पैग़म्बरों की बेअसत
- यह लेख पैग़म्बरों की बेअसत के बारे में है। पैग़म्बरों की संख्या और उनकी शरीयत से परिचित होने के लिए, अम्बिया और नबूवत प्रविष्टियाँ देखें। हज़रत मुहम्मद (स) की बेअसत से परिचित होने के लिए, पैग़म्बर (स) की बेअसत प्रविष्टि देखें।
पैग़म्बरों की बेअसत, से तात्पर्य ऐसे मनुष्यों के चयन से है, जिन्हें ईश्वर ने मानवजाति के मार्गदर्शन के उद्देश्य से वह्य प्राप्त करने और उसे पहुँचाने के लिए चुना है। मुस्लिम धर्मशास्त्रियों ने बेअसत की आवश्यकता को मनुष्य की ईश्वरीय मार्गदर्शन की आवश्यकता, क़ायदा-ए-लुत्फ़ और ईश्वरीय हिकमत के आधार पर स्पष्ट किया है। मुस्लिम दार्शनिकों ने भी मनुष्य की सामाजिक जीवन की आवश्यकता, न्याय और ईश्वरीय क़ानून को बेअसत के कारणों में माना है। जबकि सूफ़ियों ने नबूवत और शरीअत को आध्यात्मिक विकास तथा वास्तविकताओं की पहचान के लिए आवश्यक माना है। क़ुरआन ने भी तौहीद, ईश्वरीय ज्ञान की शिक्षा, तज़किया, न्याय की स्थापना और इत्माम-ए-हुज्जत को बेअसत के उद्देश्यों में गिना है।
बेअसत की वास्तविकता के बारे में भी विभिन्न विचार प्रस्तुत किए गए हैं। धर्मशास्त्रियों के प्रचलित दृष्टिकोण के अनुसार, बेअसत ईश्वर का चयन है और वह्य ईश्वरीय संदेश है, जिसे पैग़म्बर प्राप्त करके लोगों तक पहुँचाता है। इसके विपरीत, कुछ मुस्लिम आधुनिकतावादियों ने धार्मिक अनुभव की अवधारणा पर आधारित होकर बेअसत और वह्य की व्याख्या पैग़म्बर के अनुभव और आंतरिक आध्यात्मिक यात्रा के आधार पर की है। इस दृष्टिकोण के आलोचकों ने इसे वह्य के ईश्वरीय और त्रुटिहीन होने तथा पैग़म्बर के ईश्वर के दूत के रूप में स्थान के साथ असंगत माना है।
अवधारणा और स्थान
पैग़म्बरों की बेअसत से तात्पर्य ऐसे मनुष्यों के चयन से है, जिन्हें ईश्वर ने वह्य प्राप्त करने और उसे पहुँचाने के लिए चुना है।[१] इसका उद्देश्य मनुष्य का मार्गदर्शन करना और उसके लिए पूर्णता तक पहुँचने की भूमिका तैयार करना है।[२] मुहम्मद बाक़िर मजलिसी (निधन: 1110 हिजरी क़मरी) ने पैग़म्बरों की बेअसत से संबंधित रिवायतों को बिहारुल-अनवार में «मअना अन-नुबूव्वत व इल्लतु बअ्सतिल-अंबिया...» नामक अध्याय में संकलित किया है।[३]
बेअसत की आवश्यकता इल्म-ए-कलाम के विषयों में से है और ईश्वरीय कार्यों, तकलीफ़ तथा आम नबूवत के विषयों में इसकी समीक्षा की गई है।[४] मुस्लिम धर्मशास्त्रियों ने इस विषय में बेअसत की संभावना और आवश्यकता,[५] उसकी अच्छाई,[६] उसके उद्देश्य[७] तथा उससे संबंधित शंकाओं[८] के उत्तरों पर चर्चा की है।
बेअसत की आवश्यकता और दर्शन
मुस्लिम विद्वानों ने बेअसत की आवश्यकता का विभिन्न पहलुओं से अध्ययन किया है।[९]
मनुष्य को ईश्वरीय मार्गदर्शन की आवश्यकता
