद वेबसाइट।
- ↑ "इस साल अरबईन के लिए २२ मिलियन ज़ायरीन कर्बला पहुँचे", अल-आलम न्यूज़ एजेंसी।
- ↑ "साल ८९ से ९५ के बीच कर्बला में ईरानी ज़ायरीन की संख्या में ५५ गुना वृद्धि", मशरिक़ न्यूज़ एजेंसी; "५५ गुना वृद्धि", दनियाए इक़्तेसाद वेबसाइट।
- ↑ "साल ८९ से ९५ के बीच कर्बला में ईरानी ज़ायरीन की संख्या में ५५ गुना वृद्धि", मशरिक़ न्यूज़ एजेंसी; "५५ गुना वृद्धि", दनियाए इक़्तेसाद वेबसाइट।
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- ↑ "अरबईन की ज़ियारत के लिए ज़ायरीन का क़दमों से कर्बला की ओर लगातार पहुँचना जारी", अल-क़फ़ील नेटवर्क – अज़ीज़ अब्बासी दरगाह की आधिकारिक वेबसाइट।
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