धर्मशास्त्री मनुष्य को ईश्वरीय मार्गदर्शन की आवश्यकता को बेअसत का कारण मानते हैं।[१०] उनके अनुसार, मनुष्य अपनी बुद्धि के द्वारा कुछ अच्छाइयों और बुराइयों तथा जीवन के कुछ मार्गों को पहचान सकता है, लेकिन सुख और सौभाग्य तक पहुँचने के लिए आवश्यक सभी ज्ञान और निर्देशों तक उसकी पहुँच नहीं है और उसे वह्य की आवश्यकता है।[११] वे बेअसत को क़ायदा-ए-लुत्फ़ के उदाहरणों में से भी मानते हैं; अर्थात् ईश्वर मनुष्य को आज्ञापालन के निकट लाने और उसे पाप से दूर रखने के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ उपलब्ध कराता है।[१२] इसी प्रकार, ईश्वरीय हिकमत के आधार पर, चूँकि मनुष्य को पूर्णता तक पहुँचने के लिए पैदा किया गया है, इसलिए उसे इस उद्देश्य तक पहुँचने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाना चाहिए।[१३] कुछ रिवायतों में भी पैग़म्बरों की बेअसत को ईश्वरीय हिकमत और मनुष्य की ईश्वरीय मार्गदर्शकों की आवश्यकता से संबंधित किया गया है।[१४]
समाज को न्याय और शरीअत की आवश्यकता
मुस्लिम दार्शनिकों ने मनुष्य की सामाजिक जीवन और क़ानून की आवश्यकता को भी बेअसत के कारणों में से माना है। फ़ाराबी मनुष्य के पूर्णता तक पहुँचने को मदीना-ए-फ़ाज़िला में जीवन बिताने पर निर्भर मानते हैं और उसके नेता को वह्यानी मार्गदर्शन का आवश्यकता-रखने वाला मानते हैं।[१५] सुहरवर्दी सामाजिक जीवन को सुन्नत और न्याय का आवश्यकता-रखने वाला मानते हैं और उसे नबी तथा वली के बिना संभव नहीं मानते।[१६] इब्ने सीना मनुष्य को सहयोग का आवश्यकता-रखने वाला मानते हैं और सहयोग की प्राप्ति को न्याय पर निर्भर मानते हैं। उनके अनुसार, न्याय को शरीअत की आवश्यकता है और शरीअत भी ऐसे ईश्वरीय क़ानून-निर्माता की ओर से लाई जानी चाहिए, जिसके पास ईश्वर के साथ अपने संबंध को सिद्ध करने के लिए चमत्कार हो।[१७] मुल्ला सद्रा भी मानते हैं कि समाज का नेता अनुभूति, कल्पना और बुद्धि की पूर्णता तक पहुँचा हुआ होना चाहिए, ताकि वह वह्य प्राप्त करने की योग्यता रखता हो।[१८]
आध्यात्मिक विकास के लिए नबूवत
मुस्लिम सूफ़ियों ने भी नबूवत और शरीअत को मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक माना है। इब्ने अरबी शरीअत के कुछ ज्ञान को ऐसी चीज़ों में से मानते हैं, जिन तक मनुष्य अकेले नहीं पहुँच सकता और उन्हें प्राप्त करने के लिए उसे पैग़म्बरों की आवश्यकता होती है।[१९] सय्यद हैदर आमोली, शरीअत को एक ईश्वरीय व्यवस्था मानते हैं, जिसे स्थापित करने का दायित्व अंबिया और औलिया पर है[२०] और वे शरीअत के बिना आंतरिक सत्यों तक पहुँचना संभव नहीं मानते।[२१] अब्दुस्समद हमदानी भी आध्यात्मिक सत्यों की पहचान और मनुष्य के विकास के लिए नबूवत और शरीअत को आवश्यक मानते हैं।[२२]
क़ुरआन में भी तौहीद की ओर बुलाना, ईश्वरीय ज्ञान की शिक्षा देना, तज़किया, अज्ञानता और गुमराही से मुक्ति, न्याय की स्थापना, इत्माम-ए-हुज्जत[२३] और सामाजिक मतभेदों को दूर करना,[२४] पैग़म्बरों की नियुक्ति के उद्देश्यों या कारणों में गिना गया है।
बेअसत की वास्तविकता
बेअसत की वास्तविकता के बारे में विभिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए गए हैं। इन दृष्टिकोणों के बीच मुख्य मतभेद बेअसत के स्रोत और वह्य प्राप्त करने में पैग़म्बर की भूमिका की सीमा के बारे में है।[२५]
बेअसत का ईश्वरीय स्रोत
मुस्लिम धर्मशास्त्रियों के प्रचलित दृष्टिकोण के अनुसार, बेअसत ईश्वर का चयन है और पैग़म्बर ईश्वरीय वह्य प्राप्त करता है।[२६] इन विचारकों के अनुसार, बेअसत से पहले पैग़म्बर आत्मिक पवित्रता और आध्यात्मिक तैयारी के माध्यम से वह्य प्राप्त करने की योग्यता प्राप्त कर सकता है; लेकिन बेअसत और वह्य प्राप्त करते समय वह ईश्वरीय संदेश का प्राप्तकर्ता होता है।[२७] इस आधार पर, ईश्वर सत्यों को एक चुने हुए मनुष्य तक पहुँचाता है ताकि वह उन्हें लोगों तक पहुँचा सके; क्योंकि सभी मनुष्यों में वह्य प्राप्त करने की क्षमता नहीं होती।[२८]
बेअसत में धार्मिक अनुभव की भूमिका
इसके विपरीत, कुछ मुस्लिम नवचिंतकों ने धार्मिक अनुभव की अवधारणा का उपयोग करते हुए बेअसत का विश्लेषण पैग़म्बर-केंद्रित और आंतरिक उभार पर आधारित दृष्टिकोण से किया है। इस दृष्टिकोण में, बेअसत को केवल बाहरी संदेश पहुँचाने के रूप में नहीं, बल्कि पैग़म्बर के आध्यात्मिक विकास और व्यक्तित्व के विस्तार का परिणाम माना जाता है।[२९] इक़बाल लाहौरी (निधन: 1938 ई.) ने अपनी पुस्तक एहया ए फ़िक्रे दीनी दर इस्लाम में बेअसत की वास्तविकता को सूफ़ी अनुभव और पैग़म्बरी अनुभव के बीच अंतर के आधार पर समझाया है। उनके अनुसार, सूफ़ी आध्यात्मिक अनुभव के बाद भौतिक जीवन में लौटने की इच्छा नहीं रखता, जबकि पैग़म्बर इस अनुभव के बाद लोगों के बीच लौटता है और समाज तथा इतिहास को बदलने के लिए प्रयास करता है। इक़बाल पैग़म्बरों की बेअसत को उसके आध्यात्मिक जागरण के रूप में देखते हैं, जिसका उद्देश्य एक नई दुनिया का निर्माण और सामाजिक संरचनाओं में परिवर्तन है।[३०] अब्दुल करीम सूरूश (जन्म: 1324 श.) ने भी पैग़म्बरी अनुभव के विस्तार और रसूल के स्वप्न जैसी अवधारणाएँ प्रस्तुत करते हुए पैग़म्बरी की प्रक्रिया में पैग़म्बर की भूमिका को अधिक प्रमुख बनाया है। उनके दृष्टिकोण में, पैग़म्बर वह्य का निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि उसका सृजनकर्ता और उसे रूप प्रदान करने वाला है। सूरूश के अनुसार, पैग़म्बर अनुभव और आंतरिक साधना के परिणामस्वरूप ईश्वरीय सत्यों की एक समझ तक पहुँचता है और उन्हें अपने समय की भाषा और संस्कृति के रूप में व्यक्त करता है।[३१]
वह्य के अनुभव-आधारित दृष्टिकोण की आलोचना
इस दृष्टिकोण के आलोचक, धार्मिक अनुभव के आधार पर बेअसत की व्याख्या को वह्य को ईश्वरीय और त्रुटिहीन मानने के विचार के साथ असंगत मानते हैं।[३२] उनके अनुसार, यदि बेअसत मनुष्य के धार्मिक अनुभव का परिणाम हो, तो पैग़म्बर और अन्य धार्मिक अनुभव रखने वाले लोगों के बीच अंतर करना कठिन हो जाएगा और नबूवत को एक सार्वभौमिक विषय माना जा सकता है।[३३] उनका यह भी मानना है कि यह दृष्टिकोण पैग़म्बर के स्थान को रसूल और ईश्वरीय संदेश के वाहक से घटाकर एक सुधारवादी सूफ़ी तक सीमित कर देता है और आसमानी किताबों, जिनमें क़ुरआन भी शामिल है, को ईश्वरीय मानने के विचार के साथ भी संगत नहीं है।[३४]
फ़ुटनोट
- ↑ ख़तीबी कोशकक व निगारिश, फ़रहंग-ए-शिया (कलाम), पृष्ठ 159।
- ↑ ख़तीबी कोशकक व निगारिश, फ़रहंग-ए-शीआ (कलाम), पृष्ठ 159।
- ↑ मजलिसी, बिहारुल अनवार, खंड 11, पृष्ठ 1।
- ↑ रब्बानी गुलपायगानी, कलाम-ए-तत्बीक़ी, खंड 2, पृष्ठ 21।
- ↑ सय्यद मुर्तज़ा, शरह जुमल अल-इल्म वल-अमल, पृष्ठ 170; अल्लामा हिल्ली, तस्लीक अल-नफ़्स, पृष्ठ 184।
- ↑ अल्लामा हिल्ली, कश्फ़ अल-मुराद, पृष्ठ 346; मुहक़्क़िक़ हिल्ली, अल-मस्लक फ़ी उसूलिद्दीन, पृष्ठ 153; फ़ाज़िल मिक़दाद, इरशाद अल-तालिबीन, पृष्ठ 296; सरमाया-ए-ईमान, पृष्ठ 87।
- ↑ अबुस्सलाह हलबी, तक़रीब अल-मआरिफ़, पृष्ठ 153; इब्ने मीसम बहरानी, क़वाइद अल-मराम, पृष्ठ 122-124।
- ↑ हुसैनी अलवी, अलाक़ा अल-तजरीद, खंड 2, पृष्ठ 920; सुब्हानी तबरेज़ी, अल-इलाहिय्यात अला हुदा अल-किताब व अल सुन्नत वल-अक़्ल, खंड 3, पृष्ठ 59-64।
- ↑ ख़ुस्रू पनाह, कलाम-ए-जदीद-ए-इस्लामी, खंड 2, पृष्ठ 51।
- ↑ मुतह्हरी, मजमूआ-ए-आसार-ए-उस्ताद शहीद मुतह्हरी, खंड 4, पृष्ठ 290-293।
- ↑ हिम्सी राज़ी, अल-मुनक़िज़ मिन अल तक़लीद, खंड 1, पृष्ठ 373-382; नसीरुद्दीन तूसी, तल्ख़ीस अल-मुहस्सल, पृष्ठ 361-364; लाहीजी, गौहर-ए-मुराद, पृष्ठ 359।
- ↑ शेख़ मुफ़ीद, अल-नुकत अल-एतिक़ादिय्या, पृष्ठ 35; सय्यद मुर्तज़ा, अल-ज़ख़ीरा, पृष्ठ 323।
- ↑ अल्लामा हिल्ली, अल-बाब अल-हादी अशर, पृष्ठ 34-35।
- ↑ कुलैनी, अल-काफ़ी, खंड 1, पृष्ठ 168।
- ↑ मुअल्लिमी, तारीख़-ए-फ़लसफ़ा-ए-इस्लामी, पृष्ठ 112।
- ↑ सुहरवर्दी, मजमूआ-ए-मुसन्नफ़ात-ए-शेख़-ए-इशराक़, खंड 3, पृष्ठ 453-456।
- ↑ इब्ने सीना, अल-इशारात व अल तंबीहात, पृष्ठ 356-357।
- ↑ सद्रुद्दीन शीराज़ी, अल-मबदा वल-मआद, पृष्ठ 617-618।
- ↑ इब्ने अरबी, अल-फ़ुतूहात अल-मक्किय्या, खंड 4, पृष्ठ 121।
- ↑ आमोली, जामिअ अल-असरार व मन्बअ अल-अनवार, पृष्ठ 359।
- ↑ आमोली, अनवार अल-हक़ीक़त व अतवार अल-तरीक़त व असरार अल-शरीअत, पृष्ठ 17-24।
- ↑ हमदानी, बहर अल-मआरिफ़, खंड 1, पृष्ठ 329-331।
- ↑ ख़ुस्रू पनाह, कलाम-ए-जदीद-ए-इस्लामी, खंड 2, पृष्ठ 53-56।
- ↑ तबातबाई, अल-मिज़ान, खंड 2, पृष्ठ 111।
- ↑ सादेक़ी, दर आमदी बर कलाम-ए-जदीद, पृष्ठ 187।
- ↑ सादेक़ी, दर आमदी बर कलाम-ए-जदीद, पृष्ठ 191।
- ↑ सुहरवर्दी, मजमूआ-ए-मुसन्नफ़ात, खंड 3, पृष्ठ 75।
- ↑ मिस्बाह यज़्दी, राह व राहनुमा-शिनासी, पृष्ठ 119।
- ↑ समदपूर, «ماهیت وحی», पृष्ठ 565-566।
- ↑ इक़बाल लाहौरी, एह्या-ए-फ़िक्र-ए-दीनी दर इस्लाम, पृष्ठ 135-139।
- ↑ सुरूश, बस्त-ए-तजुर्बा-ए-नबवी, पृष्ठ 3-28।
- ↑ क़द्रदान क़रामलकी, पासुख़ बे शुब्हात-ए-कलामी दफ़्तर-ए-दोम, पृष्ठ 186-187; समदपूर, «ماهیت وحی», पृष्ठ 566।
- ↑ अब्दुल्लाही, वही दर क़ुरआन, पृष्ठ 130-135।
- ↑ क़द्रदान क़रामलकी, पासुख़ बे शुब्हात-ए-कलामी, दफ़्तर-ए-दोम, पृष्ठ 187; अब्दुल्लाही, वही दर क़ुरआन, पृष्ठ 140-141।
स्रोत
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- अल्लामा हिल्ली, हसन बिन यूसुफ़, कश्फ़ अल-मुराद फ़ी शरह तजरीद अल-एतिक़ाद, क़ुम, क़ुम के हौज़ा-ए-इल्मिया के अध्यापकों का समूह, इस्लामी प्रकाशन संस्था, 1413 हिजरी।
- अल्लामा हिल्ली, हसन बिन यूसुफ़, तस्लीक़ अल-नफ़्स इला हज़ीरा अल-क़ुद्स, क़ुम, इमाम सादिक़ (अ.) संस्था, 1426 हिजरी।
- आमुली, सय्यद हैदर, अनवार अल-हक़ीक़त व अतवार अल-तरीकत व असरार अल-शरीअत, क़ुम, नूर अला नूर प्रकाशन, 1383 शम्सी।
- आमोली, सय्यद हैदर, जामिअ ल-असरार व मन्बअ अल-अनवार, तेहरान, संस्कृति और उच्च शिक्षा मंत्रालय से संबद्ध वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक प्रकाशन केंद्र, 1368 शम्सी।
- इब्ने अरबी, मुहियुद्दीन, अल-फ़ुतूहात अल-मक्किय्या, बेरूत, दार अह्या- अल-तुरास- अल-अरबी प्रकाशन, 1994 ईस्वी।
- इब्ने मीसम बहरानी, मीसम बिन अली, क़वाइद अल-मराम फ़ी इल्म अल-कलाम, क़ुम, आयतुल्लाहिल-उज़्मा मरअशी नजफ़ी (रह.) पुस्तकालय, 1406 हिजरी।
- इब्ने सीना, हुसैन बिन अब्दुल्लाह, अल-इशारात व अल-तन्बीहात, क़ुम, बुस्तान-ए-किताब प्रकाशन, 1423 हिजरी।
- क़द्रदान क़रामलकी, मुहम्मद हसन, पासुख़ बे शुब्हात-ए-कलामी, दफ़्तर-ए-दोम, दीन व नुबुव्वत, तेहरान, फ़रहंग व अंदीश ए इस्लामी शोध संस्थान, 1387 शम्सी।
- कुलैनी, मुहम्मद बिन याक़ूब, अल-काफ़ी, तेहरान, इस्लामी पुस्तकों का प्रकाशन संस्थान, 1407 हिजरी।
- ख़तीबी कोशकक, मुहम्मद और हमीद निगारिश, फ़रहंग-ए-शिया (कलाम), क़ुम, ज़मज़म-ए-हिदायत प्रकाशन, 1386 शम्सी।
- ख़ुस्रू पनाह, अब्दुल हुसैन, कलाम-ए-जदीद-ए-इस्लामी, क़ुम, इस्लामी शिक्षा एवं प्रशिक्षण, 1390 शम्सी।
- तबातबाई, सय्यद मुहम्मद हुसैन, अल-मिज़ान फ़ी तफ़्सीर अल-क़ुरआन, बेरूत, अल-आलमी प्रकाशन केंद्र, 1393 हिजरी।
- नसीरुद्दीन तूसी, मुहम्मद बिन मुहम्मद, तल्ख़ीस अल-मुहस्सल, तेहरान, मैकगिल विश्वविद्यालय, इस्लामी अध्ययन संस्थान, 1359 शम्सी।
- फ़ाज़िल मिक़दाद, मिक़दाद बिन अब्दुल्लाह, इरशाद अल-तालिबीन इला नहज अल-मुस्तरशिदीन, क़ुम, आयतुल्लाहिल-उज़्मा मरअशी नजफ़ी (रह.) सार्वजनिक पुस्तकालय, 1405 हिजरी।
- मजलिसी, मुहम्मद बाक़िर, बिहारुल-अनवार, बेरूत, दार एह्या अल-तुरास प्रकाशन, 1403 हिजरी।
- मिस्बाह यज़्दी, मुहम्मद तक़ी, राह व राहनुमा-शिनासी, क़ुम, इमाम ख़ुमैनी (रह.) शैक्षिक एवं शोध संस्था, 1393 शम्सी।
- मुअल्लिमी, हसन, तारीख़-ए-फ़लसफ़ा-ए-इस्लामी, क़ुम, मरकज़े जहानी उलूमे इस्लामी प्रकाशन, 1385 शम्सी।
- मुतह्हरी, मुर्तज़ा, मजमूआ-ए-आसार-ए-उस्ताद शहीद मुतह्हरी, तेहरान, सद्रा प्रकाशन, 1376 शम्सी।
- मुहक़्क़िक़ हिल्ली, जाफ़र बिन हसन, अल-मस्लक फ़ी उसूलिद्दीन, मशहद, पवित्र रज़वी आस्ताना, इस्लामी शोध सभा, 1414 हिजरी।
- रब्बानी गुलपायगानी, अली, कलाम-ए-तत्बीक़ी, क़ुम, अंतरराष्ट्रीय अल-मुस्तफ़ा प्रकाशन केंद्र, 1402 शम्सी।
- लाहीजी, अब्दुर्रज़्ज़ाक़ बिन अली, गौहर-ए-मुराद, तेहरान, साया प्रकाशन, 1383 शम्सी।
- शेख़ मुफ़ीद, मुहम्मद बिन मुहम्मद, अल-नुकत अल-एतिक़ादिय्या, क़ुम, शेख़ मुफ़ीद की सहस्राब्दी का विश्व सम्मेलन, 1413 हिजरी।
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- समदपूर, मुहम्मद, «ماهیت وحی», कलाम-ए-जदीद त्रैमासिक पत्रिका, संकलन: हसन रज़ाई, क़ुम, बाक़िर अल-उलूम (अ.) शोध केंद्र, 1403 शम्सी।
- सय्यद मुर्तज़ा, अली बिन हुसैन, अल-ज़ख़ीरा फ़ी इल्म अल-कलाम, क़ुम, क़ुम के हौज़ा-ए-इल्मिया के अध्यापकों का समूह, इस्लामी प्रकाशन संस्था, 1411 हिजरी।
- सय्यद मुर्तज़ा, अली बिन हुसैन, शरह जुमल अल-इल्म वल-अमल, तेहरान, औक़ाफ़ एवं परोपकारी मामलों का संगठन, उसवा मुद्रण एवं प्रकाशन संस्था, 1419 हिजरी।
- सादेक़ी, हादी, दर आमदी बर कलाम-ए-जदीद, क़ुम, किताब-ए-ताहा प्रकाशन एवं मआरिफ़ प्रकाशन, 1382 शम्सी।
- सुब्हानी तबरेज़ी, जाफ़र, अल-इलाहिय्यात अला हुदा अल-किताब व अल सुन्नत वल-अक़्ल, क़ुम, इमाम सादिक़ (अ.) संस्था, 1413 हिजरी।
- सुरूश, अब्दुल करीम, बस्त-ए-तजुर्बा-ए-नबवी, तेहरान, सिरात सांस्कृतिक संस्था, 1378 शम्सी।
- सुहरवर्दी, याह्या बिन हबश, मजमूआ-ए-मुसन्नफ़ात-ए-शेख़-ए-इशराक़, तेहरान, उलूमे इंसानी व मुतालेआते फ़रहंगी शोध संस्थान, 1372 शम्सी।
- हमदानी, मौला अब्दुस्समद, बहर अल-मआरिफ़, तेहरान, हिकमत प्रकाशन, 1387 शम्सी।
- हिम्सी राज़ी, महमूद बिन अली, अल-मुनक़िज़ मिन अल तक़लीद, क़ुम, क़ुम के हौज़ा-ए-इल्मिया के अध्यापकों का समूह, इस्लामी प्रकाशन संस्था, 1412 हिजरी।
- हुसैनी अलवी, मुहम्मद अशरफ़ बिन अब्दुलहसीब, अलाक़ा अल-तजरीद, तेहरान, सांस्कृतिक कृतियों और विद्वानों का संघ, 1381 शम्सी।